Hindi Family Story: रचना ने दरवाजे का ताला खोला और अंदर आ गई. पीछेपीछे सामान का थैला उठाए प्रसून भी अंदर आ गया. रचना पूरे महीने का सामान इकट्ठा नहीं लाती थी. दुकान से वापस आते हुए हफ्ते में एक बार जितना जरूरी होता था उतना खरीद लाती थी. प्रसून ने थैला किचन में जा कर रख दिया और फिर रचना से बोला, ‘‘तुम फटाफट चाय बनाओ तब तक मैं प्रियांशु को ले आता हूं.’’ ‘‘जी ठीक है,’’ कह कर रचना हाथमुंह धोने बाथरूम में चली गई. प्रसून प्रियांशु को लेने चला गया.

2-3 घर छोड़ कर ही एक घर में बच्चों का झलाघर था जिस में 6 महीने से ले कर 13-14 वर्ष तक के बच्चे रहते थे. यह एक वृद्ध दंपती का घर था. उन के दोनों बच्चे अमेरिका में सैटल हो चुके थे और अपनीअपनी गृहस्थी में पूरी तरह रम गए थे और खुश थे. यह उन की खुशी का ही परिणाम था कि यह वृद्ध दंपती नातीपोतों से खेलने की उम्र में यहां अकेले एकाकी रह गए थे. अपना एकाकीपन काटने के लिए उन्होंने झलाघर खोल लिया. इस महल्ले में वे 40 वर्षों से रह रहे थे. स्वभाव के भी अच्छे थे. सब लोग उन्हें जानते और मानते थे. 1-1 कर दूर पास के कई बच्चे उन के पास आ गए. घर विभिन्न उम्र के नातीपोतों से भर गया, साथ ही अतिरिक्त आय भी हो जाती.

समय एक अच्छे काम में व्यतीत हो जाता. बच्चों को प्यार से संभालने वाले दादादादी मिल गए और मातापिता को बच्चों की अच्छी और सुरक्षित देखभाल का आश्वासन. सब की समस्याओं का समाधान हो गया. प्रसून रोहनजी के घर पहुंचा तो प्रियांशु उन की गोद में बैठा कहानी सुन रहा था. बाकी बच्चे दरी पर आसपास बैठे थे. प्रियांशु तो रोहन दंपती का खास प्यारा था. प्रसून को देखते ही प्रियांशु चहक उठा, ‘‘अंकल आ गए.’’ प्रसून ने हंस कर उसे गोद में ले लिया, ‘‘घर चलें बेटा?’’ ‘‘हां चलो,’’ प्रियांशु ने उस के गले से लिपटते हुए कहा. प्रसून ने प्रियांशु का स्कूल बैग लिया, रोहनजी को नमस्ते कहा और घर की ओर आ गया.

रचना ने चाय तैयार रखी थी और प्रियांशु के लिए दूध भी. प्रियांशु दूध पीने में नखरे करने लगा तो प्रसून ने थैली में रखे तरहतरह के बिस्कुट दिखा कर दूध पीने को राजी कर लिया. क्रीम वाले बिस्कुट देख कर प्रियांशु खुश हो कर दूध पी गया. रचना और प्रसून चाय पीने लगे. चाय पीने के बाद प्रसून जाने लगा तो रचना ने उसे रोक लिया कि वह रात का खाना खा कर ही जाए. ‘‘प्रिया दीदी तो है नहीं अब आप रात का खाना खाकर ही घर जाइए. अकेले क्या बनाएंगे.’’ ‘‘ठीक है तुम खाने की तैयारी करो तब तक मैं प्रियांशु को पार्क में झले पर झुला लाता हूं,’’ प्रसून ने कहा और प्रियांशु को ले कर बाहर चला गया. रचना जा कर रोहन दंपती को भी रात के खाने का न्योता दे आई.

झला घर के सब बच्चों के जाने के बाद थोड़ी देर आराम कर के रोहन रचना के पास चले आए उस की मदद कराने. दोनों रसोईघर में काम करते हुए गप्पें मारने लगीं. सुनीता यानी रोहन की पत्नी को अपनी दोनों ही बहुओं के साथ रहने, बातें करने का सुख तो मिला ही नहीं. एक बहू तो विदेशी ही थी. उसे तो उन्होंने आज तक देखा ही नहीं. उन के बड़े बेटे ने चर्च में शादी कर लेने के बाद अपनी शादी की खबर देते हुए फोन कर दिया और फोटो भेज दिए थे. उन्होंने बहुत कहा कि बस एक बार बहू को ले कर भारत आ जाओ तो वे लोग प्रत्यक्ष उस से मिल लेंगे लेकिन उन की अल्ट्रा मौडर्न विदेशी बहू यहां आने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हुई.

दूसरे बेटे के लिए उन्होंने खुद लड़की देखी थी लेकिन वह भी शादी कर के अमेरिका जा बसी तो आज तक कभी 4 दिन भी उन के पास आ कर नहीं रही. 4 साल में उन का छोटा बेटाबहू 2 बार भारत आए लेकिन हर बार उन्हें न बता कर चुपचाप बहू के मायके में पूरी छुट्टियां बिता कर 2-4 दिन जाने के पहले उन के पास औपचारिकतावश रह जाते हैं. अब तो रोहन सुनीता ने अपना पूरा ध्यान झलाघर के बच्चों पर केंद्रित कर लिया है और अपने दिमाग से बेटेबहू को पूरी तरह निकाल दिया है.

जो भी खुशी है वह इन बच्चों और महल्ले के पुराने परिचितों में ही है. यही उन का सच्चा परिवार है. रचना से सुनीता आंटी को बहुत स्नेह है. वह भी हालात की मारी हुई और ससुराल से सताई हुई लड़की है. लेकिन उस ने हिम्मत और धीरज से काम लेते हुए अपनेआप को भी संभाला और अपने बच्चे को भी पाल रही है. सुनीता आंटी की मदद से रचना का काम काफी जल्दी हो गया. तब तक रोहन अंकल और प्रसून भी प्रियांशु को ले कर आ गए. सब ने साथ बैठ कर खाना खाया. खाने के बाद आंटी ने फटाफट किचन साफ कर दिया. 9 बजे प्रसून अपने घर चला गया. थोड़ी देर बाद अंकलआंटी भी अपने घर चले गए.

रचना ने दरवाजे पर ताला लगाया और प्रियांशु को ले कर कमरे में आ गई. सुबह 7 बजे ही प्रियांशु की बस आ जाती है तो वह रात में जल्दी सो जाता है. उस के सोते ही रचना की भी आंखें झपकने लगीं और जल्द ही वह भी सो गई. सुबह 5 बजे अलार्म बजने के साथ ही रचना की नींद खुल गई. वह जल्दी से उठी, हाथमुंह धो कर प्रियांशु का टिफिन बनाने लगी. एक तरफ उस ने चाय का पानी चढ़ा दिया.

प्रियांशु के लिए दूध गरम कर के उस ने उसे उठाया और नहला कर स्कूल के लिए तैयार कर दिया. दूधबिस्कुट खिला कर रचना ने पानी की बोतल और टिफिन उस के बैग में रखा और उसे बस स्टौप पर छोड़ने गई. 5-7 मिनट में ही बस आ गई. रचना ने प्रियांशु को बस में बैठाया और घर वापस आ गई. थोड़ी देर अखबार पढ़ते हुए रचना ने चाय पी और फिर घर के बाकी काम निबटाने लगी. काम भी क्या, रचना ने एक गहरी सांस ली, छोटा सा रसोईघर, थोड़े से बरतन, बाहर एक छोटी सी बैठक उसी से लगा हुआ डाइनिंग हाल और एक छोटा सा बेडरूम बस. अपने लिए 2-4 रोटियां बनाईं और खाना तैयार.

नहाधो कर उस ने लंच पैक किया और तैयार हो गई. 9 बजे प्रसून आ जाता था उसे लेने और उसे सुपरमार्केट में ड्रौप कर देता था जहां वह काम करती थी. उसी मार्केट से आगे प्रसून का औफिस था. शाम को लौटते हुए प्रसून उसे वापस ले आता था और घर पर ड्रौप कर देता था. पिछले 4 सालों से उस की यही दिनचर्या है. रोहन दंपती प्रसून और प्रियांशु यही उस की छोटी सी दुनिया और यही उस का परिवार है. कभीकभी प्रसून की पत्नी प्रिया और दोनों बच्चे भी आ जाते. प्रिया बहुत सुलझ हुई स्त्री थी. 8 बरस पहले पास के शहर में उस की शादी हुई थी. परिवार ने लड़के के बारे में बड़ीबड़ी बातें की थीं.

संपन्न घर था बड़ा सा मकान, गाड़ी. मध्यवर्गीय मातापिता ने तुरतफुरत उस का विवाह कर दिया. विवाह के बाद पता चला लड़का अर्थात आशीष कुछ करता नहीं है, बेरोजगार है. पिता और बड़े भाइयों की कमाई पर घर में पड़ा रहता है. घर में उस की कोई इज्जत नहीं है. भाईभाभियां सभी सारा समय उसे दुत्कारते रहते हैं. जब पति की कोई इज्जत न हो तब पत्नी का कौन सम्मान करता है.

शादी के 6 महीने बाद सासससुर का रवैया भी बदल गया. वे रचना को ही ताने देते कि हम ने तो सोचा था कि तुम उसे समझबुझ कर काम करने के लिए मना लोगी. जिम्मेदारी पड़ने से वह सुधर जाएगा लेकिन तुम पत्नी हो कर भी उसे जिम्मेदार नहीं बना पाई, सुधार नहीं पाई. क्या फायदा हुआ तुम्हें घर लाने का? 1 के बजाय 2 लोगों को बैठा कर खिलाना पड़ता है.’’ एकडेढ़ साल तक रचना ससुराल में अपमान के घूंट पीती नौकरों की तरह काम करती रही. आशीष को मनाती रही कोई कामधंधा या छोटीमोटी ही सही नौकरी करने को, लेकिन उस निठल्ले के बस का कुछ नहीं था.

हार कर रचना ने एक स्कूल में नौकरी कर ली. पैसा ज्यादा तो नहीं मिलता था लेकिन कम से कम उसे छोटीछोटी जरूरत के लिए घर में जेठानियों के आगे हाथ तो नहीं फैलाने पड़ते थे. मगर यहां भी दुख ने पीछा नहीं छोड़ा. आशीष ने उस के स्कूल के टीचर्स से पैसा उधार लेना शुरू कर दिया. जब आशीष उन टीचर्स को पैसा चुकता नहीं कर पाया तो उन्होंने रचना को बताया. रचना ने सिर पीट लिया. खुद तो कुछ कमाता नहीं है रचना कमा रही है तो वहां भी चैन नहीं. रचना की सारी कमाई तो आशीष की उधारी चुकाने में खत्म हो जाती. उस ने सारे टीचर्स से निवेदन किया कि वह अब आगे से आशीष को कोई पैसा उधार न दें. लेकिन अब तक की उधारी तो उसे चुकानी ही पड़ रही थी. रचना दोनों तरफ से पिस गई.

एक तरफ घर का सारा काम उसे करना पड़ता तो दूसरी तरफ स्कूल की नौकरी, उस पर भी हालत वैसी ही कि हाथ में एक फूटी कौड़ी नहीं आती और घर पर ताने पड़ते सो अलग. रचना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस के मातापिता अलग अपराधबोध से घिरे रहते थे कि जल्दबाजी में यह कैसे नकारा से ब्याह दिया उन्होंने अपनी बेटी को. जैसेतैसे आशीष के लिए हुए कर्ज से मुक्त हो ही पाई थी वह कि पता चला वह मां बनने वाली है. जैसेतैसे रचना कुछ महीनों तक अपने शरीर को और खींचती रही लेकिन फिर तकलीफ बढ़ जाने से उसे नौकरी छोड़नी पड़ी.

घर में आशीष की वजह से उसे हर कदम पर बेइज्जत होना पड़ता था. रातदिन ताने सुनने पड़ते थे. घरबाहर दोनों मोरचों पर पिस कर भी कुछ हासिल नहीं था. तंग आ कर वह अपनी मां के यहां आ गई. पिता अपने अपराधबोध में घुलते हुए अचानक एक दिन हार्ट अटैक से चल बसे. मां के ही घर प्रियांशु का जन्म हुआ. आशीष 2-3 बार उसे घर वापस ले जाने के नाम पर वहां आया और खुद भी वही टिक गया. पिता तो रहे नहीं मां स्वयं ही बड़े भाइयों पर आश्रित थी. भाई तो फिर भी कुछ कहते नहीं थे मगर भाभियों की जबान खुलने लगी. वे दोनों रातदिन ताने मारने लगीं. आशीष की वजह से ससुराल में रचना को जेठानियों के ताने सुनने पड़ते थे और अब मायके में भी उसे चैन नहीं.

बच्चे को ले कर अगर वह ससुराल वापस जाती तो भी आशीष की बेरोजगारी और आवारागर्दी उसे त्रस्त कर डालती. प्रियांशु की देखभाल के बहाने वह मायके में ही रही और जैसेतैसे उस ने आशीष को वहां से चलता किया और स्पष्ट बोल दिया कि अगर ढंग की नौकरी मिले तो ही उसे लेने आए वरना उसे और बच्चे को उन के हाल पर छोड़ दे. रचना ने फिर एक स्कूल में नौकरी कर ली. प्रियांशु की देखभाल मां कर ही लेती थी. लेकिन दुख ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा और प्रियांशु साल भर का हुआ ही था कि मां चल बसीं.

अब तक मां के कारण जो भाभियां जैसेतैसे रचना को सहन कर रही थीं उन्होंने मां की 13वीं होते ही रचना को अपनी ससुराल वापस चले जाने का फरमान सुना दिया. रचना किसी भी कीमत पर ससुराल वापस नहीं जाना चाहती थी. वह अब और जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं जी सकती थी. उस ने ठान लिया कि अब वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर सम्मान के साथ ही जीएगी. उस ने भाभियों से थोड़े दिनों की मोहलत मांगी और अपने नन्हें बच्चे के साथ दरदर भटकते हुए काम की तलाश करने लगी. कोई ऐसा काम जिस में इतना पैसा मिले कि वह एक कमरा किराए पर ले कर प्रियांशु को किसी अच्छे झलाघर में रख सके.

बहुत तलाशने के बाद रचना की मुलाकात रोहन दंपती से हुई. उन्होंने उसे मानसिक संबल दिया तथा पास ही एक कमरा किराए पर दिला दिया. उन्होंने ही उसे प्रसून से मिलाया. प्रसून ने रचना को अपने दोस्त के यहां सुपरमार्केट में नौकरी दिला दी. रचना प्रियांशु को ले कर यहां आ गई. उस ने किसी को भी अपना पता नहीं बताया था. वह अतीत के सारे अपमान, सारी तकलीफें, कड़वाहट सब भूल जाना चाहती थी.

भाईभाभियों ने भी राहत की सांस ली और अपने हाथ झटक लिए. उन्हें क्या परवाह थी कि वह कहीं भी रहे किसी भी हाल में रहे. 2 साल में अपनी मेहनत और ईमानदारी से रचना ने असिस्टैंट मैनेजर का पद प्राप्त कर लिया. अब एक कमरे की जगह उस ने यह छोटा सा पोर्शन किराए पर ले लिया था, जिस में छोटी सी किचन, बैडरूम, ड्राइंगरूम सब थे. इतने सालों में प्रसून ने हर तरह से हर कदम पर उस का भरपूर साथ दिया था. सुख में, दुख में, हर परेशानी में, चाहे कभी प्रियांशु बीमार पड़ा हो, चाहे वह खुद.

डाक्टर को दिखाने से ले कर दवाइयां लाने तक हर जिम्मेदारी पूरे अपनेपन और ईमानदारी से निभाता है प्रसून. दोनों में एक अव्यक्त अनाम मगर बहुत ही गहरा रिश्ता बन गया था. प्रिया ने भी कभी प्रसून को रोका नहीं रचना की मदद करने से या उस के यहां आनेजाने से बल्कि जब भी होता वह खुद भी रचना की मदद करती. अब तो रचना अपने बेटे के साथ अपने इस नए परिवार और नए जीवन में पूरी तरह से रम गई थी. पुरानी यादें रात के बुरे सपने की तरह बीत चुकी थीं. अब जीवन की नई सुबह आ गई.

रोहन अंकलआंटी कभी मातापिता की कमी महसूस नहीं होने देते. एक बार जब प्रियांशु बहुत बीमार पड़ गया तो आंटी दिनरात उसे गोद में ले कर बैठी रहती थीं. रचना को कभी लगा ही नहीं कि उस की मां नहीं है. रचना के घाव भर चुके थे. वर्षों के संघर्ष के बाद अब वह आर्थिक एवं मानसिक रूप से समर्थ और स्वतंत्र व्यक्ति थी, पूरी तरह आत्मनिर्भर थी. पेपर समेटते हुए रचना की नजर घड़ी पर पड़ी उफ, आज तो वह काफी देर तक पेपर पढ़ती रह गई. बाकी काम उस ने काफी स्फूर्ति से निबटाए.

वह तैयार हो कर लंच बौक्स रख ही रही थी कि नीचे से प्रसून की बाइक का हौर्न सुनाई दिया. जल्दी से उस ने अपना पर्स संभाला और ताला लगा कर बाहर आ गई. प्रसून ने बाइक स्टार्ट की और रचना को ले कर सुपर मार्केट में ड्रौप कर के अपने औफिस चला गया. रचना की दिनचर्या और जीवन सुख से चल रहा था. दिन बीत रहे थे. सबकुछ व्यवस्थित था कि एक दिन अचानक उस के जीवन में एक भूचाल आ गया. एक दिन वह प्रसून के साथ शाम को घर लौटी तो दरवाजे पर आशीष को खड़ा देख कर बुरी तरह चौंक गई.

प्रसून ने उसे चौंकते हुए देख कर पूछा कि यह व्यक्ति कौन है? रचना पिछले सालों में बुरे अतीत के साथ आशीष को भी पूरी तरह से भूल चुकी थी. उस के नाम को, व्यक्तित्व को पूरी तरह से अपने जीवन से अलग कर चुकी थी. अब अचानक उसे सामने देख कर उस के मन में संदेह के कांटे चुभने लगे. उस ने धीरे से प्रसून से कहा कि यह आशीष है. बेचारा प्रसून हकबका गया इस नई परिस्थिति से सामना होने पर. वह भी रचना के जीवन में आशीष नाम के किसी प्राणी के अस्तित्व के बारे में भूल ही गया था.

आज आशीष को देख कर उसे रचना के साथ जोड़ कर देखने की कल्पना से ही उसे अजीब सा लग रहा था. कुछ पलों तक सब किंकर्तव्यविमूड़ से खड़े रह गए. ‘‘क्या हुआ रचना दरवाजा खोलो तुम्हारा पति आया है, उसे अंदर भी नहीं बैठाओगी क्या?’’ आशीष ने ही चुप्पी तोड़ी. आशीष के मुंह से पति शब्द सुन कर रचना के शरीर में वितृष्णा की एक लहर दौड़ गई. प्रसून के चेहरे के भाव भी सख्त हो गए क्योंकि वह रचना के दुखद और संघर्ष भरे अतीत से भलीभांति परिचित था. ‘‘मैं प्रियांशु को ले कर आता हूं,’’ और कुछ समझ न आने पर उसे असमंजस से उबरने का यही एक तरीका समझ आया. मगर अचानक रचना सख्त लहजे में बोली, ‘‘नहीं आप कहीं नहीं जाएंगे.’’

आशीष की ओर कठोर नजरों से देखते हुए रचना ने उस से पूछा, ‘‘आप यहां क्यों आए हैं?’’ ‘‘क्यों आया? क्या मतलब? मैं पति हूं तुम्हारा. प्रियांशु का बाप हूं,’’ आशीष ने अपने स्वर में भरसक अधिकार भाव भरते हुए कहा. ‘‘वाह इतने सालों बाद आप को याद आया है कि आप का हम से क्या रिश्ता है?’’ रचना के स्वर में व्यंग्य था. प्रसून ने रचना से कहा कि अंदर बैठ कर बातें करते हैं यहां पासपड़ोस वाले सुनेंगे तो क्या कहेंगे.

आशीष को प्रसून की उपस्थिति नागवार लग रही थी. रचना ने ताला खोला और सब अंदर आ गए. जब प्रसून भी अंदर आ गया और सोफे पर बैठ गया तो आशीष गुस्सा भरे स्वर में बोला, ‘‘ये महाशय कौन हैं? हम पतिपत्नी के बीच में इन का क्या काम?’’ बारबार आशीष के मुंह से पति शब्द सुन कर रचना झल्ला पड़ी, ‘‘कौन पति, कैसा पति, किस का पति?’’ ‘‘मैं तुम्हारा पति,’’ आशीष उस के चिल्लाने से अचकचा गया. ‘‘कोई रिश्ता नहीं है मेरा तुम से. आज तुम्हें याद आ रहा है कि तुम मेरे पति हो, तब क्यों नहीं याद आया जब मैं नौकरों की तरह तुम्हारे घर पर काम करती थी और तुम्हारा कर्ज चुकाने के लिए स्कूल की नौकरी में पिस कर भी पैसेपैसे को मुहताज थी.

तब कहां थे तुम जब मैं अपने छोटे बच्चे को ले कर नौकरी की तलाश में दरदर भटक रही थी?’’ रचना क्षोभ से भर कर बोली. ‘‘कोई रिश्ता कैसे नहीं है, धर्म को साक्षी मान कर विवाह हुआ है हमारा. मैं तुम्हारा पति हूं,’’ आशीष ने फिर अपने स्वर में अधिकार भाव ला कर रचना पर हावी होना चाहा. ‘‘धर्म को साक्षी मान कर तुम्हारे जैसा पति मिलता है तो मैं आज उस धर्म को ही मानने से इनकार करती हूं. मैं तुम्हें बहुत अच्छे से पहचानती हूं. जरूर उस घर से तुम्हें धक्के मार कर बाहर निकाल दिया गया होगा तभी तुम तलाश करते हुए यहां आ धमके हो. मगर कान खोल कर सुन लो अब यहां तुम्हारी दाल नहीं गलेगी. बरसों की मेहनत के बाद मेरे जीवन में इज्जत और चैन के दिन आए हैं. मैं अब किसी को भी उन्हें छीनने नहीं दूंगी. बहुत मेहनत से यह छोटा सा नीड बनाया है मैं ने.

अब इसे किसी कीमत पर बरबाद नहीं होने दूंगी. तुम अभी के अभी इस घर से निकल जाओ और फिर जिंदगी में कभी मुझे अपनी सूरत मत दिखाना,’’ रचना तलख स्वर में बोली. ‘‘क्यों निकल जाऊं मेरा पूरा हक है तुम पर. कानूनन भी मैं ही तुम्हारा पति हूं,’’ आशीष अब भी अपनी बात पर बेशर्मों की तरह अड़ा रहा. ‘‘कोई हक नहीं है तुम्हारा मुझ पर. मैं तुम्हारे जैसे निकम्मे, नकारा आदमी के साथ रहना तो दूर सूरत तक देखना नहीं चाहती और कानून की धमकी मु?ो मत दो. मैं वैसे भी 7 साल से तुम से अलग रह रही हूं.

यह शादी तो वैसे भी टूट चुकी है और जल्द ही मैं कागजी काररवाई भी कर दूंगी अब तो,’’ रचना का स्वर दृढ़ था. ‘‘तो इस के कारण तुम मुझे दुत्कार रही हो. अच्छा यार फंसा रखा है. पति को तो छोड़ दिया इस को रख लिया,’’ जब रचना पर जोर नहीं चला तो आशीष प्रसून की ओर इशारा कर के अभद्र तरीके से उस पर लांछन लगाते हुए बोला. इस अपमान पर प्रसून और रचना दोनों ही स्तब्ध रह गए.

स्त्रीपुरुष में पवित्र और मर्यादित सखा भाव वाला शालीन रिश्ता भी हो सकता है यह तो समाज सोच ही नहीं सकता. स्त्रीपुरुष को साथ देखा नहीं की सब की शक भरी उंगलियां ही उठती हैं उन की ओर. कोई स्वस्थ नजरिए से तो देख ही नहीं सकता. 2 लोगों के बीच इंसानियत का रिश्ता भी हो सकता है यह समाज पचा नहीं पाता. ‘‘तुम जैसा बेशर्म और गिरा हुआ इंसान और सोच भी क्या सकता है. जब मनुष्य की स्वयं की नजर ही कीचड़ से सनी हो तो उसे सब ओर गंदगी ही नजर आती है. इस से पहले कि मैं तुम्हें धक्के मार कर बाहर निकालूं चुपचाप यहां से चले जाओ,’’ प्रसून कठोर स्वर में बोला.

आशीष प्रसून को नीचा दिखाने और रचना को अपमानित कर उस पर हावी होने की आखिरी कोशिश करने में दोनों के संबंधों को ले कर अनर्गल और अनापशनाप बोलने लगा. प्रसून का मन किया कि आशीष को 2-4 तमाचे जड़ दे मगर वह संयम रख कर खड़ा रहा. मगर रचना का और अधिक अपमान उस से सहा नहीं गया. ‘‘मेरा दोस्त शहर का एसपी है. अगर तुम चुपचाप यहां से दफा नहीं हो गए तो मैं अभी तुम्हें थाने में बंद करवा दूंगा. सारी जिंदगी जेल में सड़ते रहोगे. जाओ यहां से और आइंदा रचना के आसपास नजर भी मत आना,’’ प्रसून ने गुस्से से हुए कहा. धमकी असर कर गई.

आशीष अचानक बौखला गया जब उस ने देखा कि प्रसून ने अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला और किसी को फोन करने लगा. आशीष की जबान तालू से चिपक गई. वह चुपचाप उठा और वहां से खिसक गया. प्रसून ने रचना की ओर देखा. किस मुश्किल से रचना ने अपनेआप को संभाल कर जीवन को व्यवस्थित किया था, मगर आज आशीष आ कर सब अस्तव्यस्त कर गया. बेचारी आशीष के घिनौने इलजाम सुन कर प्रसून से नजर नहीं मिल पा रही थी. प्रसून जानता था कि रचना के मन में उसे ले कर कोई ऐसीवैसी भावना या इच्छा नहीं है.

उस का मन शीशे की तरह साफ है. ‘‘छोड़ो रचना, आशीष जैसों की बातों से अपना मन खराब नहीं करते. मुझे तुम पर भी पूरा भरोसा है और अपनेआप पर भी. हमारे मन पूरी तरह साफ हैं और हमारा रिश्ता भी. हम दोस्त हैं बस और कुछ नहीं और इसी रिश्ते में सारी पवित्रता है. यह तो कुछ लोगों का नजरिया ही गंदा होता है कि वे औरतमर्द के रिश्ते को ले कर कभी स्वस्थ सोच रख ही नहीं सकते. हमेशा गंदा ही सोचते हैं. मगर हमें इन लोगों से क्या लेनादेना. हमारी अपनी एक सुंदर साफसुथरी खुशहाल दुनिया है,’’ प्रसून ने रचना के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे सांत्वना दी. ‘‘हां बेटी प्रसून ठीक कह रहा है. हमें भी तुम पर पूरा भरोसा है. आशीष की बातों से अपना मन खराब मत करो और डरो मत, हम सब तुम्हारे साथ हैं,’’ रोहन दंपती प्रियांशु को ले कर अंदर आए.

जब देर तक आज प्रसून या रचना उसे लेने नहीं आए तो उन्हें चिंता हुई और वे खुद ही चले आए. बाहर उन्होंने सारी बातें सुन ली थीं. ‘‘तुम्हे लोगों की बातों की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं. आप भला तो जग भला. दुनिया की सोच की जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है, तुम केवल अपने सहीगलत की जिम्मेदार हो और हम जानते हैं कि तुम सही हो,’’ सुनीता आंटी ने रचना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा. रचना के सिर से मानो बोझ हट गया. समाज में आशीष जैसे गिरी हुई सोच वाले व्यक्ति हैं तो प्रसून और रोहन दंपती जैसे परिपक्व व स्वस्थ विचारों वाले व्यक्ति भी हैं. प्रियांशु प्रसून से खेल रहा था.

रचना ने कृतज्ञ और संतुष्टि भरी नजर अपने इस खुशहाल परिवार पर डाली. बाहर अंधेरा घिरने लगा था, मगर उस के जीवन में आज संबंधों का एक नया उजाला छा गया था. ‘‘भई दिमाग बड़ा पक गया आज तो, इस समय मुझे तो गरमागरम चाय की सख्त जरूरत है,’’ रोहन अंकल बोले. ‘‘और मुझे भी,’’ प्रसून भी बोला तो सुनीता आंटी हंसने लगीं. ‘‘अभी लाती हूं मैं सब के लिए गरमगरम चाय और साथ में कुछ नाश्ता भी. आप प्रिया दीदी और बच्चों को भी फोन कर के यहीं बुला लीजिए. आज डिनर पूरा परिवार साथ ही करेगा,’’ रचना मुसकराते हुए चाय बनाने किचन में चली गई.

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