Family Story : अपमानित, शर्मसार, निर्वस्त्र मोहिनी अपनेआप को बैड पर बिछी चादर से ढकने की कोशिश कर रह थी. मन फूटफूट कर, चीखचीख कर रोने को कर रहा था, लेकिन अपमान के सदमे से आंखें इतनी खुश्क थीं जैसे पत्थर की हों. अभीअभी एक तूफान उस के जीवन में आ कर गया था. कमरे के बाहर का शोर कुछ ठंडा तो पड़ा था. लेकिन यह तूफान उस के जीवन को हमेशा के लिए तहसनहस कर गया था.
मोहिनी 18 साल की थी जब शिव कुमार से उस का विवाह हुआ था, मोहिनी का उन से कभी वैचारिक तालमेल नहीं बैठा. शिव कुमार इंगलिश के अध्यापक थे व शांत गंभीर शिव कुमार ने उसे घर की चाबी पकड़ाई और लगभग भूल गए कि वह है चंचल मोहिनी. उन के गहरेपन को कभी सम झ नहीं पाई. शिव कुमार ने उसे आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहन दिया, लेकिन अपने रूप और मन के बिंदासपन के आगे उस ने कभी शिव कुमार की बात को गंभीरता से नहीं लिया.
उसी साल मोहिनी ने एक पुत्री को जन्म दिया, मां बन कर भी वह अल्हड़ युवती बनी रही. शिव कुमार ने बेटी कोमल की देखरेख भी एक तरह से अपने जिम्मे ले ली. कालेज से आते तो बेटी की देखरेख पर ध्यान देते, मोहिनी इधरउधर सहेलियों के साथ सैरसपाटा करती.
कोमल अपने पिता की तरह धीरगंभीर, शांत, दृढ़चरित्र की स्वामिनी थी. वह अपने पिता की छत्रछाया में पलतीबढ़ती रही. कोमल ने इंग्लिश में एमए किया ही था कि शिव कुमार का हृदयाघात से निधन हो गया. मांबेटी दोनों ने किसी तरह अपने को संभाला. पीएफ, पैंशन सब मोहिनी को मिला, अब उसे अपने भविष्य की चिंता खाए जा रही थी.
सब से बड़ी चिंता उसे कोमल की नहीं, अपनी थी, उसे अपने लिए किसी पुरुष का साथ चाहिए था, वह दूसरा विवाह भी नहीं करना चाहता थी, सोचती कौन फिर से झं झट में पड़े, किसी की घरगृहस्थी की जिम्मेदारी क्यों उठाए. अगर किसी से तनमनधन की जरूरत बिना विवाह के पूरी हो जाए तो क्या हरज है आराम से जी लेगी.
मोहिनी दिनभर यही योजनाएं बनाती, सोचती कुछ ऐसा किया जाए ताकि बाकी का जीवन आराम से कट जाए, देखते में वह कोमल की बड़ी बहन ही लगती थी, यत्न से सजाया गया रूपसौंदर्य किशोरियों को भी पीछे छोड़ देता था और इसी बीच कोमल ने बीएड भी कर लिया तो शिव कुमार के कालेज में ही उसे इंगलिश की अध्यापिका का पद मिल गया. आर्थिक रूप से मांबेटी ठीक स्थिति में थीं, घर अपना था ही लेकिन मोहनी को मन ही मन यह चिंता थी कि शादी के बाद कोमल की अपनी घरगृहस्थी होगी तो वह मां पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाएगी.
मोहिनी के मायके में अब कोई नहीं था, मातापिता की मृत्यु हो चुकी थी, भाईबहन कोई था नहीं. ससुराल वालों से उस की कभी बनी नहीं थी. शिव कुमार की मृत्यु के बाद तो संबंध बिलकुल ही खत्म हो चुके थे और अब लखनऊ की इस कालोनी में मांबेटी अकेली ही रहती थीं. पासपड़ोसी अच्छे थे, उन का हालचाल लेते रहते थे, लेकिन मोहिनी को जिस चीज की तलाश थी, वह उसे एक विवाह समारोह से मिली, अनिल से उस का परिचय उस की सहेली अंजू ने करवाया था. अंजू ने उस को कहा था, ‘‘मोहिनी है हमारे दफ्तर के नया सीनियर अफसर, मातापिता हैं नहीं, एक बहन है जो विदेश में रहती है. महाराष्ट्र से है और रिजर्व कोटे की वजह से आए है पर अच्छेअच्छों को मात दे देता.’’
मोहिनी को अनिल पहली ही नजर में पसंद आ गया. उस के मन की मुराद पूरी हो गई. सुंदर, स्मार्ट है, भिन्न जाति का है तो क्या हुआ. सुल झा हुआ है, देखने में कश्मीरी लगता है. अनिल की तरफ वह आकर्षित हो गई.
अनिल उस से अच्छी तरह मिला और यह जान कर हैरान हुआ कि वह एक युवा बेटी की मां है. दोनों काफी देर अकेले में बातें करते रहे. अनिल भी उस के सौंदर्य से प्रभावित हुआ. मोहिनी को भी लगा कि अनिल में कहीं से हीनग्रंथि नहीं है.
चलते समय अगले दिन अनिल को घर आने का निमंत्रण दे कर मोहिनी स्वप्नों के संसार में डूबतीउतराती घर पहुंची.
कोमल ने पूछा, ‘‘मां, कैसी रही शादी?’’
‘‘तुम्हें क्या, तुम्हें तो अपने पापा की तरह बस किताबों में सिर खपाए रखने का शौक है.’’
‘‘नहीं मां, कुछ जरूरी नोट्स बनाने थे मु झे और वैसे भी मैं वहां किसी को जानती नहीं थी. मै वहां क्या करती.’’
‘‘अरे, कहीं जाओगी तभी तो जानपहचान होगी. कितने नएनए लोगों से मिली मैं आज. बहुत अच्छा लगा.’’
कोमल ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ मां, आप हो आईं, आप को अच्छा लगा वहां यह आप को देख कर ही पता चल रहा है.’’
मोहिनी गुनगुनाते हुए चेंज करने अपने बैडरूम में चली गई तो कोमल अपने काम में व्यस्त हो गई.
अगले दिन कोमल कालेज चली गई. लंच के समय अनिल ने जब मोहिनी की डोरबैल बजाई तो दरवाजा खोलने पर मोहिनी हैरान नहीं हुई. उस ने अनिल को जिन अदाओं से आने का निमंत्रण दिया था अनिल जरूर आएगा यह उसे पूरा विश्वास था. उस ने अनिल की खूब आवभगत की. उसे घर दिखाया, उस के साथ ही लंच किया, अपनी दुखद कहानी सुनाई, कम उम्र में शादी, फिर वैधव्य का दुख और अकेलापन.
मोहिनी से अनिल को सहानुभति हुई. उस ने कहा, ‘‘आप परेशान न हों,
मु झे आप अपने साथ ही सम िझए. मैं आप की ऊंची जाति का नहीं पर जानता हूं कि दुनिया कैसे चलती है,’’ कह कर वह उठ कर मोहिनी के पास ही बैठ गया तो मोहिनी ने भी अपना हाथ उस के हाथ पर रख दिया. अनिल के सामीत्य ने कई दिनों से पुरुष संपर्क को तरसते उस के तनमन में एक चिनगारी भी भड़का दी तो उस ने सारी लाजशर्म छोड़ कर अनिल की बांहों में खुद को सौंप दिया और फिर यह एक दिन की बात नहीं रही, कोमल के बाहर जाने का समय देख कर वह अनिल के मोबाइल पर मैसेज भेज देती और अनिल पहुंच जाता, वह अच्छे पद पर था. मोहिनी पर खुल कर खर्च करता. मोहिनी को हवस और पैसों का स्वाद मुंह लग गया.
अनिल और कोमल का अभी तक आमनासामना नहीं हुआ था, लेकिन एक दिन मार्केट में मोहिनी कोमल के साथ घर का कुछ सामान खरीद रही थी, तो अनिल वहां मिल गया. मोहिनी ने कोमल को अनिल का परिचय दिया. कहा कि अंजू के परिचित हैं और अनिल ने कोमल को पहली बार देखा तो देखता रह गया. शांत, कोमल, सुंदर सा चेहरा, दुबलीपतली. कोमल का शिष्ट व्यवहार उसे प्रभावित कर गया.
मोहिनी ने अनिल की आंखों में कोमल के लिए पसंदगी के भाव देखे तो उस के दिमाग में फौरन नई योजनाएं जन्म लेने लगीं.
अब तक कई पड़ोसी बातबात में अनिल कौन है, क्या करता है, क्या करने आता है, इस तरह के कई सवाल मोहिनी से करने लगे थे. मोहिनी ने अनिल को अपना एक परिचित बता कर बात टाल दी थी. अब वह ज्यादा सचेत रहने लगी थी. अनिल दूसरी कालोनी में अकेला रहता था. उस के मातापिता अरसा पहले मर चुके थे. वह वर्षों से अकेला रहा क्योंकि शादी के लिए कोई कहने वाला भी तो हो.
मोहिनी ने अनिल से कह दिया, ‘‘तुम यहां कम ही आया करो, मैं ही तुम्हारे घर आ जाया करूंगी.’’
अनिल को इस में कोई आपत्ति नहीं थी. अब फुरसत मिलते ही वह मोहिनी को फोन
कर देता.
मोहिनी कोमल को कोई न कोई काम बता कर
अनिल के घर पहुंच जाती और दोनों एकदूसरे में डूब कर काफी समय साथ बिताते. ऐसी ही एक शाम थी जब दोनों साथ थे, मोहिनी ने बात छेड़ी, ‘‘अनिल, तुम्हें कोमल पसंद है?’’
अनिल चौंका. पूछा, ‘‘क्यों?’’
‘‘मैं काफी दिनों से कुछ सोच रही हूं, तुम जवाब दो तो आगे बात करूं?’’
‘‘हां, अच्छी है,’’ अनिल ने िझ झकते हुए कहा.
मोहिनी हंसी,’’ तो शरमा क्यों रहे हो. तुम्हारे ही फायदे की बात सोच रही हूं.’’
‘‘बताओ क्या सोचा है?’’
‘‘तुम कोमल से शादी कर लो.’’
जैसे करंट लगा अनिल को. बोला, ‘‘यह आप कैसे सोच सकती हो? मेरेआप के जो संबंध हैं उन के बाद भी मु झे अपनी बेटी से शादी करने के लिए कह रही हो? वैसे भी अपनी जाति के लोग आप को खा जाएंगे कि दलित से शादी
कर ली.’’
‘‘तो क्या हुआ. शादी तो तुम एक दिन किसी से करोगे ही और कोमल की भी शादी तो होनी ही है, तुम उस से कर लोगे तो उस के बाद भी हमारे संबंध ऐसे ही रहेंगे, फिर कभी किसी को हम पर शक भी नहीं होगा. रही बात जाति की तो तुम तो देख ही रहे हो कि हमारी जाति वालों ने ही हमें कैसे छोड़ दिया. उन्हें मैं अपशकुनी लगती. ऐसी जाति का क्या करूंगी.’’
अनिल मोहिनी का मुंह देखता रह गया कि कोई औरत ऐसा भी सोच सकती है.
मोहिनी ने अनिल के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘क्यों, क्या तुम मु झे प्यार नहीं करते? मेरे साथ हमेशा संबंध नहीं रखना चाहते?’’
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है,’’ कहते हुए उस ने भी मोहिनी को बांहों में भर लिया. कहा, ‘‘लेकिन मु झे सोचने का समय तो दो.’’
‘‘ठीक है, अच्छी तरह सोच लो,’’ कुछ देर रुक कर मोहिनी चली गई.
अनिल ने बाद में सोचा, मेरा क्या नुकसान है, अच्छीभली शरीफ सी लड़की है. मेरे तो
दोनों हाथों में लड्डू हैं. जब मोहिनी को बेटी से अपना प्रेमी शेयर करने में कोई परेशानी नहीं तो मु झे क्या.
अनिल ने मोहिनी को फोन पर अपनी स्वीकृति दे दी तो मोहिनी ने कोमल को भी अनिल से विवाह के लिए तैयार कर लिया. उस की बिरादरी में तो इस तरह के संबंध बहुत होते थे और कोई कुछ बोलता भी नहीं था.
बहुत जल्दी मोहिनी ने कोमल और अनिल की सीविल मैरिज करवा दी. कोमल चली गई. अब मोहिनी को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहा. कोमल कालेज जाती तो अनिल कोमल को बिना बताए छुट्टी ले लेता. मोहिनी पहुंच जाती और दोनों कोमल के आने तक का समय साथ बिताते.
कोमल अनिल को पति के रूप में पा कर खुश थी. कोमल के मधुर और शिष्ट व्यवहार ने अनिल को बहुत प्रभावित किया. वह कोमल को दिल से प्यार करने लगा. उसे साफ लगा कि उस परिवार में जाति को ले कर सवाल ही नहीं उठते थे. लेकिन अब भी मोहिनी का जादू उस पर चढ़ा रहता.
कोमल को सपने में भी अंदाजा नहीं था कि उस की अनुपस्थिति में प्यार का कैसा खेल चलता है. वह अकेली मां का बहुत ध्यान रखती और यह देख कर खुश करती कि अनिल और मोहिनी के संबंधों में बहुत अपनापन है. मन ही मन सोचती चलो, मां को दामाद के रूप में एक बेटा मिल गया. वह बहुत संतुष्ट रहती.
इसी बीच एक दिन मोहिनी घर के सामने की सड़क के उस पार बने घर के सामने से गुजरते हुए रुक गई, यह घर काफी दिनों से बंद पड़ा था और आज ट्रक से किसी का सामान उतर रहा था. उस की नजर एक पुरुष पर पड़ी जो सावधानी से सामान उतारने के निर्देश दे रहा था, मोहिनी ने अंदाजा लगाया शायद यही लोग रहने आए है. अंदर से आती एक महिला को देख कर वह रुक गई. अपना परिचय दिया. उस ने भी मुसकरा कर मोेहिनी का अभिवादन करते हुए अपना नाम पुष्पा बताते हुए अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘ये मेरे पति सुधीर है. हमारा 1 ही बेटा है जो अमेरिका में पढ़ रहा है. हम दोनों ही पुणे में जौब करते हैं, अभी इन का ट्रांसफर यहां हो गया है. मैं भी अपना ट्रांसफर यहां करवाने की कोशिश कर रही हूं, अभी तो मैं घर सैट कर के चली जाऊंगी, वीकैंड पर ही आना हुआ करेगा.’’
मोहिनी पुष्पा और सुधीर के प्रभावशाली व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई और उसी समय उन्हें डिनर पर आने के लिए कहा. पुष्पा और सुधीर ने सहर्ष निमंत्रण स्वीकार कर लिया.
करीब 8 बजे सुधीर और पुष्पा मोहिनी के घर आ गए. मोहिनी ने टू बैडरूम
फ्लैट काफी सलीके से सजाया हुआ था. दोनों ने घर की तारीफ की, मोहिनी ने उन की खूब आवभगत की.
अपने बारे में सब बताया तो पुष्पा तो हैरान हो कर कह उठी, ‘‘अरे, लगता ही नहीं आप एक विवाहिता बेटी की मां हैं, आप तो बहुत यंग और स्मार्ट हैं.’’
मोहिनी खुश हो गई. उस के बनाए खाने की दोनों ने खूब तारीफ की. पुष्पा ने 1 हफ्ते की छुट्टी ली हुई थी, जाने तक औपचारिकता खत्म हो चुकी थी. 11 बजे के आसपास वे लोग चले गए.
उस के अगले दिन भी माहिनी घूमतीटहलती उन से मिल आई, सुधीर ने औफिस जौइन कर लिया था. अनिल और कोमल को भी उस ने इन नए परिचितों के बारे में बता दिया था.
कोमल ने खुश हो कर कहा था, ‘‘अच्छा है, आप को कुछ साथ मिल जाएगा.’’
घर अच्छी तरह व्यवस्थित कर पुष्पा पुणे चली गई. मोहिनी ने सुधीर से कह दिया था, ‘‘किसी चीज की भी जरूरत हो तो बे िझ झक कह सकते हैं मु झे.’’
एक दिन शाम को मार्केट में ही मोहिनी की सुधीर से मुलाकात हो गई तो सुधीर ने कहा, ‘‘आइए, घर ही तो जाना है, मैं छोड़ देता हूं.’’
थोड़ी नानुकुर के बाद मोहिनी सुधीर की गाड़ी में बैठ गई. सुधीर ने मोहिनी को सीट बैल्ट बांधने का इशारा किया. मोहिनी ने कोशिश की लेकिन बांध नहीं पाई. सुधीर थोड़ा झुक कर मोहिनी की बैल्ट बांधने लगा. दोनों के हाथ ही नहीं टकरा गए बदन भी टकरा गए. मोहिनी की सुडौल छातियां सुधीर को महसूस होती रहीं.
मोहिनी ने शरमाते हुए सुधीर को देखा. वह पुरुषों की इस नजर से भलीभांति परिचित थी. वह एक पुरुष की मुग्ध दृष्टि थी. सुधीर के महंगे परफ्यूम की खुशबू मोहिनी के तनमन में एक नई उमंग जगा गई.
सुधीर ने मुसकरा कर गाड़ी आगे बढ़ा दी. घर आया तो मोहिनी ने कहा, ‘‘आप जब चाहें घर आ सकते हैं, अगर मन हो तो एक कप कौफी अभी पी सकते हैं.’’
सुधीर ने सहमति में सिर हिलाया और मोहिनी के घर आ गया. मोहिनी सामान रख कर कौफी बना लाई. दोनों आम विषयों पर बातें करते रहे.
कौफी पी कर सुधीर जाने लगा तो मोहिनी ने उस की आंखों में आंखें डाल कर फिर आने के लिए कहा. सुधीर के जाने के बाद मोहिनी सुधीर के खयालोें में खो गई. सुधीर का आकर्षक व्यक्तित्व, बात करने का ढंग उसे छू गया.
अगले दिन अनिल और कोमल दोनों मोहिनी से मिलने आ गए, मोहिनी उन्हें नए पड़ोसियों के बारे में बताती रही. तीनों ने डिनर साथ ही किया. इतने में पड़ोस में रहने वाले उमाशंकर भी आ गए. अनिल और कोमल को उन्होंने आते हुए देख लिया था, सब थोड़ी देर बातें करते रहे.
उमाशंकर ने अनिल की तारीफ करते हुए कोमल से कहा, ‘‘बहुत अच्छा दामाद मिला है मोहिनीजी को हालचाल पूछने आता रहता है.’’
कोमल हैरान हुई. खुश भी कि कितने अच्छे हैं अनिल, मां का ध्यान भी रखते हैं और कभी शो भी नहीं करते. कोमल को रात को घर छोड़ कर अनिल फिर अभी आया, कह कर मोहिनी के पास पहुंच गया, मोहिनी खिल उठी. उसे अनिल की चाहत देख कर स्वयं पर गर्व सा हो आया और फिर दोनों सारी मर्यादाओं को भूल एकदूसरे में खो गए.
कुछ दिन बाद सुधीर मोहिनी से मिलने अचानक आ गया. कहा, ‘‘पुष्पा वीकैंड पर नहीं आ पाएगी, उस की कुछ जरूर मीटिंग है. वह दिल्ली जा रही है.’’
मोहिनी ने मन के भाव चेहरे पर नहीं
आने दिए. बोली, ‘‘आप तो बोर हो जाएंगे छुट्टी के दिन.’’
‘‘हां देखता हूं क्या करना है.’’
‘‘लंच यहीं कर लीजिए.’’
सुधीर ने मोहिनी को ध्यान से देखा. एक औरत का आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कहता मौन निमंत्रण पलभर सोच, फिर कहा, ‘‘ऐसा
ही करते हैं, मैं ही आप को बाहर ले चलता हूं लंच पर.’’
मोहिनी को और क्या चाहिए था. सहर्ष तैयार हो गई.
‘‘तो फिर कल तैयार रहिएगा. मैं लेने आ जाऊंगा.’’
मोहिनी तो जैसे किसी और दुनिया में पहुंच गई. अगले दिन दोपहर तक का समय उस से नहीं कट रह था. सुबह से ही तैयारी शुरू कर दी. आसमानी रंग की शिफौन की साड़ी जो अनिल ने गिफ्ट में दी थी, साथ में मैचिंग ज्वैलरी, बालों का ढीला सा जूड़ा, सुधीर को आकर्षित करने की पूरी तैयारी थी उस की.
सुधीर लेने आया तो मोहिनी को देखता ही रह गया. कहा, ‘‘आप बहुत सुंदर लग रही हो.’’
‘‘थैंक्स,’’ मोहिनी ने शरमा कर कहा.
गाड़ी में बैठ कर सुधीर ने मुसकराते हुए थोड़ा झुक कर मोहिनी की सीट बैल्ट
खुद ही बांध दी तो मोहिनी खुल कर अदा से मुसकरा दी.
सुधीर ने बहुत सी बातें करते हुए एक शानदार महंगे होटल में उसे लंच करवाया. मोहिनी जैसे आसमान में उड़ रही थी. ऐसे होटल में वह कभी नहीं आई थी. अनिल के साथ उस के संबंध उस के घर के बिस्तर तक ही सीमित रहे थे और अब सुधीर के साथ के स्टार होटल का वैभव, मोहिनी जैसी गूंगी हो गई थी. सुधीर और पुष्पा के आर्थिक स्तर का अंदाजा तो उसे पहले भी था. आज उस ने सुधीर को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वह सोच चुकी थी अगर सुधीर के साथ उस की नजदीकी बढ़ेगी तो उस का जीवन और आसान हो जाएगा, अनिल के साथ उस के रिश्ते पर कोमल का एक बंधन था, यहां तो सुधीर पूरा हफ्ता अकेला रहता है. उस ने मन ही मन खूब अच्छी तरह से बहुत कुछ सोच लिया.
लंच करते हुए सुधीर ने मोहिनी की सुंदरता की खूब तारीफ की. वापसी में सुधीर
उसे छोड़ने आया तो मोहिनी ने कहा, ‘‘अंदर नहीं आएंगे.’’
सुधीर मुसकराते हुए अंदर आ गया. जैसे ही मोहिनी ने दरवाजा बंद किया, सुधीर ने उसे बांहों में भर लिया. मोहिनी तो जैसे इस के लिए तैयार ही थी, उस ने थोड़ा सकुचानेशरमाने का नाटक किया, फिर सुधीर की बांहों में खुद को सौंप दिया और एक और पुरुष उस से प्यार करने लगा है यह सोच कर उस के मन में अजीब गर्वमिश्रित खुशी हुई. वह आज भी किसी पुरुष को अपना दीवाना बना सकती है, यह सोच कर वह मन ही मन आसमान में उड़ रही थी.
शाम तक सुधीर उस के घर पर रहा और फिर जाते हुए उसे अगले दिन अपने घर पर ही आने के लिए कह गया.
अब यही क्रम चलने लगा. उस ने अनिल को भी कह दिया था, ‘‘तुम जब भी आना, फोन कर के आना.’’
अनिल ने पूछा, ‘‘क्यों?’’
‘‘ऐसे ही, मैं कहीं बाहर होऊं… घर का कुछ सामान लेने भी जाना पड़ जाता है.’’
‘‘ठीक है.’’
कभी कोमल मिलने आने वाली होती तो वह सुधीर को पहले ही मिलने के लिए मना कर देती. सुधीर बेचैनी से मोहिनी से मिलने की प्रतीक्षा करता रहता. पुष्पा वीकैंड पर आती तो मोहिनी से जरूर मिलती. कभी सुधीर पुष्पा के पास जाता तो मोहिनी अनिल से खुल कर मिलती.
कोमल को अकेली रह रही अपनी मां से बहुत हमदर्दी रहती. वह दिन में कई बार फोन करती. मौका मिलते ही मिलने भी आ जाती. उसे तो कभी अंदाजा भी नहीं हो सकता था कि उस की मां अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए 2 पुरुषों को एकसाथ अपनी उंगलियों पर नचा रही है. अपने जीवन में आए इन दोनों पुरुषों को वह अच्छी तरह बेवकूफ बना रही थी. मोहिनी का जीवन ऐसे ही बीत रहा था. 2 पुरुषों को अपनी अंदाओं, सुंदरता, नाजनखरों से अपने इशारों पर नचाते हुए ही एक दिन अनहोनी हो गई.
एक दिन सुधीर ने फोन पर कहा, ‘‘मोहिनी, मैं ने आज छुट्टी ली है. तुम सुबह ही आ जाना. पूरा दिन ऐश करेंगे.’’
मोहिनी तैयार हो गई. सुबह ही उस ने पूरा काम कर लिया. खूब अच्छी तरह से तैयार हो कर वह सुधीर के घर पहुंच गई. सुधीर की मेड भी उस के औफिस की वजह से सुबह ही काम कर के चली गई थी. दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए.
इसी बीच अनिल औफिस की किसी मीटिंग से फ्री हुआ तो लंचटाइम में मिलने के लिए उस ने कई बार मोहिनी को फोन मिलाया. मोहिनी ने आज अपना फोन पहली बार बंद कर रखा था. अनिल ने सोचा क्या हो गया, आज फोन क्यों बंद है, जा कर देखता हूं.
कालेज में कोमल की तबीयत कुछ ढीली थी. उस ने सोचा मां के पास जा कर आराम करती हूं. वह भी मोहिनी को फोन मिला रही थी. फोन बंद होने पर कोमल को मां की चिंता होने लगी. वह फौरन छुट्टी ले कर मां से मिलने चल दी.
अनिल मोहिनी के घर पहुंचा तो देखा ताला लगा हुआ है. इस समय कहां चली गई, उस ने इधरउधर देखा, कुछ बच्चे खेल रहे थे. उन में से एक बच्चे ने इशारा किया कि आंटी उस घर की तरफ गई हैं, अनिल के मन में पता नहीं क्या आया, वह सुधीर के घर की तरफ चल दिया. कोमल भी पड़ोस में रहने वाली कुसुम आंटी के यह बताने पर कि उन्होंने मोहिनी को सामने वाले सुधीर के घर जाते देखा है. अत: वह भी सुधीर के घर चल दी.
अनिल ने सुधीर की डोरबैल बजाई, अंदर सुधीर और मोहिनी बैड पर एकदूसरे में खोए निर्वस्त्र लेटे थे. डोरबैल बजने पर कोई कूरियर होगा यह सोच कर बस टौवेल लपेट कर गेट खोल दिया. सामने अनिल खड़ा था. सुधीर की अस्तव्यस्त हालत देख अनिल को एक पल में सब सम झ आ गया.
अब तक कोमल भी चुपचाप पीछे आ कर खड़ी हो चुकी थी. सुधीर सकपका गया. वह अनिल से तो कभी नहीं मिला था, लेकिन कोमल से 1-2 बार मिल चुका था. अनिल ने सुधीर को एक तरफ धक्का दे कर अंदर जाते हुए पूछा, ‘‘कहां है मोहिनी?’’
