Family Drama : स्मिता और रोहित में झगड़े बैठक में बैठे सभी सदस्य एकदूसरे से मुसकरा कर बातें कर रहे थे. कोने में सिमटी सी बैठी स्मिता अपने पैर के अंगूठे से फर्श को कुरेदने में लगी हुई थी. कुछ देर के बाद उसेऔर रोहित को कमरे में अकेला छोड़ कर सब उठने लगे मगर सुमित्राजी ने सब को यह कह कर बैठा दिया, ‘‘अरे ये सब करने की कोई जरूरत नहीं है. रोहित की सहमति ले चुकी हूं.
ये सब से जल्दी घुलमिल नहीं पाता है. रिश्ता हमारी तरफ से पक्का है. अगर आप लोगों की भी सहमति है तो आप सब लोग अब अगली बार जब भी हमारे घर आओगे तब हम एक रस्म कर लेंगे’’
यह सुनते ही बैठक में बैठे स्मिता के मम्मी, पापा, भाई, भाभी, रोहित का छोटा भाई राहुल और उस के पिता राधेलाल सभी खुशी से तालियां बजने लगे और एकदूसरे को रिश्ता पक्का करने की खुशी में मिठाई खिलाने लगे.
कुछ हिचकिचाते हुए स्मिता के पिता ओमप्रकाश ने धीरे से कहा, ‘‘आप लोगों की कोई मांग हो तो अभी बता दीजिए. हम विवाह समारोह में ज्यादा खर्च नहीं कर पाएंगे…’’
उन की बात को काटते हुए राधेलाल ने तुरंत कहा, ‘‘अरे भाई साहब अब आप और हम एक ही परिवार के हैं. शादी का खर्च भी आधाआधा रहेगा. आप हमें अपनी बेटी दे रहे हैं, यही हमारे लिए सम्मान की बात है.’’
सुमित्राजी भी बोल पड़ीं, ‘‘देखिए हमारी तो बस इतनी सी मांग है कि हम विवाह के बाद बहू को अपने गुरुजी से मंत्र दिलवाएंगे और फिर यह कभी निरामिश भोजन नहीं करेगी. हमारे घर में सभी सदस्य अपने गुरुजी के बताए मार्ग पर चलते हैं और अंडा, मांस, मछली से दूर ही रहते हैं.’’
यह सुन कर स्मिता की मम्मी रूपाली बोलीं, ‘‘इसे भी मांसमछली बहुत ज्यादा पसंद नहीं है. हां, कभीकभी अंडा खा लेती है.यह भी छोड़ना इस के लिए कोई मुश्किल नहीं है.’’
‘‘बस बात पक्की करते हैं. हमें कुछ नहीं चाहिए. हमारे घर कानपुर में सबकुछ है. बेटे ने भी दिल्ली में टू बीएच के फ्लैट से ले कर घरगृहस्थी का सामान पहले ही जोड़ रखा है. बैंक की पक्की नौकरी है. आप की बेटी को कोई कष्ट नहीं होगा,’’ सुमित्राजी इठलाती हुई बोलीं.
‘‘हमारी बेटी भी वर्क फ्रौम होम ही कर रही है, इसलिए इस से कानपुर या दिल्ली जाने में कोई समस्या नहीं आएगी. बाद में यदि कंपनी से काल आएगी तो फिर तभी देखेंगे कि इसी कंपनी मैं कार्य करना है या फिर वहीं दिल्ली में कोई कंपनी जौइन कर लेनी है,’’ रूपाली ने मुसकराते हुए बताया.
दोनों घरों में शादी की जोरदार तैयारियां शुरू हो गईं. 2 महीने ही शेष रह गए थे.
स्मिता ने अपनी मम्मी से कहा, ‘‘मम्मी, आप की जिद और पापा के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए मैं इस रिश्ते के लिए तैयार हो गई हूं. लेकिन उस दिन रोहित की चुप्पी मु झे खल रही थी. मु झे रोहित से उस की मरजी के विषय में जान लेना चाहिए.’’
‘‘ठीक है बेटा, मैं सुमित्राजी से उन के बेटे का फोन नंबर मांग लेती हूं फिर तुम लोग आपस में सलाह कर लेना,’’ कह कर रूपाली ने सुमित्राजी को फोन मिलाया.
‘‘नमस्कार बहनजी और तैयारियां कैसी चल रही हैं आप लोगों की?’’
‘‘हां जी…, हां जी…, हां जी हां जी यहां भी सब चंगा है जी.’’
‘‘….मैं कह रही थी कि आप के बेटे, हमारे दामाद रोहित का फोन नंबर मिल जाता तो दोनों बच्चे आपस में बात चीत कर लेते, एकदूसरे की पसंद, नापसंद सम झ लेते.’’
‘‘अरेअरे अभी नहीं, आप दे दीजिएगा. वे आराम से बात कर लेंगे… अच्छा स्मिता बेटा… इधर आना देखो सुमित्राजी, अपने फोन से ही बात करा रही हैं. कह रही हैं कि वे आजकल दिल्ली में, शादी की तैयारियों के लिए पहुंची हुई हैं. लो उन के फोन से ही रोहित बेटे से बात कर लो. आज रविवार है तो घर पर ही है’’
स्मिता ने अजीब नजरों से अपनी मम्मी को घूरा और बोली, ‘‘इतनी जल्दी भी नहीं कहा था,’’ फिर फोन पर रोहित से बोली, ‘‘वे आप की पसंद का रंग जानना था मम्मी को कपड़ों की खरीदारी के लिए,’’ और फिर इधरउधर की बातें कर फोन रख दिया क्योंकि वह जानती थी कि उस की होने वाली सास बगल में ही खड़ी है. उस ने रोहित को अपना फोन नंबर बताया और कहा कि आप को जब भी फोन करना हो, कुछ पूछना हो तो इसी नंबर पर बात कर सकते हैं. रोहित ने भी स्वीकृति दे दी.
स्मिता ने अपनी मम्मी से कहा, ‘‘मम्मी मु झे तो लगता है कि ये रोहित ममाज बौय हैं.’’
‘‘क्या है? यह क्या होता है?’’ रूपाली ने पूछा.
‘‘इस का मतलब है, अपनी मम्मी के पल्लू से बंधे रहना, अपनी मरजी से कुछ नहीं करेंगे,’’ यह कह कर स्मिता जोरजोर से हंसने लगी.
उधर रोहित ने अपनी मम्मी को फोन पकड़ा कर कहा, ‘‘हो गई आप की तसल्ली,
कर ली मैं ने बात, कुछ और बाकी हो तो वे भी बता दीजिए. मु झे आज अपने दोस्तों के साथ बाहर जाना है, लंच पर मेरा इंतजार मत करिएगा’’
‘‘कहीं उन्हीं मित्रमंडली के साथ तो लंच नहीं है तेरा जिन का हड्डियों को चबाए बिना खाना हजम नहीं होता,’’ सुमित्रा गुस्से से बोलीं.
‘‘आप भी न मम्मी, घूमफिर कर वही बात करती है. वे लोग खाते हैं. मैं थोड़ी न खाता हूं. मैं तो सिर्फ दालरोटी ही खाता हूं… आप को पता ही है.’’
‘‘और तेरी वह सहेली उस के क्या हाल हैं?’’
‘‘ओह आप रेणुका की बात कर रही हैं. उसे क्या होगा? आप ने उसे सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि वह मांसमछली नहीं छोड़ना चाहती थी. मेरी सहकर्मी है. औफिस में सभी उसे पसंद करते हैं. जिंदादिल लड़की है. अपने पैरों पर खड़ी है. आप को क्या पता? कितनी विपरीत परिस्थितियों से लड़ कर उस ने यह जगह हासिल की है.’’
‘‘अच्छा इस बात को यहीं खत्म कर मु झे उस की तारीफ है नहीं सुननी, उसे अगर तु झ से प्यार होता तो वह अपने खानपान को बदलने तक तैयार हो जाती मगर उस ने तेरी जगह मांसाहार को चुना.’’
‘‘मैं जा रहा हूं मां, अगर घर में रहा तो फिर इसी टौपिक पर बहस होती रहेगी,’’ कह कर रोहित कार की चाबी उठा कर चला गया.
उन दोनों की बहस को सुन रहे, रोहित के पिता राधेलाल अपनी पत्नी सुमित्रा से बोले, ‘‘अब जब बेटा हमारी मरजी से विवाह करने को राजी हो गया है तो फिर तुम क्यों वही पुरानी बातें उस के सामने करती हो. विवाह को कितना कम समय बचा है. अगर यह पीछे हट गया तो समाज में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी?’’
‘‘आप तो चुप ही रहिए. अपने बेटे के आगे आप की जबान नहीं खुलती. सारा ज्ञान मु झे ही देते रहते हैं. वह तो भला हो मेरी सहेली मधु का, जिस ने जबलपुर में यह रिश्ता ठहरा दिया वरना दिल्ली के आसपास के लोग तो इस की सारी करतूत का पता लगा ही लेते. वह लड़की तो दिनरात यहीं फ्लैट में पड़ी रहती थी. लेकिन मांसाहार छोड़ने के नाम पर बिदक गई, अच्छा हुआ. हमें कितनी सुंदरसुशील कन्या मिल गई.’’
राधेलाल ने चुपचाप अखबार पढ़ने में अपनी भलाई सम झी.
कानपुर आ कर दोनों पक्षों ने विवाह को संपन्न करा दिया. दोनों के
परिवार बहुत खुश थे. केवल स्मिता और रोहित के मन में उथलपुथल चल रही थी. विवाह के
1 हफ्ते बाद उन्होंने अपने कुलगुरु को आमंत्रित कर बहू को भी मंत्र की दीक्षा दिलवा दी और बहू से भी मांसाहार न करने की शपथ दिलाई.
स्मिता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा. वह ससुराल में बहुत अच्छे से घुलमिल गई. सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करती और उस के साथ भी सभी बहुत नर्मी से पेश आते. घर में सासससुर के अतिरिक्त छोटा देवर राहुल है, जो एक मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर है. आजकल वर्क फ्रौम होम के चलते घर से ही काम करता है. स्मिता ने फूड ऐंड न्यूट्रिशियन में एमएससी की हुई है इसीलिए वह भी एक कंपनी में ट्रेनी के पद पर कार्यरत है.
कोरोना के समय से ही उस का भी वर्क फ्रौम होम चल रहा है. इसलिए उसे उस से अपने विवाह के समय ज्यादा छुट्टी लेने की जरूरत महसूस नहीं हुई किंतु जब उन का हनीमून पर जाने का कोई भी प्रोग्राम न था तो उस ने फिर से वर्क फ्रौम शुरू कर दिया.
विवाह के 2 हफ्ते बाद रोहित उसे कानपुर में ही छोड़ कर अकेले दिल्ली चला गया. स्मिता को सम झा गया, ‘‘मेरी मम्मी बहुत स्वादिष्ठ भोजन बनाती हैं. तुम कुछ दिन उन के साथ रह कर पकाना सीख लो, फिर मैं तुम्हें दिल्ली ले जाऊंगा. आजकल बैंक में हाफ ईयरली क्लोजिंग चल रही है. इसलिए मैं तुम्हें दिल्ली में ज्यादा समय नहीं दे पाऊंगा’’
स्मिता ने सहमति दे दी. 15 दिन क्या 1 महीना गुजर गया, इस बीच वह अपने मायके हो कर भी आ गई. मगर रोहित उसे लेने नहीं आया. फिर सुमित्राजी ही उसे ले कर दिल्ली पहुंच गईं. स्मिता से बोलीं, ‘‘आजकल बैंक में बहुत काम है उसे फुरसत नहीं है. अब उसे छुट्टी नहीं मिली तो क्या हुआ? तुम अपना सामान पैक कर लो हम उसे सरप्राइज देंगे.’’
राधेलाल ने उन के टिकट बुक करने के साथसाथ रोहित को भी बता दिया कि वे लोग कब पहुंच रहे हैं. इस का परिणाम यह रहा कि स्टेशन पर उन्हें लेने के लिए पहुंच कर रोहित ने उन्हें ही सरप्राइज कर दिया.
‘‘अरे तू यहां कैसे? किसी को छोड़ने आया है क्या?’’ सुमित्रा ने पूछा.
‘‘सरप्राइज, आप को लेने आया हूं.’’
‘‘मु झे या स्मिता को? सुमित्रा ने मुड़ कर स्मिता के चेहरे की तरफ देखा जो शरमा कर गुलाबी हो गया था.
‘‘आइए चलिए,’’ कह कर रोहित ने अटैची को संभाल लिया.
फ्लैट एकदम साफसुथरा. सारी चीजें करीने से रखी हुई थीं. स्मिता ने पूरे फ्लैट को अच्छे से निहारा. रसोई से ले कर बाथरूम तक हर सामान अपनी जगह मौजूद था. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि यह किसी बैचलर का फ्लैट है. घरगृहस्थी की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हर वस्तु मौजूद थी.
‘‘यह मेरा बैडरूम है,’’ कह कर सुमित्राजी ने कमरा खोल कर स्मिता को दिखाया. सामने दीवार पर गुरुजी का बड़ा सा आशीर्वाद की मुद्रा का चित्र टंगा था. उस ने दोनों हाथ जोड़ कर कमरे के अंदर प्रवेश किया. कमरे में गुरुजी के चित्र के अतिरिक्त पूरी दीवार खाली थी, जबकि रोहित के बैडरूम में विभिन्न प्रकार की सीनरीज लगी थीं.
‘‘अब मैं तु झे रोहित की पसंद का हर व्यंजन बनाना सिखा दूंगी तभी वापस जाऊंगी,’’ कह कर सुमित्रा हंसने लगीं.
स्मिता मुसकराती रह गई. रोहित कम बोलने वाला युवक है. वह कभी लंच ले कर जाता तो कभी मना कर देता कि आज मेरे बैंक में फलां कर्मचारी का बर्थडे है या ऐनिवर्सरी है तो वहीं पार्टी होगी.’’
रोहित वीकैंड में उसे फिल्म दिखाने या मौल ले कर जाता तो अपनी मां को भी जिद कर के ले जाता. तीनों की अच्छी कैमिस्ट्री जम गई थी.
तभी एक दिन पता चला कि स्मिता मां बनने वाली है. यह खुशखबरी सुन कर उन्होंने
गुरुजी को प्रसाद चढ़ाया और अपना कानपुर जाने का इरादा बदल दिया. उधर कानपुर से राधेलाल और राहुल लगातार उन से फोन पर बात करते और कहते कि वे बाई के हाथ का खाना खा कर परेशान हो चुके हैं इसलिए उन्हें अब रोहित और स्मिता को छोड़ कर वापस आ जाना चाहिए.
सुमित्रा 2 महीने बाद वापस तो आईं मगर स्मिता को साथ ही ले आईं. बोलीं यह वहां क्या करेगी? इस का बीपी हाई रहता है चक्कर खा कर गिर गई तो कौन देखेगा?’’
स्मिता भी खुश थी और उस के मायके
वाले भी कि उस की सास उस की इतनी
देखभाल करती हैं. उसे ससुराल में वर्क फ्रौम होम करते हुए पूरा आराम मिल रहा था और रोहित महीने में एक चक्कर दिल्ली से कानपुर का लगा ही लेता है.
स्मिता ने एक सुंदर स्वस्थ्य बेटे को जन्म दिया. इसी बीच उस के देवर की शादी भी तय हो गई. घर में खूब चहलपहल हो गई. दूसरी बहू के आने के बाद ही सुमित्राजी ने अपनी बड़ी बहू स्मिता और पोते विभु को दिल्ली भेजा. पहले तो रोहित ले जाने को तैयार नहीं हुआ लेकिन सुमित्राजी के जोर देने पर ले गया.
स्मिता बहुत खुश है कि अब पहली बार उस की गृहस्थी उस के हाथों में होगी. उस ने 3 महीने की मैटरनिटी लीव ले ली. रोहित उस से अकसर कहता कि उसे जल्दी उठ कर उस का खाना बनाने की चिंता करने की जरूरत नहीं हैं. वह बाहर
ही खा लेगा. वह केवल अपने बेटे पर ध्यान दे. मगर स्मिता खुशीखुशी जल्दी उठ कर सारा काम निबटा देती.
उस की मेड भी जल्दी आ जाती और फिर वह दिन में आराम कर लेती. रोहित तो फिर रात में 8-9 बजे के बीच घर पहुंचता. सबकुछ ठीक ही चल रहा था अगर उस दिन भरी दोपहरी में रेणुका न आती.
रविवार का दिन था. रोहित लैपटौप ले कर बैठा हुआ था और स्मिता अपने 6 माह के बेटे विभू की तेल मालिश कर रही थी कि अचानक रेणुका आ गई.
रोहित ने रेणुका को अचानक अपने सामने देखा तो चौंक पड़ा, ‘‘अरे तुम यहां कैसे?’’
‘‘जैसे पहले आती थी,’’ उस ने अपने हाथ में पकड़ी फ्लैट की चाबी दिखाई.
‘‘चु… चु… चुप ऐसा न कहो?’’ कह कर रोहित ने उस के हाथ से चाबी ले ली.
‘‘क्यों तुम्हारे परिवार में सब लोग बातें छिपा कर क्यों रखते हैं जो सच बात है वह है…’’
‘‘नाराज क्यों होती हो? आओ तुम्हें स्मिता से मिलवा दूं.’’
‘‘स्मिता देखो यह रेणुका है. मेरे औफिस में मेरी कलीग है. हम दोनों पिछले 5 वर्षों से एक ही ब्रांच में, एक ही डिपार्टमैंट में काम करते हैं. पर देखो न यह हमारी शादी में नहीं आई.’’
‘‘हां उस के लिए सौरी, मेरा ऐक्सीडैंट हो गया था. पांव में फ्रैक्चर था तो कैसे आती?’’
‘‘अरे कोई बात नहीं आप लोग बैठिए मैं चाय बना कर ला लाती हूं,’’ स्मिता ने बेटे की मालिश करते हुए कहा.
‘‘अरे नहीं, तुम मुन्ने की मालिश कंटिन्यू करो. मैं चाय खुद बना लूंगी. मु झे यहां का आइडिया है.’’
रेणुका की बात सुन कर स्मिता को बहुत हैरानी हुई मगर वह विभु को छोड़ कर उठ नहीं सकती थी. इसलिए चुपचाप विभु को स्नान करा कर तैयार करने में व्यस्त हो गई और उधर रेणुका ने चाय के साथ ही लंच की भी तैयारी कर दी.
जब स्मिता उठ कर आई तो वह रेणुका की फुरती को देख कर हैरान रह गई. रेणुका एक सुंदरस्मार्ट युवती है, जिसे अपने औफिस के कार्य में कुशलता के साथ ही घरगृहस्थी के हर कार्य में भी निपुणता हासिल है.
लंच वाकई बहुत स्वादिष्ठ बना था. स्मिता ने उस की बहुत तारीफ करी.
यह सुन कर रेणुका ने कहा, ‘‘तुम्हें आज पता चला कि मैं इतना स्वादिष्ठ खाना बनाती हूं. कभी तुम्हारे पति ने यह नहीं बताया कि वह अकसर लंच टाइम में मेरा टिफिन साफ कर जाता है.’’
स्मिता ने हैरानी से राहुल की तरफ देखा. राहुल ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया. स्मिता को मन ही मन बहुत बुरा लगा कि उस का पति उस से इतनी सारी बातें छिपाता है जबकि रेणुका एकदम खुली किताब की तरह है और अपनी हर बात साफ लफ्जों में कहना जानती है.
‘‘यहां दिल्ली में मेरा कोई नहीं है. सीतापुर गांव में मेरी मां रहती हैं. मेरी दोनों बड़ी बहनों की ससुराल भी सीतापुर के आसपास के गांवों में ही है. अपने परिवार में मैं ही सब से ज्यादा पढ़ीलिखी हूं और बैंक में नौकरी करती हूं. इस बैंक में मेरी पहली पोस्टिंग दिल्ली की है. जहां मेरी मुलाकात रोहित से हुई और रोहित ने ही मु झे बैंकिंग सिखाई. यहां मेरी ज्यादा लोगों से जानपहचान नहीं है. अगर तुम्हें बुरा न लगे तो कहो मैं हर संडे आ जाया करूं?’’ रेणुका ने स्पष्ट शब्दों में कहा.
‘‘हांहां क्यों नहीं. मैं भी तो जबलपुर की हूं. यहां दिल्ली में मेरी पहचान का भी कोई नहीं है. तुम आओगी तो मु झे भी अच्छा लगेगा.’’
अगली बार जब रेणुका आई तो साथ में अंडे भी ले आई और बोली,
‘‘तुम्हें पता है स्मिता मैं एग करी बहुत टेस्टी बनाती हूं.’’
यह सुन कर स्मिता को झटका लगा.
वे बोली, ‘‘हमारे घर में तो यह सब खाना
मना है.’’
‘‘हां मु झे पता है तो क्या तुम सचमुच अब अंडे नहीं खाती? रोहित ने बताया था कि तुम शादी से पहले अंडे खाना पसंद करती थी.’’
‘‘हां, लेकिन मु झे गुरुजी से मंत्र दिलाया गया है इसलिए अब मैं अंडे नहीं खाती,’’ स्मिता ने कहा.
रोहित तुरंत बोल उठा, ‘‘अरे तुम ये अंडे क्यों लाई हो जब तुम्हें पता है कि यहां रसोई में यह सब पकाना वर्जित है.’’
‘‘अच्छा बैंक में तो मेरे लंच से खूब चटकारे ले कर एग करी खाई जाती है, फिर यहां घर में क्यों नहीं बना सकते हैं?’’
‘‘आप घर से बाहर मांसमछली खाते हैं?’’ स्मिता को यह धोखा देना लगा.
रोहित चुपचाप घर का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया.
रेणुका ने कहा, ‘‘सौरी मु झे नहीं पता था
कि रोहित तुम से भी छिप कर यह खाता है.
हां उस की मम्मी को नहीं पसंद यह तो मु झे मालूम था,’’ कह कर रेणुका भी घर से बाहर निकल गई.
स्मिता फूटफूट कर रो पड़ी. उसे महसूस होने लगा कि रोहित के विषय में अभी भी कुछ पता नहीं कितनी परतें उस ने अपने मुखड़े में प्याज के छिलकों सी चढ़ा रखी हैं. उस ने तुरंत अपनी सास से इस विषय में बात की तो उन्होंने इधरउधर की बात न सुन कर उसे अपनी गृहस्थी को बचाने और रेणुका को घर से दूर रखने की हिदायत दे दी.
स्मिता और रोहित में झगड़े बढ़ने लगे थे. जब भी वे लंच बौक्स रखने को मना करता तो स्मिता उसे ताने देती कि आज वे रेणुका के लंच में लाए मांसाहार खाने वाले हैं.
लगभग महीनेभर के बाद रेणुका का फोन आया. उस ने स्मिता से कहा कि अगर उसे अच्छा नहीं लगता है तो अब वह, कभी भी उस के घर नहीं आएगी. यह सुन कर स्मिता ने कहा कि नहीं तुम आओ, मु झे रोहित के विषय में हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात जाननी है. मैं अब और अंधेरे में नहीं रहना चाहती.
यह सुन कर रेणुका रविवार को सुबह ही पहुंच गई. रोहित ने उन दोनों को घूर कर देखा और खुद घर से बाहर निकल गया. वे जानता था कि रेणुका मुंहफट है वह कोई बात नहीं छिपा सकती.
‘‘पूछो फिर क्या आप जानना चाहती हो तुम रोहित के विषय में?’’
‘‘मु झे क्या पूछना है, मैं तो यह भी नहीं जानती.’’
‘‘चलो फिर मैं ही सबकुछ बताती हूं. असल में मैं और रोहित शादी करना चाहते थे मगर तुम्हारी सास ने एक शर्त रखी कि शादी के बाद मु झे गुरुमंत्र लेना होगा और मांसाहार का त्याग करना होगा. मैं ने उन्हें बताया था कि आप का बेटा भी तो गुरुमंत्र ले चुका है लेकिन वह तो खूब चटकारे ले कर मांसाहार करता है. यह सुन कर उन्होंने कहा कि शादी के बाद वह भी सुधर जाएगा. मु झे यह बात हजम नहीं हुई और मैं ने शादी करने से इनकार कर दिया. मैं ने कहा जब मेरा मन करेगा तब मैं खाना छोड़ दूंगी लेकिन किसी शर्त की वजह से नहीं. इसी बात पर हमारा रिश्ता नहीं हुआ. यह भी सच है कि हम दोनों
3 साल तक लिव इन में भी रहे हैं. यहीं इसी फ्लैट में और यह बात जब तुम्हारी सास को पता चली तो वे ये नई शर्तें हमारे बीच ले आई और हम दोनों का ब्रेकअप हो गया.’’
स्मिता यह सब सुन कर सन्न रह गई.
कुछ देर बाद बोली, ‘‘रेणुका तुम्हारी कोई गलती नहीं है तुम सही हो जो है, साफ है, समक्ष है जबकि मेरी सास सबकुछ जानते हुए भी
अनजान बनने का नाटक करती हैं और मु झे भी अपने साथ सालभर तक ले कर घूमती रहती थीं जिस से मु झे कुछ पता न चले. रोहित मु झे पसंद नहीं करते थे तो शादी ही क्यों की. मैं शादी के बाद कानपुर में इंतजार करती रह गई फिर मेरी सास मु झे यहां ले कर आईं और मेरी प्रैग्नैंसी
की खबर मिलते ही मु झे साथ ले गईं. अब बेटा होने के बाद उन्होंने मु झे यहां भेज दिया. सोचा होगा अब तो इस के पैरों में जंजीर बांध दी है. अब यह कहां जाएगी? यह सच है कि मेरे
मायके में इतनी संपन्नता नहीं है.
‘‘मगर रेणुका, तुम ने अपनी और रोहित की हर बात से परदा उठा दिया. एक बात तो मु झे सम झ में आ गई कि रोहित को तुम से कोई प्यार नहीं है. अगर ऐसा होता तो वह अपनी मां से विद्रोह कर के उसी प्रकार तुम्हारे साथ रहता, जिस प्रकार उन की मरजी के खिलाफ जा कर मांसाहार करता है. लेकिन उस ने तो तुम्हें छोड़ दिया. नई गृहस्थी बसा ली लेकिन मांसाहार नहीं छोड़ा. अभी भी वह केवल तुम्हारे लाए हुए भोजन की वजह से तुम से संपर्क में हैं. जिस दिन से उसे यही सब घर में पकापकाया मिलने लगेगा, उस का तुम से यह संपर्कसूत्र भी टूट जाएगा. अब मैं जा रही हूं.’’
‘‘कहां जा रही हो, इस घर को छोड़ कर?’’ रेणुका ने पूछा.
‘‘अरे घर से नहीं जा रही, बस रसोई में जा रही हूं. आज से मैं भी अपना मनपसंद आमलेट बना कर खाऊंगी और रोहित के लिए उस की फैवरिट चिकन बिरयानी भी पकाऊंगी. फिर देखना कैसे रोहित मेरी मुट्ठी में रहेगा. दिल का रास्ता, पेट से हो कर गुजरता है और हां उस की मां यानी मेरी सास जिन्होंने मु झे धोखे में रखा जरूर अपने बाल नोचती नजर आएंगी.’’
यह सुन कर रेणुका के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं और स्मिता खिलखिला कर हंसने लगी.
