Kahaniyan : वादियों की मीठी ठंडक बटोरते बटोरते, धूप और धुंध की आंखमिचौली देखतेदेखते, चीड़ और देवदार के पत्तों के बीच से छन कर आती विशुद्ध हवा को सांसों में भरते हुए कब शिमला पहुंच गए और कब गाड़ी ‘हिमलैंड’ की पार्किंग में जा लगी, अर्चना को पता ही नहीं चला.
रजत महाशय ने तो होटल की सीढि़यां चढ़ते ही घोषणा कर दी, ‘‘गाड़ी चलातेचलाते अपना तो बैंड बज गया भई, अपुन को अब कल सुबह से पहले कोई कहीं चलने के लिए न कहे. आज पूरा रैस्ट.’’
बच्चे राहुल और रिया तो कमरे में पहुंचते ही जूते उतार कर कंबल में दुबक गए और अर्चना बाथरूम में घुस गई.
बढि़या कुनकुने पानी से नहा कर लौटी तो राहुल और रिया गरमागरम कौफी पीते हुए टीवी देख रहे थे और रजत अर्चना और खुद के लिए कौफी तैयार कर रहे थे. अर्चना को सुनहरे सितारों वाले सुर्ख सलवारसूट में सजे देख कर उन्होंने चुटकी ली, ‘‘ये बिजली कहीं गिरने जा रही है क्या?’’
‘‘हां, जरा, माल रोड का एक चक्कर लगा कर आती हूं.’’
‘‘तुम थकती नहीं यार?’’
‘‘लो, थकना कैसा? बैंड तो आप का बजा. मैं तो आराम फरमाती आई हूं. यों भी रजत, साल भर पत्थरों के पिंजरे में कैद रहने के बाद ये 6-7 दिन मिले हैं मुझे आजादी के, इन में से आधा दिन भी होटल के बंद कमरे में बैठ कर गुजारना मंजूर नहीं मुझे,’’ माथे पर बिंदिया का रतनारी सितारा टांकते हुए अर्चना ने कहा.
‘‘ठीक है, जाओ बेगम, लेकिन अंधेरा होने से पहले लौट आना,’’ रजत ने हिदायत दी और अर्चना खिल उठी. कभीकभी अकेले बिंदास घूमने का भी अपना एक अलग ही मजा होता है.
‘हिमलैंड’ परिसर से निकल कर संकरी घुमावदार सड़क से गुजरते हुए जब अर्चना ने मुख्य सड़क पर कदम रखे तो उसे एक अनोखा एहसास हुआ कि जैसे यह जानीपहचानी पथरीली सड़क उसी के दरसपरस को तरस रही थी. शिमला की मदमस्त फिजाएं और दिलकश मंजर उसे बरस दो बरस से जैसे बरबस यहां खींच कर ले ही आता है.
माल रोड रंगारंग देशीविदेशी पर्यटकों की खुशरंगियों से गुलजार हो रही थी. उन्हीं का एक हिस्सा थी छोटेछोटे कदम रखती हुई अर्चना, जो लिफ्ट की ओर बढ़ी जा रही थी कि अचानक ‘ये शाम मस्तानी, मदहोश किए जाए…’ की नशीलीसुरीली धुन हवाओं में खुशबू की तरह बिखर गई. उस ने मुड़ कर देखा तो लाल पुलोवर और काली जींस में रजत की उम्र का एक ‘डेशिंग मैन’ माउथ औरगेन बजाता हुआ चला आ रहा था. वह जादू जगाने वाली मीठी धुन लिफ्ट तक उस के साथसाथ चलती रही.
अपर माल रोड की ओर जाते हुए एक मोड़ पर अर्चना दो पल सुस्ताने के लिए बैठी तो उस ने देखा कि वह व्यक्ति भी इसी ओर चला आ रहा है. उस के सामने से गुजरते हुए पल भर को ठिठक कर उस ने एक गहरी नजर अर्चना पर डाली. न जाने क्या था उस नजर में कि अर्चना सिहर उठी.
एक भरपूर जवां और रंगीनहसीन शाम माल रोड पर उतरी हुई थी. नएनवेले जोड़े बांहों में बांहें डाले हंसी के मोती बिखेरते घूम रहे थे तो चाबी से चलने वाले खिलौनों से नन्हेमुन्ने बच्चे खरगोश की तरह फुदक रहे थे, जैसे वहां जिंदगी मुसकरा रही थी.
पहाड़ों की खासियत है कि यहां शाम जल्दी उतर आती है और बनी भी देर तक रहती है, इसीलिए शाम की इस गुलाबी उजास में नहाती अर्चना बेफिक्र हो कर चहलकदमी कर रही थी कि अचानक बादल गरजने लगे और शाम की सुनहरी संतरी रंगत में श्याम रंग घुल गया और देखते ही देखते बूंदाबांदी शुरू हो गई.
पहाड़ी मौसम के मिजाज को खूब पहचानती थी अर्चना, इसलिए इस से पहले कि ये बूंदाबांदी हलकी या तेज बारिश में बदले, वह ‘हिमलैंड’ पहुंच जाना चाहती थी, अत: उस ने अविलंब वापसी की राह पकड़ ली. ‘लिफ्ट पर भीड़ होगी,’ यह सोच कर वह शौर्टकट वाले ढलवां रास्ते पर उतर आई.
वह तेजतेज कदम बढ़ाते हुए चली जा रही थी कि उस भीगे मौसम में एक दर्द में डूबी धुन तैर गई, ‘दिल ने फिर याद किया, बर्क सी लहराई है…’ अर्चना का जी धक् से रह गया कि वह माउथ औरगेन वाला भी यहींकहीं मौजूद है. कौन है यह और चाहता क्या है? अर्चना को यह सोच परेशान भी कर रही थी और डरा भी रही थी. सहसा बूंदाबांदी ने हलकी बारिश का रूप धारण कर लिया और अर्चना सबकुछ भूल कर उस ऊबड़खाबड़ सड़क पर सधे हुए कदम रखरख कर आगे बढ़ने लगी.
रिसेप्शन पर चाय का और्डर दे कर अर्चना अपने कमरे में पहुंची. राहुल और रिया सो चुके थे, रजत बाहर के मौसम से बेखबर अपना लैपटौप ले कर बैठे थे. लैपटौप से नजरें उठाए बिना उन्होंने पूछा, ‘‘इतनी जल्दी कैसे आ गईं बेगम?’’ पर अर्चना ठंड से कांप रही थी, इसलिए बिना जवाब दिए कपड़े बदलने बाथरूम में घुस गई.
रात भर अर्चना ठीक से सो नहीं पाई. आंखें बंद करते ही जैसे वह व्यक्ति सामने आ कर खड़ा हो जाता और कानों में ‘शाम मस्तानी…’ और ‘दिल ने फिर याद किया…’ की धुनें गूंजने लगतीं. वह क्यों पीछा कर रहा है उस का? या हो सकता है कि उसे ही कोई गलतफहमी हुई हो… ‘हां, यही होगा,’ सोच कर उसे तनिक सा चैन आया और वह सोने की कोशिश करने लगी.
अगले दिन सुबहसवेरे ही वे लोग नालडेहरा की ओर निकल पड़े. सुबह के दुधिया उजास में ताजेताजे नहाएधोए से खड़े पहाड़ों के दरस ने और प्राणदायिनी ठंडी सुहानी हवाओं के स्पर्श ने अर्चना के चित को हराभरा कर दिया था और कल की शाम उस के जेहन से उतर चुकी थी. वह फिर सोनचिरैया सी चहक रही थी.
हरीभरी घाटियों को झुकझुक कर चूमते हुए धुएं की तरह बादलों और किसी कुशल चित्रकार द्वारा उकेरे गए खूबसूरत चित्रों से अजबगजब नजारों को कैमरे में कैद करने की मंशा से रजत ने एक हेयरपिन मोड़ पर गाड़ी रोक ली. रजत तसवीरें ले रहे थे और अर्चना राहुलरिया के लिए भुट्टे भुनवा रही थी कि पास से एक सफेद मारुति गुजरी, जिसे ‘वह’ चला रहा था और अकेला था. अर्चना का अच्छाखासा मूड खराब हो गया और उसे पक्का यकीन हो गया कि ‘वह’ उस का पीछा कर रहा है, लेकिन रजत साथ हैं तो डर काहे का, सोच कर उस ने राहत भरी सांस ली.
नालडेहरा में किसी हिंदी फिल्म की शूटिंग चल रही थी. रजत और बच्चे उस ओर चले गए और वह घूमघूम कर कुदरती नजारों के चित्र लेने लगी. अर्चना एक पहाड़ी बच्ची की तसवीर उतारने लगी तो सहसा फे्रम में ‘वह’ आ गया. अर्चना ने कैमरा हटा कर देखा तो जैसे वह हिल कर रह गई. एक पेड़ से टिक कर खड़ा था ‘वह’ और नीली जींस और क्रीम कलर की जैकेट में कल से भी ज्यादा डेशिंग लग रहा था.
‘क्या चाहते हैं आप?’ यह पूछने के लिए जैसे ही अर्चना आगे बढ़ी, वह पलक झपकते ही न जाने कहां गायब हो गया.
घूमघाम कर शाम को लौट आए थे वे लोग. बच्चे अंत्याक्षरी खेल रहे थे और अर्चना उन से बेखबर ‘उस की’ ही सोच में डूबी थी कि रजत ने टोका, ‘‘भई अर्ची, आज तुम्हारा चैटर बौक्स क्यों बंद है? कुछ बकबक करो बेगम, चुप्पी तुम्हें शोभा नहीं देती.’’
‘‘थोड़ा सिरदर्द है. थकान भी हो रही है,’’ कह कर टाल दिया उस ने.
रात फिर नींद गायब थी अर्चना की. उसे ‘उसी’ की सोच ने जकड़ा हुआ था. एक बार तो जी में आया कि रजत को सब बता दे पर यह सोच कर रुक गई कि रजत न जाने इस बात को किस रूप में लें? वह उस का मजाक भी उड़ा सकते हैं, उस पर शक भी कर सकते हैं या हो सकता है कि ‘वह’ फिर मिले तो उस से झगड़ने ही बैठ जाएं और एक बात तो पक्की है कि उसे फिर कहीं अकेले नहीं जाने देंगे. इस से तो बेहतर है कि वह चुप ही रहे. जो होगा देखा जाएगा.
अगले दिन ‘रिवोली’ पर सुबह का शो देख कर रजत और बच्चे जाखू चले गए. उन के लाख कहने पर भी अर्चना नहीं गई और सड़क के किनारे बनी दुकानों से छोटीछोटी कलात्मक वस्तुएं खरीदती हुई वह माल रोड पर घूमती रही.
आखिर थक कर वह अनमनी सी चर्च के सामने बिछी एक बैंच पर बैठ गई.
सहसा मन में चाह उठी कि ‘वह’ दिख जाए तो चैन आए. अपनेआप पर हैरानी भी हो रही थी अर्चना को कि जिस की उपस्थिति की कल्पना भी उसे 2 दिन से भयभीत कर रही थी और जिस के आसपास मौजूद होने के एहसास मात्र से वह असहज होती रही, आज उसी को देखने की ललक क्यों जाग रही है मन में? कहीं चला तो नहीं गया ‘वह’? फिर झरने से बहते एक खनकते हंसी के स्वर ने उस के भटकते मन को जैसे रोक दिया.
अर्चना ने देखा सामने वाली बैंच पर बैठा एक नवविवाहिता जोड़ा दीनदुनिया से बेखबर आपस में हंसीठिठोली कर रहा था. नई नर्म कोंपल सी कोमल वह लड़की चूड़ा खनकाते हुए कभी हंस रही थी, कभी इतरा रही थी तो कभी इठला रही थी और छैलछबीला सा उस का पति खिदमती अंदाज में उस के नाजनखरे उठा रहा था. कभी भाग कर कुल्फी लाता, कभी पौपकौर्न तो कभी चाट के पत्ते. ‘कितने खुशनुमा होते हैं जिंदगी के ये कुछ दिन… फिर तो वही घरगृहस्थी के झगड़ेपचड़े,’ एक ठंडी सांस ले कर सोचा अर्चना ने.
‘‘एक्सक्यूज मी.’’ मुड़ कर देखा अर्चना ने, तो सिर से पांव तक कांप गई. सामने ‘वही’ खड़ा था.
‘‘आप?’’ कह कर वह हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई.
‘‘जी, आप अर्चना हैं न? अर्चना सचदेव, अमृतसर से?’’
‘‘जी हां, मगर आप?’’
‘‘मुझे पहचाना नहीं आप ने?’’ उस के स्वर में न पहचाने जाने का दर्द था.
अर्चना ने पहली बार उसे सिर से पांव तक देखा. काले ट्राउजर और बंद गले के काले स्वैटर में वह पिछले दिनों से ज्यादा आकर्षक लग रहा था. कश्मीरी सेबों सी लालिमा लिए गोरा रंग और घनेघुंघराले बाल, किसी हिट फिल्म का नायक लग रहा था वह. अर्चना ने अपने दिमाग पर पूरा जोर डाला, स्मृतियों की सारी डायरियां टटोल डालीं, लेकिन उस की पहचान नहीं मिली तो हार कर अर्चना ने इनकार में गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं नहीं पहचान पाई आप को.’’
‘‘मैं अखिल हूं… अखिल आनंद… वह खालसा कालेज…’’
‘‘ओ, माय गौड, वहां तक तो मैं पहुंची ही नहीं. कितना बदल गए हैं आप? कैसे पहचानती मैं आप को?’’
‘‘लेकिन आप बिलकुल नहीं बदलीं. बिलकुल वैसी ही हैं आप, तभी तो मैं आप को देखते ही पहचान गया, जब आप गाड़ी से सामान निकाल रही थीं, इत्तेफाक से मैं भी ‘हिमलैंड’ में ही ठहरा हूं.’’
‘‘तभी क्यों नहीं बात कर ली आप ने? इस तरह मेरे पीछेपीछे क्यों घूमते रहे?’’
‘‘डर गया था कि आप न जाने कैसा बरताव करें.’’
‘‘तो अब क्यों सामने चले आए?’’
‘‘डर गया था कि कहीं आप चली न जाएं और मैं आप से दो बातें भी न कर पाऊं.
‘‘अकेले आए हैं आप घूमने?’’
‘‘मैं घूमने नहीं, काम से आया हूं यहां. शिमला में हमारे सेब के बाग हैं, इसी सिलसिले में आनाजाना लगा रहता है.’’
‘‘और बाकी सब… पत्नी वगैरा, वहीं हैं अमृतसर में?’’
‘‘नहीं, अमृतसर तो कब का छूट गया, अब चंडीगढ़ में हैं हम. एक बेटी भी है मेरी, बिलकुल आप की तरह खूबसूरत. सच कहूं अर्चना मैं आप को अभी भी भूल नहीं पाया,’’ बड़े हसरत भरे स्वर में कहा अखिल ने.
‘‘अब इन बातों का क्या फायदा?’’ एक निश्वास के साथ कहा अर्चना ने.
‘‘आप कहां हैं आजकल?’’ अखिल ने बात बदली.
‘‘दिल्ली में.’’
‘‘अर्चना, आप यहीं रुकिए, प्लीज. कहीं जाइएगा नहीं. मैं अभी आया, 5 मिनट में,’’ कह कर वह चला गया और अर्चना का दिलोदिमाग 12 बरसों को चीर कर अमृतसर के खालसा कालेज में जा पहुंचा.
बीकाम अंतिम वर्ष में थी वह. 4 सहेलियों की चौकड़ी थी उन की. मस्त, खिलंदड़ और शरारती. उन के अंतिम 3 पीरियड्स खाली रहते थे, इसलिए वे कालेज बस के बजाय पैदल ही घर चल देती थीं. हंसतीबतियाती आधी सड़क घेर कर चलती थीं वे चारों. उन दिनों एक हैंडसम लड़का एक निश्चित दूरी बना कर उन के पीछे आया करता था बाइक पर. वे उसे कभी मजनू कहतीं तो कभी रोमियो. वे तो यह भी नहीं जानती थीं कि वह दीवाना किस का है.
पहेली तो तब सुलझी, जब परीक्षाएं शुरू होने से पहले लाइबे्ररी की किताबें लौटाने वह अकेली कालेज गई. लाइब्रेरी से निकल कर कोरीडोर तक ही पहुंची थी कि अचानक ‘वह’ सामने आ गया और एक खुलापत्र उस के हाथ में थमा कर न जाने कहां गायब हो गया और अर्चना ने कांपते मन और लरजते हाथों से उस अमराई में जा कर वह खत पढ़ा जहां अपनी हमजोलियों के साथ बैठ कर उस ने हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ पढ़ी थी, ‘नीरज’ के गीत गाए थे और भविष्य के आकाश को चांदसितारों से सजाने की योजनाएं बनाई थीं.
नीले मोती से अक्षरों में लिखा था, ‘अर्चना, मैं आप को पंसद करता हूं, बहुत… बहुत… बहुत… इतना जितना कभी किसी ने किसी को नहीं किया होगा. आप के साथ जिंदगी बिताना चाहता हूं मैं, इसलिए सिर्फ प्रेमनिवेदन नहीं कर रहा हूं, ब्याह का प्रस्ताव भी रख रहा हूं. न जाने फिर कब मिलना हो, इसलिए जवाब अभी ही दे दें प्लीज. ‘हां’ या ‘ना’ जो भी होगा मैं कबूल कर लूंगा.
‘…अखिल आनंद.’
खत पढ़ कर कंपकंपी छूट गई अर्चना की… जैसे जाड़ा लग कर ताप चढ़ रहा हो और न जाने किस भावना के अधीन हो कर उस ने खत के पीछे ही 2 पंक्तियां लिख डाली थीं, कांपते हाथों से… ‘हमारे घरों में ब्याहशादी के फैसले मातापिता करते हैं. पिता मेरे हैं नहीं, इसलिए जो बात करनी हो मेरी मां से करें.
‘…अर्चना.’
अर्चना ने नजरें झुका कर उसे पत्र लौटाया था, जिसे पढ़ कर भावावेश में अखिल ने उस का हाथ थाम लिया था, ‘आप की तो ‘हां’ होगी न?’
और लज्जाते हुए अर्चना ने ‘हां’ में गरदन हिला दी थी और उसी पल उस के दिल में बस गया था वह.
परीक्षा की तैयारी करतेकरते किताबकापियों में भी जैसे अखिल का चेहरा नजर आने लगा था अर्चना को. उस का वह स्पर्श याद आते ही तनमन सिहर उठता था उस का. पढ़ने में दिल नहीं लग रहा था, जबकि परीक्षा में कुछ ही दिन बाकी थे. पढ़ना जरूरी है, यह भी जानती थी वह, पर क्या करती मन के हाथों मजबूर हो चुकी थी. दिल हसरतों के मोती चुनने लगा था और आंखें सौसौ ख्वाब बुनने लगी थीं, लेकिन तब कहां जानती थी अर्चना कि उस की जिंदगी में प्यार की यह चांदनी सिर्फ चार दिन के लिए ही छाई थी… हां, सिर्फ चार दिन के लिए ही.
5वें दिन मां ताऊजी के घर गई हुई थीं और अर्चना अपने कमरे में बैठी अर्थशास्त्र के एक चैप्टर से सिर खपा रही थी कि मां आ गई धड़धड़ाती हुईं. उन्होंने भीतर से दरवाजा बंद कर लिया और धीमे मगर चुभते स्वर में बोलीं, ‘ये अखिल आनंद के साथ क्या चक्कर है तेरा?’
‘कौन अखिल आनंद? कैसा चक्कर?’ उस ने नाटक किया.
‘बन मत और साफसाफ बता. क्या बात है? पता है कल शाम उस का बाप तेरे ताऊजी की दुकान पर आया था और कह रहा था कि ‘आप की भतीजी मेरे बेटे को फांस रही है. संभाल लें उसे.’ मैं तो जैसे शर्म से मर गई. बड़ा नाज था मुझे तुझ पर,’ मां रोने लगीं तो उस के भी आंसू निकल पड़े कि यह कैसा मजाक किया उस के साथ अखिल ने. रोतेरोते उस ने पूरा किस्सा मां के सामने बयां कर दिया तो मां ने उसे बांहों में भर लिया.
‘देख बच्चे, वे पैसे वाले लोग हैं. उन का हमारा कोई जोड़ नहीं, बस तू इतना समझ ले. तू मेरी बड़ी सयानी बच्ची है. तुझे ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं. तू पढ़ाई में दिल लगा बस.’ कैसे लगता दिल पढ़ाई में? दिल टूटा था… चोट लगी थी… दर्द भी होता था और टीसें भी उठती थीं कि अभीअभी तो जन्म लिया था उस के प्यार ने और अभी ही उस की मौत भी हो गई.
परीक्षाओं के दौरान ही जैसे आसमान से उतर कर उस के लिए एक रिश्ता आया, परीक्षाएं खत्म होने के फौरन बाद सगाई हो गई और एक महीने बाद ब्याह भी. मां ने उसे सख्त हिदायत दी थी, ‘बेटा, भूल कर भी रजत को कुछ न बताना. बात तो है भी नहीं कुछ, पर मर्द का क्या भरोसा, किस बात को किस तरह से ले ले.’
उस ने मां की हिदायत को हमेशा याद रखा था. रजत एक अच्छा पति साबित हुआ. उस ने उसे प्यार भी दिया और सुखसुविधाएं भी, फिर राहुलरिया की मां बन कर तो वह निहाल हो उठी थी. आहिस्ताआहिस्ता वह प्रेमप्रसंग गुजरे जमाने की असफल और कमजोर लघुकथा बन गया. उस की यादों के अक्स भी दिल के दर्पण से धुंधलाने लगे और अब वह इतने बरसों बाद फिर अचानक सामने आ कर खड़ा हो गया.
‘‘अर्चना,’’ अखिल खड़ा था सामने कोक के 2 टिन और ढेरों पैकेट्स हाथों में थामे.
‘‘अखिल,’’ उस के हाथ से कोक का टिन लेते हुए अर्चना ने वह सवाल पूछा जो अब भी उस के मन में गीली लकड़ी सा सुलग रहा था, ‘‘आप ने इतना बड़ा मजाक क्यों किया था मेरे साथ?’’
‘‘कैसा मजाक अर्चना?’’
‘‘बनिए मत, पहले तो मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा, फिर अपने पापा को भेज दिया मेरे ताऊजी के पास कहने को कि आप की बेटी मेरे बेटे को फांस रही है, क्यों?’’
‘‘यह आप क्या कह रही हैं अर्चना? मेरे पापा ने ऐसा कुछ नहीं कहा था. मैं उन के साथ ही तो था. पापा ने तो हाथ जोड़ कर आप का रिश्ता मांगा था. आप के ताऊजी ने कहा था, ‘‘अर्चना को टीबी है, पता नहीं ठीक भी होगी या नहीं.’’
अर्चना के हाथ से ‘कोक’ का टिन छूट गया. जल बिन मछली सी तड़प उठी वह, ‘‘ऐसा कहा था ताऊजी ने? मेरे अपने ताऊजी ने, जिन्हें मैं पापा की तरह मानती थी.’’
‘‘आगे तो सुनिए. वह 2 दिन बाद हमारे घर आए, अपनी बेटी का रिश्ता ले कर, पर पापा ने इनकार कर दिया.’’
‘‘ये थे मेरे अपने? हाय, मैं 12 साल तक धोखे में रही, पर आप ने कैसे यकीन कर लिया उन की बातों पर? यही थी आप की चाहत? अच्छा, एक बात बताइए अखिल, टीबी तो दूर की बात है, आप ने किसी भी बीमारी की छाया तक देखी थी मेरे चेहरे पर? आप मुझ से मिलते. खुल कर बात करते, लेकिन नहीं… आप ने तो मुझ से मिलने की कोशिश तक नहीं की अखिल. सब ने छल किया मेरे साथ,’’ बोलतेबोलते हांफने लगी थी अर्चना.
‘‘की थी कोशिश… बहुत कोशिश की थी मैं ने आप से मिलने की, पर आप की मां ने कभी आप से मिलने ही नहीं दिया, फिर सोचा वक्त सब ठीक कर देगा, पर फिर सुना कि परीक्षाओं के बाद ही आप का ब्याह हो गया. मैं तब भी आप के ताऊजी के पास गया था, ‘आप तो कह रहे थे, अर्चना को टीबी है, बचेगी नहीं,’ तो उन्होंने रूखे स्वर में कहा था, ‘वह ठीक हो गई. आप पूछ कर देखिएगा उन से.’
‘‘किस से पूछूं? न अब मां हैं और न ही ताऊजी,’’ वह कैसे और क्यों बताती अखिल को कि जो बीमारी उन्होंने उस पर आरोपित की थी, उसी से मिलतीजुलती बीमारी से 2 साल एडि़यां रगड़रगड़ कर मरे वह, और अपनी जिस बेटी के लिए उन्होंने अर्चना का पत्ता काटा था, उस की कैसी दुर्गति हुई ससुराल में.
सच है, यह धरती कर्मों की खेती है. ‘न जाने उस साजिश में कौनकौन शामिल था,’ एक उसांस ले कर सोचा अर्चना ने.
कुछ देर वहां खामोशी पसरी रही, फिर एकाएक अखिल ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उस के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘आप लौटते हुए चंडीगढ़ आइएगा, रजत और बच्चों के साथ हमारे घर. मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’
अर्चना ने देखा कि उस की आंखों में वही सितारे झिलमिला रहे थे जो बरसों पहले ‘प्रणय निवेदन’ करते वक्त झिलमिलाए थे. एक हूक सी उठी अर्चना के कलेजे में.
वह कुछ देर तक मुग्ध निगाहों से निहारता रहा अर्चना को, फिर अचानक उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘मैं चलता हूं अर्चना, मुझे आज ही वापस जाना है. आज की इस मुलाकात को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा… कभी नहीं,’’ भीगे स्वर में कह कर वह चल दिया, फिर चार कदम चल कर उस ने मुड़ कर देखा. न जाने क्या कहा उस की खामोश निगाहों ने कि अर्चना की आंखें छलक आईं. उन आंसुओं को बहने दिया उस ने, फिर आहिस्ता से नरमी से उस विजिटिंग कार्ड को सहलाया और पर्स में रख लिया सहेज कर एक मधुर एहसास की तरह. वह देखती रही… देखती रही, जुदा हो कर जाते अपने उस परिचित से अपरिचित को तब तक जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया.
