लेखिका- नमिता दुबे
Hindi Story Collection :अपनेअंदर की घुटन को मन में दबा कर मानसी छत पर चली आई. बाहर की ताजा हवा में सब से दूर, वह फिर से सामान्य रूप से सांस ले पा रही थी. उस ने मन ही मन प्रार्थना की कि उस के व्यवहार की विचित्रता पर किसी का ध्यान न जाए. यह लगभग रोज का नाटक हो गया था, विभा आती और सारा परिवार उस के इर्दगिर्द इकट्ठा हो जाता. इस दौरान मानसी बेहद मानसिक यातना से गुजरती थी. ऐसा नहीं कि उसे अपनी छोटी बहन से प्यार नहीं था. बहुत प्यार था उसे विभा से पर परिस्थिति ही कुछ ऐसी हो गई थी कि अपनी बहन को देखते ही उस का मन खिन्न हो उठता. ‘यह फैसला भी तो तुम्हारा ही था. अब उस पर पछताने से क्या होगा?’’ उस के मन ने उसे दुत्कारा और उस की आंखों के सामने वह शाम पुन: सजीव हो उठी, जो इन घटनाओं की गवाह थीं.
एमए के प्रथम वर्ष की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने के उपरांत बड़ी उमंगों के साथ घर आई थी छुट्टियां मनाने. सिविल सर्विस या लैक्चररशिप के बीच जू झ रही थी. यों तो उस का मन बचपन से ही सिविल सर्विस में जाने का था, पर जैसेजैसे उस की निकटता साहित्य से बढ़ी और बीए के बाद एक अस्थायी शिक्षक के रूप में उस ने जिस सुख का अनुभव किया था, उस के परिणामस्वरूप उस का झुकाव लैक्चररशिप की ओर अधिक होता गया. बच्चों को किसी सुंदर पंक्ति से परिचित कराने के साथसाथ उन में किसी जीवनमूल्य को निविष्ट करना उसे एक अनूठे रोमांच से भर देता था. घर आई थी तो सोचा था परिवार वालों का परामर्श लेगी पर उसे आए एक दिन भी कहां बीता था कि उस के सामने विभोर के रिश्ते का प्रस्ताव रख दिया गया. प्रस्ताव क्या था, आदेश ही तो था. मम्मी खुश होहो कर तसवीरें दिखा रही थीं और दादी जन्मपत्री के मिलान की व्याख्या कर रही थीं.
इस अचानक हुए वज्रपात पर उस का संपूर्ण अंतर्मन आतंकित हो उठा था. लगा जैसे सांस लेना ही मुश्किल हो जाएगा. कितनी कठिनाई से मुंह से निकला था ‘न.’ उस के इस एक धीमे से निकले शब्दों ने घर को सन्नाटे में डुबो दिया था.
पापा ने बात संभालने की कोशिश की थी, ‘‘मेरे बचपन का दोस्त है अशोक. उस का लड़का है विभोर.’’
उसे पता था कि हाल ही में उस के पापा ने फेसबुक के माध्यम से अपने पुराने दोस्तों से पुन: संपर्क स्थापित किया था. स्वयं उस ने ही तो इतने उत्साह से उन की सहायता की थी. उसे क्या पता था कि स्वयं अपने लिए ही गड्ढा खोद रही है. अभी तो उसे आगे पढ़ना है, विदेश से फैलोशिप करनी है… इतना कुछ है करने को. ऐसे में वह अपने सपनों की बलि चढ़ा अपना जीवन घरगृहस्थी में कैसे निछावर कर सकती है?
वह ‘नहींनहीं’ की माला जपने लगी. विभा ने ही तो उसे झक झोर कर उस की तंद्रा भंग की थी.
शाम को खाना खाते हुए इस बारे में सिर्फ विभा ने इतना भर कहा था, ‘‘शादी ही तो है? इतनी कौन सी बड़ी आफत आन पड़ी है तुम पर? लड़का भी तो कितना अच्छा है. पापा भी वादा कर आए हैं. तुम न होती बीच में तो मैं ही शादी कर लेती.’’
दादी ने उसे डपट कर चुप तो करा दिया पर मानसी ने गौर किया कि मां ने पापा को गहरी निगाहों से ताका.
अगले दिन शांत माहौल में सुबहसुबह मां ने फिर वही बात छेड़ी थी. मानसी ने एक ठंडी सांस ली. कल रात उस ने उन्हें अपनी योजनाओं से अवगत कराया था. अभी उसे आगे पढ़ना है, अपना कैरियर बनाना है. शादी के बाद ये सब कैसे संभव होगा? उस के मम्मीपापा ने हमेशा उस का उत्साहवर्धन किया. उसे परिस्थितियां दीं कि वह अपने हिसाब से जी सके, फिर आज जब उस के जीवन के इतने महत्त्वपूर्ण फैसले पर बात आई तो वे अपना निर्णय उस पर थोपना चाहते हैं, यह कैसा न्याय हुआ?
‘‘बेटा, तेरी पढ़ाईलिखाई से किसी को कोई दिक्कत थोड़े ही है,’’ मां ने बड़े प्यार से उसे सम झाना चाहा पर उस ने बीच में उन की बात काट दी, ‘‘होनी भी नहीं चाहिए. पर बात यह नहीं है मां. तुम ने शादी के बाद पढ़ाई करी है, मैं जानती हूं लेकिन मैं तुम जैसी नहीं हूं मां, जो घर में, पति में, बच्चों में ही अपने संसार को पा ले… मैं न तो पढ़ाई में मन लगा पाऊंगी न ही घर में. यह तो सभी के साथ अन्याय होगा न?’’
मां कुछ वक्त शांत रहीं. उन्होंने कहा कुछ नहीं, लेकिन उन के भावों से ऐसा भी नहीं लगा कि वे मायूस या दुखी हैं. उन्हें पता है कि मानसी अत्यंत महत्त्वाकांक्षी लड़की है. उस का सपना अपने पैरों पर खड़े होना है और वे उस की दृढ़ता की और निष्ठा की कायल भी हैं. बचपन से ही उन की बड़ी बेटी का मन न कभी बननेसंवरने में लगा, न ही उस की कोई खास दोस्ती रही है. सारा ध्यान उस ने अपने व्यक्तित्व को निखारने में ही लगाया है.
एक अंतराल के बाद बगीचे के बीचोंबीच लगे आम के पेड़ पर निगाह टिकाए
उन्होंने उसे बताया, ‘‘विभा ने बीए के बाद आगे पढ़ने से मना कर दिया है.’’
मानसी चौंकी. उसे लगा मां उसे फिर से मनाने का प्रयास करेंगी. फिर उस ने मां के कहे शब्दों पर गौर किया. आगे नहीं पढ़ेगी? फिर क्या करेगी? नौकरी करेगी? कोई और कोर्स जौइन करेगी?
मां ने उस के चेहरे पर तैरते प्रश्नों को हमेशा की तरह सही ताड़ा, ‘‘तुम तो जानती हो कि उस का मन नौकरी करने का कभी नहीं था.’’
सच ही तो कह रही हैं मां. विभा उस के एकदम विपरीत रही है. पढ़ाई तो जैसेतैसे कर ली पर नौकरी वह नहीं करेगी. कहती है कि अपनी लाइफ सोशलाइजिंग में स्पैंड करेगी और फिर थोड़ाबहुत सोशल वर्क भी कर लेगी. यु नो फौर गुडविल.’ मानसी ने हंसते हुए अपना सिर हिलाया. उस की बहन में कभी परिपक्वता आएगी भी या नहीं?
‘‘विभा शादी के लिए तैयार है. सोचा था तेरी शादी के बाद उस की शादी तुरंत कर देंगे,’’ मां ने सीधेसीधे बोल दिया.
मानसी को झटका लगा. अभी उम्र ही क्या है विभा की. बच्ची है वह. पर इस से पहले कि वह अपना मंतव्य व्यक्त करती, मां ने बात आगे बढ़ा दी, ‘‘विभोर की अभीअभी सरकारी नौकरी पक्की हुई है. अशोकजी, तुम्हारे पापा के पुराने दोस्त हैं, इस खातिर रिश्तों की बाढ़ पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. विभोर सैटल होना चाहता है.’’
मां ने बात जारी रखी, ‘‘विभा की दिलचस्पी पढ़ाई और कैरियर में नहीं है. जबरदस्ती उसे आगे पढ़ने भी नहीं भेज सकते. घर में वह पुस्तकें पढ़ने में, पेंटिंग आदि करने में मग्न है, लेकिन कितने दिन चलेगा? उस की सहेलियों को तो तुम जानती ही हो. कहीं कुछ उलटासीधा न कर बैठे.’’
मानसी को याद हो आए विभा के कालेज के प्रसंग. आए दिन कोई न कोई उसे कुछ न कुछ थमा देता. वैलेंटाइन डे के आसपास तो सारा घर टौफीचौकलेट और अन्य गिफ्टों से भर जाता. कुछ पत्र भी तो थे जो उस ने मानसी को गोपनीयता में दिखाए थे. उन मतवाले आशिकों की ऊटपटांग कविताओं की दोनों बहनों ने मिल कर खाल उधेड़ी थी.
‘‘मैं सम झ रही हूं मां पर इस का यह तो मतलब नहीं कि आप लोग मेरी जिंदगी से खिलवाड़ कर लें,’’ उस ने अपनी बात रखी.
‘‘तू नहीं सम झी रे मानू,’’ मां ने प्यार से फटकारा, ‘‘अगर तु झे वाकई शादी नहीं करनी तो हम विभा की बात चलाएं?’’
मानसी स्तब्ध रह गई.
‘‘अब वह पहले जैसा जमाना तो रहा नहीं कि बड़ीछोटी की शादी सीक्वैंस में ही हो,’’ मां ने चुप्पी तोड़ी. फिर शरारत भरी निगाहों से मानसी को देखते हुए उन्होंने कहा,‘‘वैसे भी मेरी मानसी पूर्णत: आत्मनिर्भर है,’’
‘जिस लड़की ने अपने हरेक परिधान तक का चुनाव भी स्वयं किया हो, अपने विषयों का चुनाव खुद किया, अपने जीवन का हर चुनाव अपनी मरजी से किया हो उस से उसे यह अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है कि वह अपने जीवनसाथी का चुनाव किसी और को करने देगी.’ मां की बातों के निहितार्थ को सम झने में तीव्रबुद्धि मानसी को देर नहीं लगी. उस के जीवन में ऐसा कोई नहीं था. फिर शायद मां की ठिठोली का ही नतीजा था कि वह गुलाबी हो गई. अंतत: उस ने विभोर के रिश्ते को अस्वीकार कर के विभाविभोर के रिश्ते को मौन स्वीकृति दे दी.
अभी कुछ माह ही हुए थे शादी को संपन्न पर जैसे ही विभा अपने हनीमून के रगीन किस्से उसे सुनाने लगती, मानसी को लगता कि इतना लंबा अरसा बीतने के बाद भी विभा इतना रस ले कर कैसे सब सुना सकती है. बाली गए थे वे दोनों हनीमून पर. हालांकि मानसी ने भारत के बाहर कदम भी नहीं रखा पर फिर भी उसे ऐसा लगता था मानो उस ने बाली की संपूर्ण यात्रा कर ली हो. यह नहीं तो सब के साथ बैठ कर कभी किसी पार्टी की व्याख्या करना, कभी किसी गैटटुगैदर की. इतना समय आखिर मिलता कैसे है किसी को?
जब उस के नौकरी जौइन करने का समय आया तो उस ने चैन की सांस ली. अपने घर से इतनी दूर आ कर उसे शुरू में तो बहुत अच्छा लगा. आज तक कभी साउथ इंडिया नहीं देखा था. बैंगलुरु जैसे शहर में रहना उसे खूब आनंददायक लगा. न ज्यादा गरमी, न ज्यादा सर्दी. उस के शहर पटना से तो काफी बेहतर था. पर धीरेधीरे नए माहौल, नए पकवान का रंग फीका होने लगा और घर की याद सताने लगी. हालांकि पढ़ाई के लिए वह दिल्ली में रहती थी पर जब मौका लगा घर निकल गई. यहां नई भाषा, नई संस्कृति के बीच उसे पराएपन का एहसास होने लगा. सिर्फ यह संतोष था कि काम में मन लग गया था.
कुछ बातों को ले कर उस की अपने हैड से अनबन होने लगी है. उसे कभीकभी लगता है कि उस के एचओडी उस के औरत होने के कारण उस पर ऐसी कई जिम्मेदारियां लाद देते हैं, जो उन के अनुसार औरतों को शोभा देती हैं. मसलन, कालेज की ऐनुअल फेस्ट आयोजित करना. ऐसा नहीं है कि उसे इस से कोई परेशानी है पर जब विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय साहित्यक सम्मेलन व्यवस्थित करने का उस ने अनुरोध किया था तब उसे संकेतात्मक ढंग से सम झा दिया गया था कि देश के साहित्यकारों को एकत्रित करने का भार उस से वहन नहीं होगा.
मन बहलाने के लिए विभा को फोन लगाया तो मनोदशा और बिगड़ गई. मुहतरमा अपनी ननद के साथ किसी पार्टी में जाने की तैयारी में व्यस्त थीं, ‘‘अरे दीदी, इतनी सुंदर साड़ी भेंट दी है जीजी ने मुझे दीवाली पर, मैं क्या बताऊं.’’
उस का खून जल उठा. एक विभा है जो दिनरात मौजमस्ती में लगी रहती है और एक वह है जो यहां घर से इतनी दूर सड़ रही है. उस की बचपन से ही अपने में मग्न रहने की आदत के कारण उस की किसी से इतनी मित्रता नहीं हुई थी कि उसे दीवाली के लिए निमंत्रण मिलते. वैसे भी यहां लोग दीवालीहोली कम ही मनाते हैं. मां ने बुलाया था घर, पर क्या करती छुट्टी ही नहीं थी इतनी.
रहरह कर उस का ध्यान विभा पर चला जाता कि वह यहां नितांत अकेली है और विभा ने उस का रिप्लेसमैंट भी खोज लिया. घर बसाना यही उस का सपना था.
‘मैं तो उस से बिलकुल अलग किस्म की जीव हूं. फिर आजकल उस के बनसंवर कर नित पार्टी में सब के आकर्षण का केंद्र बनने से, उस के घरपरिवार में मानसम्मान पाने से मु झे बुरा क्यों लग रहा है? आखिर क्यों?’
‘हां मैं स्वीकारती हूं कि मैं मानसी, अपनी छोटी बहन से ईर्ष्या कर रही हूं,’ उस का मन बोल उठा.
‘पर क्यों? ये सब तो मेरा ही चुनाव है,’ मस्तिष्क ने जवाब दिया.
सारी रात दिल और दिमाग के वादविवाद में गुजर गई. उसे स्मरण हो आया कि कैसे उस ने जब घर में बताया था कि वह बैंगलुरु में नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार चुकी है तब दादी ने कितना बवाल मचाया था. अपने कपड़े पैक कर वह मम्मीपापा और दादी के सामने दृढ़तापूर्वक उन के सवालों के जवाब दे रही थी. उस के मम्मीपापा ने उस की इच्छा का सम्मान किया. उस के साहस और उस की महत्त्वकांक्षा को सलाम किया. जब वे संतुष्ट हो गए कि वह इतनी दूर, अकेले सुरक्षित रह सकेगी तो उन्होंने शुभकामनाओं और आशीर्वाद के साथ उसे विदा किया. अब क्या हो गया उस के उस साहस को?
बैंगलुरु में रह कर विभा के सुखद जीवन की कल्पना मात्र से उसे इतनी तकलीफ होती थी और अब यहां आ कर अपनी आंखों से ये सब देखना उस के लिए असहनीय हो गया. मन शांत होने पर उसे एहसास हुआ कि वह विभा के सुख के कारण दुखी नहीं थी, अपितु अपने जीवन से दुखी है. उस ने संकल्प किया कि वह जल्द ही वापस जाएगी और अपने कैरियर पर ध्यान केंद्रित करेगी. उस का कार्य ही एक ऐसी वास्तु थी और साहित्य एक मात्र वह साधन था, जो उसे प्रसन्नता प्रदान करते थे.
देखते ही देखते वक्त पंख लगा कर उड़ गया. इधर उस के कैरियर ने रफ्तार पकड़ी और उधर विभा की जिंदगी ने भी. इन 5 वर्षों में क्या कुछ नहीं बदल गया. इंसान की सभी योजनाएं क्रियान्वित हों, जरूरी नहीं है. वक्त के साथ विभा दो बच्चों की मां बन गई और मानसी ने यूएस से फैलोशिप के पश्चात पीएचडी कर ली. वहीं प्रोफैसर बन जिंदगी का लुत्फ उठाने लगी.
एक अच्छी शिक्षिका होने के नाते उस की ख्याति दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. विद्यार्थी ही नहीं शिक्षक भी उस की बुद्धि का लोहा मानते थे. इस के साथसाथ दुनियाभर की साहित्यिक गोष्ठियों में भी वह सम्मिलित होने लगी थी. उस की रचनाओं के चर्चे होने लगे थे. उस का अपना सर्कल बन गया, पार्टियों में जाना भी शुरू कर दिया. बहुत लोगों से मुलाकात होती रहती.
कुछ वक्त बाद वह भारत लौट आई. विदेश की भूमि पर स्वतंत्रतापूर्वक जो जीवन व्यतीत कर आई थी, वह विचार भी अपने साथ ले आई. अपनी यात्राओं पर उस का कई भारतीयों से परिचय हुआ था, जिन से उस का मानसिक जुड़ाव हुआ था और फिर कितनी कौन्फ्रैंस में उस ने भारत आ कर भी भाग लिया था. हर बार मम्मीपापा से मिलने आती और विभाविभोर के लिए तोहफे लाती. जब उन की जिंदगी में अभय और मित्रा ने दस्तक दी, तब बड़ी खुशी के साथ वह उन के लिए भी तोहफे लाने लगी.
अब जब हमेशा के लिए लौट आई है, तो पटना जाने में पहले वाली आतुरता नहीं रही. मन किया कि सब काम निबटा कर, कई दिन आराम से वहां बिताएगी. पिछली बार तब गई थी जब दादी ने संसार से सदा के लिए विदा ले ली थी. यह भी एक वजह थी कि वह जाने में हिचकिचा रही थी.
फुरसत पा कर जब घर आई और विभा को वहां देखा तो प्रथम तो उस की
खुशी का ठिकाना नहीं रहा पर जब उसे ज्ञात हुआ कि बच्चों को ले कर विभा माहभर पहले घर आ गई थी तो उस का माथा ठनका.
जब मां से पूछना चाहा तो उन्होंने बगीचे के बीच पेड़ को गहरी, दुखी निगाहों से देखते हुए बस इतना ही कहा था कि, विभा से पूछो तो बेहतर है. रात को खाने के बाद जब दोनों बहनें छत पर गईं और काफी देर मौन बैठी रहीं, तब अचानक मानसी को एहसास हुआ कि विभा कितनी बड़ी हो गई है. ऐसा लगा मानो अभी से अधेड़ हो गई हो.
‘‘क्या बात है विभा?’’ उस ने कोमल स्वर में पूछा.
‘‘तुम कितनी खुशहाल हो दीदी,’’ विभा के मुंह से सहसा बोल फूट पड़े, ‘‘तुम्हारी जिंदगी, तुम्हारी है.’’
इस का क्या जवाब दे, मानसी को सू झा नहीं.
विभा ने ही कहना जारी रखा, ‘‘मेरी जिंदगी तो दीदी मेरी रही ही नहीं.’’
मानसी ने हलके से विभा के कंधे पर हाथ रखा, ‘‘ऐसा क्यों कह रही हो विभा?’’
पर विभा मानो अपनेआप से ही बतिया रही थी, ‘‘तुम्हारे आगेपीछे दिनभर असिस्टैंट घूमते रहते हैं, तुम्हारे घर के कामकाज के लिए मेड है, कुक है. इतने अवार्ड मिलते रहते हैं, पेपर में तसवीरें छपती रहती हैं,’’ उस ने अचंभित निगाहों से मानसी को देखा. उस की आंखों में मानसी कई भाव तैरते नजर आए. विस्मय, गर्व, ईर्ष्या,भय सभी का सम्मिश्रण था उस की निगाहों में, ‘‘तुम्हारी अपनी जिंदगी है दीदी. तुम्हारा अपना वजूद है.’’
विभा, विभा, विभा, उस का हृदय तड़प उठा. उस की बहन इतनी बड़ी हो कर भी, कितनी मासूम, कितनी भोली है. उसे बचपन की याद हो आई जब वह अपनी बहन की रक्षक हुआ करती थी. आज भी उस ने अपनी छोटी बहन को बांहों में भर लिया, मानो सारी दुनिया से उस को बचा लेगी. ‘‘तुम विभा हो. दादी की परी विभा. मांपापा की विभा. मेरी विभा. विभोर की विभा. अभय और मित्रा की मां विभा.’’
इस पर विभा के आंसू निकल आए, ‘‘पर मेरी अपनी क्या पहचान है दीदी?’’
‘‘क्यों नहीं है री पगली?’’ मानसी ने अश्रुसिक्त मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘तुम विभा हो, जिस के कारण दादी इस संसार से खुशीखुशी विदा हुईं. तुम विभा हो, जिस के नाम से आज शहरभर के लोग मम्मापापा को जानते हैं.’’
भले ही मानसी की अपनी पहचान थी, लेकिन शहर के सोशल सर्किल में मांपापा विभा के अभिभावक के रूप में मशहूर थे.
‘‘जानती हो विभा, जब मैं अकेले बैंगलुरु में रहती थी तब मु झे तुम से काफी ईर्ष्या होती थी. मैं तुम्हें देखदेख के कुंठित हो उठती थी.’’
‘‘क्या? मु झ से ईर्ष्या? मैं ने ऐसा क्या किया है दीदी जीवन में?’’ विभा ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘तुम ने जिंदगी में रिश्ते बनाए हैं विभा… यह हर किसी के बस की बात नहीं होती है. तुम में साहस है कि तुम अपनी परवाह किए बिना अपनेआप को पूर्णत: समर्पित कर दो. हां, मेरी आज अपनी एक पहचान है विभा, मैं ने यही पहचान सर्वथा चाही थी. तुम स्वयं से पूछो, क्या तुम्हें जीवन से वही चाहिए जो मु झे?’’
काफी देर शांत रहने के बाद विभा ने सिर ‘न’ में हिलाया, ‘‘फिर तुम मु झ से क्यों जलती थीं दीदी?’’ उस ने कुतुहल से पूछा.
‘‘बस तुम्हारी बातें सुनसुन कर… नित घूमनाफिरना, मिलनाजुलना. हालांकि ये सब सम झ में ज्यादा नहीं आता पर फिर भी तुम्हें देख ईर्ष्या होती थी.’’
‘‘मैं तो बिलकुल बच्ची थी, दीदी,’’ विभा ने एक दुखी मुसकान के साथ कहा.
‘‘मैं बहुत बाद में सम झी विभा,’’ मानसी ने विभा का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘मु झे ईर्ष्या तुम से नहीं थी. मु झे ईर्ष्या तुम्हारे जीवन से थी , इस बात से थी कि तुम ने जो जीवन से चाहा वह तुम्हें मिल गया पर जो मैं चाहती थी वह मु झ से काफी दूर था. इसलिए मैं ने मन कड़ा कर अपना सबकुछ अपने कैरियर को बनाने में दे दिया.’’
दोनों कुछ देर शांत रहीं. चांद आसमान में काफी ऊपर तक चढ़ गया था.
‘‘पर मु झे कहां कुछ मिला दीदी?’’ विभा ने थके स्वर में बोला.
‘‘हुआ क्या है विभा? किस बात ने इतना दुखी कर दिया है तुम्हें?’’ यह कह मानसी ने उसे गले लगा लिया.
बस इतने भर से उस के मन का बांध फूट पड़ा और वह 1-1 कर सब बताती चली गई…
कैसे अभय के होने के कुछ वक्त बाद उस के ससुर, अशोकजी की तबीयत खराब होने लग गई. विभोर का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया. छोटे बच्चे और पिता की बिगड़ती हालत के कारण उस ने अकेले ही वहां रहना उचित सम झा. विभा और उस की ननद शीला ने खूब सेवा की पर उन्हें बचाया नहीं जा सका.
इस दौरान काफी जोरआजमाइश के बाद विभोर का स्थानांतरण वापस पटना हुआ पर आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. जब विभा प्रैगनैंट हुई तो विभोर ने अबौर्शन की सलाह दी. तब शीला ने सम झाबु झा कर विभोर को मनाया था. कुछ वक्त सब ठीक रहा, लेकिन जब शीला ने ससुराल से ज्यादा मायके रहना शुरू कर दिया तो सभी को आश्चर्य हुआ. विभा को ज्ञात था कि शीला जीजी और जीजाजी के संबंध बहुत मधुर नहीं हैं. उसे डर लगा कि मायके में ज्यादा समय देने के कारण कहीं वह जीजी से रुष्ट न हो जाएं. फिर आखिरकार एक दिन टूट कर शीला ने बता ही दिया कि वह वापस नहीं जाएगी. कोर्टकचहरी में पैसा बहा सो अलग. मां की तबीयत फिर खराब होने लगी. रोजरोज के तनाव, पैसों को ले कर झगड़े से तंग आ कर आखिर विभा बच्चों को ले कर घर आ गई.
एक लंबे वक्त तक दोनों बहनें एकदूसरे से लिपटी रहीं, ‘‘तुम ने पहले कुछ क्यों
नहीं बताया विभा?’’
‘‘परिस्थिति ही कुछ ऐसी थी,’’ उस ने एक ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘‘और क्या बताती दीदी?’’ एक रूखी हंसी हंसते हुए उस ने कहना जारी रखा, ‘‘तुम कह रही थीं कि मैं रिश्ते निभाती हूं. अब देखो न दीदी आज जब मेरे परिवार को मेरी सब से ज्यादा जरूरत थी, मैं परिस्थितियों से घबरा कर भाग आई.’’
‘‘विभा, विषम परिस्थितियों से जू झते हुए हर किसी के लिए आवश्यक हो जाता है कि कभीकभी थोड़ी दूरी बना ली जाए. तुम वहां रहती तो बच्चों पर भी गलत प्रभाव पड़ता.’’
‘‘हमारी कई दिन से बात नहीं हुई है दीदी.’’ उस ने घबराई हुई आवाज में कहा, ‘‘अगर मेरे साथ भी शीला जीजी जैसा हुआ तो…’’
‘‘बेकार की बातें मत सोचो विभा. वह तुम्हें याद कर रहा होगा पर नहीं चाहता कि तुम कोई दबाव महसूस करो. तुम ने उसे बताया कि वापस कब जा रही हो?’’ तभी अचानक कुछ सोचते हुए उस ने पूछा, ‘‘तुम वापस तो जा रही हो न?’’
‘‘हां, दीदी,’’ उस ने दृढ़तापूर्वक जवाब दिया. ‘‘वह मेरा घर है.’’
कुछ दिन बाद जब विभा वापस अपने घर लौटी तब मानसी भी उस के साथ गई.
‘‘भाभी,बड़ी देर लगा दी. अब संभालो अपनी गृहस्थी. एक चीज नहीं मिलती थी मु झे, विभोर ने पागल कर दिया,’’ शीला रोते हुए विभा के गले लग गई थी.
काफी देर तक ननदभाभी ऐसे ही खड़ी रहीं. विभोर गाड़ी से सामान निकालने में व्यस्त था और बच्चे दादी के कमरे की ओर दौड़ गए थे. मानसी भी उन के पीछे हो ली. उस ने वह मौन संवाद देखा था, जब विभोर उन्हें घर से लेने आया था. बिन कुछ कहे ही विभाविभोर ने एकदूसरे से माफी मांग ली थी. बच्चे पापा क गले लग गए थे. थोड़ेबहुत शिष्टाचार के बाद वे लोग निकल पड़े थे.
मानसी यों तो विभा को संबल देने आई थी पर उस के आने का एक कारण और था. उसे बस सही मौके की तलाश थी. शाम को खाना शीला ने ही बनाया था, ‘‘तुम थक गई होंगी, भाभी’’ कह कर उस ने विभा को कुछ नहीं करने दिया.
उन सब के आपसी प्रेम को देख कर मानसी को बड़ी खुशी हुई. रात को जब सब सोने चले गए, मानसी बगीचे में टहलने निकल गई. अब उस के पास कुछ ही दिन थे, फिर उसे वापस जाना होगा. वह विचारों में मग्न थी कि तभी किसी के वहां होने का एहसास हुआ. उस ने पलट कर देखा तो शीला खड़ी थी. दोनों में शुरू में इधरउधर की बातें होती रहीं…
‘‘जब पापा…’’ कहतेकहते रुक गई थी शीला, ‘‘तब उन के पास विभा ही थी.’’
मानसी ने उस की आंखों में वेदना को देखा.
‘‘फिर विभोर का इतना दूर होना, वापस आने पर…’’ उस ने बात अधूरी छोड़ दी.
मगर मानसी सम झ गई कि वह क्या कहना चाहती है.
‘‘अच्छा हुआ जो आप आ गईं. लंबे अरसे बाद मैं ने विभा का यह रूप देखा है.’’
शीला के इस कथन पर मानसी के अधरों पर स्वत: ही मुसकान खेल गई.
उसी रात मानसी और शीला ने निकट भविष्य के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय
ले लिए.
1 वर्ष बाद मानसी, मम्मीपापा के पास जा रही है. इस बार उस की यात्रा एकांत में नहीं है. कुछ माह में ही शीला ने देश की सर्वोच्च साहित्यिक संस्थान में अपनी जगह बना ली. अब वह देशभर में लिटरेरी इवेंट्स करवाती है. संभवत: शीघ्र ही वह इंटरनैशनल कम्युनिटी में भी इवेंट्स और्गेनाइज करे. गत वर्ष की घटनाएं मानसी के मन में उभरने लगी.
उस ने कितना सही फैसला लिया था शीला को और्गेनाइजर बनाने का. उस निर्णय का इतना प्रभावपूर्ण परिणाम निकलेगा इस की कल्पना तो उस ने भी नहीं की थी. जब विभा ने उसे सबकुछ बताया था तभी उस ने सोच लिया था कि वह शीला की जितनह बन पड़ेगी उतनी मदद करेगी. उस रात जब शीला उस से बात करने आई, उसे ऐसी अनुभूति हुई मानो यदि स्वयं मानसी ने कभी दबाव में आ कर आननफानन में विवाह कर लिया होता तो वह भी यों ही बिखर गई होती. तभी उस ने निश्चय कर लिया था कि वह शीला की हरसंभव सहायता करेगी. इसी उद्देश्य से वह उसे अपने साथ दिल्ली ले आई.
विभा और विभोर की गृहस्थी वापस पटरी पर आ गई. शीला को काम संभाले कुछ ही सप्ताह हुए थे कि अशोकजी ने जग को अलविदा बोल दिया. जाने से पहले उन्होंने बड़ी सहृदयता से मानसी का धन्यवाद किया था. उन को प्रसन्न करने में मानसी का भी योगदान था, इतना भर उस के लिए बहुत था.
आज जब वह पटना जा रहे हैं, इस के पीछे सिर्फ परिवार से मिलना ही इकलौता
उद्देश्य नहीं है. एक तो उन की एक गोष्ठी है, जिसे शीला संभाल रही है और जिस में मानसी अपनी रचना पढ़ने वाली है. दूसरी और अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस गोष्ठी से एकत्रित राशि एक संस्था जिस से कि हाल ही में विभा जुड़ी है, उस के द्वारा एक सेहतगाह को जाएगी. इस सैनेटोरियम में उन बुजुर्गों की देखभाल होती है, जिन का कोई नहीं है या जिन की देखभाल का जिम्मा उन का परिवार उठा नहीं सकता या उठाना नहीं चाहता.
‘यदि हमें पता हो कि जिंदगी में क्या चाहिए तो उसे पा लेने की यात्रा तनिक सरल हो जाती है,’ मानसी के मन में खयाल आया. वह ट्रेन के बाहर फैली सुंदर धूप को निहार रही थी. ‘यदि नहीं भी पता हो, तो कदाचित यात्रा आरंभ होने पर उस का एहसास हो जाता है. यह यात्रा होती तो सब की एकांत में ही है पर कभीकभी 2 लोग ऐसे मिल जाते हैं, जो अपना एकांत आपस में बांट सकते हैं. वह रिश्ता सिर्फ एक ही हो ऐसा तो आवश्यक नहीं. कभी हमें जीवन में सहारा एक दोस्त से मिलता है, कभी परिवार से, कभी किसी अजनबी से भी. हरकोई अपना जीवन सिर्फ किसी एक रिश्ते के पीछे भागने में लगा दें, यह तो बुद्धिमत्ता नहीं होगी.’
मानसी को पता है बहुत से लोग आज भी अपने जीवन का आधार किसी अन्य को बनाना ही जीवन का महत्त्व सम झते हैं. हो सकता है ऐसा करना आसान होता हो या हो सकता यह दुष्कर हो, परंतु जीवन में सभी का एक ही मार्ग हो, यह तो संभव नहीं. उसे उम्मीद है कि लोग यह धीरेधीरे सम झने लगेंगे और फिर शीलाओं को यों टूट, बिखर कर पुन: खुद को तलाशने की जरूरत नहीं होगी.
‘‘एक अच्छी शिक्षिका होने के नाते उस की
ख्याति दिनबदिन बढ़ती जा रही थी. विद्यार्थी ही नहीं
शिक्षक भी उस की बुद्धि का लोहा मानते थे….’’
