लेखिका- सिंधु मुरली

रोज की तरह आज भी डा. शांतनु बहुत खुश नजर आ रहे थे. जब से अंजलि मरीज बन कर उन के अस्पताल में आई थी, उन्होंने अपने अंदर एक बदलाव महसूस किया था. लेकिन बहुत सोचने पर भी इस बदलाव के कारण को वे समझ नहीं पा रहे थे. यह जानते हुए भी कि अंजलि के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है, वे खुद को उस की ओर खिंचने से रोक नहीं पा रहे थे. वर्षों पहले लिया गया उन का ब्रह्मचर्य का प्रण भी अब डगमगा रहा था.

ऐसा नहीं था कि उन के जीवन में कोई स्त्री आई ही नहीं थी या उन्होंने इस से पहले कोई रेप केस देखा ही नहीं था. लेकिन उन्होंने सभी से किनारा कर लिया था. उन स्त्रियों में से कुछ तो आज भी उन की अच्छी मित्र हैं.

लौस एंजिलिस जैसे आधुनिक शहर में रहते हुए भी उन्होंने योग और अध्यात्म से अपने शरीर और चरित्र को बाह्य सांसारिक सुखों से मुक्त कर लिया था, परंतु अपने बरसों से भटकते हुए मन पर अभी भी पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाए थे.

मगर अंजलि से मिलने के बाद उन्होंने अपने मन पर पूर्णविराम अनुभव किया था. उन के चेहरे पर एक अद्भुत सी चमक आ गई थी. 42 की उम्र में यह परिवर्तन सिर्फ उन्होंने ही नहीं, उन की मां, मित्रों व अस्पताल के कर्मचारियों ने भी महसूस किया था.

जानीपहचानी हस्ती होने के बावजूद डा. शांतनु हर पल सब की मदद को तैयार रहने वाले एक शांत और दयालु इंसान थे. मगर अचानक ही उन के व्यक्तित्व में आए इस सुखद परिवर्तन का राज कोई नहीं जान पाया था. उन के हंसने और बात करने के अंदाज में एक नई ऊर्जा का समावेश हुआ था.

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