कीर्तन यानी भरपूर मनोरंजन, एक पब्लिक फंडा. जहां कहीं भी कीर्तन होता है, औरतों की मंडली सजधज कर ढोलमंजीरे ले कर तुरंत पहुंच जाती है.

‘‘मिसेज सोढी ने यही साड़ी कल भी पहनी थी. लगता है, यह इन की ‘लकी’ साड़ी है. चलोजी, अब कीर्तन की शुरुआत होने जा रही है. सब लोग शांत हो जाएं. जोर से बोलें, ‘जय मातादी’, ‘जय मातादी’.’’

ढोलमंजीरे बजा कर कीर्तन का शुभारंभ हुआ. इसी के साथ नाचगाना भी शुरू हुआ. साथ ही शुरू हुआ खुसुरफुसुर का दौर.

‘‘अरे, जरा शर्माइन को तो देखो. क्या बोल्ड लग रही है… कैसे पल्लू गिरा कर नाच रही है.’’

‘‘अरी, गुप्ताइन को तो देखो, नजर वाला मोटे लैंसों वाला चश्मा लगाए कैसे उछलउछल कर नाच रही हैं. कहीं चश्मा ही न गिर जाए. और उस मटको को तो देखो, ‘मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा, देखोदेखो रे हमरा कमाल मितवा…’ वह तो ऐसे नाच रही है मानो डीजे चल रहा हो. कुछ मोटियां बैठेबैठे ही मटक रही हैं.’’

तभी मंडली के लीडर की आवाज आती है, ‘‘कृपया बातें न करें. वरना बाहर चले जाएं.’’

फिर जयमाता के नारों की आवाज तेज हो जाती है, ‘जय मातादी, जय मातादी’, ‘मां मेरी लाज रखना, मां मेरी लाज रखना’.’’

‘‘अरे, ‘लाज’? भला लाज आजकल रही ही कहां है. आजकल तो बेशर्मों का जमाना है, बेशर्मों का,’’ रमा बोली.

‘‘क्या हुआ? जरा हमें भी तो बता,’’ विमला ने पूछा.

‘‘अरी, वह मिसेज चोपड़ा नहीं हैं जो दूसरों की लड़कियों पर अकसर उंगली उठाती रहती थी. उस की लड़की भाग गई और वह भी पड़ोस के लड़के के साथ. कहते हैं, छज्जेछज्जे का प्यार था… बेचारी किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही,’’ रमा बोली.

‘‘अरे, तू ने मिसेज गुप्ताइन को देखा, कैसे सेठानी बन कर घूमती रहती है. घर में बहू नौकरानी बनी घर का काम करती रहती है. और वह शर्माइन, उसे तो कतई लोकलाज नहीं है, विधवा है, मगर कोई नहीं कह सकता कि वह विधवा है. लाल चूडि़यां, गुलाबी साड़ी, पैरों में पायलें पहने सज कर आदमियों पर डोरे डालती रहती है. और यह कल्लो कमला, जरा तेवर तो देखो महारानी के… किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती,’’ विमला ने बताया.

 

तभी उधर से आवाज आई, ‘‘मुंह पर ताला लग जाए ‘अलीगढ़’ वाला, जो जोर से न बोले ‘माता तेरी जय.’ बोलो ‘माता की जय’.’’

माता की जयजयकार के बाद फिर कीर्तन शुरू हो गया. उधर साथ ही औरतों की खुसुरफुसुर भी चल पड़ी. तालियां तो माता के भजन के लिए बज रही थीं, लेकिन मुई जबान बातों के चटखारे लेने से बाज नहीं आ रही थी.

‘‘अरी, उस मालती को देख, यह तो मुझे फूटी आंख नहीं भाती. खुद तो खूब सजधज कर इधरउधर मटकती फिरती है और खसम बेचारा फटी बनियान में घूमता रहता है. उस की हालत नौकरों की तरह बना रखी है.’’

यहां तो बातों की पूरी थाली परोसी हुई थी. बीचबीच में होश आता है तो ‘जय मातादी’ बोल देते हैं.

बीचबीच में लोगों का आनाजाना भी लगा हुआ था, ‘‘अरेअरे, निझावनी को तो देखो, आती सब के बाद में है, लेकिन बैठती है सब से आगे जैसे कि कीर्तन वही करा रही हो,’’ एक अन्य महिला बोली.

फिर माइक से आवाज आती है, ‘‘जिन्हें बातें करनी हों वे बाहर जा कर करें. यहां का माहौल खराब न करें. बोलो, ‘जय माता दी’. जो न बोले, उस का मुंह सिल जाए.’’

तभी फिर एक महिला की खुसुरफुसुर सुनाई दी, ‘‘अरी, कमबख्तों ने पानी तक को नहीं पूछा. गला सूख गया… पता नहीं बाद में चायवाय का भी इंतजाम किया है या नहीं.’’

तभी मंडली के नेता का स्वर तेज हो गया, ‘‘बोलो, ‘जय माता दी.’ आप सब माता की भेंट देना शुरू कर दें. 100 रुपए देंगी लाख मिलेंगे.’’

थोड़ी देर बाद जब कीर्तन का समय समाप्त होने को हुआ तो फिर एलान हुआ कि अब अरदास करनी है. चढ़ावा चढ़ाने के लिए आगे आएं. मां के दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता है. आगे आएं मां के चरणों में शीश नवाएं और चढ़ावा चढ़ाएं.

फिर क्या था, दिखावे के लिए अपने नाम का सिक्का उछालने के लिए लोग बढ़चढ़ कर आगे आए. नोटों की वर्षा होने लगी.

नाचनागाना, ठुमके लगाना… फुल ऐंजौय के साथ कीर्तन में भोग पड़ा.

असल में खुशी तो मंडली के मालिक को थी. जेब ठीकठाक भर गई थी. फिर भी उतनी नहीं जितनी उसे इस इलाके से उम्मीद थी. शायद उसे अगली बार किसी नाचने वाली को खुद भी लाना पड़ेगा ताकि काम बन जाए. 

– सुनीता 

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