Hindi Sad Story: ‘‘भैया, मैं… मैं जल्द ही आप के पैसे लौटा दूंगी, सच कहती हूं. लेकिन अभी मुझे पैसों की सख्त जरूरत है. प्लीज भैया,’’ घिघायाते हुए आरती अपने बड़े भाई से बोल रही थी कि इस संकट की घड़ी में मायके वालों के सिवा और कोई नहीं है जो उस की मदद कर सके. मगर आरती के भाई ने दोटूक शब्दों में यह बोल कर फोन रख दिया कि अभी उस के पास पैसे नहीं हैं तो कहां से दे.

आरती ने जब अपने छोटे भाई मनोज से जोकि अपने परिवार के साथ बैंगलुरु में रहता है, मदद मांगी तो उस ने भी यह बोल कर फोन रख दिया कि इतने बड़े शहर में यहां अपना ही खर्चा चलाना मुश्किल है तो वह उसे पैसे कहां से दे पाएगा. फिर कई बार उस ने फोन मिलाया, पर उस के भाइयों ने फोन बंद कर दिया ताकि आरती फोन करकर के उन्हें परेशान न कर सके. दोस्त, नातेरिश्तेदारों ने भी इस आढ़े वक्त में आरती की मदद करने से इनकार कर दिया. जब अपनों ने ही मुंह मोड़ लिया तो परायों से क्या आस.

लेकिन आरती को अब समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करेगी? कहां से पैसे लाएगी? नरेश से तो कुछ बोल नहीं सकती है क्योंकि वह तो खुद ही अस्पताल में पड़ा है और बच्चे क्या समझेंगे उस की परेशानी? उन्हें तो यही पता है कि उस के पापा को चोट लगी है इसलिए अस्पताल में भरती हैं, जल्दी घर वापस आ जाएंगे. नरेश के ऐक्सीडैंट के बारे में बता कर वह बच्चों को टैंशन नहीं देना चाहती थी. इसलिए उन से इतना ही कहा कि उन के पापा को मामूली चोट लगी है, जल्दी ठीक हो कर घर आ जाएंगे. मगर बिट्टू अब कोई बच्चा नहीं रहा, सब समझता है वह.

दरअसल, उस रोज औफिस जाते समय नरेश की बाइक को पीछे से एक गाड़ी ने इतनी जोर का धक्का मारा कि वह सीधे खाई में जा गिरा. वह गाड़ी वाला तो वहां से भाग गया, लेकिन आसपास के लोगों ने दौड़ कर नरेश को वहां से बाहर निकाला वरना तो शायद वह वहां पड़ापड़ा मर ही जाता. उन लोगों ने ही पुलिस को खबर दी. नरेश को जल्दी अस्पताल पहुंचाया गया. आरती को जब नरेश के ऐक्सीडैंट की बात पता चली तो उस के तो हाथपांव ही थरथराने लगे थे.

दोनों बच्चे स्कूल में थे इसलिए पड़ोस में चाबी दे कर वह पागलों की तरह अस्पताल भागी. डाक्टर ने जब बताया कि उस ऐक्सीडैंट में नरेश के कमर और दोनों पैरों की हड्डियां टूट गई हैं तो आरती वहीं धम्म से जमीन पर बैठ कर बिलखबिलख कर रोने लगी. आरती की मनोस्थिति देख तभी नरेश के एक दोस्त ने अस्पताल में पैसे भर दिए थे ताकि जल्दी से जल्दी उस का औपरेशन शुरू हो सके.

औपरेशन के बाद डाक्टर ने बताया कि नरेश खतरे से बाहर हैं, लेकिन अभी उन्हें पूरी तरह से ठीक होने में कम से कम 6 महीने तो लग ही जाएंगे. ‘6 महीने’ सोच कर ही आरती का दिमाग घूम गया था क्योंकि अब घर का खर्चा, नरेश की दवाइयां, बच्चों की पढ़ाई वगैरह कैसे हो पाएगी. 6 महीने अकेले सबकुछ कैसे मैनेज करेगी वह? लेकिन जब इंसान पर दुख पड़ता है तो सहने की शक्ति भी आ जाती है. नरेश का एक दोस्त रात में उस के पास रुक जाता था. सुबह वह बच्चों को स्कूल भेज कर, घर के सारे काम निबटा कर अस्पताल चली आती थी.

इन दिनों वह जिन झंझवातों से गुजर रही थी वही जानती थी. पैसों की किल्लत, घरबच्चों की देखभाल और सुबहशाम अस्पताल के चक्कर लगातेलगाते वह थक चुकी थी तन और मन दोनों से. कभी मन होता नरेश को बताए. लेकिन वह तो खुद ही अभी बैड पर पड़ा कराह रहा है तो उस से क्या कहे. दर्द के मारे जब नरेश चिल्लाने लगता तो आरती दौड़ कर नर्स को बुला लाती ताकि वह उसे दर्द का इंजैक्शन लगा सके और नरेश चैन की नींद सो सके.

जब नरेश कभी यहां दर्द तो कभी वहां दर्द की शिकायतें करता तो मन ही मन आरती चिढ़ उठती कि खुद तो कष्ट में हैं ही, परिवार को भी कष्ट मे डाल दिया. क्या ठीक से बाइक नहीं चला सकते थे? कितनी बार समझया था आरती ने बाइक से नहीं कार से औफिस जाया करो. लेकिन वे कहते कि क्यों ज्यादा पैट्रोल खर्च करे जब बाइक से औफिस जाया जा सकता है. लेकिन कुछ पैसे बचाने के चक्कर में कैसे चक्कर में पड़ गए यह तो देखो. मगर क्या गारंटी थी कि कार से नरेश का ऐक्सीडैंट नहीं हो सकता था? होनी तो हो कर रहती है, चाहे जैसे हो. अपने मन में ही सोच आरती खुद को समझती. लेकिन ये सब जो समस्याएं आन पड़ी हैं उन से वह अकेले कैसे निबट रही है वही जानती है.

आज सोचती है पैसे बचा कर रखने की आदत डालती तो यों उस सब के सामने हाथ न फैलाना पड़ता. घर खर्च से जो भी पैसे बचते उन से वह शौपिंग कर आती थी. पैसे आते ही उस के हाथों में खुजली होने लगती थी. नरेश को पता था आरती बहुत खर्चालु औरत है. तभी तो वह उसे कोई कार्ड वगैरह हाथ में नहीं देता था. एक मायका ही था जिस से आरती को आस थी. लेकिन उन्होंने भी आरती की मदद करने से इनकार कर दिया. भाइयों का परायापन व्यवहार देख कर आरती के दिल को कितनी ठेश पहुंची थी वही जानती है.

लेकिन किस से कहे वह अपना दर्द? जिस भाई ने बचपन से उसे एक पिता की तरह प्यार किया, आज कैसे वह एकदम से पराया हो गया सोच कर ही आरती के आंसू नहीं रुक रहे थे. जिस छोटे भाई को आरती ने अपनी गोद में खेलाया, आज उसी भाई को बहन का दर्द दिखाई नहीं दिया. कैसे पलट कर बोल दिया कि यहां अपने ही खर्चे कम हैं क्या? यही आरती अपने भाइयों को राखी बांधती आई है. उन की लंबी उम्र की दुआ मांगती आई है. लेकिन आज जब उस के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है तो कैसे उन्हीं भाइयों ने उस से मुंह फेर लिया. कहावत है न, ‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और.’

समाज की नजरों में एक अच्छे भाई बनने का सिर्फ दिखावा किया उन्होंने. लेकिन आज जब सच में कुछ करने की बारी आई तो हाथ खड़े कर दिए. आरती के भाईभाभियों का कुछ महीनों से अजीब व्यवहार हो गया था क्योंकि जब भी आरती तीजत्योहार पर अपने मायके जाती, निश्चित तौर पर उन के बीच झगड़ा शुरू हो जाता था. हमेशा की तरह भावनाओं में बह कर आरती सब के लिए उपहार ले कर जाती ही थी.

लेकिन कैसे उस की भाभी उस के लाए उपहार कहीं कोने में रख देती और कहती कि अब ये सब लाने की क्या जरूरत थी. जितनी हंसीखुशी से आरती अपने मायके जाती थी उतनी ही दुखी हो कर वापस आती थी. फिर भी कभी आरती को यह नहीं लगा कि अब उस का मायका पहले जैसा नहीं रहा.उसे तो अब भी यही लगता था कि उस के भैयाभाभी उस से बहुत स्नेह रखते हैं. लेकिन आज आरती का भ्रम टूट चुका था.

अपनी ससुराल वालों से आरती किस मुंह से मदद मांगती क्योंकि उस ने ही तो उन से अपना सारा नातारिश्ता खत्म कर लिया था. नरेश के दिल में उन के प्रति इतनी नफरत भर दी कि नरेश अपने परिवार वालों को देखना भी नहीं चाहता कि वह उन की जिंदगी में कोई दखल दें या यहां आएं. नरेश के परिवार वाले उस की सुखसुविधाओं और संपन्नता से जलते हैं. उस के मातापिता नरेश से ज्यादा अपने बड़े बेटेबहू और उन के बच्चों को प्यार करते हैं. तभी तो हर वक्त उन्हें उन्हीं की चिंता लगी रहती है.

आरती यह कहकह कर नरेश के मन में उन के लिए जहर भरती रहती थी कि कहीं घर और जमीनजायदाद भी उस के मातापिता अपने बड़े बेटेबहू के नाम न कर दें. आरती की बातों में आ कर नरेश को भी लगने लगा था कि उस के मांपिताजी उस से ज्यादा उस के बड़े भाई विनोद को प्यार करते हैं. तभी तो जब देखो उन की ही फिक्र लगी रहती है उन्हें. लेकिन नरेश यह बात भूल गया कि पैसे की कमी के बावजूद उस के पिताजी ने उसे बाहर पढ़ने भेजा था ताकि वह एक बड़ा इंजीनियर बन सके.

तब विनोद भी तो बोल सकता था न कि उसे शहर पढ़ने क्यों नहीं भेजा गया? उसे क्यों नहीं इंजीनियर बनाया? क्यों उसे 12वीं तक पढ़ा कर खेतीबाड़ी में लगा दिया गया? लेकिन कभी उस ने अपने मुंह से ऐसी बात नहीं निकाली बल्कि वह तो खुश होता था अपने छोटे भाई को इतनी बड़ी पोस्ट पर देख कर. जब भी विनोद दिल्ली अपने भाई के घर आता उस के जीनेरहने के तौरतरीके देख कर खुश हो जाता था.

आरती के सासससुर जब भी दिल्ली आते, अपने साथ घर का बना घी, पेडे़, देशी चबाना ले कर आते थे. मगर खुश होने के बजाय आरती मुंह बनाते हुए कहती, ‘‘हुं. कौन खाता है ये सब चीजें. बेकार में माता लाया करो, बरबाद ही होते हैं,’’ कह कर वह अपनी सास के सामने ही उन के लाए सामान को घर के नौकर को दे देती थी. बेचारी उस की सास को कितना बुरा लगता होगा यह उस ने कभी नहीं सोचा. उन के आने से घर के काम बढ़ जाते थे, जगह छोटी पड़ जाती थी. इस बात की भी वह नरेश से शिकायत करती. आरती यह बोल कर नरेश के कान भरती, ‘‘जानते हो तुम्हारे मांबाबूजी क्या बोल रहे थे? कह रहे थे कि नरेश को तो इतनी अच्छी नौकरी है, अपने दोनों बेटों को बड़ेबड़े स्कूल में पढ़ालिखा सकता है. प

र बेचारा विनोद क्या करेगा. कैसे 3-3 बेटियों को पालेगा? सोच कर ही मुझे चिंता होती है. तुम्हारे मांबाबूजी के बोलने का मतलब है कि हम अपना हिस्सा छोड दें. अरे, हम क्यों छोड़ें अपना हिस्सा? देखो, मैं तो कहती हूं जितनी जल्दी हो सके अपना हिस्सा ले कर रामसलाम कर दो इन्हें. कल को क्या पाता अगर तुम्हारे मांबाबूजी नहीं रहें तो तुम्हारे भैयाभाभी तो सारी संपत्ति हड़प लेंगे. फिर समझ लो कुछ हाथ नहीं आएगा हमारे. कब से सोच रही हूं एक बड़ा 3 कमरे वाला घर हो हमारा.

बच्चे बड़े हो रहे हैं तो इन्हें भी तो अब अपना कमरा चाहिए कि नहीं.’’ आरती की कही 1-1 बात नरेश को सही लगने लगा था. उसे भी लगने था कि अगर उस के मांबाबूजी को कुछ हो गया तो कहीं उस के भैयाभाभी सारी संपत्ति अपने नाम न करा लें. इसलिए अपने मांबाबूजी से लड़झगड़ कर नरेश ने अपना हिस्सा अपने नाम करवा लिया और फिर उस संपत्ति को बेच कर उसने यहां दिल्ली में बड़ा घर खरीद लिया. नरेश और आरती के पराए व्यवहार से दुखी हो कर उन लोगों ने यहां आना ही छोड़ दिया फिर.

अब आरती यही तो चाहती थी कि उस की ससुराल वाले उन से दूर रहें ताकि वह अपने मायके वालों का खुल कर सत्कार कर सके. जब भी आरती के मायके वाले दिल्ली आते, आरती पागलों की तरह उन की खातिरदारी में लग जाती थी और सिर्फ आरती ही नहीं, नरेश भी उन के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. उन की खातिरदारी में कोई कमी न रहे इसलिए वह छुट्टी ले कर तैनात रहता था.

कभीकभी तो महीनोंमहीनों वे आरती के घर रह जाते थे क्योंकि कहां बिहार का एक छोटा सा शहर और कहां दिल्ली जैसा बड़ा शहर. आते तो फिर जाने का मन ही नहीं होता उन का. क्या तब आरती के घर का बजट नहीं बिगड़ता था? उस के मायके वालों के आने से उस का घर छोटा नहीं पड़ता था? कैसे खुशीखुशी वह उन के लिए रोज नएनए पकवान बनाती और खिलाती थी. छुट्टी ले कर, पैट्रोल खर्च कर नरेश उन्हें दिल्ली की सैर कराता. बड़ेबड़े होटलों में पार्टी देता. लेकिन कभी उफ तक नहीं करता कि इतना खर्च क्यों करती हो, कहां से लाऊंगा मैं पैसे? जब वे लोग यहां से जाने लगते तो आरती सब के लिए महंगेमहंगे उपहार खरीदती.

उन के लिए प्लेन का टिकट भी वही कटवा कर देती थी यह बोल कर कि क्या बेटी का हक नहीं है अपने मायके वालों के लिए कुछ करने का? मगर आज उन्हीं मायके वालों ने कैसे उसे ठेंगा दिखा दिया. आरती को दुख तो इस बात का है कि भाभियां तो फिर भी दूसरे घर की हैं, लेकिन दोनों भाई तो उस के अपने थे न? फिर कैसे उन्हें उस का दुख नजर नहीं आया. मां के गुजरने के बाद जिन भाइयों को उस ने पिता का दर्जा दिया और भाभियों को मां का, उन्होंने ही इस संकट की घड़ी में उस से मुंह मोड़ लिया.

अभी भी आरती को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा है कि उस के भाइयों ने उस की मदद करने से इनकार कर दिया. सही कहते हैं लोग कि सुख के सब साथी, दुख में न कोई. जब आरती के पास पैसा था कैसे वही लोग लाड दिखादिखा कर यहां चले आते थे. लेकिन आज वही लोग मुसीबत पड़ने पर देखने तक नहीं आए. शायद यह सोच कर कि कहीं अस्पताल के सारे बिल उन्हें ही न चुकाने पड़ जाएं, इसलिए कोई भी बहाना बना दिया, सोचते हुए आरती ने एक गहरी सांस भरी कि तभी नर्स आ कर उसे दवाई का परचा पकड़ा गई और कहा कि इसे तुरंत लाना है. अब तक गिरवी रखी 2 सोने की चूडि़यों से खर्चे चल रहे थे. लेकिन अब आगे वह क्या करेगी समझ नहीं आ रहा था.

कभी इन्हीं भाईभतीजों पर आरती ने दोनों हाथों से पैसे लुटाए थे लेकिन आज वही 1-1 पैसे के लिए मुहताज हो रही है. उस के खर्चीले स्वभाव देख कर कभीकभी नरेश कहता भी कि आरती, घर खर्च से जो भी पैसे बचते हैं, उन्हें बचत खाते में डाल कर भूल जाया करो. देखना कभी काम आएंगे. मगर हंसते हुए आरती कहती कि जिंदगी 4 दिन की होती है नरेश. खाओपीयो, मौज करो. कभी उस ने नरेश की बातों को सीरियसली लिया ही नहीं. अगर कुछ पैसे जोड़े होते तो आज यह नौबत न आती.

नरेश के लिए सीमित आमदनी और बढ़ती महंगाई में घर चलना कितना मुश्किल हो जाता था यह आरती समझती ही नहीं थी. दिल्ली जैसे महानगर में एक इंजीनियर की तनख्वाह से क्या हो सकता था? केवल दोनों बच्चों की पढ़ाई में ही लाखों रुपए स्वाहा हो जाते थे. लेकिन आरती को कौन समझए यह सब. उसे तो बस होटलों में खाना, घूमना और मायके वालों को बुलाने से ही फुरसत नहीं थी. आरती के खर्चीले व्यवहार के कारण कभीकभी नरेश चिंचित हो उठता था.

कहता कि किसी पर खर्च करो, मना नहीं करता मैं, पर अपनी हैसियत के अनुसार खर्च करो. हम कोई अंबानी या टाटा, बिरला तो हैं नहीं कि खर्चे का हम पर कोई असर नहीं पड़ेगा.अगर मैं आर्थिक रूप से कमजोर हो जाऊंगा तो तुम भी हो जाओगी. मगर आरती को समझने का मतलब था पत्थर पर सिर पटकना और तो और वह नरेश को ही कंजूस बोल कर उस का मजाक उड़ाती थी. लेकिन आज उसे एहसास हो रहा है कि नरेश कितना सही कहते थे. खैर, अब जो भी जेवर बचे थे उन्हें ही बेच कर वह किसी तरह घर चलाएगी क्योंकि अभी नरेश को दवाइयां और पौष्टिक खाने की जरूरत है. बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, सब कैसे हो पाएगा? इसलिए आरती अपने गहने ले कर सुनार के पास चली गई.

गहने देखनेपरखने के बाद सुनार ने उसे 1 लाख और कुछ हजार दिए. अभी वह पैसे ले कर दुकान से निकली ही थी कि एक आदमी ने पीछे से टोका कि बहनजी, आप का कुछ गिर गया है. वह देखने के लिए जैसे ही मुड़ी, दूसरा आदमी उस के हाथ से पर्स ले कर रफूचक्कर हो गया. वह भागी उस के पीछे, चिल्लाई. उस की मदद के लिए वहां खड़े लोग भी भागे भी पर न जाने वह आदमी कहां लापता हो गया. वहां खड़े लोग कहने लगे कि चोरों का एक गिरोह है यहां, इसलिए उसे संभल कर रहना चाहिए था. सही कहते हैं, जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से आती है.

अपने आंसू पोछते हुए किसी तरह लड़खड़ाते कदमों से आरती आगे बढ़ने लगी. समझ नहीं आ रहा था अब क्या करेगी ? कहां से पैसे लाएगी? मन तो कर रहा था ट्रेन के नीचे सिर दे दे ताकि सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल जाए. लेकिन वह भी नहीं कर सकती थी वह क्योंकि वहां अस्पताल में पति पड़ा है और घर में बच्चे उस का इंतजार कर रहे हैं. इतने दिनों से कैसे उस ने अपने आंसू जब्त किए हुए हैं वही जानती है क्योंकि न तो वह बीमार पति के सामने रो सकती थी और न ही बच्चों के समाने. सारे दुख अपने अंदर समेटे तिलतिल कर मर रही थी. आरती कुछ देर पार्क की बैंच पर जा कर बैठ गई और सिसकसिसक कर रोने लगी. उसे आज पूरी दुनिया वीरान, सुनसान लग रही थी. वह अपनेआप को आज एकदम अकेला महसूस कर रही थी. उसे लग रहा था ये रिश्तेनाते सब झठे हैं. कोई किसी का नहीं है इस दुनिया में.

सब मतलबी और स्वार्थी हैं. जब सुख और अच्छा वक्त था, मायके वाले उस के साथ रहे. जब तक वह सब के मनमुताबिक चलती रही, उन के काम आती रही, अच्छी थी. लेकिन आज उस पर दुख की जरा सी छाया क्या पड़ गई, सब कैसे पराए हो गए. सपने में भी नहीं सोचा था कि उस के मायके वाले यों उस से मुंह फेर लेंगे. संपत्ति भाइयों के हाथ आते कैसे उन के तेवर भी बदल गए. आरती के पिता के मरते ही दोनों भाइयों ने सारी संपत्ति बराबर में बांट ली. दोनों बहनों को पूछा तक नहीं. लेकिन क्या यहां पापा की गलती नहीं थी? अगर वे जीतेजी अपने चारों बच्चों में संपत्ति का बंटवारा कर देते तो अच्छा नहीं होता. आरती की बड़ी बहन गीता गुस्से से उबल रही थी. उस का कहना था कि जब संपत्ति में वे दोनों भी बराबर की हकदार हैं, फिर क्यों छोड़ें अपना हक? उन के भी तो बच्चे हैं, उन्हें भी तो अपने बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलानी है.

अगर आरती साथ दे तो वे अपना हक मांग सकती हैं. अगर देने से आनाकानी करेंगे तो फिर कानून तो है ही. गीता का कहना था कि वे अपना हक कानून के जरीए ले सकती हैं. लेकिन उस की बात पर आंखें बड़ी कर आरती बोली थी कि क्या अब अपने भाइयों को हम कोर्ट में घसीटेंगे? और कमी क्या है हमें जो कुछ पैसों के लिए हम भाइयों से अपना रिश्ता बिगाड़ें? नहीं चाहिए हमें कोई हकवक. मायका बना रहे, मानसम्मान मिलता रहे यही काफी है. अगर गीता को लेना है तो मांगे जा कर, पर उसे कुछ भी नहीं चाहिए और तब से ही दोनों बहनों में मतभेद हो गया था. दोनों ने एकदूसरे के घर आनाजाना और बातचीत करना भी बंद कर दिया था.

नहीं पता था आरती को कि जिन भाइयों के लिए उस के दिल में इतना प्यार और सम्मान था, जिन के लिए उस ने अपनी बड़ी बहन से रिश्ता बिगाड़ लिया, ससुराल वालों की भी परवाह नहीं की, उन्हीं भाइयों के दिल में उस के लिए इतना मैल भरा है. सही कहती थी गीता कि यह सब बस कुछ दिनों का दिखावा है. देखना एक दिन ये हमें पूछना तो दूर अपने घर में चढ़ने तक नहीं देंगे. मगर तब आरती ने उस की बातों को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल दिया था. उसे लगा था गीता पगला गई है, इसलिए कुछ भी बोल देती है. उसे अपनी बहन एक लालची औरत और भाइयों का दुश्मन नजर आई थी, लेकिन आज लगता है गीता कितनी सही थी. कितना समझती थी वह उन्हें. आरती ही पगली थी जो अपने पति की मेहनत की कमाई उन पर लुटाती रही. तभी फोन की घंटी से आरती वर्तमान में पहुंच गई. देखा तो बिट्टू का फोन था. वह बिट्टू को नरेश के पास छोड़ आई थी कि पता नहीं कब उसे किस चीज की जरूरत पड़ जाए. पिंकी छोटी है उसे अस्पताल में नहीं छोड़ सकती थी.

लेकिन बिट्टू जरा समझदार है इसलिए उसे ही नरेश के पास कुछ देर छोड़ देती है रोज ताकि घरबाहर के काम कर सके. फोन पर बिट्टू की घबराहट भरी आवाज सुन कर आरती के तो होश ही उ़ड़ गए. उसे लगा कहीं नरेश को कुछ हो तो नहीं गया ? ‘‘क्या हुआ बिट्टू… तुम्हारे पापा तो ठीक हैं न? बता न?’’ घबराते हुए आरती बोली. मगर बिट्टू ने यह बोल कर फोन रख दिया कि जल्दी आओ. किसी तरह दौड़तेहांफते आरती जब अस्पताल पहुंची तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो वह देख रही है सही है.

उस की ससुराल वाले नरेश को घेरे खड़े थे और नरेश मुसकरा रहा था, ‘‘मां…’’ कह कर आरती अपनी सास के गले लग कर फूटफूट कर रोने लगी. उस का रोना देख सास की भी रुलाई फूट पड़ी. ‘‘तो क्या हम इतने पराए हो गए कि छोटे बबुआ के ऐक्सीडैंट की खबर भी नहीं दे सकती थी? बिट्टू न बताता तो हमें पता भी नहीं चलता,’’ एक मीठे उलाहने के साथ आरती की जेठानी ने भींच कर उसे सीने से सटा लिया. अभी कुछ देर पहले जो आरती अपनेआप को बहुत अकेला और कमजोर समझ रही थी, इन्हें देख अपनेआप को ताकतवर महसूस करने लगी. लगा एकदम से दुख आधा हो गया उस का.

अपने परिवार से मिल कर नरेश कैसे अपना सारा दर्द भूल कर हंस रहा था और बच्चे भी अपने दादादादी, तायाताई को देख कितने खुश नजर आ रहे थे. मन ही मन आरती अपनेआप को कोस रही थी कि उस ने ही नरेश को उस के परिवार से तुड़वाया, सब के लिए उस के मन में जहर भरा. कितनी बेइज्जती की थी उस ने अपनी ससुराल वालों की, वह भी सिर्फ अपने मायके वालो के लिए. लेकिन आज इस दुख की घड़ी में इन्हीं लोगों ने उस का साथ दिया. डाक्टर को अंदर आते देख सब साइड में खड़े हो गए. जांच कर हंसते हुए डाक्टर ने कहा कि नरेश अच्छा इंपूर्व कर रहा है और अगर ऐसा ही रहा तो जल्द ही वह अपने घर जा सकता है. सुन कर सब हर्षित हो गए कि नरेश ठीक हो रहा है. तभी पीछे से किसी का स्पर्श पा कर जब आरती मुड़ी और सामने अपनी बड़ी बहन गीता को देखा तो भरभरा कर उस की आंखों से आंसू बहने लगे. गीता को भी बिट्टू ने ही फोन कर नरेश के एंक्सीडैंट की खबर दी थी.

‘‘दीदी, मुझे माफ कर दो मैं ने आप के साथ बहुत गलत…’’ मगर गीता ने बीच में ही उस के मुंह पर उंगली रख दी यह बोल कर कि जो हुआ उसे भूल जाओ. ‘‘नहीं दीदी, नहीं भूल सकती मैं. कैसे मैं ने आप का अपमान किया था. यहां तक कि मैं ने आप को लालची और भाइयों का दुश्मन भी बोल दिया था. लेकिन फिर भी आप सबकुछ भूल कर नरेश को देखने आईं. लेकिन हमारे स्वार्थी भाइयों ने जो मेरे साथ किया उसे मैं कभी भूल नहीं सकती दीदी. देख लिया मैं ने दीदी कि कौन मेरे सुख के साथी थे और कौन दुख के हैं. वादा करती हूं दीदी कि अब से आप जो कहोगी मैं वही करूंगी,’’ कह कर आरती बहन के गले लग गई. Hindi Sad Story

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