Hindi Short Story : पता नहीं क्यों सामने बैठी हंसमुख महिला पर ध्यान बारबार अटक रहा था. उस की हंसी या आवाज या फिर बात करने का अंदाज,ऐसा लगता था जैसे पहले से जानता हूं उसे. मगर खुद को सम झाते हुए बोला, अरे मुर्ख, सावन के अंधे को सब हराहरा ही लगता है. तू भी कहां भटक रहा है. मगर मन था कि मानता ही नहीं था और मानता भी कैसे?
वही तो मेरा पहला प्यार थी जिस के कारण छोटी से छोटी छुट्टियों में भी इंजीनियरिंग कालेज से भाग कर घर आ जाता और वापस जाने का नाम ही न लेता. घर वालों को जोरजबरदस्ती करनी पड़ती तब जा कर ट्रेन पकड़ता. खैर, अब तो इस बात को भी 30 वर्ष निकल गए हैं. मगर उस की उम्र तो जैसे 30-35 पर ही अटक गई हो.
फिलहाल अपने बारे में कहूं तो मैं सपत्नीक बहन के घर शादी में जा रहा था लेकिन कुहरे के कारण रांची से जाने वाली सभी उड़ानें पहले
2 घंटे फिर अनिश्चितकाल के लिए रद्द कर दी गई थीं. उस की फ्लाइट के साथ भी ऐसा ही कुछ होगा. तभी कुछ न कुछ बंगला में लगातार बोले जा रही थी और उस के इशारों पर नाचने वाला भागभाग कर उस की तीमारदारी में लगा था. तो मेरी गुलनाज गुलबदन इस कांटे भरे पौधे पर आ खिली है.
एक बार उसे तो एक बार खुद को निहार रहा था जिसे भांप कर मेरी पहरेदार पत्नी ने अपने सौभाग्य रक्षा हेतु फरमान सुनाया, ‘‘सुनिएजी, हमें घर लौट जाना चाहिए जब फ्लाइट उड़ेगी ही नहीं तो बैठेबैठे वक्त क्यों बरबाद करें?’’
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