Hindi Love Story: हौजरी की फैक्टरी में कार्यरत किरण तेजी से कपड़ों की पैकिंग में व्यस्त थी. तभी उस की नजर दीक्षा पर पड़ी. दीक्षा को कंपनी में भरती हुए अभी 1 महीना ही हुआ था लेकिन उस की सूनी आंखें एक दर्द समेटे हुए नजर आती हैं. दीक्षा अकसर काम के बीच में रुक जाती और उस की आंखें शून्य में कुछ तलाशने लगती हैं.
किरण भी क्या करे? इस छोटी सी नौकरी के बदौलत किसी तरह अपनी सम्मानजनक जिंदगी को बना कर रखे हुए है. उस का दुख कम है क्या? 25 वर्ष की उम्र तक आते हुए वह इतनी सख्त और भावनाओं से रहित हो जाएगी यह उसे खुद पता नहीं था.
अपने सहकर्मी के संग वह जल्दी घुलतीमिलती नहीं है, यह सोच कर कि क्या बातें होंगी? वही लौट कर पुरानी, घरगृहस्थी और बच्चों की बातें. यही विषय उसे बातचीत करने से रोकते हैं. शादीशुदा औरतों का तो यही रोना रहता है कि मेरे पति को क्या पसंद है या वे मेरे लिए क्या उपहार लाया या मैं ने उस के लिए क्या पकाया, मेरा बच्चा सब से स्मार्ट और मेरा पति सब से भोला, इन्हीं सब बातों से उसे चिढ़ हो जाती थी. जैसे कल की ही बात हो.
वह छोटे से शहर सीतापुर में अपने मम्मीपापा और छोटे भाई के साथ रहती थी. उस का गांव सीतापुर से मात्र 15 किलोमीटर पर है. आम, अमरूद के बगीचे और सब्जी की खेती से प्राप्त आय के अतिरिक्त उस के पिताजी ने टैक्टर की ऐजेंसी भी ले रखी है साधनसंपन्न घर में उस की बहुत लाड़प्यार से परवरिश हुई. 12वीं कक्षा पास करते ही किरण ने आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ जाने की जिद लगा दी.
पिताजी ने भी लखनऊ एक फ्लैट में उस के रहने का इंतजाम कर दिया जिस में उस के साथ 2 अन्य लड़कियां भी रहती थीं. शुरू के 2 वर्ष तो उसे लखनऊ की आबोहवा को समझाने में लग गए. जल्द ही वह भी स्कूटी में फर्राटा भरती लड़़कियों में शामिल हो गई. स्नातक के बाद उस का पढ़ाई से मन उचट गया तो उस के पिताजी उस पर वापस सीतापुर आने का दबाव बनाने लगे. उस के पास लखनऊ में रुकने का कोई कारण भी नहीं बचा था तो उस ने एक बीमा कंपनी में ऐजेंट का काम संभाल लिया.
यह तरकीब उसे मोहित ने बताई जो खुद भी उसी कंपनी में ऐजेंट था. मोहित उस के साथ ही कालेज में भी पढ़ता था. 6 फुट लंबा मोहित दिखने में सुदर्शन और स्वभाव से हंसमुख युवक था. कालेज में उस की कई लड़कियों से दोस्ती थी. वह सब की सहायता को भी हमेशा तत्पर रहता था. जब उसे किरण की समस्या पता चली तो उस की सहायता कर उस की नजरों में भी उठ गया. 2-4 बार वह किरण के साथ सीतापुर भी गया और उस के रिश्तेदारों से मिल कर उन का भी जीवन बीमा कराया.
धीरेधीरे वह किरण के परिवार का अभिन्न अंग बनता चला गया. किरण साधारण नैननक्स की सांवली रंगत की युवती थी. आज तक किसी सहपाठी से ऐसी तवज्जो नहीं मिली थी. वह मोहित के प्रति आकर्षित हो मन ही मन अपने भावी जीवन के सुनहरे स्वप्न बुनने लगी. एक दिन अमीनाबाद में खरीदारी करते हुए उसे एक गुलाबी रंग की चिकनकारी से सजी चादर बहुत पसंद आई मगर उस की कीमत अधिक होने के कारण लेने में झिझक रही थी. ‘‘इसे पैक कर दो,’’ मोहित ने चादर दुकानदार की तरफ बढ़ाते हुए कहा. ‘‘अरे नहीं, आज बहुत शौपिंग कर ली है. इसे फिर कभी आ कर ले जाऊंगी,’’ किरण ने दुकानदार के हाथ से चादर वापस रखते हुए कहा. ‘‘अगले महीने तुम्हारा बर्थडे है, इसे मेरा तोहफा समझा. मुझे ढूंढ़ना पड़ता मगर यह तुम्हारी पसंद का हैं,’’ कह कर मोहित ने उसे तुरंत पैक कर किरण को गिफ्ट कर दिया. उस दिन अमीनाबाद की कुल्फी उसे इतनी स्वाद लगी जैसे जिंदगी में पहली बार कुल्फी खा रही हो.
घर पहुंच कर भी वह यही सोचती रही कि मोहित को मेरा जन्मदिन याद है. इस का मतलब वह भी मेरे प्रति गंभीरता से सोचता है. उस के आगेपीछे न जाने कितनी लड़कियां घूमती रहती हैं मगर उसे मैं पसंद आई. किरण के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. न जाने कितने ख्वाब उस की आंखों में सज गए. अब किरण अपने कपड़ों और मेकअप के प्रति सजग हो उठी. उधर घर वाले उस के लिए रिश्ता तलाशने में जुट गए थे.
मगर किरण की किसी रिश्ते में कोई रुचि नहीं थी. अपने जन्मदिन पर किरण ने अपने बैड पर वही चादर बिछाई. उस से लिपट कर कितने प्रेमप्रस्ताव उस ने मन ही मन मोहित से कह दिए. उस के फ्लैट की अन्य 2 युवतियां रीता और संगीता भी मोहित के आने की खबर से उत्साहित हो उठीं. तीनों ने मिल कर प्लान बनाया कि आज घर में ही केक काट कर डिनर के लिए बाहर चलेंगे. गुलाबी रिबन और गुब्बारे से घर को सजा कर तीनों भी तैयार हो गईं.
नियत समय पर मोहित अपने एक मित्र के साथ फ्लैट में हाजिर हो गया. काली जींस और सफेद टीशर्ट में सजा मोहित कहर ढा रहा था. जल्द ही मोहित और उस का मित्र सौरभ सब से ऐसे घुलमिल गए जैसे पुराने मित्र हों. मोहित ने रीता और संगीता को भी जीवन बीमा पौलिसी लेने को राजी कर लिया. उन्हें मोहित से पौलिसी लेते देख कर किरण ने दोनों की टोक दिया, ‘‘अरे मैं कितने महीनों से तुम्हें इस के लाभ समझा रही हूं मगर तुम्हें समझा नहीं आया और मोहित की बात सुन कर 5 मिनट में फार्म भरने बैठ गईं.’’ ‘‘तुम्हारी बातों में तर्क नहीं था इस ने हमें सरल तरीके से इस के लाभ समझा दिए.’’ रीता ने लापरवाही से कहा. ‘‘क्यों परेशान हो मैं जल्द ही सेल्स मैनेजर बनने वाला हूं फिर तुम्हें ही पौलिसी दिलाया करूंगा,’’
मोहित ने उसे प्यार से समझाया. किरण भी उस की सम्मोहक आंखों में डूब कर रह गई. मोहित और किरण की नजदीकियां बढ़ने लगीं, औफिस से निकल कर जब वे फील्ड वर्क पर होते तो एक बार फ्लैट में जरूर आते. दिन में उस की रूममेट अपने औफिस में रहती थी. उन्हें पता ही नहीं चला कि किरण और मोहित फ्लैट को अपनी कामनाओं की पूर्ति करने का साधन बना चुके हैं.
किरण मोहित की हर बात में आंख मूद कर विश्वास करती. मोहित अब सेल्स मैनेजर बन चुका था और वह उस की चहेती सेल्स ऐजेंट. 2 साल बीत गए. घर वालों ने जब शादी का दबाव डालना शुरू किया तो किरण ने मोहित से ही सीधे बात करना उचित समझा. फ्लैट का दरवाजा लगाते हुए किरण ने मोहित से कहा, ‘‘सुनो, आजकल पिताजी शादी करने के लिए बहुत दबाव बना रहे हैं.’’ मोहित ने किरण को गोद में उठा कर बिस्तर पर लिटाते हुए कहा, ‘‘कुछ महीनों के लिए किसी तरह से टाल दो बस.’’
‘‘फिर कुछ महीनों के बाद क्या होगा?’’ किरण ने अपने मुख पर झाक आए मोहित के घुंघराले बालों को हाथों से पीछे की तरफ समेट कर एक चुंबन लेते हुए पूछा. ‘‘2 महीने में ट्रांसफर लिस्ट निकलने वाली है, मुझे बनारस या कानपुर मिलने वाला है,’’ मोहित उस के शरीर को अपनी बांहों में जकड़ते हुए बोला. ‘‘फिर उस के बाद?’’ किरण रोमांटिक हो उस से सर्प की तरह लिपट कर बोली. ‘‘उस के बाद तुम अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते,’’ कह कर मोहित ने उस के शरीर के साथ ही दिलोदिमाग को भी मसल कर रख दिया. शब्द पिघले शीशे की तरह कानों से उतर कर कलेजे को चीरते हुए चले गए.
मोहित शारीरिक सुख भोग कर तृप्त हो कर सो गया और किरण अपनी बेबसी पर आंसू बहाती रह गई. पिछले 4 साल का घटनाक्रम उस की आंखों में घूम गया… मोहित ने कभी कहा ही नहीं कि वह किरण से प्यार करता हैं. उस से ही शादी करेगा. दोनों के बीच औफिस के विभिन्न विषयों पर घंटों बात हो जाती थी मगर प्यार के कसमेवादे तो कभी नहीं हुए. किरण ने एकतरफा प्यार किया और अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, जिसे मोहित ने तुरंत स्वीकार कर लिया.
मोहित की जगह कोई भी होता तो शायद यही करता. अब किरण के पास घुटघुट कर रोने के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा था. उस दिन भी दीक्षा को देर तक शून्य में निहारते देख कर किरण कों तरस आ गया. उस ने दीक्षा के पास आ कर उस की पीठ को प्यार से सहला दिया. दीक्षा वर्तमान में लौट आई. सामने किरण की नजरों में उभरी सहानुभूति को देख कर उस की आंखों में कैद दुख का बांध टूट गया. आंसुओं की लहर उमड़ पड़ी, जिसे रोकने के लिए वह उठ कर वाशरूम की तरफ दौड़ पड़ी.
जी भर कर रोने के बाद उस ने अपने मुंह को धो कर संयत किया. वापस अपनी जगह आ कर पूर्ववत कार्य करने लगी. सुमन और किरण में धीरेधीरे मित्रता बढ़ने लगी लेकिन दोनों ही अपने अतीत के विषय में बात करने से कतराती थीं. एक दिन दीक्षा ने किरण को बताया, ‘‘आज मुझे जल्दी निकलना है, मेरे मकानमालिक के बेटे की शादी होने वाली है इसलिए मुझे अपना कमरा खाली करना होगा. अब फिर से नई जगह तलाश करना कितना मुश्किल है.’’ ‘‘कितने समय से यहां रह रही हो?’’ किरण ने पूछा. ‘‘2 साल से, मगर मुझे सिर्फ 2 महीने का ही समय दिया हैं,’’ दीक्षा ने रोनी सूरत बना कर कहा. किरण को उस की काली कजरारी आंखों में याचना दिखी. बोली, ‘‘मैं अपनी सोसायटी में पता करती हूं, तुम भी तलाश जारी रखो.’’
किरण को दीक्षा से हमदर्दी हो उठी. दीक्षा मात्र 20 वर्ष की ही थी. उस के आगे 25 वर्षीय किरण अपनेआप को बहुत सयानी समझाती. किरण मोहित से धोखा खाने के बाद और मोहित की ट्रांसफर के बाद बीमा कंपनी में कार्य करने में खुद को असहज महसूस करती. कंपनी में मोहित की जगह एक नया सेल्स मैनेजर अजय आ गया. अजय उसी के गृहनगर सीतापुर का था. अजय साधारण कदकाठी का मिलनसार युवक था.
कंपनी में उस के आने के बाद स्टाफ में एक नया जोश और उत्साह पैदा हो गया. कंपनी की छमाई रिपोर्ट में उन की ब्रांच का बिजनैस टौप पर था. इसी खुशी में एक होटल में सभी कर्मचारियों के लिए पार्टी रखी गई. किरण आधेअधूरे मन से उस में शामिल हुई. अजय ने उस दिन पार्टी में सभी सदस्यों के आपसी तालमेल को इस का श्रेय दिया लेकिन किरण की कार्यशैली की विशेष प्रशंसा हुई. सभी ने उस का फूलों के गुलदस्ते के साथ जोरदार तालियों से स्वागत किया. किरण पिछला सबकुछ भूल कर काम में डूबती चली गई. उस दिन उसे तेज बुखार था उस ने औफिस से छुट्टी ले ली.
फ्लैट में दवा ले कर अकेले पड़ी थी. ऐसे में उसे अपने भविष्य को ले कर एक अनिश्चिंतता दिखाई दी. उस ने विचार किया कि अपने अभिभावकों के बताए रिश्तों में से एक रिश्ते को वह चुन लेगी. दिनभर बदन दर्द से करवटें बदलते हुए उसे शाम को गहरी नीद आ गई. फ्लैट की डोरबैल से उस की नीद खुली. शाम के 6 बज रहे थे. दरवाजे खोलते ही सामने अजय को देख कर हैरान रह गई. ‘‘ऐसे क्या देख रही हो? क्या मैं तुम्हारा हालचाल नहीं पूछ सकता?’’ अजय ने कहा. ‘‘यह बात नहीं है.
आप को यों अचानक देख कर हैरानी हुई,’’ कह कर उस ने अजय को अंदर आने को कहा. अजय सेब, संतरे के थैलों को उसे पकड़ाते हुए एक कुरसी पर बैठ गया. ‘‘कुछ दिनों के लिए घर जाने की सोच रही हूं,’’ किरण ने कहा. ‘‘जब चलना हो बता देना, मैं भी अपने परिवार से मिलने चल पड़ूंगा,’’ अजय ने लापरवाही से कहा. ‘‘परिवार में कौनकौन हैं,’’ किरण ने औपचारिकता से पूछा. ‘‘मम्मीपापा और छोटा भाई है,’’ अजय ने लापरवाही से जवाब दिया. ‘‘सीतापुर में कब से रहते हो?’’ ‘‘अभी 2 साल पहले ही घर बनवाया है, इस से पहले पूरा परिवार गांव में ही था.’’ ‘‘हमारा भी पुश्तैनी घर गांव में ही है.
सीतापुर का घर, पापा ने 20 साल पहले बनवाया था.’’ उस दिन औफिस में जब किरण अजय के कैबिन में बीमा भुगतान संबंधी फाइल ले कर पहुंची अजय अपनी कुरसी पर मौजूद नहीं था. उस का फोन सामने ही रखा था जिसे देख कर वह समझा गई कि आसपास में ही कहीं गया है. अजय की प्रतीक्षा में वह वही कुरसी पर बैठ गई.
कुछ शादी के कार्ड के नमूने भी रखे हुए थे. उसे याद आया कि अजय ने उसे बताया था कि कार्ड की डिजाइन उस की पसंद की ही रखेगा. किरण ने कार्ड उठाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि तभी अजय का फोन बज उठा. उस में मम्मा शब्द डिस्प्ले हो रहा था. उस ने फोन उठा लिया, ‘‘सुनो मैं अपने मायके जा रही हूं. अब तुम्हारी मारपीट बरदाश्त से बाहर है. अपने दोनों बच्चे भी ले जाऊंगी. तुम्हें उस लड़की के साथ गुलछर्रे उड़ाने है तो उड़ाओ.
मुझे अपनी नौकरानी मत समझाना. अब दोबारा इस विषय में बात भी मत करना.’’ ‘‘रौंग नंबर मिला दिया है आप ने, यह अजय का नंबर है,’’ किरण ने कहा. ‘‘ओह तो तुम्हीं हो वह चुड़ैल. मेरे लिए ही नहीं तुम्हारे लिए भी वह रौंग नंबर है.’’ किरण स्तब्ध रह गई. अजय भी उस के पीछे आ कर खड़ा हो गया. किरण की कुछ समझा में नहीं आ रहा था. अजय अपनी नाकाम शादी के सच्चे, झाठे किस्से सुनाता जा रहा था और वह न जाने क्याक्या अनर्गल बके जा रही थी. कैबिन के बाहर लोग इकट्ठा हो चुके थे. उस दिन के बाद उस औफिस में काम करना उस के लिए मुश्किल होता गया.
उसे अपनी पीठ पर सहकर्मियों की हंसी और सहानुभूति चुभती सी महसूस होती. किरण दिल्ली अपनी मौसी के पास चली आई. कुछ समय बाद, फरीदाबाद की इस फैक्टरी में काम करने लगी और यहीं शिफ्ट हो गई. दीक्षा के लिए इतनी जल्दी अच्छी और सुरक्षित जगह तलाश करना आसान नहीं था इसलिए किरण ने उसे अपने साथ ही फ्लैट में रहने का प्रस्ताव दे दिया.
दीक्षा कम बोलने वाली लड़की है लेकिन घर की साफसफाई और भोजन बनाने में कुशल है जबकि किरण घरबाहर के सारे काम, स्कूटी दौड़ाते हुए मिनटों में निबटा देती. दोनों साथ ही स्कूटी से फैक्टरी जातीं और साथ ही बाजार, सिनेमा का भी आनंद लेतीं. उन की मित्रता घनिष्ठता में बदलने लगी. एक बीमार पड़ती तो दूसरी जीजान से सेवा करती. ‘‘किरण उठो न,’’ दीक्षा ने ट्रे में चाय संग पकौड़ों को बैड की साइड टेबल में रखते हुए कहा. ‘‘सुबहसुबह पकौड़े?’’ ‘‘10 बज गए हैं, कितना सोओगी?’’ दीक्षा ने अपने गीले बालों से टपकते पानी को तौलिए में लपेटते हुए कहा.
‘‘ओह तुम कितनी सुंदर हो दीक्षा. काश, मैं लड़का होती,’’ किरण ने आह भर कर कहा. ‘‘लड़कों का नाम न लेना मुझे नफरत हो चुकी है.’’ ‘‘सही कहा, मुझे भी सख्त नफरत है, मैं ने कभी पूछा नहीं तुम से लेकिन अगर तुम अपना मन हलका करना चाहती हो तो खुल कर कह सकती हो,’’ किरण ने दीक्षा का हाथ पकड़ कर उसे अपने पास बैड पर बैठाते हुए कहा. ‘‘कहूंगी नहीं तो शायद अंदर ही अंदर घुट कर रह जाऊंगी,’’ दीक्षा ने कहा.
दीक्षा कानपुर के कपड़ा व्यवसाई परिवार की सब से बड़ी बेटी थी. उस से छोटी 2 बहनें जुड़वां होने के कारण आपस में ही खेलकूद करती रहतीं. दीक्षा उन से उम्र में 8 वर्ष बड़ी थी. जब वे 10 वर्ष की हुईं, दीक्षा 18 वर्ष की हो गई. वह घर से बाहर अपने मित्रों के संग अधिक समय बिताने लगी. उस का घर में मन कम ही लगता था. उन्हीं दिनों पड़ोसी मकान में हमउम्र 4 नवयुवक किराए पर रहने के लिए आए.
दीक्षा अपनी बालकनी से उन की गतिविधियां देखती रहती थी. कुछ समय पश्चात इशारों में ही हायहैलो होने लगी. फिर फोन नंबर की अदलाबदली भी हो गई. अब वह वीडियोकौल से सभी से जुड़ती चली गई. दीक्षा की मां को जब यह बात पता चली तो उस दिन उस की बहुत पिटाई हुई. दीक्षा ने बहुत समझाया कि वे सिर्फ दोस्त ही तो हैं. मगर उस की मां इन सब बातों के सख्त खिलाफ थीं.
दीक्षा की मां सौतेली हैं, यह तो उसे मालूम था मगर आज उसे एहसास भी हो गया कि अगर ये मेरी सगी मां होतीं तो ऐसा नहीं करतीं. दीक्षा मन ही मन प्रतिशोध की आग में जल उठी. इस आग को उन लड़कों ने भी हवा दी और फिर एक दिन दीक्षा घर से भाग गई. दीक्षा इस घटना के करीब साल बाद ही घर छोड़ कर निकली थी. सालभर वो अपने मातापिता की हर सलाह को नकारात्मक ढंग से लेती और अपनी नानी से घंटों बुराई करती.
नानी भी उसे समझाने के बजाय उस की मां के सौतेले रिश्ते को ही दोष देतीं. उस ने उन लड़कों को बताया था कि वह बनारस अपनी नानी के घर चली जाएगी, उन्होंने उसे ऐसा कदम उठाने से मना किया था. वे कहां जानते थे कि दीक्षा सचमुच घर से बिना बताए निकल जाएगी. पुलिस ने चारों लड़कों को सब से पहले पूछताछ के लिए उठाया तो उन्होंने बताया कि वह हम से सिर्फ फोन पर हंसीमजाक ही किया करती थी. पुलिस ने उन के खिलाफ कोई सुबूत न मिलने पर उन्हें चेतावनी दे कर छोड़ दिया. दीक्षा गुस्से में घर से निकल कर नानी के पास बनारस जाने के लिए बस स्टैंड पर आ गई. वहां उसे लखनऊ की बस अड्डे से निकलती दिखाई दी तो उसी में चढ़ गई.
वह सोच रही थी कि कानपुर शहर से जितना जल्दी निकल सके, उतना अपने मातापिता की पहुंच से दूर हो जाएगी. लखनऊ का टिकट ले कर किरण बस की खिड़की से सिर टिका कर बैठ गई. पीछे छूटते नजारों के साथ ही वह भविष्य के सपने बुनने लगी… कुछ समय बाद बस एक जलपानगृह में रुकी. किरण बस से नहीं उतरी. उसे ध्यान आया कि वह अपना फोन भी जल्दबाजी में घर ही छोड़ कर आ गई है.
उस का क्रोध अब तक शांत हो चुका था. उस ने अपने परिवार को सूचना देने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का फोन प्रयोग में लाने के लिए इधरउधर देखा. उस के पीछे की सीट पर एक महिला अपने छोटे से बच्चे को गोद में लेकर बैठी थी. 1-2 सवारियां बस में इधरउधर छितरी हुई बैठीं अपने झाले से जलपान निकाल कर बैठी हुई थीं. बाकी सवारियां नीचे उतर चुकी थीं. ‘‘मुझे एक काल करनी है क्या आप अपना फोन इस्तेमाल करने के लिए देंगी ?’’ दीक्षा ने कहा. ‘‘हां ले लो,’’ महिला ने उसे तुरंत फोन थमा दिया. दीक्षा को न तो नानी का फोन नंबर याद था न ही घर के किसी सदस्य का, उसे सिर्फ अपना फोन नंबर याद था जिसे वह घर भूल कर आई थी.
उस ने उसी पर काल किया. लगातार 4 बार काल करने पर उस की छोटी बहनों ने उस का फोन थाम लिया. ‘‘हैलो दीदी, तुम्हारा फोन घर पर रह गया है.’’ ‘‘मुझे मालूम है सुनो मैं नानी के घर बनारस जा रही हूं, पापा को बता देना चिंता न करें.’’ ‘‘तुम कब घर आओगी?’’ ‘‘अब से मैं बनारस में ही रहूंगी, वहीं पढ़ाई करूंगी, मम्मी को बता देना,’’ कह कर दीक्षा ने फोन काट दिया. दोनों बहनें अपने खेल में व्यस्त हो गईं.
जब शाम 8 बजे तक दीक्षा घर नहीं पहुंची तो उस की मां ने उस की खोजखबर लेनी चाही तो उसे दीक्षा के बनारस जाने की खबर मिली. सुबह 8 बजे से कालेज के लिए निकली दीक्षा बनारस भी नहीं पहुंची थी. पुलिस में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी गई. बनारस नानी के घर से भी लोग बसअड्डे और रेलवे स्टेशन की खाक छानते रहे, दीक्षा का पता नहीं चला.
जलपानगृह से बस के चलते ही दीक्षा की बगल में एक नवयुवक आ कर बैठ गया. जल्द ही दोनों घुलमिल कर बातें करने लगे. उस ने दीक्षा को विश्वास में ले लिया कि वह उसे विश्वनाथ बाबा की गली के पास स्थित उस की नानी के घर सुरक्षित पहुंचा देगा. वह भी लखनऊ अमीनाबाद से कुछ सामान लेगा, फिर शाम की ट्रेन से बनारस निकल जाएगा. उस ने अपने मोबाइल से उस के लिए भी ट्रेन का टिकट बुक कर दिया.
सुबह के 10 बजे थे और ट्रेन शाम की थी तो दीक्षा उस के साथ अमीनाबाद घूमने निकल पड़ी. दोनों ने एक रेस्तरां में खाना खाया और फिर दीक्षा को कुछ याद नहीं रहा. लगातार 3 महीनों तक यौन शोषण का शिकार होती रही. एक देह व्यापार के अड्डे से बिकती हुई वह दूसरे अड्डे में पहुंच कर शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना झेलते हुए मानसिक रूप से अस्वस्थ होती चली गई.
एक दिन एक गैस्ट हाउस में किसी मुखबिर की सूचना से छापा पड़ा और उस में नाबालिग लड़कियों के साथ दीक्षा भी बरामद हुई. दीक्षा की विक्षिप्त हालत को देखते हुए उसे मानसिक रोग चिकित्सालय भेज दिया गया. उस के परिवार वालों ने उसे अपनाने से मना कर दिया. दीक्षा नारी सुधार गृह का हिस्सा बन कर रह गई.
जब उस की मानसिक स्थिति में सुधार हुआ तो उस की इस फैक्टरी में नौकरी लगा दी गई. अब वह अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने के लिए आजाद थी. मगर उस की जिंदगी में कोई रंग, उमंग बची ही नहीं थी. दीक्षा अपनी आपबीती सुना कर सिसकने लगी. किरण ने उसे गले से कस कर अपने से लगा लिया. दोनों को एकदूसरे की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी.
दीक्षा अभी भी सिसक रही थी. किरण ने भावावेश में भर कर उस के चेहरे पर चुंबनों की बरसात करते हुए कहा, ‘‘रो मत पगली, हमारी जिंदगी में अब कोई तीसरा नहीं आएगा, हम दोनों ही एकदूसरे के पूरक बन कर रहेंगे.’’ समय कब किसी के लिए रुका है दोनों ने स्टांप पेपर में हस्ताक्षर कर एकदूसरे को अपना साथी बनाते हुए, अपनी चलअचल संपत्ति का वारिस घोषित कर दिया. अब लोग उन्हें पीठ पीछे क्या कहते हैं इस की उन्हें कोई परवाह नहीं होती. वे एकदूसरे के पूरक बन चुके हैं यही उन का अंतिम सत्य है बाकी दुनिया मिथ्य बन चुकी है.
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