अचानक अमन को कुछ याद आया, ‘‘उठ ही गया हूं तो चल के उस फूल वाले को पकड़ते हैं पहले. भेजने वाले का हुलिया पता करते हैं, वह कब आता है उस के पास... पुलिस की धमकी दे कर उगलवाते हैं. वैसे भी कोई बदमाश हो सकता है. फिर कोई कांड ही न हो जाए लड़की के साथ और हम सोचते रहें कि पहले क्यों नहीं ध्यान दिया. चलचल...’’

‘‘यार अभी भी खोजबीन में लगा रहता है. तुझे तो सीबीआई, विजिलैस में होना चाहिए था या समाज सुधारक एनजीओ का बाबाजी. फूल देतेदेते तुझे कहीं प्यारव्यार तो नहीं हो गया उस से जो इतना कंसर्न दिखा रहा है अब समझ, सही में तू...’’ संचित हंसा.

‘‘बकवास मत कर... चल उठ.’’

‘‘देख बता दे कुछ गलत नहीं होता यह जैसा तेरे दिमाग में भरा हुआ है... प्रेम, प्यार, आकर्षण यह तो नैचुरल इंस्टिंग्ट है, मानव की प्रकृति है. अगर किसी के साथ अच्छा महसूस होता है, कोई अच्छा लगता है तो यह नौर्मल बात है. मर्द या औरत की इस में कोई तौहीन नहीं, यह लज्जा का विषय नहीं न ही जबरदस्ती का. यार समझ समझकर थक गया तुझे...’’

‘‘बाबाजी मत बन... बस चल उठ.’’

‘‘मूवी के लिए लेट हो जाएंगे...’’

‘‘अगला शो देखते हैं न... पहले चल...’’

‘‘तुझे परेशानी क्या है अंकलआंटी को पसंद है और जहां तक मैं समझ रहा हूं तुझे भी...’’

दोनों बाइक से निकल पड़े एक फूल वाले से दूसरे फूलवाले...

‘‘यार पास के फूल वाले तो यही 2-3 हैं... यहां तो कोई दूसरा ही बैठा है.’’

‘‘अरे घर चल तैयार हो मूवी के लिए निकलते हैं... तू बेकार के चक्करों में पड़ा हुआ है.

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