Social Story : ‘‘पा  पा, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती,’’ मेरा मन तिक्त था.

‘‘हर काम की उम्र होती है. समय से शादी कर लेना ही बेहतर होता है,’’ पापा ने सम?ाया.

‘जब से होश संभाला आप लोगों ने हमेशा समय की दुहाई दी. समय से यह करो समय से वह करो पर क्या वैसा हुआ जैसा आप लोगों ने चाहा?’’

‘‘प्रयास तो करता ही है आदमी.’’

‘‘मान लिया जाए कि मैं ने शादी कर ली. फिर क्या होगा?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘समय से बच्चे होंगे. उन्हें ढंग से पालपोष सकोगी,’’ मम्मी बोलीं.

‘‘नहीं हुए तब?’’

‘‘तुम बहुत कुतर्क करने लगी हो,’’ मम्मी नाराज हो गईं.

‘‘2 साल ही तो हुए हैं नौकरी करते हुए. अभी उम्र ही क्या है मेरी यही कोई 25 साल. कुछ साल और रुक जाने में हरज ही क्या है?’’

‘‘हरज है. हम अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहते हैं,’’ मम्मी ने कहा.

‘‘आप की जिम्मेदारी के लिए मैं अपने कैरियर का गला घोट दूं?’’ मेरा स्वर तलख था.

‘‘कैरियर तो शादी के बाद भी चलता रहेगा,’’ पापा बोले.

‘‘तब सबकुछ इतना आसान नहीं होगा. मुझे पति, सासससुर की बंदिशों का सामना करते हुए काम करने जाना होगा. फिर क्या पता नौकरी को लेकर उन का कैसा रवैया हो?’’

‘‘छोड़ देना नौकरी. घरपरिवार संभालना,’’ मम्मी बोलीं.

‘‘मम्मी, आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं अपनी जिंदगी किचन में नहीं खपाना चाहती. मेरा मन खाना पकाने में बिलकुल नहीं लगता,’’ मेरा मुंह बन गया.

‘‘लड़की हो खाना तो बनाना ही होगा,’’ मम्मी ने खाना पर जोर दिया.

औफिस का समय हो रहा था. मैं अब और बहस में नहीं पड़ना चाहती थी. सो औफिस के लिए निकल पड़ी. औफिस में मेरा मन बेचैन रहा. मम्मीपापा की शादी की जिद ने मेरी सारी खुशियां छीन ली थीं. जब से होश संभाला पढ़ती ही रही. अब जब नौकरी कर के आर्थिक आजादी पाई तो मम्मीपापा ने शादी के बंधन में बांधने का मन बना लिया यानी एक स्त्री कभी आजाद नहीं रह सकती. उसे किसी न किसी पुरुष के बंधन में रहना ही होगा. जबकि मैं उस बंधन को तोड़ना चाहती थी. पुरुष का साथ चाहिए मगर बंध कर नहीं. फिलहाल अभी कुछ साल तो बिलकुल नहीं. बाद में मन का मिला तो शादी कर लूंगी.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ आकाश ने मेरी तंद्रा तोड़ी. अकसर टिफिन के वक्त हम दोनों एकसाथ बैठ कर बातें करते.

‘‘मम्मी मेरी शादी के लिए पीछे पड़ी हैं, ‘‘मैं ने आकाश से कहा.

‘‘तो कर लो शादी,’’ निर्विकार भाव से आकाश बोला.

‘‘मैं कुछ साल और टालना चाहती हूं. अभी घरगृहस्थी के चक्कर में नहीं पडना चाहती,’’ मेरी त्योरियां भिंच गईं.

आकाश ने कोई जवाब नहीं दिया. शायद यह सोच कर कि यह मेरा निजी मामला है.

शाम औफिस से लौटी तो मेरा मन अशांत था. रहरह कर मम्मीपापा के शब्द कानों में गूंजते रहे. मांबाप बेटाबेटी में क्यों फर्क करते हैं. बेटे के लिए पूरा फलक वहीं बेटी के लिए आसमान एक छोटा सा टुकड़ा और वह भी बादलों से घिरा.

रोज शाम को किसी न किसी रिश्तेदारों से मां मेरी शादी का जिक्र करतीं, ‘‘कोई ढंग का लडका हो तो बताओ. इस साल शादी कर देनी है,’’ मां चिंतित होती.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है? ढंग का लड़का मिले तभी रिश्ता करना. घबरा कर गिरने की जरूरत नहीं है,’’ मौसी सम?ातीं.

पता नहीं क्यों मम्मी मेरी शादी के लिए इतनी उतावली थीं. अभी मैं 24 साल की थी. 30 के ऊपर के लड़के मिल रहे थे. 2-3 साल और रुक जाती तो क्या जाता?

एक दिन मैं ने मम्मी से साफसाफ कह दिया, ‘‘शादी अपने हिसाब से करूंगी.’’

‘‘तब तो हो चुकी शादी,’’ मम्मी ने कहा.

‘‘क्या कमी है जो लड़कों के सामने झुकूं. मैं उसी से शादी करूंगी जो मु?ो जंचेगा.’’

‘‘जंचने का पैमाना क्या है?’’ मम्मी की त्योरियां चढ़ गईं.

‘‘वह मुझ पर छोड़ दो.’’

मेरे कथन से मम्मी परेशान हो जातीं. उन्हें लगता शादी के मामले में मांबाप से बेहतर संतानें नहीं सोच सकतीं. किताबें पढ़ लेने से जमाने का तजरबा नहीं आ जाता. लिहाजा, यह फैसला मांबाप पर ही छोड़ देना चाहिए. मैं वर्तमान नौकरी से खुश नहीं थी सो दिल्ली में मुझे बेहतर औफर मिला तो वहीं जाने का मन बना लिया.

‘‘अकेले दिल्ली में कैसे रहोगी?’’ मां की चिंता स्वाभाविक थी.

‘‘मैं पीजी में रहूंगी.’’

‘‘यहां क्या दिक्कत है.? कौन सा तुम्हें जिंदगीभर नौकरी करनी है?’’ मां ने ऐतराज जताया.

‘‘इस छोटे से शहर में मुझे ग्रोथ नहीं मिल रही. वहां आगे बढ़ने का मौका है.’’

‘‘शादी के बाद जहां चाहे वहां रहती. अभी से भागदौड़ करने का क्या मतलब?’’

‘‘फिर शादी?’’

मैं चिढ़ गई, ‘‘मुझे किसी के बैशाखी की जरूरत नहीं. मैं अपने बलबूते पर आगे बढ़ सकती हूं,’’ मम्मी के लाख मना करने के बावजूद मैं ने दिल्ली का रुख कर लिया. किंचित पापा का भी मन हिचकिचा रहा था मगर मेरे दृढ़ संकल्प के आगे उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया.

दिल्ली आ कर मुझे बेहद सुकून महसूस हुआ. यहां न मांबाप की बंदिश न ही किसी की टोकाटाकी. अपनी जिंदगी चाहे जैसे जीओ. पीजी औफिस से थोड़ी दूरी पर था.

एक शाम मैं ने आकाश को फोन लगाया, ‘‘वहां क्या पडे़ हो? यहीं आ जाओ. मैं तुम्हारा भी बंदोबस्त करा दूंगी.’’

आकाश ने मेरे औफर को स्वीकार कर लिया. वैसे भी एक छोटे से शहर की छोटी सी कंपनी में ग्रोथ नामुमकिन था. मैं जिस कंपनी में थी वह काफी बड़ी थी. लोग ठीकठाक सैलरी पा रहे थे. नई दिल्ली की बात ही अलग थी. यहां की आधुनिकता और फैशन नें मु?ो गहरे तक प्रभावित किया. हर किसी की कोई न कोई गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड था. कुछ लोग तो रिलेशनशिप में भी थे. गर्लफ्रैंड का कौनसैप्ट तो हमारे छोटे से शहर में भी आ गया था. मगर दिल्ली से अलग. इस विशाल शहर मैं न कोई देखने वाला न ही खुसुरफुसुर करने वाला. आजाद जिंदगी थी. मैट्रो हो या कोई बागबगीचा, रैस्टोरैंट हो या शहर  की लंबीचौड़ी सुनसान सड़कें हर तरफ कोई न कोई युवा बेखौफ अपनी गर्लफ्रैंड की कमर में हाथ डाले मुसकराते हुए चला जा रहा था. पहलेपहल आई तो मेरे नए सहकर्मियों ने पूछा कि क्या मेरा कोई बौयफ्रैंड है? मैं ने मुसकरा कर न किया तो उन्हें अचरज हुआ. उस समय मुझे आकाश की याद आई.

आकाश को मेरी कंपनी का औफर लैटर मिल गया. उस के आने से मुझे काफी राहत मिली. हम दोनों ने एक कमरा लिया और साथ रहने लगे. अकसर औफिस से घूमने निकल जाते फिर रात 10 के आसपास लौटते. करना ही क्या था. कपड़े बदले और सो गए. हम दोनों की चारपाई अलगअलग थी.

एक रात मैं अपने बिस्तर पर गहरी नींद में थी. तभी किसी के करीब होने का एहसास हुआ. मैं उनींदी आंखों से उठी तभी आकाश ने मुझे बल दे कर बिस्तर पर लिटा दिया.

‘‘आकाश, प्लीज मुझे छोडो,’’ खुद मैं ने छुड़ाने की असफल कोशिश की. मगर आकाश कब मानने वाला था. उस रात पहली बार मुझे अपराधबोध हुआ क्येंकि जो हुआ वह औचित्य की सीमा से बाहर का था. सुबह मैं ने आकाश को खूब खरीखोटी सुनाई.

‘‘लिव इन रिलेशन में यह सब आम बात है. तुम बिना वजह तूल दे रही हो?’’ आकाश ने मुझे समझना चाहा.

‘‘तुम ने ठीक नहीं किया,’’ मैं रोंआसी हो गई.

‘‘बड़े शहर में आ कर भी तुम ने छोटापन नहीं छोड़ा. जिसे तुम संजीदगी से ले रही हो वह समय की जरूरत है. चाहे तो अपनी महिला सहकर्मियों से पूछ सकती हो? शायद ही कोई अछूता हो?’’ आकाश ने खुद को सही साबित करने की भरसक कोशिश की.

‘‘मैं अपने पति को क्या मुंह दिखाऊंगी?’’

‘‘यह तो तुम्हें मेरे साथ रहने से पहले सोचना चाहिए था. मैं फिर कह रहा हूं 2 चीजें एकसाथ नहीं चल सकतीं. या तो रूढिवादी बने रहो या फिर आजादखयाल बन कर जिंदगी का लुत्फ उठाओ.’’

‘‘हम दोस्त हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘बंद कमरें में 2 जवान महिलापुरुष दोस्त नहीं हो सकते,’’ आकाश ने कहा.

‘‘इस हिसाब से भाईबहन भी नहीं रह सकते?’’ मैं ने तर्क दिया.

‘‘उन में खून का रिश्ता है. हमारेतुम्हारे बीच कौन सा रिश्ता है?’’

आकाश के तर्क में दम था. गलती मेरी थी. आकाश ने सही कहा. मुझे एक रास्ता चुनना होगा या तो रूढिवाद या फिर आजादखयाल. दोहरे मानदंड से काम नहीं चलेगा. दिल्ली आने का मेरा यही मकसद था. मैं पिटीपिटाई परिपाटी पर नहीं चलना चाहती थी.

‘‘फिर भी तुम मुझसे अलग रहना चाहती हो तो रह सकती हो,’’ कह कर आकाश ने यों पल्ला ?ाड़ लिया जैसे कुछ हुआ ही न हो.

एक कुंआरी लड़की के साथ जबरदस्ती की,

इस का उसे जरा भी क्षोभ नहीं था, जबकि मैं उसे मन ही मन चाहने लगी थी. मगर इस हद तक नहीं कि जो उस ने रात मेरे साथ किया.

‘‘आकाश, मैं तुम से प्रेम करने लगी हूं,’’ मैं भावुक थी.

‘‘क्या जरूरी है कि मैं भी करूं?’’ आकाश निर्विकार भाव  से बोला.

‘‘ऐसा मत कहो. मैं टूट जाऊंगी,’’ मैं अतिभावुक थी.

‘‘तुम्हारी आजादखयाली का क्या होगा? मेरे हिसाब से तुम अब भी पुरातन सोच से उबर नहीं पाई हो. बेहतर होगा वापस अपने शहर चली जाओ और शादी कर के घर बसा लो,’’ आकाश ने बिना लागलपेट के कहा, ‘‘अभी हम एकदूसरे को ठीक से जानते तक नहीं. शादी कैसे कर लें?’’

‘‘जानने के लिए बचा ही क्या है?’’

‘‘फिर वही रात का रोना ले कर बैठ गई. तुम सम?ाती क्यों नहीं कि जो हुआ वह आम है. कौन सा तुम्हारा अंगभंग हो गया. 2 युवा एकसाथ रहेगे तो ऐसा होना स्वाभाविक है.’’

‘‘तुम्हारे लिए हो सकता है, मगर मेरे लिए नहीं.’’

‘‘ऐसा था तो क्यों मुझे अपने पास बुलाया?’’ आकाश नाराज स्वर में बोला.

‘‘दोस्ती के कारण. तुम ने उस की मर्यादा तोड़ी.’’

‘‘मर्यादा मैं ने नहीं तुम ने तोड़ी. क्यों अपने साथ रहने दिया? मैं तुम्हारा क्या लगता हूं?’’

मेरे पास इस का कोई जवाब नहीं था. क्षणांश हम दोनों के बीच सन्नाटा छाया रहा.

आकाश बैड से उठा और अपने कपडे़ समेटने लगा.

‘‘मैं जा रहा हूं,’’ आकाश बैग में अपने कपड़े रखते हुए कहा.

‘‘कहां?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘तुम से अलग रहने.’’

‘‘तुम ऐसा नहीं करोगे,’’ कह मैं उस का रास्ता रोक खड़ी हो गई.

‘‘बच्चों जैसी हरकत मत करो,’’ आकाश

ने मुझे एक तरफ झटकते हुए बाहर का रुख कर लिया.

आकाश चला गया और मैं घुटनों में सिर छिपा कर फूटफूट कर रोने लगी. आज औफिस से छुट्टी ले ली. पूरा दिन आत्मविश्लेषण किया तो पाया कि आकाश ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे अमार्यादित कहा जाए. 2 युवा एक कमरे में होते हैं तो ऐसा होना स्वाभाविक है. मैं बिना वजह इसे तूल दे रही हूं. आज का जमाना बदल चुका है. बेशक मैं भी तो बदलाव की तरफ उन्मुख हूं. हां, अभी थोड़ी कसर थी जो आकाश ने पूरी कर दी. अब मैं ने आजादी का पूरा अर्थ सम?ा लिया था लिहाजा, आकाश बेकुसूर लगा मु?ो शाम होतेहोते सबकुछ साफ हो चुका था. अब मैं बिना वजह के अपराधबोध से मुक्ति पा ली थी. मन शांत हुआ तो आकाश को फोन लगाया.

‘‘वापस चले आओ. तुम ने कोई गुनाह नहीं किया है.’’

‘‘तुम मुझे ले कर कुछ ज्यादा ही संजीदा हो?’’

‘‘हूं तो गलत क्या है क्योंकि मैं तुम से मन ही मन प्रेम करने लगी हूं,’’ मैं खुश थी.

‘‘जरूरी नहीं कि वैसी ही फीलिंग मेरे दिल में भी हो. किसी का अच्छा लगना और प्रेम करने में फर्क होता है. तुम मुझे अच्छी लगती हो इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम से प्रेम करता हूं या फिर विवाह की सोच रहा हूं.’’

मैं समर्पण की स्थिति में थी. लिहाजा, उस ने जो कहा मैं मानती गई. पता नहीं क्यों आकाश के जाने के बाद मैं खालीपन महसूस कर रही थी, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. उन्मुक्त जीवन जीने वाले किसी से बंधे नहीं रहते. ऐसा न होता तो मैं इस शहर में आती ही नहीं. मगर न जाने आकाश ने मु?ा पर क्या कर रखा था कि उस के बगैर सूनासूना सा लगने लगा.

‘‘तुम पिछली रात की घटना को भूलने के लिए तैयार हो न?’’ आकाश ने मु?ा से कबूलवा ही लिया.

जैसे ही आकाश कमरे में घुसा मैं उसे बांहों में कस कर बोली, ‘‘तुम मु?ा से शादी करो या न करो, मगर वादा करो कि यों छोड़ कर नहीं जाओगे.’’

‘‘मैं ने कब मना किया,’’ आकाश मुसकराया.

2 साल गुजर गए. मम्मीपापा कहते रहे, मगर मैं हर बार शादी टालती रही. एक रोज अचानक पापा बिना बताए मेरे फ्लैट पर आ गए. आकाश उस समय मेरे साथ चाय पी रहा था. सकपका गई.

‘‘यह कौन?’’ पापा ने त्योरियां चढ़ा कर पूछा.

‘‘आकाश, मेरे साथ बनारस में था.’’

‘‘यहीं रहता है?’’ मुझ से न कहते न बना.

‘‘पापा, हम लिव इन रिलेशन में हैं.’’

‘‘लिव तो सम?ा में आता है पर रिलेशन? कैसा संबध है तुम दोनों में?’’

‘‘दोस्ती का.’’

‘‘लडकी से क्यों नहीं दोस्ती की?’’

‘‘पापा, यहां लोग इस पर गौर नहीं करते कि कौन किस के साथ रहता है. कोई किसी के साथ रह सकता है.’’

‘‘लेकिन हम तो करते हैं.

बिना शादी किए रहना व्यभिचार कहलाता है?’’

‘‘शादी की इतनी जल्दी भी क्या है?’’

‘बेशर्मी को तुम ने दोस्ती का नाम दे रखा है. उस पर कह रही हो कि शादी की जल्दी क्या है,’’ पापा उखड़े, ‘‘बनारस जा कर क्या मुंह दिखाऊंगा लोगों को?’’

मेरी जिद और तेवर देख कर पापा उलटे पांव बनारस लौट गए. जातेजाते इतना कहते गए,’’ देखना, एक दिन पछताओगी.’’

2 दिन बाद मम्मी ने मुझे खूब खरीखोटी सुनाई. मैं ने फोन काट दिया. लिव इन रिलेशन की स्वच्छंदता मुझे भाने लगी थी. न कोई जिम्मेदारी न ही रिश्तों का मोह. कभी भी कोई  भी किसी को छोड़ कर जा सकता है. मैं ने भी आकाश को ले कर कोई भ्रम नहीं पाला. दोनों की इच्छा पर निर्भर करेगा कि कब शादी करें.

आहिस्ताआहिस्ता 5 साल गुजर गए. मैं 32 की हो गई. मम्मीपापा ने मेरी खबर लेनी छोड़ दी. मैं अपनी जिंदगी में खुश थी. कभीकभी लगता अगर आकाश ने मेरा साथ छोड़ दिया तब किस का दामन थामेगी.

1 हफ्ते की कह कर आकाश ने पूरे 15 दिन लगा दिए बनारस में. 15 दिन बाद आया तो बेहद खुश था. कहने लगा, ‘‘मैं ने शादी कर ली.’’

जानकर मुझे बड़ा आघात लगा.

‘‘मैं बोर हो चुका था इस जिंदगी से. पापा ने लड़की दिखाई तो न नहीं कर सका,’’ आकाश ने बेहद सहज भाव से कहा.

मुझ पर इस का क्या असर होगा, इस से वह बेखबर था जो स्वाभाविक था. वह मेरी चिंता क्यों करेगा? मैं उस की लगती भी क्या थी. महज एक दोस्त. आकाश ने मुझे ऐसी जगह ला कर छोड़ा कि मैं पीछे लौट भी न सकूं.

आज मैं सचमुच काफी दुखी थी. सब से ज्यादा दुखर आकाश का साथ छूटने का था. लिव इन रिलेशन में कोई बंधन होता तो नहीं. इस की लिए उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं बनता. आकाश ने वही किया जो उसे उचित लगा. मगर मैं किस ओर जा रही हूं, यह सवाल मैं ने अपनेआप से पूछा. उन्मुक्त जीवन गुजारने के चक्कर में कहीं भटक तो नहीं गई? क्या मुझे फिर किसी और पार्टनर की तलाश करनी चाहिए? रात काफी देर तक मैं यही सोचती रही. एक पल बनारस लौटने का खयाल आया. पर किस मुंह से वापस जाऊं?  वहां क्या मिलेगा मुझे? वैसे भी मैं उन के लिए बेगानी हो चुकी हूं. मेरा आत्ममंथन जारी रहा. आजादी के चक्कर में मैं ने क्या खोया और क्या पाया?

बेशक विवाह एक बंधन है और मैं इसी बंधन से भागती रही. विवाह फिर बच्चे. क्या बच्चे पालना आसान है? मैं ने मम्मीपापा को गृहस्थ जीवन की चक्की में हमेशा पिसते देखा. दोनों हर वक्त हम बच्चों

के लिए परेशान रहते. अकसर मम्मीपापा में वैचारिक मतभेद के चलते तूतू, मैंमैं हो जाती.

इस के बावजूद उन्होंने न एकदूसरे का साथ

छोड़ा न ही हमारी परवरिश में कोई कसर छोड़ी. चट्टान की तरह खडे़ रहे. हम भाईबहनों के

लिए. हम पढ़लिख कर अपने पैरों पर खडे़ हो जाएं यही उन की ख्वाहिश थी. कितनी हसरत

थी पापा को मेरी शादी को ले कर. कहते थे कि तुम्हारे हाथ पीले कर दूं  उस के बाद निश्चिंत जिंदगी गुजारूंगा.’’ सोचतेसोचते मेरी आंखें भर आई.

लिव इन रिलेशन यानी स्त्रीपुरुष स्वच्छंदता का नया नारा. क्या इसे आकाश ने निभाया? जाहिर है वह सजग रहा. तभी तो विवाह कर के घर बसा लिया और मैं यह सोच कर बंधी थी कि यह रिश्ता बगैर विवाह के

मेशा चलता रहेगा. न चला तो एकदूसरे से अलग हो जाएंगे.

आकाश तो चला गया मगर मैं क्यों उस

के चले जाने से व्यथित हूं? वजह साफ है. मैं

उसे मन ही मन चाहने लगी थी परंतु वह नहीं चाहता था. यह तो उस ने पहले ही बता दिया था. अब क्या करूं? क्या नए रिश्ते की तलाश

में जुट जाऊं? नए रिश्ते की तलाश का मतलब खुद को वेश्या साबित करना. हां, यह सच है लिव इन रिलेशन वेश्यापन नहीं है तो क्या है एक महिला के लिए? कुछ साल किसी के साथ हमबिस्तर रही तो कुछ साल किसी दूसरे के साथ. फिर एक दिन बूढ़ी हो गई तो मक्खी भी भिनभिनाने नहीं आएगी दरवाजे पर. पुरुषों का क्या वे तो कभी भी किसी के साथ शादी कर के घर बसा लेंगे और मैं आजादी के नाम पर रोज नए संबंध की तलाश करती रहूंगी. क्या यही मेरी नियति होगी?’’

मैं एकाएक फट पड़ी नहीं,’’ मैं ऐसा

नहीं होने दूंगी. फिर क्या रास्ता बचा है मेरे पास? खुदकुशी?

आज मुझे मम्मीपापा की बेहद याद आ रही थी. उस रोज पापा के साथ जिस

बेरुखी से पेश आई जाहिर है वह नश्तर की तरह चुभा होगा. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन की लाडली बेटी एक गैर लड़के के लिए उन्हें पहचानने से इनकार कर देगी.

तभी मोबाइल की घंटी बजी. देखा मम्मी का था. मैं ने लपक कर उठाया. हताश क्षणों में यह किसी मरहम से कम नहीं था.

‘‘पापा की तबीयत ठीक नहीं हैं. वे तुम्हें देखना चाहते हैं?’’

यह मेरे लिए बरदाश्त से बाहर था. फफक कर रो पड़ी, ‘‘क्या हुआ पापा को? मैं आ रही हूं,’’ मैं ने तत्काल फ्लाइट बुक कराई और बनारस पहुंच गई. पापा अस्पताल में थे. काफी कमजोर हो गए थे. कितने हैंडसम थे मेरे पापा और आज कैसे हो गए? यकीनन उन्हें मेरी चिंता खा गई. मैं अपराधबोध से घिर गई.

उन्हें देख कर मेरी रुलाई फूट पड़ी, ‘‘पापा, मुझे माफ कर दीजिए. मैं आप के दिए संस्कारों से भटक गई थी.’’

‘‘एक वादा करो,’’ अस्फुट शब्दों में बोले.

‘‘क्या?’’

‘‘शादी कर लो.’’

‘‘जो मुझे संपत्ति नहीं पार्टनर समझे.’’

‘‘ऐसा ही है समीर. चाहो तो मिल सकती हो,’’ पापा बोले.

‘‘मुझे आप पर भरोसा है. बस आप ठीक हो जाएं,’’ पापा की आंखों में आई खुशी की चमक ने मेरी सारी दुविधा खत्म कर दी.

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