Hindi Love Story: वह ठीक मेरे सामने से गुजरी. एकदम अचानक. मन में बेचैनी सी हुई. उस ने शायद देख लिया था मुझे. लेकिन अनदेखा कर के पल भर में बिलकुल नजदीक से निकल गई. जैसे अजनबी था मैं उस के लिए. कोई जानपहचान ही न हो. इस जन्म में मिले ही न हों कभी. मेरा कोई अधिकार भी न था उस पर कि आवाज दे कर रोक सकूं

और पूछूं कि कैसी हो? क्या चल रहा है आजकल? उस ने भी शायद बात करना नाजायज समझा हो. शायद इस तरह आमनेसामने से निकलने पर उसे लग रहा हो जैसे कोई गुनाह हो गया हो उस से. आज का दिन उस के लिए बुरा साबित हुआ हो. कहां से टकरा गए? क्यों, कैसे देख लिया?

यही वह लड़की थी. लड़की पहले थी अब तो वह महिला थी शादीशुदा. किसी की पत्नी. लेकिन जब मेरी पहली मुलाकात हुई थी उस समय वह लड़की थी. एक सुंदर लड़की, जो मुझ से मिलने के लिए बहाने तलाशती थी. मुझे देखे बिना उसे चैन न आता था.

हम कभी पार्क में, कभी रैस्टोरैंट में, कभी क्लब में तो कभी सिनेमाहाल में मिलते.

धीरेधीरे प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम के पंख लगते ही हम उड़ने लगे. आसमान की सैर करने लगे. जब मौका मिलता मोबाइल पर बातें करते. एकदूसरे को एसएमएस करते रहते. दोनों दुनिया से बेखबर प्यार में डूबे रहते. बहुत थे उसे देखने वाले. बहुत थे उस के चाहने वाले. लेकिन वह केवल मेरे साथ थी, मेरी थी. वह मुझ से बेइंतहा प्रेम करती थी. देखता तो मैं उसे रहता था. लेकिन मेरे देखने से क्या होता है? ताजमहल को हजारों लोग देखते हैं. बात तो तब थी जब वह मुझे देखे.

कालेज शुरू हो चुका था. वह प्रथम वर्ष में थी और मैं द्वितीय वर्ष में. जैसाकि रिवाज चला आया है कालेजों में नए छात्रों की खिंचाई करना. उन्हें परेशान करना. अपमानित करना. प्रताडि़त करना. इसे परिचय का नाम देने वालों को पता नहीं था कि बाद में यह कुरीति बन कर गंभीर अपराध का रूप धारण कर लेगी.

जब सीनियर छात्रों ने उस से कहा कि वह आई लव यू कहे तो उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने उसे घेर कर बियर पीने को कहा. उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने कहा कि वह अपनी सलवार या कमीज दोनों में से कोई एक उतार दे. उस ने मना कर दिया. सीनियर छात्रों ने इसे अपना अपमान समझा. उन्होंने उस के गालों पर तमाचे मारना शुरू कर दिया. फिर तमाचों की चोट से वह तिलमिला कर चीखने लगी.

सभी सीनियर लड़के बारीबारी आते और जोरदार थप्पड़ मार कर हंसते हुए निकल जाते. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी. मेरा नंबर भी आया. मैं ठीक उस के सामने था. वह डर, क्रोध, अपमान से थरथरा रही थी. मैं उस के नजदीक से निकल गया बिना उसे तमाचा मारे. फिर सीनियर छात्रों ने उसे जबरदस्ती बियर पिला दी. उस के कपड़े फाड़ने की कोशिश की. वह अपमान व पीड़ा से बिलखती हुई वहीं बैठ कर रोने लगी. फिर बियर से उस का सिर भारी होने लगा. उस का चेहरा मेरी नजरों के सामने घूमा. मैं वापस वहीं पहुंचा, जहां उस की रैगिंग हो रही थी. वहां कोई नहीं था. वह बेसुध पड़ी हुई थी. मैं उसे अस्पताल ले गया. उस के मोबाइल से उस के घर का नंबर ले कर उन्हें इतला दी.

उस के पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे. हालात मालूम होने पर उन्होंने पुलिस को इतला दी. लड़की के पिता के पास धनबल, राजनीतिक बल था. उन्होंने कालेज की ईंट से ईंट बजा दी. इस से पहले कि लड़कों पर कोई कानूनी काररवाई होती, उन्होंने लड़की से अस्पताल में जा कर माफी मांग ली. बात खत्म हो गई.

उस के पिता ने मेरा शुक्रिया अदा किया. जब छोटी औकात वाले का शुक्रिया अदा किया जाता है तो उसे शुक्रिया के रूप में कुछ रुपए दिए जाते हैं, यह कह कर कि रख लो प्यार से दे रहा हूं. मेरी मना करने की हिम्मत नहीं हुई. न चाहते हुए भी लेने पड़े. एक करोड़पति आदमी, आलीशान कोठी. गेट पर दरबान. लाइन से खड़ी महंगी चमचमाती गाडि़यां. मैं उन के व्यक्तित्व के आगे दब गया था. अगर कालेज के लड़कों को उस के पिता की औकात के बारे में पता होता तो भूल कर भी यह गलती न करते. अब सब उस से संबंध बनाने का प्रयास करने लगे. लेकिन उस ने मुझे देखा उस नजर से, जिस नजर से इस उम्र में हर कोई चाहता है कि उसे देखा जाए. वह मुझे कालेज कैंटीन में ले जाती. यदि मैं पहले से किसी दोस्त के साथ बैठा होता तो वह आ कर कहती ऐक्सक्यूजमी, क्या मैं बैठ सकती हूं? क्या आप हमें अकेला छोड़ सकते हैं? मेरे दोस्त शर्मिंदगी, गुस्से से उठ कर चले जाते.

‘‘हैलो, मैं सरिता,’’ उस ने हाथ बढ़ाया.

‘‘मैं, देव,’’ मैं ने हाथ बढ़ाया.

2 हाथ मिले. आंखें चार हुईं. धड़कनों की गति बढ़ी. कुछ और नजदीकियां बढ़ीं और पास आए. गले मिलने लगे तो धमनियों में रक्त का संचार बढ़ने लगा. कालेज की ओर से पिकनिक टूर हुआ. मैं अपनी आर्थिक स्थिति के चलते जाने को राजी न था. उस ने अपनी तरफ से मेरी फीस अदा की और मुझे यह कह कर ले गई कि पिकनिक तो बहाना है. हमें एकदूसरे के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा.

सभी छात्र हिल स्टेशन का लुत्फ उठाते रहे. लेकिन हम दोनों बांहों में बांहें डाले

अपनी ही दुनिया में खोए रहे. प्यारमुहब्बत के वादे करते रहे. हम दोनों एकदूसरे के दिल की गहराइयों में उतर चुके थे.

उस ने कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं. तुम्हारे बिना जी नहीं सकती.’’

‘‘प्यार तो मैं भी तुम से करता हूं, लेकिन इस प्यार का अंजाम क्या होगा?’’ मैं ने कहा.

‘‘वही जो हर प्यार का होता है.’’

‘‘मैं गरीब हूं.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘अपने पिता से पूछ कर देखना.’’

‘‘यार, प्यार मैं ने किया. शादी मुझे करनी है. जीवन मेरा है. जीना मुझे है. इस में मेरे पिता का क्या लेनादेना?’’

‘‘यह भी पिता से पूछ कर देखना.’’

वह चिढ़ गई. मैं ने उसे मनाने का हर जतन किया. उसे फिल्मी शेरोशायरी सुनाई. प्रेम भरे गीत सुनाए. उस से लिपट गया. उस के गालों को चूमा. उस से माफी मांगी. वह खिलखिला पड़ी. स्वच्छ, पवित्र बहती नदी की तरह. अपने नाम की तरह.

हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं. हमारा प्यार बढ़ता गया. कालेज में सब को पता था हमारे प्यार के बारे में. सब जलते थे हमारे प्यार से.

एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘मुझे अपने घर के लोगों से मिलवाओ.’’

मैं डर गया. क्या सोचेगी? कहीं मेरी गरीबी का मजाक तो नहीं उड़ाएगी? किस से मिलवाऊं घर में? गरीब महल्ले में 1-2 कमरे का कच्चा मकान. जवानी की दहलीज लांघ चुकी कुंआरी बहन, जिस की शादी दहेज के कारण न हो सकी. विधवा बूढ़ी मां, जिस के मन में ढेरों बोझ, चेहरे पर झुंझलाहट और मुंह में कड़वे बोल थे. क्या कहेगी मां कि मेहनत, मजदूरी कर के पढ़ाने के लिए भेजा और बहन की शादी करने के बजाय खुद इश्क कर रहा है. अपनी शादी की योजना बना रहा है.

खैर, सरिता नहीं मानी. मैं उसे घर ले गया. वह बहन से मिली. मां से मिली. प्यार से बातें हुईं. चायनाश्ता भी. लेकिन सरिता के जाने के बाद मां ने मुझ से कुछ कहा तो नहीं, लेकिन खफाखफा सी नजर जरूर आईं. उन का अनकहा मैं समझ गया. मुझे नौकरी तलाश कर घर चलाना है. मुझे हर हाल में बहन की शादी करनी है. यह मेरा दायित्व है. बाकी सब बाद में. पढ़ाई के साथसाथ में नौकरी के फार्म भी भर रहा था. तैयारी भी कर रहा था नौकरी की. लेकिन हर जगह से नाउम्मीदी, असफलता. घर में घुटन सी होती. पढ़ाई से मन हटने लगा था. लेकिन मेरे हाथ में कुछ न था. मेरे पास एक सीधा रास्ता यह था कि सरिता से शादी कर के घरजमाई बन कर अपनी गरीबी से मुक्ति पा लेता. लेकिन आत्मसम्मान आड़े आता रहा.

सरिता करोड़पति पिता की इकलौती बेटी थी. वह प्यार के खुमार में महल से झोपड़े में आने को तैयार थी. वह मुझे झोपड़े से महल में ले जाने को भी राजी थी. लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं और क्या न करूं? मैं कैसे एक कलकल बहती पावन, शुद्ध साफ नदी का रुख मोड़ कर उसे अपनी गरीबी के दलदल में ले आऊं? कितने दिन रह पाएगी? कैसे उन अभावों को सह पाएगी? क्यों लूं मैं उस से इतनी बड़ी कुरबानी? कैसे मैं उस के घर जा कर अपने जमीर को मार कर उस की अमीरी में अपना मुंह छिपा लूं? क्या सोचेगी मेरी बूढ़ी मां, जिस के पास पूंजी के नाम पर सिर्फ मैं था?

‘‘तुम्हारी समस्या क्या है?’’ सरिता ने पूछा, ‘‘मैं सब में राजी हूं. या तो तुम निकलो अपनी गरीबी से या फिर मुझे ले चलो अपनी गरीबी में. मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. जगह जो भी हो. महल हो या झोंपड़ा. जहां तुम वहां मैं. तुम्हारे बिना मुझे महल स्वीकार नहीं.’’

मैं चुप रहा.

‘‘तुम बोलते क्यों नहीं?’’ सरिता ने झल्ला कर कहा.

‘‘मेरे पास बोलने को कुछ नहीं है. मुझे समय चाहिए.’’

समय का काम है गुजरना. समय गुजरता रहा. कालेज पूरा हो चुका था. मैं नौकरी के लिए प्रयास करता रहा. सफलता तो जैसे मेरी दुश्मन थी. सरिता मुझ से मिलती रहती. फोन पर बात करती रहती. गुजरते वक्त के साथ मैं टूट रहा था और सरिता शादी की जिद पर अड़ी थी, जोकि उस के प्यार का हक था.

सरिता का कालेज भी समाप्त हो चुका था. मेरी दुविधा को खत्म करने के लिए सरिता ने अपने पिता से बात की. एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘पापा ने घर पर बुलाया है. उन्हें कुछ बात

करनी है.’’

मैं उस विशाल कोठी के सामने खड़ा था. दरबान ने हिकारत के भाव से गेट खोला. विदेशी कुत्ते भूंक रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरी गरीबी को दुतकार रहे हों.

विशाल कोठी के बाहर सरिता के पिता बैठे चाय की चुसकियां ले रहे थे.

मैं पहुंचा. उन्होंने बैठने को कहा. उन्होंने नौकर को इशारा किया. नौकर फौरन चाय ले कर आ गया. उन्होंने नौकर को जाने को कहा. अब मैं इस विशाल व्यक्तित्व के सामने खौफ खाए बैठा था. मुझे डर नहीं था, लेकिन मैं अपनी औकात से वाकिफ था.

उन्होंने अपनी रोबदार आवाज में कहा, ‘‘क्या चाहते हो?’’

‘‘जी, कुछ भी तो नहीं,’’ मैं ने अचकचा कर कहा.

‘‘सरिता से शादी करने की हिम्मत है?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘घरजमाई बन सकते हो?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘फिर, आगे क्या सोचा है?’’

मैं चुप रहा.

‘‘शादी तुम कर नहीं सकते. नौकरी तुम्हें मिल नहीं रही. घर की जिम्मेदारियां निभाते जीवन गुजर जाएगा. मेरी बेटी का क्या होगा? उसे मना कर दो. क्यों उस का वक्त बरबाद मेरा मतलब जीवन खराब कर रहे हो?’’

मैं फिर चुप रहा.

‘‘तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगा चुका है देव. चलो, एक समझौता करते हैं. सौदा चाहो तो सौदा समझ लो.’’

मैं नजरें झुकाए शांत बैठा था. एक नजर सरिता के पिता को देखता और फिर नजरें झुका लेता.

‘‘मैं अपने दोस्त की कंपनी में तुम्हें नौकरी दिलवा सकता हूं. सुपरवाइजर की पोस्ट खाली है. अच्छी तनख्वाह है. तुम्हारी बहन की शादी के लिए लोन भी दिलवा सकता हूं. बदले में तुम्हें सरिता को छोड़ना होगा.’’

मुझे नौकरी मिल गई. बहन की शादी के लिए पैसा भी. बूढ़ी मां का बोझ उतर गया.

सरिता ने अपने पिता से पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘उस ने अपनी जिम्मेदारी और प्यार में से जिम्मेदारी को चुन लिया है. तुम उसे भूल जाओ. न वह घरजमाई बन कर रहने लायक है और न ही वैसा दामाद जैसा मुझे चाहिए था, पूर्ण समर्पित तुम्हारे प्रति. वह वैसा नहीं है और न ही वह तुम्हें अपनी गरीबी में रखने को राजी है. तुम रह भी नहीं पाओगी. वह जानता है.’’

सरिता मेरे पास आई. उस ने अपना गुस्सा मुझ पर उतारा, ‘‘क्यों किया था

प्यार? क्यों किए थे झूठे वादे? तुम फरेबी निकले. मुझे नहीं पता था कि कालेज में मुझे थप्पड़ न मारने वाला लड़का मुझे बहोशी की हालत में अस्पताल ले जाने वाला वह दिलेर लड़का बेकारी और कर्त्तव्यों के बोझ से इतना दब जाएगा कि अपने प्यार से बच कर भाग निकलेगा.’’

मैं चुप रहा तो मेरी चुप्पी ने उसे तोड़ दिया. वह कलकल बहती पवित्र नदी का शुद्ध जल आज मेरे सितम, मेरी चुप्पी से रुक सा गया था. मानों किसी बड़े बांध में बंध कर उस का प्रवाह रुक गया हो. उस उमड़तीघुमड़ती नदी का पानी मटमैला सा हो चुका था.

‘‘तुम ने मेरा सौदा कर दिया. मुझे बेच दिया अपने कर्त्तव्यों की आड़ में. मुझे कालेज की रैगिंग के वे चांटे, वे कहकहे, वह अपमान उतना भारी नहीं लगा जितनी तुम्हारी खामोशी. तुम अपनी गरीबी, अपनी जिम्मेदारियों, अपनी बेकारी में अपने प्यार को हार चुके हो,’’ और वह चली गई.

आज वर्षों बाद जब सरिता इतने नजदीक से अचानक गुजरी तो यों गुजर गई मानों मैं उस के लिए दुनिया से गुजर गया हूं या शायद दुनिया का सब से गुजरा व्यक्ति था. तभी तो उस ने पल भर रुकना, मेरी तरफ देखना भी गंवारा न समझा.

उस के पीछे उस का पति था. मेरा कालेज का दोस्त. रैगिंग मास्टर.

समर मुझे देख कर रुक गया. बोला, ‘‘अरे देव, तुम यहां कैसे? कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं अपनी कहो,’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं भी ठीक हूं. पर तुम यहां कैसे?’’ समर ने पूछा.

‘‘भाई समर मैं यहां कपाडि़या से मिलने आया था. पौलिसी के संबंध में वरना इस बड़े और महंगे होटल में मेरी क्या औकात आने की.’’

वह हंसा, ‘‘मैं ही कपाडि़या हूं. मैं ने ही बुलाया था.’’

मैं भौचक्का रह गया. कहा, ‘‘तुम तो समर राठी हो… क्यों मजाक…’’

उस ने मेरी बात काट कर, ‘‘चलो, कौफी पीते हुए बातें करते हैं.’’

मैं एजेंट था. क्लाइंट के पीछे चलना मेरी मजबूरी, मेरी रोजीरोटी थी.

समर ने कौफी मंगवाई. मैं ने फार्म निकाला. मैं उस के बताए अनुसार फार्म भरता गया. नौमिनेशन में सरिता कपाडि़या का नाम आते ही पल भर के लिए हाथ रुक गया.

उस ने हंसते हुए बताया, ‘‘तुम्हारी चुप्पी से सरिता कटी पतंग की तरह हो गई थी. मैं भी मध्यमवर्ग का था. मुझे भी पैसा, ऐशोआराम की जिंदगी चाहिए थी. यों समझ ले कि वह कटी पतंग मैं ने लूट ली. मैं उस के जीवन में आया. उसे प्रेम, दिलासा, अपनापन दिया. उस का दिल बहलाया. वह पहले से टूटी हुई थी. मुझ से जल्दी जुड़ गई. उस के पिता ने शर्त रखी कि तुम्हें घरजमाई बनना होगा. अपना सरनेम चेंज करना होगा. मैं जो चाहता था वह मुझे मिल गया. मैं पूरी तरह कपाडि़या हो कर सरिता और उस के पिता के कहने पर चला. आज मैं कपाडि़या सेठ हूं.’’

तभी सरिता आ गई. उस ने मुझे उचटती निगाह से देखा. मैं ने उसे देख कर पहलू बदला. उस ने कुछ भी पीने से इनकार कर दिया और समर से पूछा, ‘‘ये यहां कैसे?’’

‘‘बहुत दिनों से पौलिसी लेने के लिए फोन कर रहा था. यह मुझे नहीं पहचान पाया. मैं पहचान गया. मैं ने सोचा चलो दोस्त की मदद हो जाएगी.’’

सरिता ने व्यंग्य से कहा, ‘‘कैसे पहचान पाते. तुम ने अपनी जात ही बदल ली,’’ फिर हंसते हुए कहा, ‘‘प्रेम तो कोई तुम से करना सीखे. प्रेम में क्या जाति, क्या धर्म? पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनेआप को बदल ही नहीं पाते.’’

समर ने कहकहा लगाया. इस कहकहे में वह अपना अपमान छिपा गया. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘देव, घर में सब कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हैं.’’

‘‘मेरा मतलब तुम्हारी पत्नी, बच्चे?’’

‘‘मैं ने अपनी जिम्मेदारी के कारण शादी नहीं की. विधवा बहन के 2 बच्चों का पालनपोषण कर रहा हूं. सुपरवाइजरी की नौकरी छोड़ दी… वह नौकरी मुझे एहसान लगने लगी थी. किसी का कर्ज, कोई सौदा. फिर एलआईसी में एजेंट बन गया. अब दिनरात ग्राहक तलाशता हूं.’’

सरिता की आंखें भर आईं. फिर आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘‘जो लोग जीवन में सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते, जो लोग जीवन में बड़े फैसले नहीं कर पाते, उन का कुछ नहीं हो सकता.’’

समर को लगा कि कहीं पुराना पे्रम फिर से हिलोरें न मारने लगे. अत: उस ने उठते

हुए कहा, ‘‘अच्छा देव, हमें चलना है. चलो सरिता.’’

देव अपनी फाइल व कागजात समेटने लगा. समर और सरिता बाहर निकल गए.

सरिता यों चल रही थी समर के साथ मानो अंत में हर नदी का अंजाम ही हो खारे सागर में मिल कर मरना. उस ने अपनी नियत स्वीकार ली थी.

देव की एक चुप्पी ने सरिता के जीवन में ऐसा बांध बना दिया कि उसे फिर से कलकल करते बहने के लिए किसी समर रूपी सागर में पनाह लेनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि समर ने शादी उस की दौलत की खातिर की है. गंगोतरी की गंगा खारे पानी में मिल कर विलीन हो चुकी थी. उस की सरिता मर चुकी थी. सरिता के मरने में उस का भारी योगदान था. देव की सरिता, समर की सरिता. सागर में विलीन सरिता. उस की चुप्पी से अधूरी, अतृप्त, उदास सरिता.

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