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महराज तो कोविड और लौकडाउन की वजह से आ नहीं रहे थे. निशा प्रैग्नैंट थी. वह कंप्लीट बैडरेस्ट पर थी और मम्मी जी को गठिया के कारण परेशानी थी.

सुबह के समय निशीथ निभा के कमरे में आ कर बोले, “भाभी, आप के हाथ के मूली के परांठे खाए बहुत दिन हो गए. आज बना दीजिए. निशा का बहुत मन हो रहा है.“

वह खुशीखुशी बनाने में जुट गई थी.

“वाह भाभी, यू आर ग्रेट.”

वह इन तारीफों के जाल में उलझ कर खुशीखुशी रोज नएनए पकवान बनाने में उलझती गई. मम्मी जी बोलीं, “निभा के खाना बनाने की वजह से सब को बढिया खाना मिल जाता है और उस का समय भी अच्छी तरह बीत जाता है.“

मम्मी जी निशा की सेवा में लगी रहतीं क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस खानदान का वारिस आने वाला है. उसे बैड से नीचे पैर न रखने देतीं, जबकि वह ‘डाक्टर के यहां जा रही हूं’ कह कर घंटों के लिए घर से बाहर रहा करती.

कोविड की लहर उतार पर थी. निशा के बेबी शावर की तैयारी धूमधाम से करने के लिए रोज बैठकें हो रही थीं, जिन में निभा का प्रवेश निषेध था क्योंकि वह विधवा थी. उस की बुरी नजर से कुछ अशगुन हो जाता तो... निशा के मायके वाले और मम्मी जी और निशीथ सब बैठ कर प्रोग्राम को शानदार व यादगार बनाने के लिए प्लानिंग करते रहते.

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तभी एक दिन निभा के मोबाइल की घंटी बजी. उधर उस के पुराने ज्वैलर थे, कह रहे थे कि, ”मैडम, जो आप ने डायमंड सैट का और्डर दिया था वह बन कर आ गया है. उस को आप के घर पर पहुंचा दें या फिर यहां आकर देखेंगी.”

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