Hindi Story: आखिर कौन था वह आदमी जिस की खातिर निशा बेचैन हो उठती थी? उस की बेचैनी उस दिन और बढ़ गई जब उस ने एक शाम छत से किसी बेजान शरीर को श्मशान की तरफ ले जाते देखा...

‘‘अभी तक तो जीवन में गति ही नहीं थी, फिर अब यह जीवन इतनी तेजी से क्यों भाग रहा है? सालों बाद ऐसा क्यों महसूस हो रहा है?’’ आधी रात बीत  चुकी थी और घड़ी की टिक... टिक... टिक... करती आवाज.

चारों तरफ कमरे में अंधेरा था, मगर लैंप की रोशनी में घड़ी को निहारती निशा की आंखें थकने का नाम ही नहीं ले रही थीं. ये आंखें शायद कह रही थीं कि अगर यह घड़ी रुक जाए तो शायद समय भी ठहर जाए, फिर तो जिंदगी अपनेआप ठहर जाएगी. इसी इंतजार में निशा अभी तक के जीवन का तोलमोल करती न जाने कब तक बैठी सोचती रही कि कभी इतना एकाकीपन न था मगर आज?

औफिस के छोटे से उस कैबिन में 7 लोग बैठते थे. उंगलियां कंप्यूटर पर काम करती थीं, मगर  हर समय हंसीमजाक और ठहाके. निशा भी उन में से एक थी, मगर क्या मजाल जो चेहरे पर कभी मुसकराहट की एक छोटी सी भी लकीर दिखाई दे जाए. उधर से कमैंट मिलते, ‘‘हंसने में भी टैक्स लगता है क्या?’’

निशा जैसी थी वैसी ही थी. कोई परिवर्तन नहीं, सालों से एक ही जीवन, एक ही रूटीन, एक ही व्यवहार, कहीं कोई बदलाव नहीं. न कोई इच्छा, न आकांक्षा, न जीवन के प्रति कोई चाहत. जीवन यों ही दौड़ता चला जा रहा था, मगर रोकने का कोई प्रयास भी नहीं, सिर्फ चलते रहो, गतिहीन जीवन का एहसास लिए. न पीछे मुड़ने की चाहत, न सामने देखने की इच्छा...यही थी निशा.

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