टपोरी टाइप धारावाहिकों में सास को खड़ूस दिखाने और देखने वाले हैरान थे कि दोनों बहुएं अपनी सासूमां की खातिर किस कदर परेशान थीं. अपनी दोनों बहुओं को बेटियों की तरह प्यार करती थीं राधिका. मगर आज जीवन और मौत से जूझ रही थीं. फिर एक दिन…

‘जीवन ज्योति’ हौस्पिटल के आईसीयू के बाहर बैंच पर बैठे राधिका के परिवारजन मन ही मन सबकुछ ठीक हो जाने की कल्पना कर रहे थे. 2 दिन पहले ही 60 वर्षीय राधिका सुबह की सैर से वापस आ रही थी तो एक बाइक की तेज स्पीड के चपेटे में आ गई और सड़क के किनारे उछल कर दूर गिरने से सिर फट गया. घायल अवस्था में उन्हें हौस्पिटल पहुंचाया गया था. हाथ की हड्डी भी टूट गई थी, पैरों पर भी चोटें लगी थीं और अब वे कोमा में थी. बाइक सवार का कुछ पता नहीं था. बैंच पर बैठी उन की तीनों बहुओं के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. बड़ी बहू वत्सला कभी मं?ाली बहू रेनू को दिलासा देती तो कभी रेनू सिसकती हुई अंजलि को अपने सीने से लगा लेती. तीनों के पति और बच्चे तो घर जा कर फ्रैश भी हो कर आ गए थे लेकिन तीनों बहुएं जबरदस्ती एकदूसरे को भेज कर नहाधो कर तुरंत आ गई थीं.ड्ड

डाक्टर्स, नर्स, आसपास के लोग तीनों बहुओं की हालत पर हैरान थे. कोई बहू अपनी सास की इस हालत पर इतना तड़प सकती है, यह बात सब को अचंभे में डाल रही थी. तीनों के पति उन के लिए खाना भी ले कर आते रहे लेकिन वह खाना वैसे का वैसा वापस जा रहा था. तीनों के मुंह में मुश्किल से बस चाय और रोटी के 2 निवाले जा पाए थे. तीनों बेहाल थीं.

कई लोगों को तो यही लग रहा था कि ये शायद बहुए नहीं बेटियां हैं. तीनों उसी जगह रातदिन बैठी थीं, तीनों के दिमाग से अपनी सासूमां के साथ बिताया 1-1 पल हट नहीं रहा था. इतनी स्नेहमयी सास जिन के साथ उन्होंने कईर् साल बिताए थे, आज उन का साथ छूटने के डर से तीनों बहुओं के दिल में हौल उठ रहे थे, तीनों के आगे बीते दिनों का 1-1 पल घूम रहा था.

वत्सला

25 साल पहले आई थी मैं इस घर में मां की बहू बन कर हां, मां. उन के स्नेह ने तो सास शब्द को दूर फेंक दिया था, ससुरजी का तो बहुत पहले देहांत हो गया था. मां ने ही अपने तीनों बेटों को पढ़ायालिखाया था और आज सब उन की मेहनत से ही एक से एक अच्छे पद पर हैं. गांव में शुरूशुरू में घर का काम करने में दिक्कत होती थी मु?ो, उन्हें तीनों बेटे वाली ही कहते थे. मम्मी ने एक दिन कहा, ‘‘कोई जरूरत नहीं है सिर पर पल्लू रख कर काम करने की.’’

मैं ने सकुचाते हुएकहा, ‘‘लेकिन मम्मी, पासपड़ोस की औरतें फिर…’’

अपनी सरल मुसकान से मम्मी ने कहा, ‘‘छोड़ उन्हें, उन का क्या है, जब कोई आया करे तो बस 2 मिनट रख लेना, बस उन्हें भी मौका नहीं मिला और तु?ो भी परेशानी नहीं होगी.’’

मैं उन की इस बात पर मुसकराई थी. शामली थी भी छोटी जगह, मेरे मातापिता सहारनपुर में रहते थे. एक पारिवारिक समारोह में मां ने मु?ो नीरज के लिए पसंद किया था.

मम्मी अपनी सेहत का हमेशा ध्यान रखती हैं, सुबह की सैर उन के जीवन का अभिन्न अंग है. मम्मी ने एक दिन कहा, ‘‘मैं बीमार नहीं पड़ना चाहती. पूछेगी नहीं क्यों?’’

‘‘क्यों, मम्मी?’’

‘‘अरे, बीमार पड़ूंगी तो तु?ो परेशानी होगी न? काम बढ़ जाएगा, घर में कोई बेटी तो है नहीं जो तेरा हाथ बंटाए, इन तीनों लड़कों के काम कम हैं क्या? सारा दिन नचाते हैं तु?ो.’’

नीरज काफी व्यस्त रहते कईर् बार मम्मी कहतीं, ‘‘जा, इसे थोड़ा बाहर घुमा ला.’’

नीरज कहते, ‘‘कहां ले जाऊं?’’

‘‘कहीं भी ले जा पर थोड़ी देर घुमा कर ला,  किसी मौल में घुमा ला… कोई पिक्चर ही दिखा ला.’’

मेरे मातापिता मेरे जीवन पर खुश होते जो मु?ो ऐसी सास मिली थी. सुरभि पैदा हुई तो मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जीभर कर मिठाइयां बांटीं उन्होंने. हर समय सुरभि को सीने से लगाए रहतीं, कहतीं, ‘‘बड़ी अच्छी बात है गोद में कन्या आई है. मैं तो तरसती रह गई घर में एक लड़की के लिए.’’

एक दिन सुरभि को गोद में थपक कर सुलाते हुए कहने लगीं, ‘‘घर में एक

बेटी का होना बहुत जरूरी है, बेटी के प्यार और अपनेपन की आर्द्रता ही घर के सभी लोगों को एकदूसरे से बांधे रखती है, बेटी शक्ति है, सृजन का स्रोत है. कुछ लोग सोचते हैं पति का वंश बेटे ही बढ़ाते हैं पर मातृत्व का वंश तो एक बेटी ही बढ़ा सकती हैं.’’

मम्मी की बात की गहराई मेरे मन को छू गई थी और मैं कितनी देर तक मां की आंखों से बरसती ममता देखती रही थी.

सुरभि मां की देखरेख में पलतीबढ़ती रही. बड़े देवर कमल की शादी रेनू से हुई तो घर में कई दिन खुशी का माहौल रहा. उन्हीं दिनों नीरज का ट्रांसफर दिल्ली हो गया और हम भारी मन से दिल्ली आ गए. मां को छोड़ कर जाते हुए दिल उदास रहा, फिर हम शुक्रवार की रात को ही मां के पास पहुंच जाते और सोमवार को सुबह ही निकल जाते. इस बात से मां काफी खुश रहतीं.

धीरेधीरे सुरभि बड़ी हो गई. जीवन की जिस सब से बड़ी परेशानी में मम्मी ने मेरा साथ दिया, मैं मरते दम तक नहीं भूलूंगी. सुरभि ग्रैजुएशन कर रही थी और उस से इस उम्र में वह भूल हो गई जो मातापिता का सिर नीचे कर देती है. सुरभि की कालेज में जिस लड़के से दोस्ती थी, वह उस से अपनी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ा बैठी. जब उस ने रोते हुए मु?ो बताया कि उस से गलती हो गई और उसे 2 महीने का गर्भ है, मु?ा पर जैसे आसमान टूट पड़ा था. मेरे हाथपैर फूल गए थे. मैं ने यह बात नीरज को भी नहीं बताई. पिता को बेटी की यह शर्मनाक बात बताते हुए मेरा दिल कांप गया. किसी से यह बात शेयर नहीं कर पा रही थी. अपने मातापिता को बताना भी ठीक नहीं लगा. हर तरफ नजर दौड़ाई, बस मम्मी का ही चेहरा नजर आया जिन्हें मैं अपनी परेशानी कह सकती थी.

मैं ने रोते हुए मम्मी को जब यह सब फोन पर बताया तो उन्होंने मु?ो बहुत कुछ सम?ाते हुए शांत किया और कहा, ‘‘तू दुखी मत हो, वत्सला, सुरभि को तुरंत यहां ले आ, मैं सब संभाल लूंगी.’’

मैं ने नीरज से कहा, ‘‘मम्मी का सुरभि को देखने का मन कर रहा है, मैं मम्मी से 2-3 दिन मिल कर आ जाऊंगी.’’

सुरभि से 2 साल छोटे सौरभ को नीरज के पास ही छोड़ कर मैं और सुरभि शामली पहुंच गए.

कमल और रेनू हमें अचानक देख कर खुश हुए. रेनू का बेटा यश और बेटी समृद्धि तो सुरभि को देख चहक उठे. अगले दिन ही मां ने रेनू से कहा, ‘‘अभी तो वत्सला आई हुई है, जाओ, तुम भी मेरठ अपने मम्मीपापा से मिल आओ, मेरे अकेले रहने की भी कोई समस्या नहीं होगी.’’

रेनू खुश हो गई. कमल तो वैसे भी मुजफ्फरनगर से रोज अप ऐंड डाउन करता था, रोज आनेजाने से बचने के लिए वहीं शिफ्ट होने की सोच रहा था, बस एक पदोन्नति की प्रतीक्षा थी. मम्मी के बारबार कहने पर भी मम्मी को कोई अकेला छोड़ने के लिए तैयार नहीं था.

रेनू चली गई यश और समृद्धि सुरभि को छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे लेकिन मम्मी न कहा, ‘‘जाओ, नानानानी से भी मिलने जान चाहिए, सुरभि अभी है यहां, कल शाम तक तो तुम लोग आ ही जाओगे.’’

कमल तो सुबह का गया रात को ही आता था. कमल के निकलते ही मम्मी ने तैयार हो कर फौरन टैक्सी बुलाई और आधा घंटे की दूरी पर स्थित कैराना में रह रही अपने बचपन की सहेली को अबौर्शन के लिए ले गई और शाम तक वापस आ गईं. मैं घर पर ही रुकी. मैं ने तो रोरो कर अपनी आंखें सुजा ली थीं, मेरा ब्लडप्रैशर भी हाई हो गया था. मम्मी ने ही वह बिगड़ी हुई स्थिति बखूबी संभाली थी. वे ही तो हैं सब की राजदार और हितैषी, किसी को कानोंकान इस की खबर नहीं हुई थी. न मेरी परवरिश पर कोई ताना न उलाहना. सुरभि को अपने पास बैठा कर पता नहीं क्याक्या सम?ाती रही थीं जो मैं जानती हूं उस के भविष्य में हमेशा काम आने वाला था. आज भी अपनी उस दिन की बेचैनी का विश्वसनीय स्पर्श भी याद आ जाता है. कैसा था उन का अपनत्व भरा स्पर्श, मन की गहराई तक उतर कर तन की मिट्टी को छू कर जैसे महका गया था.

यह राज हमेशा हम तीनों के बीच ही रहा और सुरभि तो कभी दादी का साथ देना नहीं भूली. वह भी तो इस समय छटपटाती घूम रही है, पूरे परिवार को जिसे ममता की डोर ने बांध रखा है, वह डोर टूटनी नहीं चाहिए. नहीं मम्मी, आप को कुछ नहीं होगा, डाक्टर साहब, हमारी मम्मी को ठीक कर देना.

रेनू

दिल पर एक बहुत बड़ा बो?ा लिए ससुराल में कदम रखा था मैं ने. टूटे दिल की किरचें संभालना मुश्किल था, सहपाठी विनय से प्यार करती थी मैं और मातापिता ने जबरदस्ती कमल से विवाह कर दिया था. कितना मुश्किल लग रहा था ससुराल में सब को अपना सम?ाना, बेचैन रहती थी मैं यह सोच कर विनय कैसे रहेगा मेरे बिना, यह क्या हो गया. अपने मन की कशमकश मैं ने किसी पर जाहिर नहीं होने दी थी. एक अजीब सा रिश्ता है प्यार का दर्द से, उसी की याद से दुखी था मन. जिस की याद को गले से लगाए बैठी रहती थी मैं, उसे भूल जाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी, शायद करना ही नहीं चाहती थी. मैं दिन में बहू का रात में पत्नी का फर्ज मशीनी अंदाज में निभा रही थी.

मगर मम्मी ने मु?ो कब इस घर के स्नेह, अपनेपन के रंग में रंग दिया, मु?ो पता ही नहीं चला. एक दिन तो मैं हैरान रह गई जब फुरसत के पलों में मैं वत्सला भाभी और मम्मी के साथ बैठी थी. अचानक भाभी किसी के प्रेमप्रसंग का जिक्र  ले बैठी तो मम्मी ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘प्यार में पाना जरूरी भी नहीं. पृथ्वीआकाश कहां मिलते हैं भला? दूर से ऐसा देखने पर एक  सुखद भ्रम होता है बस. सच्चा प्यार तो शरीर से ऊपर मन से जुड़ता है,’’ उन्होंने कहतेकहते मु?ा पर जो निगाह डाली, मैं मन ही मन घबरा गई. लगा पता नहीं प्यार करने वालों के चेहरों पर क्या लिखा होता है जिसे हरकोई पढ़ लेता है. मम्मी शायद सम?ा गई थीं मेरे मन को. उन की पारखी नजरों ने शायद मेरी मनोदशा का अनुमान लगा लिया था.

और अचानक एक तूफान आ गया. विनय को लिखे मेरे प्रेमपत्र ही मेरे अपमान का कारण बन गए. मैं जब भी मेरठ जाती, विनय से जरूर मिलती. एक दिन विनय ने बेशर्मी दिखा दी, बोला, ‘‘विवाह तो तुम्हारा हो ही गया है, अब तो तुम मेरे साथ आराम से संबंध बना सकती हो. मैं तो यह सोचता रह गया कि शादी के बाद तो हम एक हो ही जाएंगे, यह सोच कर शारीरिक रूप से कभी पास आने की कोशिश नहीं की थी लेकिन चलो, अब भी हम बहुत कुछ…’’

मैं चिल्लाई. उसे फटकारा तो वह अपनी असलियत पर आ गया और मु?ो मेरे लिखे प्रेमपत्र मेरी ससुराल वालों को दिखाने की धमकी देने लगा.

मेरी हालत खराब हो गई और मैं उस से हमेशा के लिए संबंध तोड़ कर ससुराल आ गई. लौटने पर मेरा उतरा चेहरा देख कर मम्मी ने कई बार पूछा, ‘‘सब ठीक तो है?’’

मैं बस ‘हां’ में गरदन हिला देती पर इंसान जो सोचता है हमेशा वही नहीं होता. समय कभीकभी हर मोड़ पर परीक्षक की तरह खड़ा मिलता है, न जाने कितनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है.

एक दिन जब अचानक विनय ने मेरी ससुराल में कदम रखा तो मैं पसीनापसीना हो गई. मायके का पड़ोसी बता कर मैं ने उस का परिचय करवाया. मम्मी ने उस की आवभगत की, भाभी को किचन में काम संभालने के लिए कहा- कमल औफिस जा चुके थे.

‘‘तुम लोग बैठो, बातें करो?’’ कह कर मम्मी अंदर चली गईं.

विनय ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी ससुराल वाले तो बहुत सम?ादार हैं, हमें अकेले छोड़ कर अंदर चले गए. वाह, अब बताओ, मु?ो अकेले में मिलोगी या ये प्रेमपत्र दिखाऊं तुम्हारी ससुराल वालों को?’’ मम्मी के अंदर से आती हुई पदचाप के साथ उन की गरजती हुई आवाज भी आई, ‘‘इसी समय यहां से चले जा लड़के.’’

मु?ो लगा, कमरा छत सहित मेरे सिर पर आ गिरा हो. मम्मी की गरजना सुन भाभी भी दौड़ी आ गई. पूछा, ‘‘क्या हुआ है?’’ विनय घिघियाया, ‘‘ये लैटर रेनू ने मु?ो…’’

‘‘वापस ले जाओ इन्हें… जैसे आए हो वैसे चले जाओ नहीं तो पुलिस को फोन करती हूं अभी और आज के बाद मेरी बहू के आसपास भी फटका तो…’’

विनय उसी समय भाग गया था और मैंने रोते हुए मम्मी के पैर पकड़

लिए. धुआंधार रोते हुए माफी मांगी तो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख कर मु?ो गले लगा लिया.

मम्मी ने भाभी से कहा, ‘‘यह बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए, किसी को भी नहीं.’’

भाभी ने मम्मी की इस बात का मान रखा था. उस पूरा दिन मैं शर्मिंदगी में डूबी रही. मम्मी पढ़ीलिखी हैं, हिंदी साहित्य में उन की बहुत रुचि है. अपने खाली समय में वो कुछ न कुछ पढ़ना ही पसंद करती हैं.

उस दिन रात को जब मम्मी अपने कमरे में सोने गई तो उन्होंने मु?ो बुलाया. अपने पास ही बैठा लिया.

मैं ने मरियल सी आवाज में कहा, ‘‘मम्मी, मु?ो माफ कर दो,’’ और उन की गोद में सिर रख दिया.

मम्मी ने कहा, ‘‘अरे, मैं ने तो तु?ो बच्चन की कविता सुनाने बुलाया है.’’

मैं ने उन्हें हैरानी से देखा. मम्मी ने मुसकराते हुए सुनाना शुरू किया था: ‘‘जो बीत गई सो बात गई,

जीवन में एक सितारा था माना वो बेहद प्यारा था, वो टूट गया तो टूट गया. अंबर के आनन को देखो,

कितने इस के तारे टूटे, कितने इस के प्यार छूटे. जो टूट गए फिर कहां मिले, पर पूछो टूटे तारों को,

कब अंबार शोक मनाता है, जो बीत गई सो बात गई.’’

मम्मी के मुंह से निकली यह कविता आज भी मु?ो याद है. वे अपनी गोद में रखा मेरा सिर सहलाती रही थीं. सच, कोमल स्वभाव ने उन के दिल को बहुत बड़ा कर दिया था. सबकुछ उस में समा जाता.

उस दिन उन के चेहरे पर छाए प्यार और विश्वास के संबल का अपनी मुट्ठी में

बांध जब मैं उन के कमरे से निकली तो मेरे मन के अंदर शांति ही शांति थी जैसे अंतर्मन के कोनेकोने में छिपे सारे संदेह मिट गए हों. उस के बाद तो दिन पर दिन मेरा उन से रिश्ता मजबूत ही होता गया था. उन्होंने तो मु?ो स्नेह की डोर से ऐसा बांधा कि मैं उन के बिना अपना अस्तित्व ही नहीं सोच पाती. उन का स्नेह कितना शक्तिशाली है. उन के निश्छल, निर्मल व पावन स्नेह के प्रति मन श्रद्धा से भर उठता है. मम्मी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए, उन्हें कुछ नहीं होगा. डाक्टर साहब मम्मी को स्वस्थ कर दो.

आरती

कभी सोचा भी नहीं था पुराने जमाने की नए विचारों वाली सास मिलेगी मु?ो. पंकज मुंबई औफिस में नएनए आए तो हम कब एकदूसरे के नजदीक आते गए, पता ही नहीं चला. एक ही औफिस, दिनभर का साथ, नजदीकी प्यार में बदलती चली गई. मैं मुंबई में पलीबढ़ी और पंकज शामली से. मेरे घर में मम्मीपापा और मेरी छोटी बहन अर्चना थी. पंकज घर आए तो सब ने उन्हें पसंद किया. अब मां की मु?ो पसंद करने की बात थी. दिल में सैकड़ों आशंकाएं रहतीं कि एक  विजातीय, आधुनिक लड़की को मां बहू बनाएंगी या नहीं लेकिन पंकज के मेरे बारे में बताते ही मम्मी, वत्सला और रेनू भाभी मुंबई आ गए. पंकज ने फ्लैट किराए पर लिया हुआ ही था. पंकज उन तीनों को मेरे घर ले कर आए.

कुशलक्षेम के बाद बातों के दौरान मां ने कहा, ‘‘जातिधर्म मेरे लिए माने नहीं रखते, मैं इंसान के गुणव्यवहार की कद्र करती हूं.’’

हम सब उन का मुंह देखते रहे गए. क्रीम कलर की साड़ी, ढीला सा जूड़ा, बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व. आज भी मम्मी का उस दिन का रूप मेरी आंखों में बसा है.

मां कह रही थीं, ‘‘अगर नई पीढ़ी पुराने दायरों से निकल कर अपने लिए कुछ अच्छा सोचती है तो हम क्यों उसे मजबूर करें कि वह हमारे हिसाब से जीए. अपने जीवन का फैसला उस का अपना ही होना चाहिए. अगर जातिधर्म से परे अपना मनपसंद जीवनसाथी अपने लिए ढूढ़ लेती है और अपनी इस खुशी में अपने मातापिता का साथ चाहती है तो इस में गलत क्या है?’’

मम्मी की बात सब को छू गई. वैसे भी दिल जब स्नेह से भरा हो, दूसरों के हित की ही सोचता हो तब चेहरे पर ऐसी की चमक होती है जिसे देख कर ही महसूस किया जा सकता है. अपनी दोनों बहुओं को अपने बराबर में बैठाए मम्मी 2 बहुओं की सास नहीं, 2 बेटियों की मां लग रही थीं और मैं मन ही मन उन में शामिल होने के लिए उत्साहित थी.

पापा बीमार रहते थे. उन्हें हार्ट की प्रौब्लम थी. वे ज्यादा काम नहीं कर सकते थे इसलिए उन्हें जौब छोड़ना पड़ा था. घर पर ही कुछ ट्यूशंस पढ़ा लेते थे. मम्मी अच्छे पद पर थीं. पंकज की मां सब जानने के बाद बोली थी, ‘‘हम लोग यहीं सादा तरीके से विवाह का आयोजन कर लेंगे, इस बात की चिंता भी छोड़ दीजिए कि आरती दूर चली जाएगी. आप को पंकज के रूप में बेटा मिल जाएगा. आप चिंता न करें, विवाह के बाद भी पंकज और आरती आप लोगों की पूरी तरह देखरेख करते रहेंगे,’’ मम्मीपापा तो यह बात सुन कर इतने भावुक हो गए थे कि उन की आंखों से आंसू छलक पड़े थे. कोई सास इतने बड़े दिल की भी हो सकती है. मैं तो मन ही मन उन के चरणों में ?ाक गई थी. जैसा मां ने कहा था, वैसा कर दिखाया था. मैं ने जब चाहा, मम्मीपापा की आर्थिक मदद भी की. जब जरूरत हुई उन के पास रह कर उन की देखभाल की. अर्चना की शादी में मम्मी ने ही करीबकरीब सारे काम मिल कर करवाए, नीरज और कमल भैया भी सपरिवार आए थे. हमारा तो कोई रिश्तेदार था नहीं मुंबई में. मां ने ही अर्चना की शादी घूमधाम से करवाई. अर्चना अब बैंगलुरु में है. मम्मी ने हमेशा मम्मीपापा का ध्यान रखने के लिए कहा. कुछ समय पहले पापा का स्वर्गवास हो गया तो मम्मी ने मु?ो यह कह कर हैरान कर दिया, ‘‘आरती, अपनी मम्मी को अपने पास ही रहने के लिए बुला लो, अकेली कैसे रहेंगी?’’ मेरी मम्मी तो इस बात के लिए तैयार नहीं हुई. हां, उन के दिल में पंकज की मम्मी के लिए इज्जत और बढ़ गई.

मम्मी मेरे पास आतीजाती रहतीं. मेरी मम्मी दादर में रहती हैं और हम मुलुंड में. जब भी मौका मिलता है, हम मिल लेते हैं. एक दिन मैं ने मां को छेड़ते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप मंदिर नहीं जाती? आप की उम्र की महिलाएं तो मंदिरआश्रमों के चक्कर काटते हुए ही दिखती हैं,’’ मम्मी ने अपने खास स्नेह सने स्वर में कहा, ‘‘मु?ो तो घर के मासूम बच्चों की हंसी में ही ईश्वर दिख जाता है. तुम बहुओं की दिनरात की सेवा में ईश्वर दिखता है. अपने परिवार के साथ खुशी से रहो, खुशियां बांटो, किसी पर बो?ा मत बनो, सब के दुखसुख में काम आओ, सब में ईश्वर देखो, सब का आदर करो. ज्ञान, वैराग्य, मोक्ष, ईश्वर, इन लुभावनी बातों और शब्दों के जाल में मैं कभी नहीं उल?ा. जिस संसार में, जिस घर मैं मैं रहती हूं, वहां भी वही ईश्वर है जो मंदिरआश्रमों में नहीं है. जो हो रहा है जिस पर मेरा बस नहीं उस पर मैं दुखी नहीं होती. प्रकृति का अपना काम सम?ा कर देखती हूं. दुख मैं भी सुख तलाशने की कोशिश करती हूं. जो मिल जाए, वह अच्छा, जो न मिले उसे भी ठीक है जान कर स्वीकार कर लेती हूं,’’ मम्मी से जो सीख मिली उस के लिए ऊंची शिक्षा और तकनीकी ज्ञान की नहीं. अत: चेतना, सम?ा और गहनतम कर्त्तव्य परायणता की जरूरत होती है.

पंकज की मम्मी का कहना है त्योहार सब एकसाथ मनाएंगे, अब दीवाली,

होली कभी शामली में मनाते हैं, कभी दिल्ली, कभी मुंबई. मम्मी जब भी मुंबई आती है मेरी मम्मी को भी बुलवा लेती है. कमल भैया मुजफ्फरनगर शिफ्ट हो चुके हैं. मम्मी कभी वहां रहती है. कभी दिल्ली, कभी मुंबई, कभीकभी शामली में अकेली रह लेती हैं. घर की देखभाल का भी उन्हें ध्यान लगा रहता है. उन्हें अपने पास बुलाने के लिए सब बेचैन रहते हैं. इस बार दीवाली की छुट्टियों में सब मुंबई आए हैं. शामली में कई बार मम्मी ने कहा था, ‘‘अगर मैं कभी ज्यादा बीमार पड़ू या मेरी मृत्यु निकट हो तो मु?ो दिल्ली या मुंबई ले जाना. यहां तो इतने लोग आएंगे न तुम सब परेशान हो जाओगे,’’ हम तीनों उन का मुंह देखती रह गई थी. दिलभर आया था, भला कोई इतना भी सोच सकता है, कलेजा मुंह को आ रहा है.

कितनी चोट लगी है मां को, कितना दर्द हुआ होगा उन्हें, जिन्होंने कभी किसी को तकलीफ नहीं पहुंचाई वह आज कितना दर्द सह रही होंगी. मां, आप जल्दी ठीक हो जाना. आप के स्नेह की डोर से पूरा घर एक सूत्र में बंधा है. अपने बेटों को देखो मां, कैसे इधर से उधर भटक रहे हैं. अपने पोतीपोतों को देखो मां, कितने उदास हैं.

आईसीयू से 2 डाक्टर बाहर निकले तो राधिका के तीनों बेटे, बहुएं, पोतीपोते सब खड़े हो गए. डाक्टर ने जैसे ही ‘सौरी’ कहते हुए ‘न’ में गरदन हिलाया, वत्सला पहाड़ खा कर गिर पड़ी, रेनू और औरती का रोना वहां उपस्थित लोगों के दिलों को हिला गया. नीरज, कमल, पंकज के लिए अपने साथसाथ पत्नियों को भी संभालना मुश्किल हो गया. वहां उपस्थित डाक्टर्स, नर्स, लोग हैरान थे कि किसी सास की मृत्यु पर बहुओं की यह हालत. ऐसा भी कहीं होता है? हां, ऐसा भी होता है, स्नेह, सम्मान और अपनेपन के रिश्ते की जिस डोर ने सब को बांधा हुआ था, वह डोर टूट गई, आंसुओं का रुकना मुश्किल था.        द्य

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...