Love Story In Hindi : ‘‘मैंअपनी कार से जैसे ही घर के आंगन में घुसा मेरी नजर बोगनवेलिया पर पड़ी. सच कितना मनमोहक रंग था. उस का खिलाखिला सा चटक रानी कलर, कितना खूबसूरसूत लग रहा था. फिर एक ठंडी हवा का झंका प्रीति की याद दिला गया…

लाख कोशिश करने पर भी उसे भुला पाना आसान नहीं. उस ने बौटनी विषय (वनस्पति शास्त्र) में एमएससी की थी. तभी तो उसे पेड़पौधों का बहुत ज्ञान था. हर पौधे के बारे में वह बताती रहती थी कि आरुकेरिया लगाना हो तो जोड़े में लगाना चाहिए.

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लेकिन एक पौधा ही उस का बहुत महंगा आता था. मैं ने कहा था कि यदि शौक पूरा करना है तो एक ही ला कर लगा लो. उस ने सामने लान में कई रंगों के गुलाब ला कर लगा ये थे जो उस घर में आज भी उस की शोभा बढ़ा रहे थे. उस के बाद उस ने बहुत ही खूबसूरसूत और दुलर्भ पौधे मंगवा कर लगवा ये जिन के बारे में मैं जानता भी नहीं था.

वह कहती थी, ‘‘युक्लिपटिस तो घर में कभी भूल कर भी मत लगा न… उस की जड़ें जमीन का सारा पानी सोख जाती हैं और उसे देखने के लिए गरदन पूरी ऊपर करनी पड़ती है,’’ और वह अपनी गरदन पूरी ऊपर कर के बताती.

प्रीति की उस अदा पर हंसी आ जाती थी. मैं मन ही मन सोचता कि कब तक उसे याद कर के पलपल मरता रहूंगा? मुझे उसे भूल जाना चाहिए. मगर दूसरे ही पल मन ही मन सोचता कि उसे भूल जाना इतना आसान नहीं है.

घर में घुसने से पहले ही मन उदास हो  गया. घर के बाहर जो मेरी नेम प्लेट लगी थी, वह भी उसी ने बनवाई थी और उसे देख कर कहा था कि वाह मोहित सिंहजी आप तो बड़े रोबदार लग रहे हो.

उस दिन रविवार था. किताबों की अलमारी साफ किए बहुत समय हो गया था. सो मैं ने यह निश्चय किया कि बहादुर को कह दूंगा, उसे जब समय मिलेगा, वह अपने हिसाब से इस की सफाई कर देगा. लेकिन बहादुर इस की सफाई करे उस के पहले कुछ बेकार किताबों  को रद्दी में निकालने के लिए उन्हें एक बार देख लेना चाहिए, यह सोच कर मैं ने किताबों की अलमारी खोली और किताबें निकालने लगा.

2 पुरानी किताबों के बीच में से एक खूबसूरत सा कार्ड निकला, जिस पर लिखा था ‘मोहित वैड्स प्रीति.’ यह कार्ड भी उस ने ही पसंद किया था. कहने लगी थी कि अगर तुम्हें भी पसंद हो तो इस में हम लाल रंग की जगह हलका गुलाबी और सुनहरी रंग करवा दें.

आज भी वह शादी का कार्ड ज्यों का त्यों था और मुंह चिड़ा रहा था कि तुम जो इतना अपनी मुहब्बत का दम  भरते थे, उस का क्या हुआ.

सच, वह प्रेम विवाह था या पारंपरिक विवाह, कोई कह नहीं सकता था. मैं ने प्रीति को देखा, वह मुझे इतनी पसंद आ गई कि यह चाहत प्रेम में कब बदल गई पता ही नहीं चला. फिर भी यह कहना गलत होगा कि यह प्रेम विवाह था. मैं ने घर वालों की रजामंदी से सभी रिश्तेदारों के बीच हिंदू संस्कारों को पूरा करते हुए पारंपरिक तरीके से यह विवाह किया था.

प्रीति दुलहन के रूप में घर आई. इतनी खूबसूरसूत बहू पा कर सभी खुश थे. प्रीति को जैसे कुदरत ने स्वयं अपने हाथों से बनाया हो. जो भी उसे देखता मुग्ध हुए बिना नहीं रहता था. बोलती तो जैसे वातावरण में मधुर संगीत बज उठता, चलती तो जैसेजैसे धरतीआसमान मंत्रमुग्ध हो देखने लगते. रूप ऐसा कि हाथ रख दो तो मैली हो जाए. गुणों की खान थी वह. ऊपर से सुरुचिपूर्ण रहनसहन उस की सुदरता में चार चांद लगा देता था.

वह कालेज में व्याख्या के पद पर 2 साल से कार्यरत थी. मुझे तो लगता था जैसे मुझे मनमांगी मुराद मिल गई हो. शादी से पहले मैं ने न जाने कितनी लड़कियां देखी थीं, परंतु हर बार यह कह कर टाल दिया कि इसे देख कर मन के शिवालय में घंटी नहीं बजी. जब प्रीति को देखा तो मेरे मनमंदिर में मधुर घंटियां बज उठी थी. कितनी लड़कियों की तसवीरें देखी, लेकिन कोई मन के अलबम में फिर नहीं हुई, लेकिन प्रीति मन में ऐसी बसी कि फिर किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर नहीं देखा.

मुझे आज भी याद है वह शादी का दिन, उस के साथ बीते वे मधुर क्षण, कितनी कोमल, कितनी प्यारी, कितनी अच्छी थी प्रीति. शादी के कुछ महीने मुहब्बत की बातें करते, घूमतेघूमते पलक झपकते ही निकल गए. उन दिनों प्रीति के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता था. मैं ही नहीं सारे घर वाले खासकर के मम्मीपापा भी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे. ऐसा कुछ विशेष था उस में जो हर किसी को दीवाना बना देता था.

मुझे भी मेरे सभी दोस्त छेड़ते थे कहते कि देखो इस ने तो भाभी पर मोहित हो कर अपना नाम सार्थक कर लिया.

शादी के बाद मुश्किल से 6 महीने बीते होंगे कि मेरी पोस्टिंग देहरादून हो गई. मैं प्रीति को ले कर देहरादून आ गया. उस ने अपनी नौकरी से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली. मैं ने तब भी बहुत समझया था, ‘‘मेरी तो जगहजगह पोस्टिंग होती रहेगी? तुम छुट्टी कब तक लेती रहोगी. यह नौकरी छोड़ दो और आराम से मेरे साथ चल कर रहो.’’

मगर उस समय वह मेरी बात टाल गई. बात आईगई हो गई और हम वहां पहुंच गए. वहां मुझे बंगला मिल गया. हम दोनों ने अपने घर को मनचाहे रूप में सजाया. कई प्लान बनाए. ऐसे करेंगे, वैसे करेंगे, यह होगा, वह होगा और न जाने क्याक्या सोचते रहते थे. हंसतेखिलखिलाते, हाथों में हाथ डाले जीवन के वे सुहाने पल पंख लगा कर उड़ गए.

उस समय मैं अपनेआप को दुनिया का सब से खुशहाल इंसान समझने लगा था. यहां आने के बाद मैं उसे अपने से दूर भेजना नहीं चाहता था. मैं चाहता था वह सदा मेरी बांहों के घेरे में रहे. हर पल मेरे घर को महकाती रहे. तो इस में मैं ने क्या गलत चाहा था.

हर पति अपनी पत्नी को इसी तरह चाहता है. मैं ने उस से कहा भी था कि मेरी इतनी अच्छी नौकरी है, सब सुखसुविधाएं हैं, तुम अपनी नौकरी से इस्तीफा दे कर यहीं रहो या यहां के कालेज में जौब कर लो.

मुझे लगा वह मान गई. फिर मैं निश्चिंत हो गया. मैं तो यही सोचता था कि लड़कियां तभी नौकरी करती हैं जब वे जीवनयापन के लिए मजबूर हो जाती हैं.

प्रीति ने मुझ से झठ बोला. उस ने नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि अपनी छुट्टियां बढ़ा ली थीं. मुझे लगता था कि वह मेरे साथ खुश है. उस ने यहां आ कर जाना कि यहां जिंदगी कितनी अलग है. यहां एक औफिस क्लब था, जिस का मैं भी सदस्य था. वहां पार्टियां होती रहती थीं. उसे पार्टियों में जाना अच्छा लगता था.

शुरूशुरू  में वह क्लब में डांस करने में हिचकिचाती थी. उस समय मैं ने ही उसे बहुत संबल दिया. मेरे प्रोत्साहित करने पर धीरेधीरे वह खुलने लगी और जल्द ही वह पार्टी में आकर्षण का केंद्र बनती चली गई. तब मुझे बुरा नहीं लगा था.

मैं अपने सहकर्मियों के बीच गर्व महसूस करने लगा था, यह सोच कर कि सब की बीवियों में मेरी बीवी ही इतनी सुंदर और आकर्षक है.

अब सोचता हू कि शायद मैं ने वहीं गलती कर दी. यदि मैं उसे वहीं रोक देता, मैं उसे वहीं समझ जाता, तो शायद इतनी बात नहीं बढ़ती. परंतु नहीं मुझे बाद में समझ आया कि प्रीति बंध कर रहने वाली इंसान नहीं थी, वह तो स्वतंत्र आकाश में उड़ान भरने वाला परिंदा थी. उस ने घर की परिधि में रहना नहीं सीखा था. यहां आ कर उसे उड़ने के लिए खुला आसमान मिल गया था.

उसे सजनासंवरना, मौजमस्ती करना, सैरसपाटे, होटलों में खाना और शौपिंग करना बहुत पसंद था. शुरूशुरू में उस के मोह में यह सब मुझे भी गलत नहीं लगता था. लेकिन हर बात की जब अति हो जाती है तब वही बात बुरी लगने लगती है.

यहां आए अभी कुछ दिन ही हुए थे. एक दिन उस ने कहा, ‘‘जानू हम शादी के बाद कहीं हनीमून पर नहीं गए.’’

‘‘चलो न कहीं चलते हैं,’’ मैं भी उसे मना नहीं कर सका, ‘‘तुम बताओ कहां चलना है.’’

‘‘जहां तुम कहो, चलते हैं,’’ और उस के कहने पर हम दोनों ने कश्मीर का ट्रिप प्लान किया.

फिरदौस ने सच ही कहा है कि कश्मीर धरती का स्वर्ग है. यह वहां जा कर ही जाना. हरीभरी वादियां, कलकल बहती नदियां, बर्फ से ढके पर्वत मन मोह लेते. श्रीनगर में डलझल, शिकारे और गुलमर्ग, सोनमर्ग के बर्फीले पहाड़, फूलों से लदे बगीचे, देवदार के ऊंचेऊंचे वृक्ष आदि सभी कुछ बहुत ही मनमोहक. वह उन नजारों में खो कर रह गई. जगहजगह घूमना, फोटो खिंचाना उस का शौक था.

मैं ने भी उसे बहुत घुमाया, ढेरों तोहफे दिए, जी भर कर प्यार किया. उस के प्रेम में डूबा हुआ था मैं.

तभी फिर अचानक मुझे उस के व्यवहार पर संदेह होने लगा. मैं जब भी औफिस से घर लौट कर आता तो वह कभीकभी घर पर नहीं मिलती थी. पूछने पर बहाने बना देती थी. धीरेधीरे वह मुझे इग्नोर करने लगी. फिर कई बार उसे किसी और के साथ हाथ में हाथ डाले हंसतेबतियाते देख संदेह गहराने लगा था.

जब मैं उस से पूछता कि वह कौन था तो जवाब में कहती कि तुम बेकार ही शक करते हो. वह तो मेरा दोस्त था.

इस बात से मैं क्षुब्ध रहने लगा. वह मुझे धोखा दे रही थी. मैं उस के प्रेम में इतना पागल था कि उस के द्वारा दिए जा रहे धोखे को धोखा मानने को तैयार ही नहीं था. मेरा प्यार मुझ से दूर होता जा रहा था. उस के व्यवहार में, मैं बदलाव महसूस कर रहा था. ऐसा लगता कि वह मुझ से बोर हो चुकी है और अब कोई दूसरा तलाश रही है.

कई बार मन करता कि पूंछूं कि प्रीति मेरे प्यार में क्या कमी रह गई थी? तुम किस बात का मुझ से बदला ले रही हो? अब मुझ से पहले जैसा प्यार नहीं रहा तुम्हें. आखिर क्यों?

उस की तरफ से किसी भी क्यों का कोई जवाब नहीं था. मेरा मन बहुत दुखी था और सांत्वना देने वाला कोई नहीं था.

कई बार घर में अकेले बैठे सोचता रहता था कि मुझ से कहां गनती हो गई? क्या प्रीति को चुनने में मुझ से कोई भूल हुई? कभीकभी बहुत गुस्सा भी आता. आखिर मैं एक मर्द हूं, प्रीति का मुझे अनदेखा करना, उस का बेगानापन, पराए लोगों के साथ उस का घूमना, कईकई घंटे घर से गायब रहना अब सहन नहीं हो रहा था. मेरा दिल टूट चुका था. फिर भी मैं ने सब्र किया यह सोच कर कि सब ठीक हो जाए.

एक रात क्लब में पार्टी थी. उस समय प्रीति बहुत खूबसूरसूत लग रही थी. थोड़ी देर

में मैं ने देखा वह अपने होश में नहीं थी. उस ने शायद ज्यादा पी ली थी. यह मैं ने पहली बार देखा, उस के हाथ में सिगरेट भी थी और वह अफसरों के बीच में बेतरह पश्चिमी संगीत पर नाच रही थी. मेरी सहनशक्ति जवाब दे चुकी थी.

मैं ने उस के पास जा कर कहा, ‘‘प्रीति चलो घर चलते हैं.’’

उस ने मेरा हाथ झटक दिया. मैं ने फिर कोशिश की, परंतु नाकामयाब रहा. मैं वहां कोई तमाशा नहीं करना चाहता था, पर जब पानी सिर से ऊपर निकलने लगा तब अंत में मैं उसे घसीटता हुआ घर ले आया.

उसी दिन से वह मुझ से नाराज रहने लगी क्योंकि पार्टी में मैं ने उस का अपमान जो कर दिया था. घर आते ही वह मुझ पर बरस पड़ी, ‘‘तुम होते कौन हो मुझे रोकने वाले? हर किसी को अपना जीवन अपने तरीके से जीने का हक है. तुम मुझ से यह हक नहीं छीन सकते.’’

यहां कोई फिल्म का दृश्य नहीं फिल्माया जा रहा था, यहां हकीकत में मेरी जिंदगी पर बन आई थी. स्थिति मेरे हाथ से निकलती जा रही थी.

इसी बीच मम्मीपापा का फोन आया, ‘‘बहुत दिन हो गये तुम लोगों से मिले. बड़ी याद आ रही है, सो हम कल आ रहे हैं.’’

सुन कर मुझेे बेहद खुशी हुई. मैं ने उन के आने की खबर जब प्रीति को सुनाई तो उस ने कोई खुशी जाहिर नहीं की. उस के माथे की त्योरियां चढ़ गईं क्योंकि उस की स्वतंत्रता में खलल पड़ने वाला था. यह वही प्रीति थी जो अपने सासससुर का बहुत आदर करती थी और वे भी उसे बेहद चाहते थे. उस का ऐसा मन देख कर मुझे बहुत दुख पहुंचा.

मैं ने उसे बहुत समझया, ‘‘वे तो कुछ ही दिनों के लिए आ रहे हैं. तुम उन से प्यार से मिलोगी तो उन्हें अच्छा लगेगा.’’

मगर वह नहीं मानी. उस ने न उन से निभाया न ही उन का मानसम्मान किया. मैं ने सोचा था कि मम्मी आ कर उसे समझ लेंगी और पापा के सामने शर्म से प्रीति भी सही राह पर आ जाएगी, परंतु उस का व्यवहार देख कर मुझे बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी.

मम्मी उसे हर तरह से समझने की कोशिश कर रही थीं. विवाह के बंधन, पतिपत्नी के

बीच के अटूट संबंध, समाज का डर, रिश्तेनाते उसे कुछ न बांध सका. मम्मी उसे व्रत, तीजत्योहार, रीतिरिवाज समझने के प्रयत्न करतीं, तो वह उलटीसीधी बातें कर के उन का अपमान करती, तर्कवितर्क करती. मम्मी ने भी हथियार डाल दिए.

दिनप्रतिदिन झगड़े बढ़ते चले गए. सासससुर उसे बोझ लग रहे थे. इस स्थिति में जीना दूभर हो गया था. मेरे गले में जैसे फंदा सा कसता जा रहा था. मम्मीपापा से मेरी हालत देखी नहीं जा रही थी. उन का प्रीति के साथ रहना भी मुश्किल हो रहा था और वे मुझे इस हालत में छोड़ कर भी जाना नहीं चाहते थे.

मैं तो जैसे सलीब पर टंग गया. एक रात प्रीति को समझतेसमझते मैं थक गया. वह बराबर मम्मी पापा के लिए अनापशनाप कहे जा रही थी, उन्हें अपमानित कर रही थी. यह सब बरदाश्त के बाहर हो गया था.

वह अपना तकिया उठा कर बाहर जाने लगी और बोली, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा माई फुट.’’

उस की इस बदतमीजी से खीज कर स्वत: ही मेरा हाथ उस पर उठ गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘सौरी बोलो प्रीति.’’

उस ने कहा, ‘‘किस बात के लिए बोलूं? तुम सौरी बोलो, तुम ने हाथ उठाया है.’’

उस ने माफी नहीं मांगी उलटी जोरजोर से चिल्लाने लगी. यहां से जाने का बहाना मिल गया था उसे. बस फिर क्या था, उस ने अपना सूटकेस उतारा और उस में अपना सामान पैक कर दिल्ली अपने पीहर चली गई. हां, वह दिल्ली की रहने वाली थी. ऐसा लगा जैसे वह किसी मौके की तलाश में ही थी.

मुझे खुद पर ग्लानी हो आई कि यह क्या कर दिया मैं ने. उसे मनातेमनाते ही उसे खो दिया. मैं ने उसे बहुत रोकना चाहा. अनजाने में घबरा कर कि कहीं उसे खो न दूं, मैं ने माफी भी मांगी, लेकिन फिर उस ने एक न सुनी. लगा उसे बहुत अभिमान हो गया था शायद. उस घमंड ने उसे

न झकने दिया न ही उस ने अपनी गलती की माफी मांगी.

तभी मेरे मन ने मुझे धिक्कारा कि गलती कर के भी माफी न मांगे और मांबाप का

सम्मान न कर सके, ऐसा खोखला व्यक्तित्व है उस का, जिस के पीछे तू दीवाना हो रहा है.

जाने दे उसे. चली जाने दे. उसी दिन खत्म हो गया. वह रिश्ता शोर सुन कर मम्मीपापा बाहर आ गए थे.

मम्मी पागलों की तरह ‘बहूबहू’ पुकारती रहीं. कभी मेरी तरफ हाथ पसारतीं तो कभी दरवाजे की तरफ उसे रोक लेने को दौड़तीं.

उस ने फिर किसी की नहीं सुनी न पीछे मुड़कर ही देखा.

पापा शांत अपनी कुरसी पर बैठे हुए यह तमाशा देखते रहे. कुछ नहीं बोले. उन के चेहरे पर एक अजीब सा दर्द साफ दिखाई दे रहा था. चुप न रहते तो क्या करते? और फिर इस तरह से सूने दिनों की शुरुआत हो गई और यह सूनेपन का सिलसिला जिंदगीभर चलता ही रहा. कभी न खत्म होने वाला सिलसिला.

एक घर 3 कोनों में बंट गया- मैं, पापा और मम्मी. खाने की टेबल पर कभीकभी साथ हो लेते. वे दोनों कभी साथ बैठते, बतियाते और जी हलका कर लेते, परंतु मेरे कोने का अंधेरा, मेरे मन की कसक बढ़ती ही गई. कुछ दिन बाद वे लोग भी चले गए.

इतने बड़े बंगले में समय गुजारना बहुत मुश्किल था. हर कोने में प्रीति की यादें बसी थीं. समय काटे नहीं कटता था. अकेले रहते हुए सूनापन मन में ऐसा रम गया था कि कोई जोर से बोलता तो मैं चौंक जाता. औफिस भी जाता था, सभी काम होते थे, लेकिन कहीं भी मन नहीं लगता था. किसी से हंसीमजाक करना बिलकुल न सुहाता था.

उस दिन भी क्लब में बैठा था. सभी ऐंजौय कर रहे थे. तभी किसी ने कहा, ‘‘यार विक्रम तूने मोहित को देखा?’’

उस ने हाथ का इशारा कर के कहा, ‘‘वहां उस कोने वाली टेबल पर. वह आजकल बहुत पीने लगा है. तुम तो पहले भी मिले हो. जानते हो न उसे.’’

‘‘हां बिलकुल अच्छी तरह से जानता हूं. बहुत हंसमुख हुआ करता था.’’

यह सुरेंद्र ही था जो विक्रम को मेरे बारे में बता रहा था. विक्रम इसी महीने यहां

ट्रांसफर हो कर आया था.

‘‘अब वह पहले वाला मोहित नहीं रहा…

न वह हंसता है न ही मजाक करता है,’’

सुरेंद्र बोला.

विक्रम ने अचंभित हो कर पूछा, ‘‘ऐसा क्या हो गया भाई?’’

उस ने विक्रम को बताया, ‘‘धोखा दे गई इस की पत्नी इसे. शायद किसी के साथ भाग गई. तभी से यह देवदास बना फिरता है.’’

मन हुआ जा कर उस का गला पकड़ लूं या जबान खींच लूं उस की पर यह सोच कर कि गलत भी तो नहीं कह रहा वह मैं चुपचाप वहां से उठ कर चला आया.

ऐसे जुमले अकसर महफिलों में, पार्टियों में मेरे बारे में सुनाई देने लगे थे. शुरू में बुरा लगता था, लेकिन धीरेधीरे यह सब सुनने की आदत सी हो गई.

एक दिन पापा का फोन आया. कहने लगे, ‘‘यहां आ जाओ कोई बात करनी है,’’ बहुत दिनों बाद उन्होंने मौन तोड़ा था और संयत हो कर मुझे अपना फैसला सुनाया, जिसे सुन कर मैं स्तब्ध

रह गया.

मुझे उसे तलाक के लिए स्वयं को तैयार करने में काफी समय लग गया. असल में उम्मीद लगाए बैठा था कि प्रीति एक न एक दिन जरूर लौट आएगी. वह भी मुझ से ज्यादा दिन अलग नहीं रह पाएगी, लेकिन मैं प्रति दिन उस का इंतजार करता ही रह गया. उसे नहीं आना था तो वह नहीं आई.

कोर्टकचहरियों के चक्कर इंसान को तोड़ कर रख देते हैं, यह मैं ने तभी जाना था. सम्मन आते थे, तारीखें पड़ती थीं, जिरह होती थी. वकीलों के वाकजाल से भला कौन बच सकता. कोर्ट में झठेसच्चे आरोप और उन्हें सिद्ध करने

के प्रयास.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान मानसिक तनाव

के बीच में धीमी गति से गुजरता हुआ

जीवन… ऐसी कितनी ही भयानक रातें मुझे गुजारनी पड़ीं. एक रात वह भी थी जिस दिन प्रीति घर छोड़ कर गई थी. वह अमावस की

रात से भी ज्यादा काली रात थी. बाहर तो घना अंधेरा था, ही लेकिन मन के अंदर भी तूफान उठ रहा था.

हर बार चीखने का मन करता था.

मन यह पूछना चाहता था कि प्रीति मैं ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा जो तुम ने मेरे साथ धोखा किया? मैं ने तो तुम्हें पलकों पर बैठाया था, जी जान से प्यार किया था. मेरे प्यार में क्या कमी रह गई थी? तुम मुझ से कहती तो सही.’’

सोचता हूं कि अंतत: फैसला होगा ही और वह इस विवाह बंधन से मुक्त हो जाएगी. वह तो निर्मोही है, धोखेबाज है, न जाने किस मिट्टी की बनी है. लेकिन मैं ने तो उस से प्यार किया था, किया है और शायद जीवनपर्यंत करता रहूंगा. मैं आज भी स्वयं को इस तलाक के लिए राजी नहीं कर पाया जो परिवार और समाज चाहता था, वह उस ने हमारे बीच करवा दिया.

मगर मैं ने उसे दिल से नहीं माना. यह कैसा प्रेम संबंध था? यह कैसा विवाह संबंध था, जिसे मैं ने माना? लेकिन उस ने नहीं माना. यह कसक सदा मेरे मन में रहेगी कि क्यों प्रीति तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

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