Long Story : ‘‘यह   भी कोई जीना है, न खुल कर बोल सकते हैं, न हंस सकते हैं और न ही कहीं घूम सकते हैं,’’ रोजरोज की घुटन से तंग आ कर आखिर मोनिका फट ही पड़ी.

‘‘यही तो परिवार है, जहां सब के लिए जगह है, प्यार है. जिन्होंने हमें योग्य बनाया, उन के लिए भी तो हमारे कुछ दायित्व हैं,’’ अनुपम ने उसे समझना चाहा.

‘‘अब वह जमाना नहीं रहा अनु, आज हर परिवार इस बात को अच्छी तरह समझता है कि पतिपत्नी को अपने मनमुताबिक जीवन जीने का अधिकार है और तुम हो कि अपनेआप बड़प्पन का बोझ ओड़े पड़े हो… इस घुटनभरे घर में तो सारे सपने बिखर गए मेरे…’’ मोनिका की भृकुटियां तन गईं.

‘‘मुझे नहीं मालूम था कि तुम इस तरह के सपने पाले बैठी थीं.’’

‘‘मुझे भी नहीं पता था कि तुम्हारे साथ अपना जीवन बरबाद करने जा रही हूं.’’

प्रेम विवाह से आह्लादित मोनिका पति के प्यार में खुल कर जीना चाहती थी, लेकिन परिवार में ऐसी स्वतंत्रता के लिए जगह नहीं थी. कुछ दिनों तक उस ने दबी आवाज में अपना दुख व्यक्त किया, लेकिन जब अनुपम ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उस के सब्र का बांध टूटना ही था, सो टूट गया. उस दिन से दोनों के बीच संबंधों में शिथिलता आ गई. दोनों बात तो करते लेकिन उस में औपचारिकता ने घर बना लिया था.

दीपावली की छुट्टियां पड़ीं तो मोनिका अपने मायके जाने की जिद करने लगी. घर वाले चाहते थे, बहू उन के पास रहे. अनुपम ने भी समझया, लेकिन वह नहीं मानी. इस से आगे बढ़ कर उस ने अनुपम को भी मायके में दीपावली मनाने को कहा. अनुपम को यह व्यवहार कांटे जैसा लगा, लेकिन विवाद से बचने के लिए थोड़ी नानुकुर के बाद उस ने समर्पण कर दिया. अपने घर वालों को उस ने यह सांत्वना दे कर मनाया कि एक दिन बाद आ जाएगा. अम्मांबाबूजी और छोटे भाईबहनों के चेहरों पर उपजी वेदना को महसूस कर के वह मर्माहत हो उठा था.

अनुपम मोनिका के साथ गया पर दुखी मन से. वह कुपित था उस के ढीठ व्यवहार पर. दूसरे दिन सासससुर ने भी उसे अघोषित रूप में समझना शुरू कर दिया, ‘‘बेटा, कुछ अपने होने वाले परिवार के बारे में भी सोचो, कल को बच्चे होंगे, उन की शिक्षा, कैरियर सब देखना होगा. बेहतर हो तो अलग घर ले लो. छोटे घर में कैसे गुजर होगी. दोनों कमाते हो, कोई आर्थिक परेशानी तो है नहीं…’’ आदिआदि.

अनुपम बुझे मन से हांहूं करता रहा. लेकिन यह बात उसे चुभ गई कि

मोनिका ने अपने मातापिता के माध्यम से यह नया जाल फेंका. वह लौटना चाहता था, मगर मोनिका ने कुछ प्यार की अल्हड़बाजी और कुछ रूठनेमनाने के बहाने कुछ दिन और रुकने का अड़ंगा लगा दिया. वह दोहरे तनाव में फंस गया. घर से अम्मांबाबूजी और बहनभाई के फोन पर फोन आ रहे थे और इधर मोनिका उसे अपने पल्लू से बांधे पड़ी थी. वह घर वालों से बहाने बनातेबनाते थक गया. पूरी छुट्टियां खत्म होने के बाद ही दोनों लौटे.

घर आते ही स्थिति पहले से ज्यादा तनावपूर्ण हो गई. घर वालों की कुपित मुखमुद्रा और अघोषित टीकाटिप्पणी ने मोनिका के माथे पर आक्रोश की रेखाएं खींच दीं. अनुपम तो पहले से ही खिन्नता से भरा हुआ था. मोनिका के घर वालों ने अलग होने के लिए जो पट्टी उसे पढ़ाई थी, उस का प्रभाव भी कुछ दिनों बाद दोनों पतिपत्नी के संबंधों पर पड़ने लगा. उस को ले कर दोनों के बीच हो रहे वाक्युद्ध की जानकारी जब अनुपम के घर वालों के कानों तक पहुंची तो रविवार की छुट्टी के दिन अच्छाखासा बखेड़ा हो गया.

‘‘हमारे यहां शुरू से ही सारी बहुएं घर में ही रहती आई हैं. अलग होने के संस्कार नहीं हैं हमारे,’’ अम्मां ने मोरचा संभाल लिया.

‘‘अब समय बदल गया है, पहले जैसी बातें नहीं थोपी जा सकतीं,’’ मोनिका ने अम्मां की बात को काटा तो अनुपम की भौंहें तन गईं. उस ने मोनिका को सम?ाना चाहा, लेकिन विवाद और तर्कों का सिलसिला थमने के बजाय और बढ़ता गया.

इस पर मोनिका ने अपने मायके में फोन कर के आग में घी डालने का काम कर डाला. कुछ देर में उस के मम्मीपापा भी आ धमके. जैसी मोनिका वैसे ही उस के घर वाले. पापा तो चुप रहे, लेकिन मम्मी ने अनुपम और उस के परिवार वालों को काफी खरीखोटी सुना डाली.

मामला शांत होने पर मोनिका के मम्मीपापा तो चले गए, लेकिन अनुपम के अंदर अपमान की ग्रंथि भर गए. इस घटना से अनुपम और मोनिका के बीच संबंधों में आई तनातनी एवं टूटन और बढ़ गई. इस से मुक्ति पाने और मोनिका के लगातार जिद पकड़े रहने पर अनुपम ने अलग रहने पर सहमति दे दी, हालांकि वह स्वयं और उस का परिवार इस के पक्ष में कतई नहीं था. कालेज के परिसर में कोई क्वार्टर खाली नहीं था, इसलिए पास में ही एक मकान किराए पर ले कर दोनों उस में शिफ्ट हो गए.

मोनिका अपनी इस जीत पर अंदर ही अंदर जश्न मना रही थी. उस ने सोचा, अब अपने लटकों झटकों से अनुपम की सारी नाराजगी दूर कर देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि अनुपम के अंदर मोनिका के सामने विवश हो कर झुकने और स्वयं एवं परिवार को अपमानित किए जाने का कांटा लगातार चुभ रहा था. इस के प्रतिकार में उस ने मोनिका के परिवार से संबंध औपचारिक स्तर तक सीमित कर लिए. जब कभी मोनिका के परिवार के लोग आते तो वह उन में कोई रुचि नहीं लेता. ऐसे अवसरों पर अकसर वह घर से बाहर चला जाता और बहुत देर बाद लौटता.

अनुपम के इस व्यवहार के कारण मोनिका के अंदर भी अपमान का जहर भरने लगा. इस की परिणति पहले हलकी बहस, फिर आरोपों के तीखे वाण और फिर कई दिनों के लिए संवादहीनता के रूप में होने लगी. उन के बीच ऐसा परिवेश निर्मित हो गया, जिस में 2 व्यक्ति साथ तो रह रहे थे, लेकिन दोनों अकेले. घरेलू जरूरतों के लिएज़्ज्यादातर अनुमान और आभास का सहारा, संवादहीनता से उपजी असहनीय त्रासदी.

दोनों के बीच चल रही तनातनी के बीच बच्चे की पैदाइश भी टाल दी गई. यह कैसी स्थिति आ गई थी घर में, इस की तो कल्पना तक नहीं की थी. धीरेधीरे दोनों के अंदर विवाह को ले कर पश्चात्ताप ने घर बनाना शुरू कर दिया. इस से मुक्ति पाने के लिए वे कल्पनाओं में वैकल्पिक दिवास्वप्न देखने लगे- काश, किसी और से विवाह करते तो यह त्रासदी नहीं सहनी पड़ती.

व्यक्ति के अंदर नैसर्गिक भावनाओं की पूर्ति का प्रवाह हमेशा बना रहता है. मोनिका और अनुपम भी इस से अलग नहीं थे. समय बीतने के साथ संवादहीनता की स्थिति ने अनुपम और मोनिका के अंदर अपनी भावनाओं को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ शेयर करने की भूख बढ़ा दी.

घर की नीरवता से दम घुटने लगा तो अनुपम अपनी साथी प्रोफैसर प्रेरणा की ओर आकर्षित होने लगा. कंचन काया और सौंदर्य से परिपूरित प्रेरणा ने कुछ माह पूर्व ही जौइन किया था. अनुपम उस की ओर खिंचा जा रहा था, लेकिन प्रेरणा को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं था. वह सामान्य संबंधों तक ही सीमित रही. इस से अनुपम के अंदर प्रेरणा से प्रेम पाने के लिए बेचैनी और बढ़ती गई. वह उस के प्रेमसागर में डूब जाने के लिए तरहतरह के प्रयास करने लगा, लेकिन प्रेरणा ने उसे उपेक्षित ही बनाए रखा.कारण, वह पहले से ही किसी के प्रेमपाश में बंधी हुई थी. उसे छोड़ कर एक विवाहित आदमी से क्यों जुड़ती?

अनुपम इस से अनभिज्ञ था. ऐसे में वह दोहरी वेदना से भरे द्वंद्व में फंसा. पत्नी दूर हो चुकी थी और प्रेमिका पास नहीं आ रही थी. तो क्या सारा जीवन ऐसे ही रिक्तता में बीत जाएगा, यह प्रश्न रहरह कर उस के मन में उभरने लगा.

यह स्थिति अकेले अनुपम के साथ ही हो, ऐसा नहीं था. मोनिका को भी प्रेम के अभाव ने विचलित करना शुरू कर दिया.बस यंत्रचालित जीवन रह गया था. सुबह उठना, ब्रेकफास्ट तैयार करना, दोपहर का खाना बना कर रख देना, अपनीअपनी सुविधा के अनुसार ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर अलगअलग करना, डिनर के बाद बैड पर अपनेअपने हिस्से में दुबक जाना. रोजाना का यही क्रम बन गया था, सबकुछ, भावविहीन क्रियाओं के साथ.

संवादहीनता से उपजी त्रासदी के बीच मोनिका का मन प्रेमभाव की संतुष्टि के लिए रातदिन छटपटा रहा था, उद्वेलित हो रहा था. कितना भी कृत्रिम बनो, मगर नैसर्गिक जरूरतों को मारना बहुत दुष्कर होता है. मोनिका के अंदर भी रहरह कर एक चाह उमड़ रही थी कि कोई ऐसा अपना हो जिस के कंधे पर सिर रख कर प्रेमसुख पा सके, अपनी भावनाओं को शेयर कर के जीवन में आई रिक्तता को भर सके. इस से वशीभूत उस का मन एक हमसफर को तलाशने लगा और सामने आ गया उस का अपना पीएचडी स्टूडैंट, उस से 2 वर्ष छोटा गौरव, जिस की ओर बढ़ते कदमों को वह रोक नहीं पा रही थी.

शनिवार को अवकाश था. घर के घुटनभरे परिवेश से मुक्त होने के लिए मोनिका नैनी ?ाल के किनारे ठंडी सड़क पर आ गई थी, गौरव से मिलने, पीएचडी पर डिस्कशन के बहाने. ?ाल के पास से गुजरती ठंडी सड़क किसी अकेले व्यक्ति, युवा प्रेमी जोड़ों एवं नवविवाहित पतिपत्नी के घूमने के लिए एकदम माफूल है. दुख के क्षणों में भी इस की धुंध में लिपटी नीरवता बहुत सुकून देती है. मोनिका के लिए भी यह सड़क कुछ ज्यादा ही जानीपहचानी हो गई थी. सड़क के किनारे गुलमोहर के पेड़ों के नीचे बेंत की लकड़ी से बनी बैंच पर बैठ कर उस ने दूर तक नजर डाली तो अनुपम के साथ बिताए कई पलों की यादें ताजा हो गईं…

अनुपम से मोनिका की पहली मुलाकात इसी ठंडी सड़क पर हुई थी. वह अनुपम, जो आज उस का पति है, पहले कभी उस का प्रेमी हुआ करता था.

बड़ा खूबसूरत शहर है नैनीताल. चारों तरफ पहाडि़यां और बीच में नैनीताल जिस

ने शहर को 2 भागों में बांट रखा है. इधर तल्लीताल और उधर मल्लीताल. मोनिका और अनुपम दोनों के घर तल्लीताल में थे और डिगरी कालेज, जहां वे पढ़ते थे, मल्लीताल में था. अनुपम के पिता सीनियर वकील थे और मोनिका के पिता उन के जूनियर. अनुपम और मोनिका के बीच प्रेम पनपने में दोनों के पिताओं के प्रोफैशनल कैरियर से ज्यादा ठंडी सड़क की खास भूमिका थी.

इसी सड़क पर आतेजाते ही तो उन के बीच नजदीकियां बढ़ी थीं. फिर एक दिन इसी जगह घने कुहरे के बीच दोनों ने एकदूसरे को प्रेमपाश में बंधनेबांधने की स्वीकृति दी थी. दोनों निकले तो थे कालेज जाने के लिए, लेकिन चल पड़े प्रेम की राह पर. उस दिन कुहरे के बीच बैंच पर बैठे दोनों घंटों ओवरकोट और शाल में छिपे आपस में लिपटे रहे थे.

‘‘कहीं अलग न हो जाएं, पोस्ट ग्रैजुएशन का आखिरी साल है हमारा,’’ भीगी पलकों के साथ मोनिका अनुपम के सीने में सिमट गई.

‘‘आखिरी साल है तो क्या हुआ, हमें तो आखिरी सांस तक साथ रहना है,’’ अनुपम ने भी मोनिका को जोर से आलिंगन में भींच लिया, ‘‘तुम परेशान मत हो… देखो, ऐसा करते हैं, फिलहाल हम दोनों पीएचडी में एडमिशन ले लेते हैं. 3 साल तक तो मिलना पक्का, अब तो खु़श.’’

‘‘मु?ा से कभी अलग मत होना अनु. अपने जीवन में किसी और को जगह मत देना प्लीज,’’ मोनिका की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

‘‘मेरे लिए तो सबकुछ तुम्हीं हो मोना,’’ कहते हुए अनुपम ने उस के माथे पर चुंबन जड़ दिया.

अनुपम के पीएचडी के सु?ाव ने मोनिका को जैसे नया जीवन दे दिया हो. बहुत देर तक दोनों एकदूसरे के प्रेमपाश में बंधे आनंद के सागर में डूबे रहे.

समय के साथसाथ उन के बीच प्रेम बढ़ता ही गया. इस की भनक जब दोनों के परिवारों को लगी तो परिपक्वता और बाधारहित संबंधों को परिणयसूत्र में बांधने में उन्होंने भी खुले मन से सहमति दे दी. सुखद संयोग कुछ ऐसा बना कि पीएचडी की डिगरी पूरी होते ही उन के जीवन 2 उपहारों से खिल उठे. न केवल वे विवाह के अटूट बंधन मे बंध गए, बल्कि कुछ समय बाद दोनों को उसी कालेज में सहायक प्राध्यापक का जौब भी मिल गया.

मोनिका के ससुराल में सासससुर, छोटा देवर और छोटी ननद से मिल कर बना परिवार था. परेशानी बस यही थी कि घर बहुत छोटा था. मोनिका और अनुपम सुबह साथ ही कालेज निकल जाते और शाम को लौटते. उस के बाद थकीहारी मोनिका को घर के काम में जुटना पड़ता. घर वाले नौकरानी रखने को राजी नहीं हुए. तर्क दिया कि उन के परिवार में ऐसा कभी हुआ ही नहीं और फिर 2 बच्चों का विवाह भी तो करना है.

मोनिका ने सोचा था, नए घर में अनुपम के प्रेमांकुर को हरेभरे पौधे का रूप दे देगी, लेकिन उस के सपने बिखरते चले गए, जिन्हें समेटने के लिए अब उस की कल्पना में था गौरव… आखिर कोई तो हो, जो सूखते जीवन को प्रेमरस से तृप्त कर सके. इस के लिए उस ने गौरव का साथ पाना चाहा, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद गौरव अभी तक उस का अपना नहीं हो सका था. इस का कारण था गौरव स्वयं अपनी एक क्लासमेट के प्रेमसागर में डूबा हुआ था.

मोनिका को इस का पता नहीं था, सो गौरव की ओर से मिल रही उपेक्षा के उपरांत भी वह उस के साथ एकतरफा प्रेम के मोहपाश से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रही थी. भले ही ठंडी सड़क का रोमांसभरा परिवेश प्रेमियों और नवविवाहितों के प्रेमालाप का बरसों से गवाह रहा हो, उस की ही तरह, लेकिन अब वह अकेली थी न तो पति साथ में था और न ही प्रेमी.

गौरव का इंतजार करते करते बहुत देर हो गई, लेकिन उस का कहीं अतापता नहीं था. पति और कल्पना में समाए हुए प्रेमी के बीच द्वंद्वात्मक स्थिति से हताश वह देर तक भीगी पलकों के साथ झूल को निहारती रही, फिर चल पड़ी घर की ओर. वह घर जो अब घर नहीं, बल्कि मकान का ढांचा भर रह गया था.

भावशून्यता एवं संवादहीनता के कारण अनुपम और मोनिका के लिए अवकाश के दिन भी बोझ बन गए थे. ऐसे ही अवकाश के एक दिन ब्रेकफास्ट के बाद मोनिका और अनुपम अपनेअपने मोबाइल पर चिपटे हुए थे, तभी उन के घनिष्ठ तुषार और नेहा उन से मिलने आ पहुंचे. दोनों नगर निगम में सेवारत थे. तुषार जूनियर इंजीनियर और नेहा वहीं हैड क्लर्क के पद पर. उन्होंने प्रेम विवाह किया था और बहुत खुश थे. चारों लौन में आ गए. बातों ही बातों में दोनों के टूटते संबंध के बारे में जान कर तुषार और नेहा दुखी हो उठे.

घर पहुंच कर दोनों ने आपसी मंत्रणा कर अनुपम और मोनिका के संबंधों को बचाने

की रूपरेखा तैयार की. इस के लिए अनुपम और मोनिका से अलगअलग बात करना जरूरी था.उसी शाम उन्होंने अनुपम को चाय पर बुलाया. चाय पीने के बीच बात शुरू की तुषार ने, ‘‘अनुपम, क्या बात है यों घुटघुट कर क्यों जी रहे हो? जीवन को क्यों नर्क बना रखा है? हम से कुछ छिपा नहीं है.’’

‘‘मोनिका ने मेरा जीवन बरबाद कर दिया है, अब साथ रहना मुश्किल है,’’ अनुपम ने अपने मन की बात कह दी. फिर और कुरेदने पर पूरी भड़ास निकाल दी.

‘‘अरे, हो जाती हैं ऐसी बातें. अभी कुछ नहीं बिगड़ा है. साथ रह रहे हो न,’’ नेहा ने समझाया.

‘‘कैसा साथ, नर्क बना रखा है घर को…’’

‘‘प्यार में बड़ी शक्ति होती है, तुम्हारे प्रेमपाश में बंध गई तो कहीं जाना नहीं चाहेगी. तुम परेशान मत हो, हम मोनिका को भी समझएंगे.’’

‘‘नहीं, अब और नहीं सहा जाता. दूसरा साथी तलाशना ही होगा,’’ अनुपम ने दो टूक कह दिया.

‘‘यह आसान नहीं है और उचित भी नहीं है. तुम्हारी पत्नी है न घर में,’’ तुषार ने समझाया.

‘‘वह जब मुझ से बात ही नहीं करती तो कैसी पत्नी? आखिर मैं इंसान हूं, मुझे भी तो प्रेमसुख चाहिए. कहां जाऊं?’’

‘‘इस के लिए घर में मोनिका है तो? जरा सोचो, बाहर वाली को प्रभावित कर के अपना बनाने में जितना प्रयास करोगे, धन और समय खर्च करोगे, उस से कम में तो मोनिका स्वयं ही तुम्हारी गोद में लुढ़क आएगी और फिर उसे भी तो तुम्हारी जरूरत होगी,’’ नेहा ने अनुपम को छेड़ते हुए कहा.

‘‘अरे, प्रेमिका तो घर में ही है. बाहर तो बेकार ही हाथपैर मार रहे हो. उस का क्या भरोसा? मरीचिका निकली तो? समाज और कानून की भी तो मर्यादाएं हैं. यार, घर में मोनिका नाम की जो लड़की है, उसी को प्रेमिका समझ कर क्यों नहीं फुसलाते? आखिर शादी से पहले भी तो उस के आगेपीछे डोलते रहते थे,’’ कहते हुए तुषार ने आंख मारी तो न चाहते हुए भी अनुपम के चेहरे पर हंसी आ ही गई, ‘‘और फिर घर वाली से प्रेमप्रदर्शन में न तो कोई रिस्क और न ही समाज और कानून का डर.’’

इस पर सभी जोर से हंस पड़े. तुषार ने आगे कहा, ‘‘अनुपम, इस तरह के उतारचढ़ाव

तो हर परिवार में आते ही रहते हैं. इस का अर्थ यह तो नहीं कि स्थिति को संभालने के बजाय दूसरा विकल्प तलाशा जाए.’’

‘‘अच्छा सुनो,’’ नेहा ने तुषार के साथ चुहलबाजी की, ‘‘अगर मैं ने मुंह फेर लिया तो क्या करोगे?’’

‘‘अरी मुहतरमा, आप की मिन्नतें करेंगे, मनाएंगे, फुसलाएंगे, बहकाएंगे, कुछ भी करेंगे, लेकिन तुम्हें अलग नहीं होने देंगे. तुम्हारे बिना हमारा जीवन ही कहां,’’ तुषार ने नेहा की बांह में चिकोटी काट ली.

‘‘ऐसे में किस की मजाल कि तुम्हारे प्रेमजाल से छूट सके,’’ नेहा ने मुसकराते हुए कहा.

तुषार और नेहा के घर से लौटते हुए अनुपम काफी हलका महसूस कर रहा था. उसे लगा जैसे एक बड़ा बोझ उतर गया हो.

दूसरे दिन तुषार और नेहा ने मोनिका को भी शाम की चाय पर अकेले बुलाया, लेकिन उसे अनुपम के साथ हुई बातचीत के बारे में नहीं बताया.

‘‘देखो मोनिका, तुम अंदर ही अंदर घुटघुट कर क्यों जी रही हो? बात क्या है?’’ चाय पीने और औपचारिक बातों के बाद नेहा ने पूछा.

‘‘अनुपम एकदम बदल गए हैं. पहले जैसे नहीं रहे,’’ मोनिका के स्वर में वेदना थी. उस ने भी जो भी मन में था, सब खोल कर रख दिया. उद्वेलित मन थोड़ी सी भी सहानुभूति पर फूट पड़ता है.

‘‘ऐसा नहीं है, तुम्हारी सोच बदल गई है. एक ग्रंथि पाल ली है तुम ने. क्या वह तुम्हें प्रताडि़त करता है, हिंसा करता है तुम्हारे साथ? घरगृहस्थी की खयाल नहीं रखता?’’ तुषार ने एकसाथ मोनिका के सामने कई सवाल रख दिए.

‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. वे तो हर बात का खयाल रखते हैं. जोर से बोलते तक नहीं. लेकिन बस मेरे लिए उन का प्रेम समाप्त हो गया है. मेरे भी कुछ अरमान हैं… कभीकभी लगता है कि कोई तो हो, जिस के साथ अपना मन हलका कर सकूं,’’ कहते हुए मोनिका फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘देखो मोनिका, तुम दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ है. ईगो से जन्मा एक खालीपन है जो तुम दोनों को खाए जा रहा है. दूसरे साथी के लिए आकर्षण भी इसी खालीपन को भरने के लिए ही है. बस गलती यही है कि हम घर में प्रेम होते हुए भी उसे बाहर तलाशते हैं, यह जानते हुए भी कि उसे पाना बहुत मुश्किल होता है. उस के लिए घर में मिलने वाले प्रेम और खुशियों का गला मत घोटो, प्लीज.’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद नेहा ने समझाया, ‘‘यार, पतिपत्नी के बीच किस बात का ईगो. इस ईगो और चुप्पी ने ही कई हंसतेखेलते परिवारों की खुशियां छीन ली हैं. अनुपम अब भी तुम्हें ही चाहता है. मैं पक्के तौर पर कहती हूं वह भी तुम से मिलने को बेचैन होगा. तुम थोड़ी पहल तो करो,’’ नेहा ने भी समझाया.

‘‘मुझ से नहीं हो सकता अब,’’ मोनिका ने बुझे स्वर में कहा.

‘‘अरे यार समझ तो नारी के पास तो पुरुष को अपना बनाने के हजार गुण होते हैं. पराए पुरुष को अवैधरूप में रिझाने में लगी हो और घर का अपना पुरुष तुम्हारे कब्जे में नहीं आ रहा है, कमाल है, जरा प्रेम की बारिश तो करो, फिर देखना, अनुपम कैसे खुदबखुद तुम्हारे पास खिंचा चला आता है और वह भी खुशामद करता हुआ,’’ नेहा ने उस की कमर में चिकोटी काटी तो वह खिलखिला पड़ी और फिर काफी सहज हो गई.

‘‘मैं तो खुद बेबस हूं इन के सामने. थोड़ा सा भी दूर भागता हूं तो तुरंत इन की कातिल अदाएं अपने मोहपाश में बांध लेती हैं, क्यों देवीजी, ठीक कह रहा हूं न?’’ तुषार ने नेहा की आंखों में झांकते हुए कहा तो सभी खिलखिला पड़े.

तुषार और नेहा के चलाए तीर निशाने पर लगे. मोनिका घर पहुंची तो हिरणी जैसी प्रसन्नता के भाव से भरी हुई थी. कमरे में झंका तो बैड पर अनुपम करवट लिए लेटा था. तो क्या बिना खाए ही सो गया? करुणा से उस की आंखें द्रवित हो गईं. बहुत देर तक छिपती नजरों से उसे निहारती रही. वह उसे मासूम बच्चा सा लगा. भावविह्वलता के साथ वात्सल्य भी उमड़ पड़ा. कई दिनों बाद उस अनुपम को देख रही थी, जिसे पहले प्रेमी के रूप में हर पल अपनी आंखों में और अपने मन में समाए रखा था.

उस की नजरों के सामने प्यार होते समय की सारी यादें घूम गईं. क्या यह वही अनुपम है, जिस के बिना एक भी पल नहीं रह पाती थी, तो अब क्या हो गया? कुछ देर तक उस का चेहरा निहारा तो सारे गिलेशिकवे जाते रहे, सारी दूरियां तिरोहित होती गईं. ‘क्यों न मैं इस लड़के को ही अपना बनाऊं जो मेरे घर में ही है,’ अचानक उमड़े प्रेम से साहस पा कर पास चली गई. अनुपम सो रहा था. वह उस के पास लेट गई और बहुत देर तक उस के चेहरे को निहारती रही. आखिर छोटीछोटी बातों से उपजा ऐसा अहं किस काम का जो जीवन की खुशियां ही छीन ले. लगा जैसे समर्पण में ही जीत है, हार नहीं. पतिपत्नी में कैसा अहं. भावावेश में वह अनुपम के शरीर से बुरी तरह लिपट गई.

‘‘तुम? क्या हुआ?’’ जागने के बाद अनुपम ने पूछा तो मोनिका ने इठलाती भावभंगिमा और कंटीली मुसकान के साथ आंख मार दी. अनुपम के अंदर प्रेमपूरित रोमांस की लहर सी दौड़ गई. उस ने मोनिका को अपने बाहुपाश में जकड़ कर कस कर भींच लिया, ‘‘कहां थीं इतने दिनों से?’’

मोनिका उस की बांहों की जकड़ने में कसमसाती रही, एक अलौकिक

सुख के साथ. बहुत देर तक दोनों यों ही एकदूसरे की बांहों में समाए रहे.

फिर अनुपम ने कहा, ‘‘मेरी ही गलती थी मोना. तुम्हें छोड़ कर बाहर खुशियां तलाश रहा था, जबकि मेरी सब से बड़ी खुशी मेरे घर में ही थी. मुझे माफ…’’

मोनिका ने तुरंत अनुपमा के होंठों पर अपनी उंगलियां रख दीं, बोली, ‘‘जानेमन, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. अपनी जिद को पूरा कराने के लिए तुम्हें दुख पहुंचाती रही, फिर भी तुम ने कुछ नहीं कहा. अनु, मैं कुछ भी कहूं तो मुझे समझने का पूरा अधिकार है तुम्हें. तुम्हारी हर बात मानूंगी. अब इस घर को छोड़ कर सब के साथ उसी घर में रहेंगे.’’

‘‘भूल जाओ पुरानी बातों को. हम घर आतेजाते रहेंगे. मुझे विश्वास है कि परिवार के लोग हमारे अलग रहने की स्थिति को समझ सकेंगे,’’ थोड़ा रुक कर वह फिर बोला, ‘‘मोना, मैं तुम्हें एक सजा देना चाहता हूं.’’

‘‘क्या?’’ मोनिका चौंकी.

‘‘एक पल के लिए भी बातचीत बंद मत करना.’’

जवाब में मोनिका ने अनुपम के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उस के शरीर से कस कर चिपक गई. दिलों की तेज होती धड़कनों के साथ दोनों प्रेमरस में डूब गए. उन्हें लगा कि पतिपत्नी के बीच का प्रेम ही यथार्थ है, परिपूर्ण है. उसे दूसरों में तलाषने की जरूरत नहीं. दूसरों से प्रेम की चाह रखना एक मरीचिका के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं. प्रेम के विकल्प के दिवास्वप्न से अब उन का मोहभंग हो चुका था

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