Hindi Fiction Stories : हर पटाखे की आवाज मेनका के सीने पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी. उन चोटों से होने वाले दर्द से वह किसी विरहिणी की तरह तड़प रही थी. जब उस से रहा नहीं गया तो वह उन आवाजों से बचने के लिए भीतर के कमरे की ओर बढ़ गई.

‘‘मां,’’ अभी मेनका 2 कदम भी नहीं चल पाई थी कि उस की 8 वर्षीय बेटी डिक्की ने पुकारा.

‘‘क्या है?’’ मेनका को न चाहते हुए भी रुकना पड़ा.

‘‘आज आप पटाखे नहीं चलाएंगी?’’ डिक्की उस के पास आ कर उस की टांगों से लिपटती हुई बोली. मेनका के मन में उठ रहे तूफान से वह पूरी तरह अनजान थी.

मेनका ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘नहीं, बेटी.’’

‘‘क्यों?’’ डिक्की उसी तरह उस से लिपटी रही.

‘‘मेरा दिल नहीं करता, बेटी. बेटे सुप्रीम कोर्ट ने भी मना किया कि पौल्यूशन की वजह से पटाखे नहीं चलाओ. इस से धुआं फैलता है,’’ कहते हुए मेनका का स्वर भर्रा गया और आंखें भीग गईं क्योंकि यह बात उस के मन से नहीं निकली थी, डिक्की को चुप करने का बहाना ही था.

डिक्की ने अभी मां की आंखों की ओर नहीं देखा था. मां से अपनी बात मनवाने के लिए उन्हें पिछली दीवाली की याद दिलाते हुए कहा, ‘‘पर पिछली दीवाली पर तो आप न खूब पटाखे चलाए थे. इस बार आप का दिल क्यों नहीं कर रहा है?’’

डिक्की की भोली सी बात सुन कर मेनका को लगा कि उस के भीतर कुछ चटक गया है. एकसाथ न जाने कितनी यादों ने उसे चारों ओर से घेर लिया.

‘‘चलो न मां,’’ उसे खामोश पा कर डिक्की ने फिर अपना आग्रह दोहराया.

डिक्की के नन्हे से हाथ का स्पर्श पाते ही मेनका अतीत में से निकल कर वर्तमान में आ गई, ‘‘जिद नहीं करते, बेटी,’’ किसी तरह उस से पीछा छुड़ाने की चाह में मेनका ने उसे बहलाना चाहा, ‘‘आज मेरी तबीयत सचमुच ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं सम?ा गई,’’ मेनका के मनोभावों को देख कर डिक्की ने भोलेपन के साथ कहा, ‘‘आज आप पटाखे क्यों नहीं चला रहीं?’’

डिक्की की बात के उत्तर में मेनका कुछ भी न कह पाई. पत्थर की मूर्ति बनी डिक्की की ओर देखती रह गई मानो पूछ रही हो, ‘क्या… क्या सम?ा गई तुम?’

मासूम डिक्की मां की आंखों में उठे प्रश्न को तो न पढ़ पाई लेकिन मेनका को खामोश पा कर उस ने अपने दिल की बात कह ही दी, ‘‘आज पापा हमारे घर होते तो आप भी पिताजी के साथ पिछली दीवाली की तरह बहुत सारे पटाखे चलातीं. चाहे जितना भी बैन लगा हो.’’

डिक्की की बात ने मां के अस्तित्व का झकझोर कर रख दिया. कितने ही प्रश्नों ने एकसाथ उस के  मन में जन्म ले लिया. उसे अपने चारों ओर प्रश्न ही प्रश्न दिखाई देने लगे थे. डिक्की के सामने वह खुद को बौनी सी महसूस करती हुई सोचने लगी कि अगर डिक्की उसी प्रकार उस से प्रश्न करती रही तो वह पागल हो जाएगी. डिक्की की बातों में छिपी सचाई को सहन करने में वह खुद को बुरी तरह असमर्थ पा रही थी.

‘‘डिक्की…’’ तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ उस के पास आ कर बोला, ‘‘जल्दी चलो वरना सैम सारे पटाखे चला देगा.’’

डिक्की असमंजस में पड़ गई. मां को छोड़ कर जाने का उस का मन नहीं था पर पटाखों के समाप्त हो जाने की बात उस के नन्हे से मन को बुरी तरह मथ गई. थोड़ी देर के लिए वह यही सोचती रही कि उसे क्या करना चाहिए.

‘‘जाओ, बेटी,’’ डिक्की से मुक्ति पाने का सुनहरा अवसर पा कर मेनका ने कहा, ‘‘वरना तुम्हारे सारे पटाखे खत्म हो जाएंगे. फिर तुम क्या चलाओगी? बाजार में वैसे भी अब नहीं मिलते. न जाने ये बच्चे कहां से ले कर आए थे.’’

‘‘चलो,’’ डिक्की मेनका की बात सुनते ही उस बच्चे का हाथ थाम कर बाहर की ओर भाग गई.

उन के जाते ही मेनका ने चैन की सांस ली. इस भय से कि कहीं डिक्की फिर न आ जाए, वह तेज कदमों से चलती हुई कमरे में जा कर लेट गई.

जिन यादों से बचने के लिए मेनका वहां आई थी, उन्हीं यादों ने उसे यहां भी आ घेरा. प्रत्येक घटना उस की आंखों के सामने सिनेमा की फिल्म की तरह घूमने लगी…

‘‘माधवी का फोन आया था,’’ उस दिन जैसे ही रमन ने कमरे में प्रवेश किया, मेनका ने और दिनों की तरह मुसकराते हुए उस का स्वागत करने के स्थान पर यह संदेश दिया.

माधवी का नाम सुनते ही रमन रोमांचित सा हो गया और भूल गया कि उस समय वह अपनी पत्नी से बात कर रहा था, ‘‘वह… वह कहां से आ टपकी?’’ अपनी ही रौ में उस ने पहले प्रश्न का उत्तर मिले बिना एक और प्रश्न कर डाला, ‘‘क्या कह रही थी.’’

मेनका बड़े ध्यान से उस के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को देखती रही. उन्हीं भावों को देखते हुए उस ने महसूस किया कि माधवी कभी जरूर रमन के मन की कमजोरी रह चुकी होगी. उस का नारी मन ईर्ष्या से भर उठा. रमन की बात का उत्तर दे कर उस ने पूछा, ‘‘यह माधवी कौन है?’’

मेनका का कमजोर लेकिन चुभता हुआ स्वर सुन कर रमन को अपनी भूल का एहसास हो गया. दिल में आया कि वह बात बदल दे लेकिन मेनका के चेहरे पर छाए भावों को देख कर उसे लगा कि उस का झूठ सच नहीं बन सकता. बात को गोल करते हुए उस ने बताया, ‘‘हम दोनों कालेज में एकसाथ पढ़ा करते थे.’’

मेनका के होंठों पर एक विषभरी मुसकान तैर गई, ‘‘सिर्फ साथ पढ़ा करते थे या कुछ और भी था आप दोनों के बीच?’’

रमन चारों ओर से घिर गया था. सच बोलने का उस में साहस नहीं रह गया था और ?ाठ को वह सच बना नहीं पा रहा था. स्वयं को आने वाले तूफान का सामना करने के लिए तैयार करते हुए उस ने पूछा, ‘‘सच जानना चाहती हो?’’

‘‘सच क्या है, यह तो मैं वैसे भी जान चुकी हूं.’’

‘‘क्या जान लिया है तुम ने?’’

‘‘अगर मेरा विचार गलत नहीं है तो आप उसे प्यार करते रहे हैं. उस के साथ कई रातें रह चुके हैं.’’

‘‘हां,’’ न चाहते हुए भी रमन को स्वीकार करना पड़ा, ‘‘लेकिन यह तब की बात है, जब हम कालेज में पढ़ा करते थे.’’

तभी दरवाजे की घंटी की आवाज सुन कर मेनका ने मोबाइल पर समय देखा. समय देखते ही उस के मुंह से निकल गया, ‘‘शायद वे लोग आ गए.’’

‘‘कौ… कौन लोग?’’ अनचाहे ही रमन

पूछ बैठा.

‘‘आप की माधवी,’’ मेनका के स्वर में कटाक्ष था, ‘‘6 बजे आने को कहा था उस ने,’’ दरवाजे की ओर बढ़ते हुए मेनका ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘6 बजने ही वाले हैं. वही होगी अपने हब्बी के साथ.’’

‘‘सुनो,’’ मेनका के पीछे चलते हुए रमन ने उसे पुकारा.

मेनका रुक गई और पलट कर खामोश सी वह रमन की ओर देखने लगी.

रमन मन ही मन डर रहा था कि कहीं मेनका माधवी को बुराभला न कह दे. यही कहने के लिए रमन ने उसे रोका था लेकिन कहने का साहस नहीं कर पाया. मेनका को अपनी ओर प्रश्नसूचक निगाहों से देखता पा कर उस ने सिर ?ाका लिया.

‘‘सम?ा रही हूं कि इस समय आप के दिल में क्या है और आप क्या कहना चाह रहे हैं,’’ मेनका उसी की ओर देखती हुई बोली, ‘‘घर आए गैस्ट की किस तरह रिस्पैक्ट की जाती है, मैं अच्छी तरह जानती हूं. आप चिल रहिए. जो आप के दिल में है वैसा कुछ नहीं होगा,’’ और रमन को वहीं खड़ा छोड़ कर वह आगे बढ़ गई.

रमन के मन पर से जैसे मनों बो?ा उतर गया. स्वयं को नौर्मल बनाने की कोशिश करता हुआ मेनका के पीछेपीछे डोर की ओर बढ़ गया.

मेनका का विचार ठीक ही निकला. माधवी और उस का पति दोनों डोर पर खड़े थे. स्माइल फेंकते हुए उन को वैलकम करती मेनका उन्हें भीतर ले आई.

अपने पति का परिचय रमन से करवाते हुए माधवी ने कहा, ‘‘यह ता तुम जान ही गए होंगे कि ये मेरे पति हैं.’’

उस का इशारा अपने पति की ओर था, ‘‘इन का नाम राहुल है.’’

रमन ने मुसकराते हुए राहुल से हाथ मिलाते हुए कुछ औपचारिक शब्द कहने के बाद पूछा, ‘‘क्या मु?ो भी इन का परिचय देना होगा?’’ उस का संकेत मेनका की ओर था.

‘‘नहीं,’’ उत्तर माधवी ने ही दिया, ‘‘हम फोन पर एकदूसरे का परिचय पा चुकी हैं.’’

अब तक वे ड्राइंगरूम में पहुंच चुके थे. उन्हें बैठाने के बाद राहुल की बगल में बैठते हुए रमन ने बातों का सिलसिला चालू रखने के लिए पूछा, ‘‘आप को हमारा फोन नंबर कहां से मिल गया?’’

‘‘इसे तुम संयोग ही कह सकते हो,’’ माधवी ने कहा, ‘‘हमारे पड़ोस वाले फ्लैट में हमारा क्लासफैलो दीपक रहता है. उसी ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया. वरना मुझे तो यह भी मालूम नहीं था कि तुम आजकल सुंदर नगर में ही हो…’’

‘‘रमन, तुम्हारे साथ अपने रिलेशन के बारे में इस ने मुझे बहुत पहले बता दिया था,’’ माधवी की बात काट कर राहुल ने कहना शुरू किया, ‘‘उसी दिन आप को देखने, आप से मिलने की जिज्ञासा मन में पैदा हो गई और जब कल इस ने बताया कि आप यहां सुंदर नगर में ही हैं तो मैं आप से मिलने के लोभ को न छोड़ सका. आप का पता मिलते ही चले आए हम.’’

तभी मेड चाय ले आई. चाय की चुसकियां लेते समय भी उन की बातें जारी रहीं.  उस दिन मेनका ने उन्हें खाना खाने के बाद ही भेजा.

इस के बाद उन की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता ही गया. माधवी का अब जब भी दिल करता वह उन से मिलने आ जाती. कभी अकेले ही और कभी राहुल के साथ. रमन भी उन से कई बार मिलने जा चुका था. 2-1 बार मेनका भी उस के साथ गई थी.

कुछ दिन बाद रमन एकाएक देर से घर आने लगा. मेनका तो पहले ही से ईर्ष्या की आग में जल रही थी. रमन के देर से आने में उस आग ने घी का काम किया. उसे इस बात का पूरा यकीन हो गया कि रमन केवल माधवी के कारण ही देर से आता है.

स्वयं को उपेक्षित सी पा कर एक दिन मेनका का स्वयं पर से संयम उठ गया. जैसे ही रमन ने कमरे में प्रवेश किया, मेनका ने कटु स्वर में पूछा, ‘‘लगता है कालेज के मस्ती भरे दिन फिर लौट आए हैं.’’

‘‘क्या?’’ रमन विस्मित सा उस की ओर देखते हुए बोला, ‘‘क्यों कह रही हो तुम?’’

‘‘वही जो सच है.’’

‘‘और सच क्या है?’’

‘‘क्या आप नहीं जानते?’’

‘‘अगर जानता होता तो तुम से पूछता क्यों?’’

‘‘इस तरह अनजान बन कर आप सचाई को ?ाठला नहीं सकते,’’ अपने मन की भड़ास निकालती हुई मेनका आवेश में बोली, ‘‘क्या यह सच नहीं है कि आजकल आप माधवी के साथ अपनी शामों को रंगीन बना रहे हैं?’’

मेनका के क्रोध का कारण सम?ा आते ही रमन हलके से मुसकरा दिया, ‘‘नहीं, तुम ने जो कुछ भी कहा है उस में लेशमात्र भी सचाई नहीं है?’’

‘‘फिर आप देर से क्यों आते हैं.’’

‘‘सच मानो माधबी से मिले मुझे 7 दिन हो गए हैं,’’ रमन ने अपनी सफाई दी, ‘‘रमेश छुट्टी गया हुआ है. आजकल उस काम भी मुझे ही निबटाना पड़ता है और…’’

‘‘काम का झूठा बहाना बना कर आप मुझे बहला नहीं सकते,’’ रमन की बात पूरी होने से पहले ही मेनका ने काट दी.

रमन का चेहरा एकदम गंभीर हो गया. सोफे पर पीठ टिका कर बिना कुछ कहे वह मेनका की ओर देखता रहा. देर तक उस प्रकार देखते रहने के बाद उस ने कहा, ‘‘मैना,’’ प्यार से रमन मेनका को इसी नाम से पुकारता था, ‘‘पतिपत्नी के संबंधों की जड़ विश्वास हुआ करती है. जब उस जड़ को शकरूपी घुन लग जाता है तो एक दिन संबंधों का पौधा स्वयं ही गिर जाता है. तुम्हारे मन में भी शक पैदा हो गया है और एक दिन तुम्हारे मन का यही बहम हमारे घर को तबाह कर देगा.’’

‘‘क्या आप चाहते हैं कि यह घर बरबाद न हो?’’

‘‘हां, लेकिन सिर्फ मेरे चाहने से कुछ नहीं होगा. इसे बचाने के लिए तुम्हें भी मेरे कंधे से कंधा मिला कर चलना होगा.’’

‘‘क्या करना होगा मुझे?’’

‘‘अपने मन में से वहम को निकालना होगा.’’

‘‘अगर आप सचमुच यह चाहते हैं तो आप माधवी से मिलना छोड़ दीजिए,’’ मेनका ने अपनी शर्त रख दी, ‘‘उसे साफसाफ कह दीजिए कि वह यहां न आया करे.’’

‘‘यह मुझ से नहीं होगा,’’ रमन ने उस की बात मानने से इनकार कर दिया.

‘‘इस का मतलब यह कि आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं?’’

‘‘अगर तुम्हारी बात में थोड़ा सा भी वजन होता तो मैं जरूर मानता. जो कुछ भी तुम ने कहा है वह सब तुम्हारे वहम की उपज है,’’ रमन का स्वर कठोर हो गया था.

कमरे में मरघट जैसी खामोशी छा गई थी. बहुत देर बाद मेनका ने ही उस खामोशी को तोड़ा एक विस्फोट के साथ, ‘‘अगर आप उस से मिलना नहीं छोड़ सकते तो आप को हम दोनों में से एक को चुनना होगा.’’

‘‘मेरा यकीन करो, मैना,’’ उसे अपनी बात का यकीन दिलाने के लिए रमन ने सामान्य स्तर में कहा, ‘‘जो तुम सोच रही हो हमारे बीच वैसा कुछ भी नहीं है. तुम बेकार में ही तिल का पहाड़ बना रही हो.’’

‘‘आप जो चाहे कह सकते हैं, लेकिन आप को फैसला करना ही होगा.’’

‘‘फैसला मु?ो नहीं, तुम्हें ही करना होगा,’’ रमन ने सारी बात उस पर छोड़ दी, ‘‘लेकिन कोई भी निर्णय लेने से पहले मेरी बातों को ठंडे दिमाग से सोच लेना. कहीं ऐसा न हो कि आवेश में लिया गया तुम्हारा निर्णय तुम्हें जिंदगीभर पश्चात्ताप की आग में जलाता रहे.’’

‘‘देखा जाएगा,’’ मेनका ने लापरवाही भरे स्वर में कहा और फिर रमन को वहीं छोड़ कर दूसरे कमरे में चली गईर्.

यह सोच कर कि गुस्सा उतर जाने पर मेनका स्वयं ही सामान्य हो जाएगी, रमन वहीं बैठा रहा.

‘‘मैं जा रही हूं,’’ थोड़ी देर बाद मेनका एक हाथ में अटैची और दूसरे में डिक्की की उंगली पकड़े रमन के सामने आ खड़ी हुई.

मेनका को इस तरह घर छोड़ने को तैयार देख कर रमन सकते में आ गया. बहुत कुछ कहना चाह कर भी वह कुछ नहीं कह पाया. बस फटीफटी आंखों से मेनका की ओर देखता रहा.

‘‘सुनो,’’ रमन एकाएक उठ खड़ा हुआ. मेनका को रोकने के लिए उस ने पुकारा, ‘‘सुनो, मैना.’’

मेनका रुक गईर्. पलट कर रमन की ओर देखते हुए उस ने पूछा, ‘‘अब क्या है?’’

उसे मनाने के लिए रमन उस के पास चला आया था, ‘‘परसों दीवाली है और…’’

‘‘मेरे होने या न होने से आप को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला,’’ मेनका ने चोट की, ‘‘आप की दीवाली को रोशन करने के लिए आप की माधवी आ जाएगी,’’ और फिर रमन को वहीं छोड़ कर वह तेज कदमों से आगे बढ़ गई.

रमन पत्थर का बुत बना खड़ा रहा. उस में इतना साहस भी नहीं रह गया था कि आगे बढ़ कर मेनका को रोक लेता.

‘‘अरे तुम…’’ मेनका को डिक्की के साथ आया हुआ देख कर उस की भाभी विभा ने आश्चर्यभरे स्वर में पूछा. उस के हाथ से अटैची लेते हुए विभा ने अपने पहले प्रश्न का उत्तर लिए बिना ही स्नेहभरे स्वर में कहा, ‘‘आने से पहले फोन ही कर दिया होता. हम तुम्हें लेने स्टेशन

आ जाते.’’

‘‘कार्यक्रम इतनी जल्दी में बना कि फोन करने का समय ही नहीं मिला,’’ मेनका ने सचाई छिपाते हुए कहा.

विभा ध्यान से उस की ओर देखती रही. उस की ओर देख कर विभा के दिल में एक संदेह पैदा हो गया. उसी को मिटाने के लिए उस ने पूछा, ‘‘रमन नहीं आया?’’

‘‘नहीं,’’ रमन का नाम सुनते ही मेनका की आंखों में पानी भर गया. विभा की गोद में सिर रखने के बाद उस ने उसे सारी बात बता दी.

‘‘पागल हो तुम तो,’’ उस की बातें सुनने के बाद विभा उस के सिर पर स्नेह से हाथ फेरती हुई बोली, ‘‘मु?ो दुख है कि 10 साल तक रमन के साथ रहने के बाद भी तुम उसे पहचान नहीं सकी हो. उस ने ठीक ही कहा है कि यह सब तुम्हारे दिमाग की उपज है और इस में सचाई नाम की कोई चीज नहीं है.’’

विभा की बातों ने मेनका को सोचने पर विवश कर दिया. हरेक घटना को याद करने के बाद वह इसी नतीजे पर पहुंची कि उसे रमन को छोड़ कर नहीं आना चाहिए था.

मन में इस विचार के आते ही उस के भीतर कुछ चटक गया. वह एकाएक उठ बैठी. विभा की ओर देखते हुए उस ने पूछा, ‘‘अब… अब मुझे क्या करना चाहिए.’’

‘‘अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है,’’ विभा ने सलाह दी, ‘‘रमन के पास वापस चली जाओ.’’

विभा की बातों पर मनन करने के बाद मेनका भी इसी निर्णय पर पहुंची कि उसे वापस चले जाना चाहिए, लेकिन इस तरह वापस जा कर वह अपनी हेठी नहीं करवाना चाहती थी और फिर वह डर रही थी कि  अगर रमन ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया तो क्या होगा. उस के मन का यही भय उसे अपने निर्णय पर अमल नहीं करने दे रहा था.

‘‘क्या सोचने लगी?’’ उसे खामोश पा कर विभा ने पूछा.

‘‘क्या इस तरह वापस जा कर मेरा अपमान नहीं होगा?’’ अपने मन की बात को मेनका होंठों पर ले ही आई.

‘‘तुम्हारे सोचने का ढंग बहुत ही गलत है मैना,’’ उस की बात पर हलके से मुसकराते

हुए विभा ने कहा, ‘‘पतिपत्नी का रिश्ता ही कुछ ऐसा है. इस में मानअपमान स्वयं ही खत्म हो जाता है. जो लोग रिश्ते में बंधने के बाद भी अपने अहं को नहीं छोड़ पाते उन का जीवन विषाक्त बन जाता है.’’

‘‘वह तो ठीक है, भाभी, लेकिन…’’

‘‘सम?ा रही हूं कि मेरी बात मान लेने के बाद भी तुम खुद वापस नहीं जाना चाह रही हो,’’ मेनका की बात पूरी होने से पहले ही विभा ने कहा, ‘‘अगर तुम्हें जाना होता तो तुम इस बहस में ही न पड़तीं. खैर, कोई बात नहीं मैं कल सुबह ही तेरे भैया को रमन को लाने भेज दूंगी.’’

‘‘और अगर उन्होंने आने से इनकार कर दिया तो,’’ मेनका के दिल में नया शक पैदा हो गया?

‘‘किसी चीज से डर कर उस से मुंह नहीं मोड़ लिया जाता,’’ विभा ने उसे सांत्वना दी, ‘‘और फिर जिंदगी निराशा का नहीं, आशा का नाम है.’’

उसी आशा की एक किरण के सहारे मेनका ने रात काट दी. सुबह होते ही उस का भाई राजीव रमन को लेने चला गया.

दिनभर मेनका आशानिराशा के ?ाले में ?ालती रही. जैसेतैसे शाम गहराने लगी. उस

की आशाकी किरण धुंधली पड़ने लगी. इंतजार करती हुई आंखें पथरा गईं. पटाखों की आवाज ने उसे परेशान कर दिया था. पटाखों की उसी आवाज से बचने के लिए वह भीतर वाले कमरे में जा लेटी थी.

तभी किसी के कदमों की आवाज को अपनी ओर आता हुआ सुन कर मेनका के दिल में आया कि शायद राजीव रमन को साथ ले आया. मस्तिष्क में इस विचार के आते ही उस के निढाल पड़ गए बदन में स्फूर्ति भर गई. एक पल भी गंवाए बिना उस ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी आंखों को पोंछ डाला. आंखों में आशा की झलक लिए वह दरवाजे की ओर देखने लगी.

मगर आशा के विपरीत दरवाजे पर राजीव की जगह विभा को देख कर उस का दिल धक से रह गया. आशा की वह धुंधली सी किरण भी बुझ गई. अनजाने में ही वह पूछ बैठी, ‘‘भैया नहीं आए?’’

‘‘मैं तो आ गया हूं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन…’’ मेनका का मन आशंका से भर उठा. राजीव की बात काट कर उस ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’ किसी प्रश्नचिह्न की तरह मेनका उस के सामने आ खड़ी हुई.’’

‘‘रमन नहीं आया,’’ कहते हुए राजीव ने सिर ?ाका लिया.

‘‘क्यों? मेनका की आंखों से पानी की बूंदें निकल कर उस के गालों से होती हुईं फर्श को भिगोने लगीं, ‘‘क्यों…क्यों नहीं आए वे? क्या कहा है उन्होंने?’’

मेनका का तड़प भरा स्वर सुन कर राजीव के पीछे छिपा हुआ रमन स्वयं पर नियंत्रण न रख सका. राजीव को एक ओर हटा कर वह मेनका के सामने जा खड़ा हुआ.

रमन को देखते ही मेनका के बुझे हुए चेहरे पर चमक आ गई. रमन की ओर तिरछी निगाहों से मुसकरा कर देखने के बाद उस ने विभा का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘दीवाली के दिन घर में यह मातम क्यों छाया हुआ है,’’ विभा को लगभग घसीटती हुई ही वह बाहर की ओर ले जाती हुई बोली, ‘‘आओ न, पटाखे चलाएं. सुप्रीम कोर्ट की चिंता यहां कौन करता है.’’

मेनका की बात पर केवल विभा ही नहीं, राजीव और रमन भी ठहाका मार कर हंस पड़े. विभा दीए और लाइटें जलाने चल पड़ी.

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