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लेखक- के मेहरा

बिशनदास से मेरे रिश्ते का एक नाम था. उस के रहते मैं सुहागिन कहलाती थी, शृंगार करती थी. चवन्नीभर बिंदी मेरे उजले माथे पर चमचम करती थी. मेरा रूप जगमगाता था. अब मैं न सजसंवर सकती थी, न हंसबोल सकती थी. मेरा नाम एक गाली बन गया. मेरा अंतर्मन मुझे डसता. सोचा, तुम्हारी मनहूस दहलीज छोड़ कर मायके जा बैठूं. मगर वहां कौन खजाना गड़ा था. टीबी की मारी मां. भाई की कच्ची गृहस्थी, बूढ़ा बाप. सबकुछ बदल गया था.

बेटे के सामने होते तो तुम ऐसा दिखाते कि मुझे जानते भी नहीं. मगर अकेले में?

मैं ने अपने किवाड़ उढ़का लिए. तुम ने दर्जनों सफेद साडि़यां ला कर डाल दीं. औरगंडी कोटा, चंदेरी, शिफौन, सब राजरानी से चोरीचोरी. मैं सफेद साड़ी पहने उतरी तो तुम ने घेर लिया. तुम बोले कि फूलवती, तू हंसिनी लगती है. अपने नैनों में मुझे छिपा ले. कह कर तुम ने मेरी छाती में अपना सिर गड़ा दिया.

बेचारी राजरानी. मेरा अपराधी मन कभी भी उस की सेज पर डाका नहीं डालना चाहता था मगर तुम न माने.

मैं ने पूजापाठ में मन लगाया. आश्रम में जा कर रहने लगी. तुम चार दिन में इज्जत का ढोंग कर के वापस ले आए. आश्रम वाले अभिभूत हो गए. मैं ने हथियार डाल दिए. तुम्हारा दिया खाने के एवज में फर्ज भी तो अदा करना था. मैं तुम्हें पाले रही. मैं झूठ क्यों बोलूं. मेरी जवान देह तो वैसी की वैसी ही थी, भूखी, प्यासी.

तुम्हारा बेटा बड़ा हुआ तो राजरानी ने उसे अजमेर पढ़ने भेज दिया. अब वह रोजरोज उस से मिलने के बहाने चली जाती. तुम खुद भी चले जाते अकसर. मैं और देशी अकेले इस कोठी में. न हम आपस में बोलते थे न एकदूसरे को सह पाते थे. प्यारेलाल खाना बना देता. दोनों अलगअलग कमरों में बैठ कर उसे निगल लेते थे.

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