Hindi Story : गोरेगांव   मुंबई की  ‘नवरंग’ सोसाइटी 20 बिल्डिंग्स की एक साफसुथरी सोसाइटी है. आसपास सब जरूरी सुविधाएं थीं. शौपिंग कौंप्लैक्स में लगभग सभी कुछ मिल जाता था. ग्रे और व्हाइट कलर की सोसाइटी दूर से ही नजर आ जाती थी.

1-1 बिल्डिंग 7 फ्लोर की थी. हर फ्लोर पर 4 फ्लैट थे. मुंबई की बाकी सोसाइटीज की तरह यहां भी हर प्रांत के, हर धर्म के लोग रहते थे. बिल्डिंग नंबर 3 की 5वें फ्लोर पर आमनेसामने के फ्लैट में रहने वाली रागिनी और काजल की दोस्ती बहुत मशहूर थी. दोनों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते, क्लास आगेपीछे थी पर एक ही बस में स्कूल जाते तो दोस्ती वहीं से शुरू हुई थी. बस में बच्चों को छोड़ने जाने से. दोनों बहुत खुश थीं. लगभग एक ही उम्र का परिवार था.

रागिनी उत्तर प्रदेश की थी. उस के पति मनीष बैंक में थे जो 7 बजे तक घर आ जाते. उन के 2 बच्चे थे, 15 साल का चिराग और 13 साल की रश्मि. काजल गुजराती थी. उस के पति रवि किसी प्राइवेट फर्म में थे और एक 14 साल की बेटी थी दिव्या. रागिनी सांवले रंग की गोलमटोल स्त्री थी जिस की सेहत का ध्यान रखने में बिलकुल रुचि नहीं थी. खातीपीती, मस्त घूमती, खुश रहती. काजल भी ठीक वैसी ही थी. वह भी बिलकुल रागिनी की जुड़वां बहन लगती, गोल सा चेहरा, चेहरा क्या, गोलमटोल ही थी, खानेपीने के शौक ने ही दोनों को करीब ला दिया. दोनों कामचोर मांएं. बच्चों को स्कूल भेज कर या तो गप्पें मारतीं या सो जातीं. खाने की चीजों का खूब आदानप्रदान होता, कभी इधर से पूरीकचौरी जाती, कभी उधर से ढोकला, खांडवी आती. पर जैसेकि बड़ेबुजुर्ग कहते हैं कि अच्छी चीजों को नजर लग जाती है, वैसे ही इन की दोस्ती को न जाने किस की नजर लग गई.

हुआ यह कि छुट्टी वाले दिन अकसर किसी एक के घर महफिल जमा करती. कभी सब साथ में मौल जाते, मूवी देखते पर पता नहीं कब कामदेव ने अपना तीर चलाया जो सीधे मनीष और काजल के दिल पर लग गया, पता नहीं वह कौनसा पल था जब दोनों ने ताश पार्टी में अपनेअपने पार्टनर के सामने बैठे भी एकदूसरे को पता नहीं कैसे देख लिया कि दोनों को लगा कि वे हम आप के हैं कौन के सलमान और माधुरी हैं जो हलचल दोनों के दिलों में हुई उस ने दोनों के घरों के साथसाथ पूरी सोसाइटी को हिला डाला. दोनों 40 से सीधे 20 की उम्र में जा पहुंचे, दोनों की दुनिया ही बदल गई. एकदूसरे को देख कर बिना बात के शरमाते रहते, पहले से ज्यादा साथ बैठने के प्रोग्राम बनने लगे.

रागिनी का मायका भी मुंबई में ही था जहां उस के मातापिता रहा करते थे, वह महीने में एक बार उन से मिलने जरूर जाती, पूरा दिन उन के साथ बिता कर लौटती.

उस दिन चिराग और रश्मि के स्कूल से आने के बाद उन के खानेपीने की जिम्मेदारी काजल खुशीखुशी ले लेती क्योंकि काजल अगर कभी पार्लर जाती तो रागिनी भी दिव्या का ध्यान रखती. अब की बार जब रागिनी मायके गई तो काजल बच्चों के स्कूल से आने का इंतजार कर ही रही थी कि उस ने देखा कि मनीष बिल्डिंग की पार्किंग स्पेस में कार पार्क कर के उसी के फ्लैट की बालकनी में जा रहा है. उस का मन किसी तरुणी की तरह पुलक उठा. सम झ गई, मनीष रागिनी की अनुपस्थिति में उसी के साथ समय बिताने आया है. काजल ने अपनेआप को शीशे में देखा. लगा, इस टीशर्ट में शायद वह ज्यादा मोटी लग रही है, टीशर्ट उतार कर फेंकी, फटाक से ढीला कुरता पहन लिया, परफ्यूम लगाया, चेहरे पर पाउडर का एक हाथ भी मार लिया. बस अब डोरबैल बजने का इंतजार था. डोरबैल बजी, काजल ने दरवाजा खोला, ‘‘अरे, आप? इस समय कैसे?’’

मनीष दिलफेंक आदमी था. रागिनी को भी खुश रखता पर साथसाथ दूसरी महिलाओं में भी उस की रुचि बनी रहती. बैंक में भी उस का कुछ न कुछ चलता रहता. स्मार्ट था, गोलाकार चेहरा, हमेशा कलर किए घने काले बाल, ठीकठाक नैननक्श, हंसीमजाक की आदत थी ही, महिलाएं अकसर उस से प्रभावित हो ही जातीं.

काजल को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर मुसकरा कर बोला, ‘‘भाभी, बस आज जल्दी आने का मन हो आया,’’ फिर एकदम से उस का हाथ ही पकड़ लिया, ‘‘आप ने बेचैन कर रखा है, कहीं चैन नहीं आता. पता नहीं क्या जादू कर दिया है मु झ पर… कैसे सम झाऊं, कुछ सम झ नहीं आ रहा.’’

आंखों की गुस्ताखियां 1 महीने से चल ही रही थीं. काजल भी क्या कहती, बस मुसकरा दी. उसे तो यही लग रहा था कि क्या वह सचमुच इतनी आकर्षक है. जवानी में भी किसी ने न पूछा और अब तो इस उम्र में उसे अचानक लगा कि अरे, वह तो शायद परम सखी से भी सुंदर है. तभी तो उस का पति यहां खिंचा चला आया है. वह  इठला गई, इतराई, ‘‘बैठिए तो सही,’’ उसे भी अपना हाथ छुड़ाने की कोई जल्दी नहीं थी पर जब फ्लोर पर लिफ्ट रुकी, बच्चों की  आवाजें आईं तो मनीष ने उस का हाथ छोड़ दिया.

चिराग और रश्मि पिता को आया देख चौंक गए, खुश भी हुए और परेशान भी कि अब रोज की तरह टीवी देखने को न मिलेगा, ‘‘पापा, आप जल्दी आ गए?’’

ड्रामेबाज पिता ने मुंह लटका लिया, ‘‘हां, सिर में बहुत दर्द हो रहा था. घर ही आ गया.’’

बच्चे तो बच्चे थे, उन के दिमाग में नहीं आया कि सिर में दर्द है तो अपने घर में होते पर यहां आंटी के घर क्या कर रहे हैं पर इतराती काजल ने मनीष की आंखों में आंखें डाल कर कहा , ‘‘भाई साहब, आप बैठिए, मैं बच्चों के साथ आप का खाना भी लगा लेती हूं.’’

‘‘ठीक है, मैं बच्चों की यूनिफौर्म चेंज करवा कर आता हूं,’’ मनीष भी उसे निसार होती नजरों से देख कर बच्चों को ले कर चला गया. आज तो कामचोर काजल के हाथों में गजब की फुरती आ गई. लंच में शौर्टकट मारा हुआ था, सोचा था, बच्चे पुलाव और दही खा लेंगे, अब तो पापड़ भी तल लिए, रायता बन गया, घी चढ़ा दिया और सूजी भूनने लगी. पहली बार कोई प्रेमी मिला था, लग रहा था, क्या न बना दे. रवि पति था, प्रेमी तो नहीं. आज पहली बार नएनए प्रेमी के लिए हलवा बनाना उसे एक उमंग से भर गया. दरवाजा खुला ही था. मनीष ने बच्चों के साथ अंदर आते हुए कहा, ‘‘बहुत अच्छी खुशबू आ रही है.’’

इस में शरमाने वाली तो कोई बात नहीं थी पर काजल शरमा गई. मनीष ने खाना बहुत वाहआह करते हुए खाया, बच्चों को भी रोटीसब्जी से छुट्टी मिली थी. मनीष के कहने पर काजल ने भी सब के साथ ही बैठ कर खाया. खाना हो गया तो बच्चे अपने घर जाने के लिए खड़े हो गए.

काजल ने कहा, ‘‘भाई साहब, आप के सिर में दर्द है, एक कप चाय भी बना दूं?’’

‘‘ठीक है, भाभीजी. बच्चों, तुम चलो, मैं आता हूं.’’

काजल बरतन समेट कर 2 कप चाय भी बना लाई. आमनेसामने बैठ कर

चाय पीने में दोनों को एक सुख मिल रहा था. मनीष के लिए तो ऐसी हरकतें नई नहीं थीं. काजल के तनमन में जैसे किसी ने ऐसी उमंग भर दी थी कि वह खिलीखिली जा रही थी. वह अभी तक इस बात पर हैरान थी कि उस के जैसी आम रूपरंग वाली महिला पर भी इस उम्र में कोई जिंदा हो सकता है. मनीष को भी उस के साथ आनंद तो आ रहा था पर वह भी मन ही मन इस बात पर हैरान था कि काजल के साथ तो यह नजदीकी कभी सोची नहीं थी पर जो भी है, अच्छा लग रहा है. मनीष का दरवाजा खुला था, इसलिए वह जोर से बात नहीं कर सकता था. उस ने धीरे से पूछा, ‘‘काजल कहूं या भाभीजी?’’

‘‘अकेले में सिर्फ काजल?’’ फिर बिना बात के शरमाना? ‘‘तुम्हें खाने में क्या अच्छा लगता है?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘संडे को अब की बार जब चारों साथ बैठेंगे, वहीं ले कर आऊंगा.’’

काजल हंसी. इस हंसी में किसी नवयौवना वाली ताजगी थी, ‘‘शेगांव कचौरी.’’

‘‘सामने वाली?’’

‘‘हां.’’

‘‘फिर संडे को मिलते हैं,’’ कह कर मनीष चला गया.

सोसाइटी के बाहर ही ‘नितिन स्वीट्स’ शौप थी. वहां की यह कचौरी बहुत फेमस थी. गोरेगांव की इस शौप की यह कचौरी देखते ही देखते बिक जाती थी. रोज सुबह इसे खाने के लिए लंबी लाइन लगती. इस के साथ हरी चटनी, लाल इमली की चटनी और तली हुई हरीमिर्च से इस का स्वाद बढ़ जाता था.

उस दोपहर चाय पी कर मनीष और काजल ने भारी मन से एकदूसरे को ‘बाय’ कहा और मनीष ने धीरे से आगे के लिए भी कह दिया, ‘‘जब रागिनी फिर जाएगी तो ऐसे ही मिलेंगे.’’

रात को जब रागिनी आई तो पति का सिरदर्द सुन कर दिनभर की अपनी थकान भूल गई. मनीष और बच्चों ने बताया कि काजल आंटी ने बहुत ध्यान रखा तो बेचारी भोली पत्नी उसे थैंक्स बोलने भागी चली गई. रवि और काजल ‘‘अरे, थैंक्स कैसा,’’ बोलते रह गए.

भोले पति को पत्नी पर न फक्र? हुआ कि कितनी अच्छी पत्नी मिली है जो सब का ध्यान रखती है. छुट्टी वाले दिन रागिनी के घर कार्ड पार्टी जमी जिस के लिए  शेगाव कचौरी मनीष ने सुबह ही ला कर रख दी थी. रागिनी कहती रह गई थी कि अरे, घर पर कुछ बना लेती हूं पर मनीष ने उसे बांहों में भर कर चूम लिया था, ‘‘कहां घर पर बनाओगी. छुट्टी है, आराम करो, ऐंजौय करो.’’

रागिनी पति के इस प्रेम पर निहाल हो उठी. मनीष और काजल की प्रेम कहानी की गाड़ी धीरेधीरे नहीं, तेजी से आगे बढ़ी. दोनों फोन पर बातें करते. अब बाहर भी मिलने लगे. रागिनी और काजल की दोस्ती पहले से और पक्की होती रही. काजल पहले से ज्यादा चीजें बना कर ले जाने लगी. पहले जो मनीष गुजराती खाना कुछ खास शौक से नहीं खाता था, अब जब उसे उसी खाने में स्वाद आने लगा, रागिनी पहले तो इस बात पर खुश होती, फिर अब मन में एक हलका सा शक उभरने लगा तो उस की कुछ उल झनें बढ़ने लगीं.

मनीष वैसे तो रागिनी के सामने बहुत सतर्क रहता पर पत्नी के सामने कोई पति कितना ही सतर्क रह ले, पत्नी की निगाहों से उस की हरकतें छिप नहीं सकतीं और यहां तो बात हर समय, रोजाना की, आमनेसामने की थी. जब रागिनी अगली बार मायके गई तो उस दिन जब एक बार मनीष और काजल ने देह की दूरियां भी तुम कर दी तो अब तो उन्हें ‘और’ की चाह होने लगी. अब तो वे बाहर भी मिलने लगे. कहीं दूर जा कर खापी लेते, थोड़ा घूमफिर कर अलगअलग घर लौट आते. मनीष बैंक से सीधे निकलता, काजल दिव्या के स्कूल से लौटने से पहले लौट आती. एक बार रागिनी ने उसे अपनी बालकनी से जाते देखा तो पूछ लिया, ‘‘कहीं गई थी क्या आज?’’

‘‘हां, पार्लर. कैसे पता?’’

‘‘बालकनी से देखा था?’’ बात आईगई होतेहोते रह जाती पर सच को सामने आना था, इसलिए ही शायद रागिनी पार्लर चली गई. पार्लर सोसाइटी से 20 मिनट दूर ही था जहां रागिनी और काजल नियमित रूप से जातीं. वहां रागिनी का फेशल कर रही लड़की पूजा ने पूछ लिया, ‘‘मैडम, रागिनी मैडम बहुत दिनों से नहीं आई? कहीं बाहर गई हैं?’’

फेशल से मिलने वाला रागिनी का सारा रिलैक्सेशन पलभर में कहीं छूमंतर हो गया. उस ने बस ‘‘यहीं है,’’ कह कर अपनी आंखें बंद कर लीं. बंद आंखों के पीछे अब सिर्फ शक था. बहुत सारी बातें थीं, कुछ तो गड़बड़ चल रही है, उस की आंखों के सामने कुछ तो है जिसे उसे इग्नोर नहीं करना चाहिए. काजल को उस से  झूठ क्यों बोलना पड़ा? वह कहां गई थी जो उस से छिपाना था? वे दोनों तो एकदूसरे को बता कर हमेशा कहीं जाती हैं. मनीष आजकल जल्दीजल्दी शेगाव कचौरी ला रहा है जबकि उसे पता है कि रागिनी को वे तीखी लगती हैं. वह खाती भी नहीं. काजल ही शौक से खाती है. मनीष और काजल आजकल आपस में ज्यादा ही मजाक नहीं करते? उफ, अपनेआप को संभालती हुई रागिनी बहुत दुखी मन से घर आई. बच्चे स्कूल से आए, उस ने रोज की तरह काजल से बातें किए बिना ही जल्दी दरवाजा बंद कर लिया. काजल ने भी कुछ ज्यादा बात नहीं की. बस इतना पूछ लिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं है क्या, रागिनी?’’

‘‘नहीं, सिरदर्द है,’’ बस इतना ही कहा रागिनी ने.

‘‘चल, फिर आराम कर,’’ फ्लोर पर 2 और फ्लैट्स थे जिन में कुछ बैचलर्स फ्लैट शेयर करके रहते, न वे किसी से ज्यादा बात करते, न ये लोग करते, कभी कोई दिख जाता तो बस एक फीकी सी स्माइल ही चलती. न उन की इन परिवारों में कोई रुचि थी, न इन्हें उन से कोई मतलब था. महानगरीय सभ्यता अच्छी तरह से निभाई जाती.

बच्चों के साथ रागिनी ने खाना अच्छी तरह से ही खाया, उस ने सोचा कि अगर कुछ गड़बड़ चल भी रही है तो सब से निबटने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत रहना है, खानापीना छोड़ कर तो उसी का नुकसान होगा. उस ने अच्छी तरह से सोच लिया कि पहले दोनों पर नजर रखेगी, फिर रंगे हाथ पकड़ेगी, फिर दोनों से निबट लेगी, अपनी घरगृहस्थी तो वह टूटने देने से रही. दुख अभी बहुत है पर   झेल लेगी, निबट लेगी, वह मनीष को अच्छी तरह से जानती है, उसे उस से और बच्चों से बहुत प्यार है. उस की यह रंगबाजी तो वह आराम से दूर कर ही देगी. जैसेजैसे रागिनी ने सब के एकसाथ बैठने पर काजल और मनीष के एकदूसरे को देख कर, एकदूसरे से बात करते हुए दोनों के हावभाव नोट किए, सबकुछ उस के सामने साफ होता गया. रवि काम से काम रखने वाला एक शरीफ और खुशमिजाज इंसान था. रागिनी को उस पर अब तरस ही आता. वह कई बार सोचती कि काजल अपने पति को धोखा कैसे दे सकती है. फिर सोचती अकेली काजल ही नहीं, मनीष भी बराबर का गलत है, रागिनी की आंखों में आंसू आ जाते, फिर वह खुद को संभाल लेती. वह दिन में पता नहीं कितनी बार खुद को शीशे में ध्यान से देखती, सोचती कि काजल उस से कहीं से भी 20 तो नहीं है, 19 ही होगी. उसी की तरह सांवली, गोलमटोल, कामचोर ही तो है फिर मनीष ने उस में ऐसा क्या देख लिया. काजल से अब वह पहले की तरह बोलती, हंसती रहती क्योंकि उस ने सोच लिया था कि अब उसे क्या करना है.

अगले महीने उस ने मनीष से कहा, ‘‘इस बार मम्मीपापा से मिलने तुम भी चलना, तुम्हें भी उन से मिले बहुत दिन हो गए, वे बच्चों को भी याद कर रहे थे, संडे को चलते हैं.’’

मनीष बुरी तरह चौंका, ‘‘नहीं भई. मैं बाद में फिर कभी मिल लूंगा, हां, यह अच्छा है, तुम बच्चों को ले जाओ.’’

‘‘ठीक है, इस संडे को बच्चों को ले कर जाती हूं.’’

मनीष ने तुरंत सोचा कि रवि संडे को घर पर होगा. काजल से मिलना नहीं होगा, फौरन बोला, ‘‘डार्लिंग, मैं संडे तुम्हारे बिना बोर हो जाऊंगा, ठीक है, मैं भी चल पड़ूंगा.’’

‘‘अभी छोड़ो. मैं ही पहले की तरह अभी अकेली चली जाती हूं, तुम बच्चों को देख लेना.’’

‘‘हां, ठीक है जैसी तुम्हारी मरजी.’’

इस बार रागिनी मनीष को ले कर जाना भी नहीं चाहती थी. उसे इस बार बड़ा काम निबटाना था. हां, उस ने इस बार खाना बना कर रख दिया,

मनीष से कहा, ‘‘हर बार काजल के ऊपर क्यों बच्चों का काम डालना. तुम बैंक से थोड़ा जल्दी आ कर बच्चों को देख लेना, बच्चे काजल से घर की चाबी ले कर घर ही खा लेंगें.’’

‘‘हां, ठीक है.’’

रागिनी काजल को बोल कर चली गई, काजल के चेहरे की रौनक उस ने

साथसाथ नोट की. रागिनी पास की ही सोसाइटी में रहने वाली अपनी एक दोस्त नीति के घर उस से मिलने गई. नीति उस की बहुत पुरानी और अच्छी हमउम्र दोस्त थी. नीति भी बच्चों को स्कूल भेज कर फ्री थी. इस समय 11 बज रहे थे, सुंदर स्लिमट्रिम नीति अभी जिम से आई ही थी. वह जिम के कपड़ों में ही थी, उस ने कहा, ‘‘अभी तु झे हग भी नहीं कर सकती, जरा शावर ले कर आती हूं, तब तक तू टीवी देख. टीवी लगा दूं?’’

‘‘न्यूज मत लगाना, वार की न्यूज देख कर ही मु झे गुस्सा आता है, न्यूज चैनल छोड़ कर कुछ भी लगा जा.’’

‘‘फिर तु झे न्यूज कैसे पता चलती हैं?’’

‘‘थोड़ाबहुत ही देख कर टीवी बंद कर देती हूं, जा, जल्दी शावर ले कर आ, मु झे जल्दी जाना है. काम है.’’

रागिनी का मन कहीं और था. नीति से मिलना आज सिर्फ एक बहाना था. उसे थोड़ा टाइमपास करना था. 12 बजे तक नीति के साथ उस ने चायनाश्ता किया, अच्छी तरह से पेट भर कर किया. ऐसी परेशानी में वह खाना छोड़ने वालों में से नहीं थी. नीति से फिर मिलने की कह कर वह वहां से निकली. मुंबई में अप्रैल में बहुत गरमी

हो जाती है. ऐसी धूप में तो रागिनी किसी भी काम से न निकलती पर आज बात कुछ और थी. उस ने अपने बैग में से स्टौल निकाला, आंखें छोड़ कर उस से चेहरा और सिर ढक कर अपनी सोसाइटी की तरफ चली. अपनी बिल्डिंग में मनीष की पार्किंग पर नजर डाली, मनीष की कार खड़ी थी, बाहर तो गरमी थी ही, अब गुस्से से मन भी जल उठा.

रागिनी ने लिफ्ट भी नहीं ली. काजल के फ्लैट के बाहर खड़े हो कर अंदर की आहटें सुनने की कोशिश की. कोई आवाज नहीं आई. उस ने फिर डोरबैल बजा दी. उस ने अंदर कान लगाए, इस बार उसे कुछ आवाजें आईं. वह की होल से पीछे हो गई. कुछ देर बाद काजल ने अस्तव्यस्त सी हालत में दरवाजा खोला. उस ने नाइट गाउन पहना हुआ था. बाल कुछ बिखरे थे. रागिनी को देख कर उस के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. उस के मुंह से एक शब्द भी न निकला. रागिनी ने सीधे बैडरूम का रुख किया. मनीष बैड पर बैठा हुआ, उस के बदन पर कोई कपड़ा नहीं था. उस ने एक चादर अपने ऊपर खींच ली. उस का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

रागिनी ने कहा, ‘‘मु झे पता था बस तुम दोनों को रंगे हाथ पकड़ना था,’’ और फिर वह गुस्से से काजल की तरफ बढ़ी और उस के गाल पर एक जोर का थप्पड़ रसीद किया, ‘‘बेशर्म औरत.’’

अब की बार काजल भी चिल्ला दी, ‘‘मु झे क्या कह रही है, मनीष को मार. वही

आया है,’’ और फिर काजल ने रागिनी को भी एक जोर का धक्का दे दिया. रागिनी का सिर दीवार से टकरा गया. खून उस के चेहरे पर बहता चला गया. वह दर्द से छटपटा गई पर फिर आगे बढ़ कर काजल को एक लात मरते हुए उसे धक्का दिया. काजल सोफे पर गिर पड़ी. सोफे के कोने से उस का सिर टकरा गया. अब तक मनीष कपड़े पहन कर धूमधड़ाम की आवाज सुन कर लिविंगरूम में आ गया था. उस ने दोनों को फर्श पर अपना सिर पकड़े बैठे देखा. दोनों के माथों से खून बह रहा था. उसे कुछ सम झ नहीं आया. वह रागिनी का हाथ पकड़ कर अपने घर आ गया. रागिनी दोनों को गालियां दिए जा रही थी.

मनीष ने सोसाइटी के ही डाक्टर को घर आने के लिए कहा. वह सम झ गया था कि दोनों को काफी चोटें लगी हैं. वह रागिनी को तो डाक्टर के यहां ले भी जाता पर वह इतने गुस्से में थी कि बारबार उस का हाथ  झटक दे रही थी. जाती तो क्या ही उस के साथ. मनीष ने पलट कर काजल को देखा. वह जोर से चिल्लाई, ‘‘अपनी पागल बीवी को ले कर भाग जा यहां से.’’

इस चीखचिल्लाहट से ऊपरनीचे के फ्लोर्स पर रहने वाली, बच्चों के स्कूल से आने का

इंतजार करने वाली महिलाओं के लिए भरी दोपहर में बढि़या मनोरंजन हो गया. इस सभ्य सोसाइटी में ऐसा न कभी देखा था न सुना था.

डाक्टर सुमित आए. सोसाइटी में ही रहते थे. शौपिंग कौंप्लैक्स में ही क्लीनिक था, जनरल फिजिशियन थे. पतले, दुबले, घुंघराले बाल, घनी मूंछें. हर वक्त स्माइल करने वाले महाराष्ट्रियन डाक्टर थे. अच्छी बात यही थी कि वक्तबेवक्त सब के लिए हाजिर रहते. आए, रागिनी की चोटें देखीं, मुसकराए, ‘‘अरे, मैडम क्या हुआ?’’

बात मनीष ने संभालने की कोशिश की, ‘‘गिर पड़ीं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘मैं बताती हूं, डाक्टर साहब, सामने वाली काजल ने मु झे धक्का दिया,’’ रागिनी का गुस्सा अब काबू में नहीं था.

मरहमपट्टी करते हुए डाक्टर ने पूछा, ‘‘अरे, क्यों?’’

‘‘मैं ने उसे और मनीष को रंगे हाथ आज पकड़ लिया.’’

पट्टी बांधते हाथ  झटके से रुके, सीढि़यों पर कुछ आहटें सुनाई दीं, महिलाएं सुन रही थीं. रागिनी को इस समय किसी की चिंता नहीं थी. लिफ्ट फ्लोर पर रुकी, चिराग और रश्मि भी स्कूल से आ गए. दिव्या ने अपनी मां का खून बहते देखा, ‘‘आंटी, आंटी,’’ करते उलटे पैर रोती आई, ‘‘आंटी, अरे, आप को भी चोट लगी है, अंकल, मम्मी के सिर से भी खून बह रहा है, डाक्टर अंकल, जल्दी चलिए प्लीज. मेरी मम्मी को भी देख लीजिए,’’ स्कूल से थके बच्चे इस समय अपना खानापीना भूल कर मम्मियों की चोटों को देख कर दुखी और परेशान थे.

मनीष ने डाक्टर साहब को फीस दी और रागिनी से बच कर सामने जा कर देखने का इशारा भी कर दिया. छठी फ्लोर की सीढि़यों पर खड़ी सुधा को यह सब देख कर बड़ा मजा आया, उसे लगा 5वीं फ्लोर पर तो यह खूब रौनक सी लगी है. उस ने सब बातें सुन ली थीं, दोनों बड़ी सहेलियां बनती थीं, हुंह. बन लो सहेलियां. आमनेसामने ही कांड कर के बैठ गईं. ऐसे रहती थीं जैसे किसी की जरूरत ही नहीं.

सुधा जानबू झ कर यह दिखाने के लिए कि उस ने सारी बातें सुन ली हैं, वह सब जान गई है, 5वीं फ्लोर पर उतर गई. पहले सीधे काजल के घर गई, ‘‘अरे काजल, बहुत चोट लग गई न? डाक्टर साहब, इन के पति को फोन कर दें? आओ बेटा? परेशान न हो,’’ कहतेकहते जबरदस्ती दिव्या को अपने साथ लिपटा लिया. बेचारी बच्ची मां की चोट देख कर सहमी हुई थी. अब रोने लगी.

डाक्टर ने काजल से कहा, ‘‘जख्म ज्यादा गहरा है, टांके लगाने पड़ेंगे.’’

काजल घबरा कर रोने लगी, दर्द और अपमान के आंसू रुक ही नहीं रहे थे. सुधा ने काजल को गहरी नजरें से देखते हुए कहा, ‘‘हां, डाक्टर साहब. जख्म तो सचमुच बड़ा गहरा लगा है. काजल, कुछ भी हैल्प चाहिए तो बताना.’’ कह कर सुधा अपने घर चली भी गई. अपने घर जा कर फौरन पति अजय को औफिस में ही फोन किया और यह खबर दी.

अजय को भी ऐसी बातों में बहुत मजा आता था. उस ने भी खूब चटखारे ले कर यह बात सुनी. उस के बाद रवि को भी फोन कर के सारी बात भी दी और उसे घर जाने के लिए कहा.

रवि को जैसे एक बड़ा सदमा लगा, जो बहुत स्वाभाविक था. वह अपने तेजी से धड़कते दिल को संभालता हुआ औफिस से उठ गया और आधे घंटे में घर पहुंच कर जो देखा, सम झा, उस ने उस के होश उड़ा दिए.

रवि घर पहुंचा तो काजल बैड पर लेटी हुई थी. आंखें रोरो कर सूज चुकी थीं, माथे पर पट्टी, बिखरे बाल, रवि को देखा तो शर्मिंदा सी धीरे से उठी और सिर  झुका कर बैठ गई. आंसू फिर बह चले. काजल के पास ही लेटी दिव्या पापा से लिपट गई और उस ने जो देखा, सब कह सुनाया.

बेटी को अपने से लिपटा कर रवि ने प्यार किया पर काजल को एक शब्द भी नहीं कहा. उस की तरफ दूसरी नजर भी न डाली. वह चुपचाप सोफे पर जा कर बैठ गया, दिव्या उस के लिए पानी लाई, पूछा, ‘‘पापा, खाना खाया?’’

‘‘हां.’’

‘‘तुम आराम कर लो, बेटा, अभी होमवर्क भी करना होगा न?’’

‘‘पापा, वहीं अंदर आ जाओ, आप भी मम्मा के पास आ जाओ.’’

‘‘अभी यहीं ठीक हूं, तुम लोग लेटो, आराम करो. तुम ने खाना खाया?’’

‘‘मम्मा को दवा देनी थी, बस अभी ही खाया.’’

रवि चुपचाप सोफे पर ही लेट गया. कितने ही विचारों ने उसे बेचैन कर रखा था, उस के प्यार का यह परिणाम? इतना बड़ा धोखा? कैसे रहूंगा अब इस के साथ?

तभी उसी सोफे पर अपने लिए जगह बनाती हुई दिव्या उस से लिपट कर लेट गई,

‘‘पापा, मु झे मम्मा की चोट देख कर बहुत डर लगा. पता है, आंटी को भी चोट लगी है.’’

बेटी की भोली बातें सुन कर रवि को

अपने आंखों में नमी सी महसूस हुई, नहीं, वह यहीं रहेगा, इसी घर में, अपनी बेटी के साथ.

एक ही सोफे पर पिता के साथ लेटने के लिए लटकी सी बेटी ने उस के पेट को पकड़ा हुआ था, उस के हाथ पर सिर रख कर कह रही थी, ‘‘पापा, मु झे अच्छे से पकड़ कर रखो, गिरने मत देना.’’

उस की मासूम सी बात और कोमल स्पर्श ने जैसे रवि के जलते दिल पर एक ठंडा सा फाहा रख दिया. उस ने बेटी का सिर चूम लिया और उस का कंधा थपथपा दिया, फिर कहा, ‘‘चलो, चाय बनाता हूं.’’

दिव्या को अपने हाथ का सहारा दे कर उसे गिरने से बचाते हुए रवि ने उस के उठने के बाद अपनेआप को ही बड़ी तसल्ली दी और आगे चुपचाप जीवन को अपनी राह बढ़ते देखने की हिम्मत बांध ली.

उधर मनीष रागिनी के पैर पकड़ कर माफी मांगे जा रहा था. रागिनी उस से बिलकुल बात नहीं कर रही थी. बच्चे चुपचाप यूनिफौर्म बदल कर मां के पास आ कर बैठ गए थे. रागिनी ने उन्हें खाना खाने के लिए कहा तो मनीष ने कहा, ‘‘मैं सब का लंच लगाता हूं.’’

रागिनी फुफकारी, ‘‘कोई जरूरत नहीं है,’’ कह वह उठने लगी तो चिराग और रश्मि ने कहा, ‘‘मम्मी, हम लगा लेते हैं. आप आराम करो.’’

बच्चे किचन में चले गए, मनीष ने फिर रागिनी के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘माफ कर दो, रागिनी. बहुत बड़ी गलती कर दी. आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा, इस बार माफ कर दो.’’

रागिनी ने नजरें घुमा लीं. उस का चेहरा दर्द और गुस्से से लाल था. आंसू पोंछते हुए उस ने मनीष की तरफ से करवट बदल ली, बच्चे खाना वहीं ले आए. रश्मि ने अपनी प्लेट में से ही अपने साथ रागिनी को अपने हाथ से खाना खिलाया, उस ने 2-4 चम्मच दालचावल खा कर ‘‘बस,’’ कहा.

बच्चे कुछ तो सम झ रहे थे कि कुछ तो गलत हुआ है पर वे जानते थे कि अभी उन्हें कुछ कहनापूछना नहीं है. इस घटना के बाद दोनों परिवारों का जीवन पूरी तरह से बदल गया. दोनों घरों में पतिपत्नी के बीच विश्वास की जो दीवार इतने सालों से मजबूती से खड़ी थी, वह तो पलभर में भरभरा कर टूट ही गई थी.

सुधा के माध्यम से अब यह किस्सा पूरी सोसाइटी को पता था. रागिनी और काजल को अब किसी भी गटटुगदर में कोई न बुलाता. आतेजाते लोग उन्हें देख कर हंस कर आगे बढ़ जाते.

बच्चों को पूरी बात बाहर के बच्चों ने मजाक उड़ाउड़ा कर सम झा दी थी जिस से वे दिनबदिन गंभीर होते चले गए, आपस में बस में भी दिव्या से बिलकुल बात न करते, सारे बच्चे उन से ऐसे मजाक करते कि तीनों बच्चों की आंखों में आंसू आ जाते. दोनों परिवारों का आमनासामना हो जाता तो बहुत ही अजीब स्थिति हो जाती. दोनों परिवारों ने लिफ्ट भी लेना छोड़ दिया कि कहीं कोई लिफ्ट में ही न मिल जाए.

दुखड़े ऐसे थे कि किसी को बता भी नहीं सकते थे. दोनों परिवारों का दिल चाहता कि यह सोसाइटी छोड़ कर कहीं चले जाएं पर अपने इतने अच्छे फ्लैट को छोड़ कर जाना भी आसान नहीं था. अभी लोन बाकी था. सब की सुबहशाम की सैर छूट गई थी.

औफिस के बाद अब मनीष और रवि घर ही रहते. मनीष अब रागिनी के साथ संडे को उस के मायके साथ जाने लगा, बच्चे भी साथ जा कर. कहीं बाहर निकल कर चैन की सांस लेते. दोनों घरों के माहौल में एक घुटन सी भर गई थी, बच्चों को देख कर बच्चों के लिए ही दोनों पेरैंट्स जीवन की गाड़ी बस चला ही रहे थे, बिना किसी उत्साह के, बिना किसी उमंग के. एक बहके कदम ने घरगृहस्थी का संतुलन पूरी तरह बिगाड़ दिया था.

अब दोनों परिवार मन ही मन यही सोचते कि और वक्त बीते तो लोग यह बात भूलें जिस से उन के जीवन में कुछ सुकून आए पर इस तरह की बदनामी एक बार हो जाए तो क्या लोग भूल पाते हैं? नहीं, कभी नहीं. यह बदनामी जीवनभर की होती है, समाज से मिले इस अपमान के दुखड़े जीवनभर चलते हैं.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...