Love Story : रसोई की घड़ी ने रात के 11 बजाए तो जैसे पूरे घर की थकान एकसाथ जम्हाई ले उठी. प्रैशर कुकर अभी भी चूल्हे पर ठंडा पड़ा था, उस में बनी दाल अब भी गरम थी. सिंक में कुछ प्लेटें धुलने का इंतजार कर रही थीं.
टीवी वाले कमरे में नीलीपीली रोशनी झिलमिला रही थी पर आवाज बिलकुल धीमी थी.
आशा ने आंच बंद की और फिर हाथ पोंछते हुए टीवी वाले कमरे की ओर देखा.
राहुल सोफे पर आधी करवट लिए मोबाइल में डूबा था. उस की उंगलियां तेजी से स्क्रीन पर चल रही थीं, होंठों पर अनजानी सी मुसकान अठखेलियां कर रही थी.
‘‘खाना रख दूं प्लेट में?’’ आशा ने धीमे से पूछा.
‘‘हूं?’’ राहुल चौंका मानो किसी दूर दुनिया से वापस आया हो, ‘‘अरे नहीं, अभी भूख नहीं है. बाद में खा लूंगा, तुम सो जाओ.’’
‘‘ठंडा हो जाएगा,’’ आशा ने आदतन कहा.
‘‘माइक्रोवेव किसलिए है घर में?’’ राहुल ने बिना नजर उठाए जवाब दिया और फिर उसी मुसकान के साथ कुछ टाइप करने लगा.
आशा कुछ सैकंड उसे देखती रही. वह मुसकान उस ने बहुत बरस पहले देखी थी जब राहुल उस से छिपछिप कर बातें करता था, जब वह उस से मिलने के बहाने ढूंढ़ता था. आज वही मुसकान द्वारा उस के चेहरे पर खिल रही थी.
‘‘ठीक है,’’ उस ने बस इतना कहा और कमरे से लौट आई.
आशा और राहुल की शादी को 8 साल हो चुके थे. शहर के एक छोटे से 2 कमरे के फ्लैट
में उन का जीवन किसी साधारण टीवी सीरियल की तरह चलता रहा. ईएमआई, किराना, औफिस की मीटिंग्स, बिजली का बिल, वीकैंड पर सब्जी की मंडी और साल में एक बार कहीं घूमने की अधूरी प्लानिंग.
मध्यवर्गीय जीवन की यही तो परिभाषा थी. जरूरतों के बीच सपनों को समेट कर रख देना और समयसमय पर उन पर जमी धूल झाड़ कर बस देख लेना.
शुरू के सालों में सब ठीक था. दोनों नौकरी पर जाते, शाम को साथ चाय पीते, कभी सड़क वाले गोलगप्पे, कभी छोटे से रैस्टोरैंट में डोसा. पर धीरेधीरे जिंदगी ने अपने हिसाब से कटौती करनी शुरू की.
औफिस में प्रमोशन की दौड़, बढ़ती जिम्मेदारियां, मकान की ईएमआई, दोनों के थकते शरीर और चिड़चिड़ाते स्वभाव सब ने मिल कर उनके बीच बातचीत के पुल पर दीमक लगा दी. अब ज्यादातर औपचारिक बातचीत होती.
‘‘दूध लाना था, लाए?’’
‘‘अरे, भूल गया यार, सुबह ले आऊंगा, पक्का.’’
‘‘आजकल हर बात भूल जाते हो, जरा-सा ध्यान नहीं रहता तुम से.’’
तो कभी राहुल के देर से घर पहुंच पर आशा शिकायत करती, ‘‘आज इतनी देर से आए. 10 बज गए हैं राहुल.’’
‘‘ट्रैफिक था, मीटिंग भी लंबी चली, अब हर बात पर तकरार मत शुरू कर दिया करो आशा.’’
‘‘तकरार? मैं तकरार करती हूं? चलो रहने दो, कभी मेरी थकान दिखती है तुम्हें?’’
अब यह रोज का रूटीन बन गया था.
उन के बीच बातें दूध से शुरू हो या फिर रात को देर से घर पहुंचने पर इसी जुमले पर
खत्म होतीं कि तुम समझते ही नहीं हो मुझे.
राहुल की कंपनी में कुछ महीने पहले एक नई प्रोजैक्ट मैनेजर आई, नैना. खुल कर हंसने वाली, स्मार्ट, तेज, अपने काम में बेहद कुशल. वह मीटिंग्स में सब की बात ध्यान से सुनती और बीचबीच में राहुल के प्रेजैंटेशन पर सराहना कर देती.
‘‘राहुल, तुमने जो डेटा निकाला है न, कमाल है यार,’’ नैना ने एक दिन कौंफ्रैंस रूम से बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘तुम हंसना नहीं जानते हो पर काम में जान डाल देते हो.’’
राहुल ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘थैंक्यू, बस कोशिश करता हूं कि गलती कम से कम हो.’’
‘‘तुम्हारी यही आदत अच्छी लगी,’’ नैना हंसी, ‘‘ऐक्स्ट्रा केयरफुल.’’
उसी दिन से जैसे राहुल के भीतर एक जगह खुल गई, जिस में उसे अपना ‘कदरदान’ दिखने लगा. घर पर बातें कम हो गई थीं, पर औफिस में कोई था जो उस की बात पूरी सुनता था, उस की तारीफ करता था, उस की चुहल पर हंसता था.
धीरेधीरे वे लंच ब्रेक साथ बिताने लगे. मीटिंग के बाद की छोटीछोटी बातें व्हाट्सऐप तक पहुंच गईं. फिर रात में.
‘‘सो गए?’’
‘‘नहीं, नींद नहीं आ रही.’’
‘‘मुझे भी नहीं. वैसे फ्री टाइम में क्या करना पसंद है तुम्हें?’’
ऐसे ही मोबाइल की स्क्रीन के उजाले में 2 जिंदगियों के बीच एक तीसरी दुनिया बसती चली गई.
एक रात, जब राहुल नहाने के लिए गया हुआ था, उस का फोन अचानक टेबल से गिर पड़ा. स्क्रीन जल उठी. आशा ने अनायास ही उठाया, स्क्रीन पर आए नोटिफिकेशन से बस इतना पढ़ा, ‘‘काश, आज थोड़ी देर और साथ बैठ पाते. तुम्हारे साथ बातें करने में कितना सुकून मिलता है, राहुल. नैना.’’
आशा के हाथ जैसे जम गए. दिल ने एक पल के लिए धड़कन रोक दी, फिर तेजी से धड़कने लगा. उस ने न तो पासवर्ड डालने की कोशिश की और कुछ पढ़ने की. बस फोन वहीं रख दिया जहां था और कुरसी पर बैठ गई.
बाथरूम के दरवाजे के पीछे से पानी गिरने की आवाज आ रही थी. उस आवाज के साथ
8 साल की पूरी शादी उस की आंखों के सामने छलकने लगी. पहली बार घर सैट करना, सस्ती कुरसियां, पति के लिए पहली बार बनाई गई खराब चाय, उस पर भी राहुल ने मुसकरा कर कहा था, ‘‘दुनिया की बैस्ट चाय है.’’
बारिश में भीगते हुए लाई गई सब्जियां, बिजली कटने पर मोमबत्ती की रोशनी में खेला गया लूडो, छोटीछोटी सी लड़ाइयां, बड़ेबड़े सपने और फिर अचानक एक सवाल, ‘‘मुझ में क्या कमी रह गई?’’
बाथरूम का दरवाजा खुला, राहुल तौलिए से बाल पोंछते हुए बाहर
आया. बोला, ‘‘आशा, मेरी ग्रे शर्ट दिखी? कल की मीटिंग के लिए रखी थी. अरे, तुम ऐसे चुप क्यों बैठी हो?’’
आशा ने उसकी तरफ देखा. गला सूख गया था. पूछा, ‘‘नैना कौन है?’’
राहुल के हाथ से तौलिया लगभग छूट गया.
‘‘क… कौन नैना?’’ उस ने बेमानी सी हंसी के साथ पूछा.
‘‘वही, जिस के लिए तुम्हारे मोबाइल की स्क्रीन पर अभी दिल वाली इमोजी चमक रही थी,’’ आशा की आवाज बर्फ सी ठंडी थी, ‘‘मत बोलो कि गलत नंबर था या प्रोजैक्ट की कोई बात थी. बस सच बोलो, राहुल. मैं ?ाठ सुनने की ताकत खो चुकी हूं.’’
कमरे में कुछ सैकंड तक सन्नाटा रहा. राहुल तौलिया कुरसी पर रख धीरे से बैड
पर बैठ गया. बोला, ‘‘आशा. बात उतनी बड़ी नहीं है जितनी…’’
‘‘जितनी मैं सोच रही हूं,’’ आशा ने बीच में रोक दिया, ‘‘तो सोचती ही रहूंगी अगर तुम बोलोगे नहीं. तुम उस से प्यार करते हो?’’
राहुल ने आंखें झपका लीं. यह वही सवाल था जिस से वह खुद भी आंखें चुरा रहा था.
‘‘मैं… मैं बस उस के साथ सहज महसूस करता हूं. औफिस में बहुत स्ट्रैस होता है, तुम जानती हो. घर आ कर हम बस लड़ते हैं, शिकायतें करते हैं. वहां… उस से बात कर के हलका लगने लगा. पता नहीं कैसे… कब…’’
‘‘प्यार हो गया?’’ आशा की आंखें अब भी सूखी थीं पर आवाज में हलकी सी कंपन थी.
राहुल ने पहली बार सिर उठा कर आशा की ओर देखा. इन आंखों में उस ने पहले कभी खुद को इतना अजनबी नहीं महसूस किया था.
‘‘पता नहीं,’’ यह शब्द उस के होंठों से बमुश्किल निकला.
आशा के भीतर कुछ टूट कर बिखर गया, पर बाहर से वह स्थिर रही. थोड़ी देर बाद उस ने बहुत ही साधारण ढंग से पूछा, ‘‘वह जानती है कि तुम शादीशुदा हो?’’
‘‘हां. शुरू से,’’ राहुल ने धीरे से कहा, ‘‘मैं ने कभी छिपाया नहीं. हम दोनों भी नहीं चाहते थे कि किसी का घर टूटे. पर दिल पर किस का बस चलता है आशा?’’
आशा अचानक उठ खड़ी हुई. राहुल को लगा अब चीखपुकार होगी, आंसू होंगे, इलजाम होंगे पर आशा ने कुछ नहीं किया. वह खिड़की के पास गई, परदा थोड़ा सा हटा कर बाहर अंधेरे में ?ांकने लगी.
कुछ देर चुप रहने के बाद आशा बोली, ‘‘तुम्हारा दिल चला गया. और तुम्हें पता भी नहीं चला कब. मेरा दिल भी तो कभी तुम पर आया था, राहुल. तब हम ने कितना कुछ सोचा था न?’’
राहुल चुप रहा.
‘‘परिवार… बच्चे… थोड़ीथोड़ी बचत… तुम्हारी मां को खुश करने की कितनी कोशिश की थी मैं ने याद है?’’ उस के होंठों पर हलकी सी मुसकान थी जो आंखों तक नहीं पहुंची.
राहुल का गला भारी हो गया, ‘‘आशा, मैं… सौरी… मैं बहुत बड़ा गुनहगार हूं. अगर तुम चाहो तो मैं उस से बात बंद कर दूंगा, प्रोजैक्ट बदलवा लूंगा, ट्रांसफर ले लूंगा, जो तुम कहो.’’
आशा ने पहली बार सीधेसाफ शब्दों में कहा, ‘‘नहीं.’’
राहुल ने चौंक कर देखा, ‘‘नहीं?’’
‘‘जिस चीज को तुम्हारा दिल अपना घर बना चुका है उसे सिर्फ जिद से, डर से या सामाजिक दबाव से छोड़ने को कहोगे, तो क्या तुम कभी मेरे रह पाओगे?’’ आशा ने शांत स्वर में पूछा, ‘‘या फिर सिर्फ. मेरे साथ रह कर हमेशा मन ही मन उस के पास भागते रहोगे?’’
राहुल के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था.
अगले कुछ दिनों में घर का माहौल अजीब तरह से शांत हो गया. पहले जहां हर बात पर तकरार हो जाती थी अब वहां एक थका हुआ सा सौहार्द आ गया. आशा रोज की तरह औफिस जाती, काम करती, लौटती, खाना बनाती. बस अब वह राहुल के मोबाइल पर नजर नहीं डालती, न उस के देर से आने पर कुछ पूछती.
एक रात खाने के बाद आशा ने राहुल से कहा, ‘‘कल थोड़ा जल्दी घर आ सकते हो?’’
‘‘क्यों? सब ठीक तो है?’’ राहुल घबरा गया.
‘‘हां, सब ठीक है. बस… एक बात करनी है. वकील से मिलना है साथ में.’’
राहुल के हाथ से चम्मच गिरतेगिरते बचा, ‘‘वकील? मतलब…?’’
आशा ने राहुल की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘हां, मैं ने सब सोच लिया है. मैं तुम्हारे और नैना के बीच दीवार बन कर नहीं रहना चाहती.’’
‘‘दीवार?’’ राहुल लगभग फुसफुसाया.
‘‘जिस घर में दिल कहीं और चला जाए न, वहां पत्नी सिर्फ औपचारिक रिश्ता बन कर रह जाती है,’’ आशा ने सधी हुई आवाज में कहा, ‘‘और मैं औपचारिक नहीं रहना चाहती, न अपने लिए, न तुम्हारे लिए.’’
‘‘पर… इतना आसान नहीं होता सब, आशा,’’ राहुल ने बेबसी से कहा, ‘‘समाज, लोग, परिवार, तुम्हारे मांबाप, सब मुझे दोष देंगे. तुम मुझे माफ कर भी कैसे सकती हो? मैं तो…’’
आशा ने बीच में ही कहा, ‘‘देखो राहुल, गलती तुम्हारी है, मानती हूं, पर दिल किसी
पर जबरदस्ती तो नहीं उतरता, न किसी से जबरदस्ती उतारा जा सकता है. मैं तुम्हारी यह गलती पकड़े रख कर अपनी सारी जिंदगी जहर नहीं करना चाहती.’’
‘‘पर तुम?’’ राहुल की आवाज भर्रा गई, ‘‘तुम अकेली कैसे…?’’
आशा ने बहुत कमजोर मुसकान के साथ कहा, ‘‘जब तुम मेरे न रहे. तो मैं
तुम्हारी जिंदगी में बो?ा बन कर नहीं रह सकती, राहुल. मैं बिलकुल नहीं चाहती कि तुम्हारी मुसकान बस इसलिए न खो जाए कि तुम मेरे प्रति अपराधबोध ढोते रहो. मैं जिंदा रह कर तुम्हारे लिए मरी हुई औरत नहीं बनना चाहती. मैं चाहती हूं कि तुम्हारी अगली सुबहें साफ हों, किसी झूठी तसल्ली पर टिकी न रहें.’’
राहुल ने पहली बार देखा कि यह वही आशा है, जिस ने एक समय में उस के लिए नौकरी छोड़ने तक की जिद की थी, पर आज अपने लिए, उस की खुशी के लिए, अपने हिस्से का दुख चुन रही है.
वकील के औफिस की सीलन भरी गंध में कागजों की सरसराहट थी. एक पुरानी सी मेज पर रखे रजिस्टर में नाम लिखते हुए आशा के हाथ थोड़े कांपे पर उस ने खुद को संभाल लिया.
वकील ने औपचारिक सवाल किए. ‘‘आपसी सहमति से अलग हो रहे हो न आप दोनों?’’
दोनों ने एकसाथ सिर हिलाया.
‘‘कोई बच्चा नहीं है तो प्रक्रिया आसान होगी,’’ वकील ने कहा, जैसे कोई बिल बनाने की बात कर रहा हो, ‘‘कागज तैयार हो जाएंगे, फिर कोर्ट में 2 डेट्स में काम हो जाएगा.’’
आशा ने कलम उठाई, कागज पर अपने नाम के सामने हस्ताक्षर करने को ?ाकी. उस की आंखों के सामने अचानक शादी के समय साइन किए गए रजिस्टर की छवि उभरी, तब राहुल ने फुसफुसा कर कहा था, ‘‘देखो, अब ये साइन हमें एकदूसरे से जिंदगी भर बांधे रखेंगे.’’
आज दोबारा वही साइन उन्हें एकदूसरे से अलग कर रहे थे. हाथ कांपे, पर उसने साफसुथरे अक्षरों में अपना नाम लिख दिया, आशा.
राहुल की बारी आई. उस ने कलम उठाई पर कागज को घूरता रह गया. उंगलियां सख्त हो गईं.
‘‘आशा…’’ उस की आवाज में इतनी लाचारी थी कि वकील ने भी ऊपर देख लिया, ‘‘यह हम… सच में कर रहे हैं?’’
आशा ने बहुत धीरे से कहा, ‘‘हां, और यही तुम्हारी, मेरी और… और हमारे प्यार की ईमानदारी है.’’
राहुल की आंखों में आंसू तैरने लगे, ‘‘पर तुम इतने बड़े दिल से कैसे सोच
सकती हो? मुझे तो खुद से नफरत होने लगी है.’’
वकील हलका सा असहज हो कर कुरसी पर पसर गया, ‘‘पर्सनल बातें आप लोग बाहर भी…’’
आशा हलके से मुसकरा दी, ‘‘बस
2 मिनट सर.’’
वह कुरसी से उठी राहुल के पास आई. बोली, ‘‘राहुल, याद है शादी के पहले दिन तुम ने कहा था अगर कभी मैं गलती करूं तो मुझे छोड़ देना पर तुम बदल मत जाना.’’
राहुल ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया, ‘‘हां… बेवकूफी की बातें थीं…’’
‘‘नहीं,’’ आशा ने धीरे से कहा, ‘‘तुम ने तब जो कहा था वह मैं आज कर रही हूं मैं तुम्हें छोड़ रही हूं पर खुद को बदल नहीं रही.’’
‘‘मतलब?’’ राहुल ने उल?ा कर पूछा.
‘‘मतलब यह कि मैं आज भी वही आशा हूं जो प्यार पर यकीन करती है. बस फर्क इतना है कि आज मेरा प्यार मेरा अपना दर्द भी सम?ाता है और तुम्हारी खुशी भी. मैं तुम्हें सजा दे कर अपने भीतर कड़वाहट नहीं पालना चाहती. जब मेरे न रहूं तुम्हारी जिंदगी में पत्नी बन कर तब तुम्हें हर सुबह यह तो महसूस हो कि कभी कोई थी, जिस ने बिना स्वार्थ के तुम्हारे लिए अच्छा सोचा था.’’
यह सुन कर राहुल का दिल तारतार हो चला. उस के हाथ से पैन फिसल कर मेज पर आ गिरा.
आशा ने खुद पैन उठाया उस के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘अब साइन कर दो राहुल वरना मैं पीछे हट जाऊंगी… और फिर तुम्हारी हर मुसकान पर तुम्हारा दिल खुद ही तुम्हें सजा देगा.’’
राहुल ने कांपते हाथ से अपने नाम के आगे हस्ताक्षर कर दिए. जैसे ही स्याही कागज पर सूखी, उन के रिश्ते की कानूनी डोर भी सूख कर टूटने लगी.
कुछ हफ्तों बाद की एक शाम आशा ने अपनी अलमारी के सामने खड़े हो कर
कपड़े छांटे. कुछ कपड़ों पर राहुल की पसंद की छाप थी, नीली साड़ी जो उस ने पहली करवाचौथ पर पहनने के लिए खरीदी थी, हलकी हरी कुरती, जिसे राहुल हमेशा कहता था कि इसे पहनो, इस में तुम कालेज गोइंग लड़की लगती हो.
आशा एकएक कपड़े को हाथ में ले कर देखती, मुसकरा कर वापस रख देती, फिर दूसरे शहर की नई नौकरी के लिए पैकिंग में लग गई. वह तय कर चुकी थी शहर बदलेगी, माहौल बदलेगा, शायद खुद को नए सिरे से ढूंढ़ना आसान हो जाए.
तभी दरवाजे की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला, सामने राहुल खड़ा था.
‘‘अंदर आओ,’’ आशा ने सहजता से कहा.
राहुल ने कमरे के भीतर नजर दौड़ाई. बिखरा सामान, खुला बैग, किताबों के ढेर, किचन के बरतनों की पैकिंग.
‘‘तो सच में जा रही हो?’’ उस ने धीरे से पूछा.
‘‘हां,’’ आशा ने बैग की जिप बंद करते हुए कहा, ‘‘कंपनी की ब्रांच है इंदौर में, वही जौइन करूंगी.’’
कुछ पल दोनों बिना बोले खड़े रहे, फिर राहुल ने कुरियर से लाया हुआ एक छोटा सा लिफाफा उसे दिया, ‘‘यह… तुम्हारे लिए.’’
आशा ने खोला, अंदर बैंक की कुछ नई पासबुक, एफडी के पेपर और एक छोटा सा
कार्ड था जिस पर लिखा था, ‘‘अपना खयाल रखना, आशा.’’
आशा ने राहुल की ओर देखा, ‘‘ये सब
क्या है?’’
‘‘तुम्हारी बचतें हैं जो शादी के बाद मेरे अकाउंट में शिफ्ट हो गई थीं,’’ राहुल ने कहा, ‘‘मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी लगे कि तुम ने सिर्फ खोया है. जो तुम्हारा है, वह तुम्हें ही मिले.’’
आशा की आंखें नम हो आईं, ‘‘जिंदगी सिर्फ पैसों से नहीं नापी जाती राहुल.’’
‘‘जानता हूं,’’ राहुल ने सिर ?ाका लिया, ‘‘फिर भी कुछ तो करूं तुम्हारे लिए, जिस के लिए खुद से नफरत कम हो जाए.’’
आशा ने राहुल की बात काटी, ‘‘खुद से नफरत बंद करो. बस इतना याद रखना कि किसी का भरोसा मत तोड़ना अब न अपना, न उस का जिस के साथ तुम आगे रहोगे.’’
राहुल ने संकोच से पूछा, ‘‘मैं… मैं ने नैना से बात की है. मैं ने उसे सब बता
दिया. हमारा तलाक, तुम्हारा फैसला. उसे बहुत बुरा लगा, बहुत रोई वह. बोली कि वह वजह नहीं बनना चाहती किसी रिश्ते के टूटने की.’’
‘‘वजह तो तुम्हारा मन बना था, राहुल,’’ आशा ने शांत स्वर में कहा, ‘‘कोई तीसरा कभी तब तक बीच में नहीं आता जब तक दोनों के बीच जगह खाली न पड़ जाए. उस जगह को हम ने मिल कर खाली किया है, हमारी शिकायतों, हमारी चुप्पियों ने.’’
राहुल चुप हो गया. थोड़ी देर बाद उस ने ?ि?ाकते हुए पूछा, ‘‘अगर… अगर मैं उसे शादी के लिए पूछूं तो क्या तुम… बहुत बुरा महसूस करोगी?’’
आशा ने गहरी सांस ली. यह वही सवाल था जिसे सुनने के लिए उस ने अपने दिल को तैयार किया था, पर जब शब्दों का आकार बना तो दर्द ने अपनी जगह फिर से मांग ली.
‘‘बुरा…?’’ उस ने क्षण भर सोचा, ‘‘हां, इंसान हूं, थोड़ा तो लगेगा पर अगर तुम दोनों सच में एकदूसरे के साथ खुश रह सकते हो तो शायद मेरी रुलाई से ज्यादा जरूरी है तुम्हारी हंसी.’’
राहुल की आंखें भर आईं, ‘‘तुम… तुम इंसान हो या…?’’
‘‘बहुत साधारण सी औरत हूं राहुल,’’ आशा ने हलके से हंसते हुए कहा, ‘‘बस इतना तय किया है कि जब मैं तुम्हारी जिंदगी में न रहूं तो मेरी याद तुम्हें बो?ा न लगे. कोई अच्छा सा खयाल बने कि एक दिन एक औरत थी, जिस ने जाने को चुना, मगर नफरत को नहीं चुना.’’
कमरे में अचानक जैसे कुछ भारी सा पिघलने लगा. दोनों के बीच जो गांठें थीं वे खुल तो नहीं रही थीं पर कम से कम अब उन्हें खींच कर दर्द बढ़ाने की जिद नहीं थी.
राहुल ने धीमे से पूछा, ‘‘एक… आखिरी बार तुम्हें गले लगा सकता हूं?’’
आशा कुछ पल चुप रही, फिर उस ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘यह भी कोई पूछने की बात है?’’
राहुल ने आगे बढ़ कर आशा को गले लगा लिया. दोनों की आंखों से आंसू बह निकले. कभी के साथी, आज के पराए… पर फिर भी कहीं भीतर से जुड़े हुए.
उस आलिंगन में कोई पतिपत्नी नहीं थे, बस 2 इंसान थे जिन्होंने साथ चलतेचलते
रास्ते अलग किए थे.
प्लेटफौर्म पर खड़ी आशा ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया. लाउडस्पीकर पर ट्रेन के आने की घोषणा हो रही थी.
लोगों की भीड़, सामान का शोर, चाय वालों की आवाजें… हंगामे के बीच भी आशा के भीतर की दुनिया अजीब सी शांत थी.
तभी मोबाइल पर मैसेज आया, ‘टेक केयर, आशा. कभी भी कुछ भी लगे, बस एक मैसेज कर देना, राहुल.’
आशा ने जवाब लिखा, ‘अब मुझे खुद से बात करना सीखना है, राहुल. जब अपने साथ रहना सीख जाऊंगी, तब शायद किसी और की जरूरत कम महसूस होगी. तुम्हारा रास्ता साफ हो गया है, अब उस पर ईमानदारी से चलना. खुश रहो, आशा.’
मैसेज भेज कर उस ने मोबाइल बैग में रख दिया. ट्रेन आ चुकी थी. वह चढ़ने लगी, तभी पीछे से किसी ने आवाज दी, ‘‘दीदी.’’
आशा मुड़ी. एक छोटी सी लड़की अपनी मां का हाथ पकड़े खड़ी थी जो सीट नंबर पूछ रही थी. आशा ने उन की मदद की, सामान अंदर चढ़वाने में हाथ बंटाया. सीट ढूंढ़ कर देने के बाद लड़की ने मासूम सा सवाल किया, ‘‘दीदी, आप अकेली सफर कर रही हो?’’
आशा ने हलके से मुसकरा कर जवाब
दिया, ‘‘हां, अकेली…पर कभीकभी अकेले सफर करना जरूरी होता है न ताकि हम जान सकें कि हम हैं कहां.’’
लड़की कुछ सम?ा, कुछ नहीं. पर आशा को महसूस हुआ कि यह जवाब उस ने उस बच्ची को नहीं, खुद को दिया है.
ट्रेन चल पड़ी. स्टेशन पीछे छूटता गया. आशा ने आंखें बंद कीं. उसे लगा जैसे अपने दिल के किसी कोने से वह धीमे से फुसफुसा रही है.
‘‘जब तुम मेरे न रहे तो मैं तुम्हारी जिंदगी में बोझ बन कर नहीं रहना चाहती थी और अब शायद मैं खुद की जिंदगी में पहली बार पूरी तरह मौजूद रहूंगी,’’ और फिर उस के होंठों पर एक हलकी पर सच्ची मुसकान आ गई.
यह मुसकान किसी और के लिए नहीं, सिर्फ उस की अपने लिए थी और शायद यही उस की सब से बड़ी जीत थी.
