Hindi Story :  पढ़ाई  पूरी करने के बाद नीरू की शादी एक धनाढ्य उच्च घराने में कर दी गई. नीरू हंसीखुशी अपनी ससुराल पहुंची लेकिन वह यह देख कर दंग रह गई कि उस की ससुराल का माहौल उस के घर से बिलकुल अलग है. उस की ससुराल वालों के पास भले ही पैसे की कोई कमी न थी लेकिन उन की सोच आज भी रूढि़वादी और दकियानूसी थी.

नीरू को अपनी ससुराल में ऐसा लगता कि सासससुर और ननद उस पर सख्त पहरा रखते हैं. वे यह तक ध्यान रखते हैं कि बहू नीरू फोन पर किस से और क्या बातें कर रही है? नीरू के फोन की घंटी बजी नहीं कि ससुराल वालों के कान खरगोश के कानों की तरह खड़े हो जाते. यह सब उसे बड़ा अजीब लगता.

नीरू के घर से बाहर अकेले जाने पर तो पाबंदी थी ही, किसी के आने पर नीरू गेट भी खोलने नहीं जा सकती थी.

पहरे और बंदिशें इंसान को विद्रोही बनाती हैं. जबजब शासकों ने जनता पर बंदिशें लगाई हैं तबतब विद्रोह के शोले भड़के हैं. किसी पर लाख पहरे बैठा दो, किलेबंदी कर दो लेकिन आजाद होने वाला पंछी तो सुरंगों में से भी रास्ते तलाश लेता है.

मुगलों ने अपने हरम में हजारों औरतों को सख्त पहरे में कैद रखा. लेकिन मुगल बादशाह भले ही दुनिया के सब से शक्तिशाली सम्राट बन गए हों, वे लाख पहरे बैठाने के बाद भी हरम की औरतों को उन की इच्छाप्राप्ति से रोक न सके. हरम की कितनी ही औरतों ने उन सख्त पहरों के बीच दूसरों से संतानें पैदा कीं, भले ही हरम में पैदा होने के कारण वे संतानें हरामी कहलाईं. हरम की कितनी ही औरतें अपनी शारीरिक भूख शांत करने के लिए समलैंगिक हो गईं. यह कर के इन औरतों ने दिखा दिया कि दुनिया की सब से शक्तिशाली सलतनत भी उन की जूतियों की नोक पर है.

इन बादशाहों ने कितनी ही औरतों को

इस अपराध के लिए मौत के घाट उतरवा दिया लेकिन इन औरतों ने दिखा दिया, ‘‘ऐ जालिम बादशाहो, तुम्हारी सलतनत तुम्हें मुबारक और हमारी आजादी हमें मुबारक. एक औरत के मन को जानना तुम्हारे बूते की बात नहीं. तुम 2 कौड़ी के बादशाह औरत के लाख टके के मन को क्या जानोगे?’’

ऐसे ही लड़की थी नीरू. वह आजाद खयालों की लड़की थी. पढ़नेलिखने में किसी से कम नहीं. उस के घर का माहौल भी ऐसा ही था, आजाद खयालों का. परिवार में सब परिपक्व दिमाग के लोग, एकदूसरे पर विश्वास करने वाले.

नीरू को समझ में नहीं आ रहा था कि 2026 में यह सब क्या चल रहा है? इन सब बातों से तंग आ कर एक दिन उस ने अपने पति सौरभ से इस विषय पर बात की. लेकिन सौरभ का दकियानूसी जवाब सुन कर वह हैरत में पड़ गई.

सौरभ ने कहा, ‘‘नीरू, तुम नईनवेली दुलहन हो, इसलिए सब तुम्हारी चिंता करते हैं कि तुम्हारे साथ कहीं कोई हादसा न हो जाए.’’

यह सुन कर नीरू ने तिलमिलाते हुए कहा, ‘‘सौरभ, यह क्या कह रहे हो? मैं कोई 2 साल की बच्ची हूं जो किसी हादसे का शिकार हो जाऊंगी?’’

‘‘नीरू, मेरे कहने का मतलब था कि हिंदू धर्म और समाज में औरत को अबला माना गया है. औरत दिल और दिमाग से कमजोर होती है और वैसे भी तुम अभी यहां नई हो किसी को जानतीपहचानती भी नहीं और कोई तुम्हें भी नहीं जानतापहचानता,’’ सौरभ ने हलकेपन से कहा लेकिन उसे नहीं पता था कि उसे उस की बात का क्या जवाब मिलने वाला है.

सौरभ की इस बेसिरपैर की बात को सुन कर नीरू का सिर भन्ना गया. वह बेकाबू होते हुए बोली, ‘‘सौरभ, मैं तो तुम्हें बहुत पढ़ालिखा और आधुनिक विचारों का आदमी सम  झती थी लेकिन तुम तो बड़े ही दकियानूसी निकले. औरतों के बारे में तुम्हारे विचार बड़े ही घटिया और निम्न स्तर के हैं. छि: मु  झे तो यह सोच कर भी घिन आती है कि मेरा पति ऐसी छोटी सोच का है.’’

‘‘बस भी करो नीरू, यह क्या बोले जा

रही हो?’’

‘‘देखो सौरभ, साफसाफ सुन लो मैं ऐसी बंदिशों में रहने वाली औरत नहीं हूं. मैं किसी खूंटे से बंधी जानवर नहीं हूं बल्कि मैं एक आजाद खयालों की लड़की हूं. मु  झे मेरे मायके में कोई कहीं आनेजाने से रोकताटोकता नहीं था. मेरी सारी पढ़ाई को ऐजुकेशन वाले विद्यालयों में हुई है. मैं लडकों के साथ भी ऐसे ही घुलतीमिलती थी जैसे लड़कियों के साथ. हम लड़कियां तो लड़कों के साथ शहर के अलगअलग रैस्टोरैंट में जा कर खूब दावतें उड़ाती थी. उन के साथ खूब घूमतीफिरती थी, बैडमिंटन खेलती थी. तब तो मु  झे कुछ नहीं हुआ और अब ये असहनीय पाबंदियां और बंदिशें, आखिर क्यों?’’

नीरू के ये तलख तेवर देख कर सौरभ कुछ देर के लिए सन्न रह गया और फिर बिना कुछ कहे दूसरे कमरे में चला गया. उसे नीरू से ऐसे जवाब की उम्मीद रत्तीभर भी नहीं थी. नीरू भी पैर पटकते बड़बड़ाती हुई रसोईघर में चली गई.

एक दिन ऐसा हुआ कि घर में कोई नहीं था. नीरू के सासससुर और ननद कहीं गए

हुए थे और सौरभ अपने औफिस गया हुआ था. नीरू को सब्जी बनानी थी. लेकिन जब वह सब्जी काटने चली तो उस ने देखा कि घर में तो कोई भी सब्जी नहीं है. नीरू का बाहर जाने को बहुत मन था. उसे बाहर जाने के लिए सब्जी लाने का बहाना बहुत अच्छा लगा. उस ने स्कूटी उठाई, मेन गेट में ताला लगाया और चल पड़ी सब्जी मंडी की ओर.

इसी बीच सौरभ घर पहुंच गया. गेट पर ताला लगा देख उस के मन में शंकाओं का तूफान उठ खड़ा हुआ. उस ने नीरू को फोन किया लेकिन स्कूटी पर होने के कारण नीरू उस की कौल रिसीव न कर सकी. मन ही मन वह   झल्ला रहा था. तभी उस ने नीरू को स्कूटी से आते देखा.

अभी नीरू स्कूटी से उतरी भी नहीं थी कि सौरभ ने भड़कते हुए कहा, ‘‘नीरू, अकेले कहां गई थी तुम?’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे भड़क रहे हो, सौरभ? घर में सब्जी नहीं थी, वही लेने गई थी. इस में इतनी आफत क्यों मचा रहे हो? पहले घर तो चलो या फिर सारी भड़ास यहीं रास्ते में ही निकालोगे?’’

नीरू ने जल्दी से गेट का ताला खोला और स्कूटी को घर के अंदर खड़ा किया.

सौरभ घर के अंदर पहुंचते ही नीरू पर बिफरते हुए बोला, ‘‘नीरू, अब तो पानी सिर से ऊपर बह गया. हजार बार मना करने के बाद भी आज तुम अकेले बाजार गई. तुम बहरी हो गई हो क्या जो बात नहीं सुनती?’’

‘‘सौरभ, यह तुम पर कौन सा पागलपन छा जाता है? किसी औरत का अकेले बाहर जाना क्या कोई गुनाह है? अकेले बाहर जाने पर कोई मु  झे खा जाएगा या कच्चा निगल जाएगा?’’

‘‘न तो तुम्हें कोई खाने वाला न ही कच्चा निगलने वाला लेकिन नीरू तुम सम  झो तो जमाना कितना खराब है. हमें तुम्हारी चिंता है.’’

‘‘जमाना ही तो खराब है सौरभ, मैं तो नहीं. इतने दिन हो गए तुम्हारे साथ रहते हुए, क्या तुम्हें मु  झ पर अभी भी यकीन नहीं या फिर तुम मु  झे इतनी भोली सम  झते हो कि कोई मु  झे बहलाफुसला कर भगा ले जाएगा और सुनो सौरभ, अगर किसी औरत को भागना ही होगा तो उसे चाहे 7 तालों में बंद रखो, वह तो भाग ही जाएगी किसी के बाप से रुकने वाली नहीं. हर साल कितनी ही ब्याहता अपने यारों के साथ भाग जाती हैं.’’

यह सुन कर सौरभ पर बिजली सी गिरी. नीरू की भाषा उसे कंटीले तारों सी चुभी. वह तड़प उठा. वह गरज कर बोला, ‘‘नीरू, यह किस तरह की बातें कर रही हो? घर की बहू हो, मर्यादा में रहना सीखो.’’

नीरू के तेवर भी अब तक उग्र हो चुके थे. वह भी कड़क कर बोली, ‘‘बहू ही तो हूं, तुम्हारे घर की कोई नौकरानी, रखैल या गुलाम तो नहीं जो घर में कैद कर के रखोगे?’’

यह बात सौरभ के बरदाश्त के बाहर थी. वह हाथ उठाते हुए बोला, ‘‘बदजात, मुंह बंद कर.’’

नीरू बहुत कड़वा बोलने ही वाली थी कि तभी डोरबैल बजी, गेट पर किसी की आहट हुई. सौरभ  गेट की ओर बढ़ गया. वहां पर नीरू के सासससुर और ननद थी. तीनों वापस आ गए थे. उन्हें कुछ पता नहीं था कि क्या हुआ. सौरभ और नीरू का आज का   झगड़ा हाथापाई तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो गया.

सचमुच ऐसी आहटें बड़ी काम की होती हैं. ये केवल   झगड़े ही समाप्त नहीं करातीं बल्कि कई घर टूटने से भी बचा लेती हैं. अगर आज का   झगड़ा हाथापाई तक पहुंच जाता तो न जाने क्या होता?

मगर आज के   झगड़े के बाद नीरू के मन में एक बात साफ हो गई कि वह इस दमघोटू माहौल में ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी. इस माहौल में तो वह पागल हो कर मर जाएगी.

उस ने अपने मायके वालों को सारी बातें बताईं. उन की बातों का सार यही था कि उन्होंने तो उस की शादी एक उच्च घराने में की थी बाकी उस का नसीब.

इस जवाब को सुन कर नीरू को लगा जैसे वह इस दुनिया में अकेली पड़ गई है. उस का कोई नहीं है. लेकिन तभी उस के अंदर की हिम्मतदार औरत बोली, ‘‘नीरू, हिम्मत मत हार. एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा रास्ता खुद खोलना होता है.’’

नीरू हवा में उड़ने वाली आजाद पक्षी थी और सौरभ किसी धर्म के चंगुल में फंसे शिकारी की तरह हरदम उस के पर कुतरने में लगा था. इस से दोनों में अनबन रहने लगी. उन के वैवाहिक जीवन को ग्रहण लग गया. जीवन उस आलीशान घर में नर्क सा हो गया. नीरू का अपने मायके से पहले ही मोह भंग हो चुका था. अब अपनी जिंदगी के निर्णय उसे खुद लेने थे. इस पिंजरे में कैद छटपटाती जिंदगी जीना उसे स्वीकार नहीं था.

एक दिन नीरू अपने खयालों में खोई हुई थी. उसे अपने कालेज के दिन याद आने लगे. वाह, क्या दिन थे वे. पूरी मौजमस्ती, न किसी की चिंता, न कोई परवाह. तभी उसे रिंकू की याद आई जो उस से एकतरफा प्यार करता था. नीरू ने कालेज के दिनों में कभी उसे घास भी नहीं डाली थी. उस के जैसे कितने ही लड़के उस के आगेपीछे भंवरों की तरह मंडराया करते थे और वह अपनेआप को किसी फिल्मी नायिका से कम न सम  झती थी.

अब नीरू सोचने लगी कि रिंकू भले ही कुछ सांवला था, गरीब था लेकिन वह उस से

सच्ची मुहब्बत करता था. अगर वह अब मिल जाए तो यह सोच कर ही उस के मन में प्यारी सी गुदगुदी हुई. होंठों पर मुसकान उतर आई और चेहरा गुलाबी हो उठा.

नीरू फेसबुक पर उसे तलाशने लगी. जल्द ही उसे कामयाबी मिल गई. उस की फेसबुक से उसे पता चला कि शामली में वह एक कौंट्रैक्टर का काम कर रहा है और अभी तक अविवाहित है. नीरू की एक उम्मीद सी जाग गई.

फिर तो दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर शेयर किए और दोनों में खूब बातचीत होने लगी. रिंकू को भी लगा उस की चाहत का सपना पूरा हो सकता है. एक दिन उस ने नीरू को एक शायराना संदेश भेजा :

‘‘हर लमहा तुम्हारी यादों में कटता है,

आंखों में तुम्हारा ही अश्क उभरता है,

सदियों से तुम्हारा इंतजार है हमें,

यह दिल बस तुम्हीं पर तो मरता है.’’

इसे पढ़ कर नीरू को लगा जैसे वह कालेज के दिनों में वापस पहुंच गई है. उस की जैसे

मन की मुराद पूरी हो गई. उस ने भी बिना किसी देरी के शायराना अंदाज में ही जवाब लिख कर भेज दिया:

‘‘हम भी तुम्हारे इंतजार में ही आंहें भरते हैं,

सुबह और शाम तुम्हारी यादों के जाम पीते हैं,

आ जाओ, अपनी बांहों में पनाह दे दो हमें,

हसरत है, अपने संग उड़ा ले जाओ हमें.’’

और एक दिन सचमुच नीरू की हसरत पूरी हो गई. रिंकू नीरू को उड़ा ले गया. रिंकू ने उसे जता दिया था कि वह कोई रईस नहीं है पर जीने लायक आराम से कमा लेता है. नीरू किसी भी कीमत पर सौरभ के साथ के टौक्सिक संबंध से निकलना चाहती थी.

एक युवती को अपनी आजादी को ज्यादा कीमत देनी चाहिए बजाय सोने की जंजीरों के. अमीर परिवार की गुलामी की जगह साधारण घर की आजादी ज्यादा कीमती है. नीरू जानती थी कि उस के रिश्तेदार, मित्र, जानकार इस सोच पर कसमसाएंगे पर उसे अपने फैसले और रिंकू की उदारता पर भरोसा था.

नीरू सौरभ के लिए जाने से पहले यह संदेश लिखना नहीं भूली, ‘‘प्रिय सौरभ पहरेदार साहब, अब अपनी पहरेदारी शौक से फरमाइए. हम ने तो उस पहरे को ही तोड़ दिया जिसे आप अपनी तानाशाही की सलतनत सम  झते थे.’’

सौरभ को यह पढ़ कर 440 वोल्ट का करंट लगा. पहरे के कारण घरवाली तो गई

ही, इज्जत भी मटियामेट हो गई. उस ने एक औरत के मन को न सम  झने की भारी भूल की थी. उस की सजा तो उसे मिलनी ही थी.

सौरभ की जिंदगी उस के बाद कसमसाती चली क्योंकि जो सुख उसे एक गुलाम सी पत्नी से मिल रहे थे, मिलने बंद हो गए. वह संस्कृति की गुदड़ी में सिमट कर रह गया और नीरू आजाद पक्षी की तरह उड़ रही थी.

सौरभ की इतनी हिम्मत भी नहीं हुई कि वह तलाक का मुकदमा कर सके क्योंकि फिर जगहंसाई हो जाती. तलाक की ऐपिलकेशन तो नीरू ने डाली और जब कई हाजरियों में सौरभ अदालत में पेश नहीं हुआ तो उसे एकतरफ निर्णय फैमिली कोर्ट ने पकड़ा दिया. जज उदार डेक्टिकल महिला थी जिस ने विवाह के संस्कार जन्मों के साथ होने की बात ज्यादा नहीं थी.

रिंकू के साथ नीरू ज्यादा खुश थी हालांकि उस का घर उतना बड़ा नहीं था जितना सौरभ का था. पर जेल चाहे बड़ी कैदी की कोठरी छोटी ही होती है. रिंकू के घर में दीवारें नहीं थीं, खिड़कियां थीं, दरवाजे थे जिन से आजादी की हवा आती थी.

कोको  को हमारे जीवन का अहम हिस्सा ही नहीं बल्कि हमारे परिवार का अभिन्न सदस्य भी है. जब भी घर का कोई भी सदस्य बाहर से घर वापस आता है तो कोको का अपनापन और लगाव उस की दिनभर की थकान को भुला देता है. जुत्सु ब्रीड का कोको हमारे लिए स्ट्रैस बस्टर का रोल निभाता है.

पूरी करने के बाद नीरू की शादी एक धनाढ्य उच्च घराने में कर दी गई. नीरू हंसीखुशी अपनी ससुराल पहुंची लेकिन वह यह देख कर दंग रह गई कि उस की ससुराल का माहौल उस के घर से बिलकुल अलग है. उस की ससुराल वालों के पास भले ही पैसे की कोई कमी न थी लेकिन उन की सोच आज भी रूढि़वादी और दकियानूसी थी.

नीरू को अपनी ससुराल में ऐसा लगता कि सासससुर और ननद उस पर सख्त पहरा रखते हैं. वे यह तक ध्यान रखते हैं कि बहू नीरू फोन पर किस से और क्या बातें कर रही है? नीरू के फोन की घंटी बजी नहीं कि ससुराल वालों के कान खरगोश के कानों की तरह खड़े हो जाते. यह सब उसे बड़ा अजीब लगता.

नीरू के घर से बाहर अकेले जाने पर तो पाबंदी थी ही, किसी के आने पर नीरू गेट भी खोलने नहीं जा सकती थी.

पहरे और बंदिशें इंसान को विद्रोही बनाती हैं. जबजब शासकों ने जनता पर बंदिशें लगाई हैं तबतब विद्रोह के शोले भड़के हैं. किसी पर लाख पहरे बैठा दो, किलेबंदी कर दो लेकिन आजाद होने वाला पंछी तो सुरंगों में से भी रास्ते तलाश लेता है.

मुगलों ने अपने हरम में हजारों औरतों को सख्त पहरे में कैद रखा. लेकिन मुगल बादशाह भले ही दुनिया के सब से शक्तिशाली सम्राट बन गए हों, वे लाख पहरे बैठाने के बाद भी हरम की औरतों को उन की इच्छाप्राप्ति से रोक न सके. हरम की कितनी ही औरतों ने उन सख्त पहरों के बीच दूसरों से संतानें पैदा कीं, भले ही हरम में पैदा होने के कारण वे संतानें हरामी कहलाईं. हरम की कितनी ही औरतें अपनी शारीरिक भूख शांत करने के लिए समलैंगिक हो गईं. यह कर के इन औरतों ने दिखा दिया कि दुनिया की सब से शक्तिशाली सलतनत भी उन की जूतियों की नोक पर है.

इन बादशाहों ने कितनी ही औरतों को इस अपराध के लिए मौत के घाट उतरवा दिया लेकिन इन औरतों ने दिखा दिया, ‘‘ऐ जालिम बादशाहो, तुम्हारी सलतनत तुम्हें मुबारक और हमारी आजादी हमें मुबारक. एक औरत के मन को जानना तुम्हारे बूते की बात नहीं. तुम 2 कौड़ी के बादशाह औरत के लाख टके के मन को क्या जानोगे?’’

ऐसे ही लड़की थी नीरू. वह आजाद खयालों की लड़की थी. पढ़नेलिखने में किसी से कम नहीं. उस के घर का माहौल भी ऐसा ही था, आजाद खयालों का. परिवार में सब परिपक्व दिमाग के लोग, एकदूसरे पर विश्वास करने वाले.

नीरू को सम  झ में नहीं आ रहा था कि 2026 में यह सब क्या चल रहा है? इन सब बातों से तंग आ कर एक दिन उस ने अपने पति सौरभ से इस विषय पर बात की. लेकिन सौरभ का दकियानूसी जवाब सुन कर वह हैरत में पड़ गई.

सौरभ ने कहा, ‘‘नीरू, तुम नईनवेली दुलहन हो, इसलिए सब तुम्हारी चिंता करते हैं कि तुम्हारे साथ कहीं कोई हादसा न हो जाए.’’

यह सुन कर नीरू ने तिलमिलाते हुए कहा, ‘‘सौरभ, यह क्या कह रहे हो? मैं कोई 2 साल की बच्ची हूं जो किसी हादसे का शिकार हो जाऊंगी?’’

‘‘नीरू, मेरे कहने का मतलब था कि हिंदू धर्म और समाज में औरत को अबला माना गया है. औरत दिल और दिमाग से कमजोर होती है और वैसे भी तुम अभी यहां नई हो किसी को जानतीपहचानती भी नहीं और कोई तुम्हें भी नहीं जानतापहचानता,’’ सौरभ ने हलकेपन से कहा लेकिन उसे नहीं पता था कि उसे उस की बात का क्या जवाब मिलने वाला है.

सौरभ की इस बेसिरपैर की बात को सुन कर नीरू का सिर भन्ना गया. वह बेकाबू होते हुए बोली, ‘‘सौरभ, मैं तो तुम्हें बहुत पढ़ालिखा और आधुनिक विचारों का आदमी सम  झती थी लेकिन तुम तो बड़े ही दकियानूसी निकले. औरतों के बारे में तुम्हारे विचार बड़े ही घटिया और निम्न स्तर के हैं. छि: मु  झे तो यह सोच कर भी घिन आती है कि मेरा पति ऐसी छोटी सोच का है.’’

‘‘बस भी करो नीरू, यह क्या बोले जा

रही हो?’’

‘‘देखो सौरभ, साफसाफ सुन लो मैं ऐसी बंदिशों में रहने वाली औरत नहीं हूं. मैं किसी खूंटे से बंधी जानवर नहीं हूं बल्कि मैं एक आजाद खयालों की लड़की हूं. मु  झे मेरे मायके में कोई कहीं आनेजाने से रोकताटोकता नहीं था. मेरी सारी पढ़ाई को ऐजुकेशन वाले विद्यालयों में हुई है. मैं लडकों के साथ भी ऐसे ही घुलतीमिलती थी जैसे लड़कियों के साथ. हम लड़कियां तो लड़कों के साथ शहर के अलगअलग रैस्टोरैंट में जा कर खूब दावतें उड़ाती थी. उन के साथ खूब घूमतीफिरती थी, बैडमिंटन खेलती थी. तब तो मु  झे कुछ नहीं हुआ और अब ये असहनीय पाबंदियां और बंदिशें, आखिर क्यों?’’

नीरू के ये तलख तेवर देख कर सौरभ कुछ देर के लिए सन्न रह गया और फिर बिना कुछ कहे दूसरे कमरे में चला गया. उसे नीरू से ऐसे जवाब की उम्मीद रत्तीभर भी नहीं थी. नीरू भी पैर पटकते बड़बड़ाती हुई रसोईघर में चली गई.

एक दिन ऐसा हुआ कि घर में कोई नहीं था. नीरू के सासससुर और ननद कहीं गए

हुए थे और सौरभ अपने औफिस गया हुआ था. नीरू को सब्जी बनानी थी. लेकिन जब वह सब्जी काटने चली तो उस ने देखा कि घर में तो कोई भी सब्जी नहीं है. नीरू का बाहर जाने को बहुत मन था. उसे बाहर जाने के लिए सब्जी लाने का बहाना बहुत अच्छा लगा. उस ने स्कूटी उठाई, मेन गेट में ताला लगाया और चल पड़ी सब्जी मंडी की ओर.

इसी बीच सौरभ घर पहुंच गया. गेट पर ताला लगा देख उस के मन में शंकाओं का तूफान उठ खड़ा हुआ. उस ने नीरू को फोन किया लेकिन स्कूटी पर होने के कारण नीरू उस की कौल रिसीव न कर सकी. मन ही मन वह   झल्ला रहा था. तभी उस ने नीरू को स्कूटी से आते देखा.

अभी नीरू स्कूटी से उतरी भी नहीं थी कि सौरभ ने भड़कते हुए कहा, ‘‘नीरू, अकेले कहां गई थी तुम?’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे भड़क रहे हो, सौरभ? घर में सब्जी नहीं थी, वही लेने गई थी. इस में इतनी आफत क्यों मचा रहे हो? पहले घर तो चलो या फिर सारी भड़ास यहीं रास्ते में ही निकालोगे?’’

नीरू ने जल्दी से गेट का ताला खोला और स्कूटी को घर के अंदर खड़ा किया.

सौरभ घर के अंदर पहुंचते ही नीरू पर बिफरते हुए बोला, ‘‘नीरू, अब तो पानी सिर से ऊपर बह गया. हजार बार मना करने के बाद भी आज तुम अकेले बाजार गई. तुम बहरी हो गई हो क्या जो बात नहीं सुनती?’’

‘‘सौरभ, यह तुम पर कौन सा पागलपन छा जाता है? किसी औरत का अकेले बाहर जाना क्या कोई गुनाह है? अकेले बाहर जाने पर कोई मु  झे खा जाएगा या कच्चा निगल जाएगा?’’

‘‘न तो तुम्हें कोई खाने वाला न ही कच्चा निगलने वाला लेकिन नीरू तुम सम  झो तो जमाना कितना खराब है. हमें तुम्हारी चिंता है.’’

‘‘जमाना ही तो खराब है सौरभ, मैं तो नहीं. इतने दिन हो गए तुम्हारे साथ रहते हुए, क्या तुम्हें मु  झ पर अभी भी यकीन नहीं या फिर तुम मु  झे इतनी भोली सम  झते हो कि कोई मु  झे बहलाफुसला कर भगा ले जाएगा और सुनो सौरभ, अगर किसी औरत को भागना ही होगा तो उसे चाहे 7 तालों में बंद रखो, वह तो भाग ही जाएगी किसी के बाप से रुकने वाली नहीं. हर साल कितनी ही ब्याहता अपने यारों के साथ भाग जाती हैं.’’

यह सुन कर सौरभ पर बिजली सी गिरी. नीरू की भाषा उसे कंटीले तारों सी चुभी. वह तड़प उठा. वह गरज कर बोला, ‘‘नीरू, यह किस तरह की बातें कर रही हो? घर की बहू हो, मर्यादा में रहना सीखो.’’

नीरू के तेवर भी अब तक उग्र हो चुके थे. वह भी कड़क कर बोली, ‘‘बहू ही तो हूं, तुम्हारे घर की कोई नौकरानी, रखैल या गुलाम तो नहीं जो घर में कैद कर के रखोगे?’’

यह बात सौरभ के बरदाश्त के बाहर थी. वह हाथ उठाते हुए बोला, ‘‘बदजात, मुंह बंद कर.’’

नीरू बहुत कड़वा बोलने ही वाली थी कि तभी डोरबैल बजी, गेट पर किसी की आहट हुई. सौरभ  गेट की ओर बढ़ गया. वहां पर नीरू के सासससुर और ननद थी. तीनों वापस आ गए थे. उन्हें कुछ पता नहीं था कि क्या हुआ. सौरभ और नीरू का आज का   झगड़ा हाथापाई तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो गया.

सचमुच ऐसी आहटें बड़ी काम की होती हैं. ये केवल   झगड़े ही समाप्त नहीं करातीं बल्कि कई घर टूटने से भी बचा लेती हैं. अगर आज का   झगड़ा हाथापाई तक पहुंच जाता तो न जाने क्या होता?

मगर आज के   झगड़े के बाद नीरू के मन में एक बात साफ हो गई कि वह इस दमघोटू माहौल में ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी. इस माहौल में तो वह पागल हो कर मर जाएगी.

उस ने अपने मायके वालों को सारी बातें बताईं. उन की बातों का सार यही था कि उन्होंने तो उस की शादी एक उच्च घराने में की थी बाकी उस का नसीब.

इस जवाब को सुन कर नीरू को लगा जैसे वह इस दुनिया में अकेली पड़ गई है. उस का कोई नहीं है. लेकिन तभी उस के अंदर की हिम्मतदार औरत बोली, ‘‘नीरू, हिम्मत मत हार. एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा रास्ता खुद खोलना होता है.’’

नीरू हवा में उड़ने वाली आजाद पक्षी थी और सौरभ किसी धर्म के चंगुल में फंसे शिकारी की तरह हरदम उस के पर कुतरने में लगा था. इस से दोनों में अनबन रहने लगी. उन के वैवाहिक जीवन को ग्रहण लग गया. जीवन उस आलीशान घर में नर्क सा हो गया. नीरू का अपने मायके से पहले ही मोह भंग हो चुका था. अब अपनी जिंदगी के निर्णय उसे खुद लेने थे. इस पिंजरे में कैद छटपटाती जिंदगी जीना उसे स्वीकार नहीं था.

एक दिन नीरू अपने खयालों में खोई हुई थी. उसे अपने कालेज के दिन याद आने लगे. वाह, क्या दिन थे वे. पूरी मौजमस्ती, न किसी की चिंता, न कोई परवाह. तभी उसे रिंकू की याद आई जो उस से एकतरफा प्यार करता था. नीरू ने कालेज के दिनों में कभी उसे घास भी नहीं डाली थी. उस के जैसे कितने ही लड़के उस के आगेपीछे भंवरों की तरह मंडराया करते थे और वह अपनेआप को किसी फिल्मी नायिका से कम न सम  झती थी.

अब नीरू सोचने लगी कि रिंकू भले ही कुछ सांवला था, गरीब था लेकिन वह उस से

सच्ची मुहब्बत करता था. अगर वह अब मिल जाए तो यह सोच कर ही उस के मन में प्यारी सी गुदगुदी हुई. होंठों पर मुसकान उतर आई और चेहरा गुलाबी हो उठा.

नीरू फेसबुक पर उसे तलाशने लगी. जल्द ही उसे कामयाबी मिल गई. उस की फेसबुक से उसे पता चला कि शामली में वह एक कौंट्रैक्टर का काम कर रहा है और अभी तक अविवाहित है. नीरू की एक उम्मीद सी जाग गई.

फिर तो दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल फोन नंबर शेयर किए और दोनों में खूब बातचीत होने लगी. रिंकू को भी लगा उस की चाहत का सपना पूरा हो सकता है. एक दिन उस ने नीरू को एक शायराना संदेश भेजा :

‘‘हर लमहा तुम्हारी यादों में कटता है,

आंखों में तुम्हारा ही अश्क उभरता है,

सदियों से तुम्हारा इंतजार है हमें,

यह दिल बस तुम्हीं पर तो मरता है.’’

इसे पढ़ कर नीरू को लगा जैसे वह कालेज के दिनों में वापस पहुंच गई है. उस की जैसे

मन की मुराद पूरी हो गई. उस ने भी बिना किसी देरी के शायराना अंदाज में ही जवाब लिख कर भेज दिया:

‘‘हम भी तुम्हारे इंतजार में ही आंहें भरते हैं,

सुबह और शाम तुम्हारी यादों के जाम पीते हैं,

आ जाओ, अपनी बांहों में पनाह दे दो हमें,

हसरत है, अपने संग उड़ा ले जाओ हमें.’’

और एक दिन सचमुच नीरू की हसरत पूरी हो गई. रिंकू नीरू को उड़ा ले गया. रिंकू ने उसे जता दिया था कि वह कोई रईस नहीं है पर जीने लायक आराम से कमा लेता है. नीरू किसी भी कीमत पर सौरभ के साथ के टौक्सिक संबंध से निकलना चाहती थी.

एक युवती को अपनी आजादी को ज्यादा कीमत देनी चाहिए बजाय सोने की जंजीरों के. अमीर परिवार की गुलामी की जगह साधारण घर की आजादी ज्यादा कीमती है. नीरू जानती थी कि उस के रिश्तेदार, मित्र, जानकार इस सोच पर कसमसाएंगे पर उसे अपने फैसले और रिंकू की उदारता पर भरोसा था.

नीरू सौरभ के लिए जाने से पहले यह संदेश लिखना नहीं भूली, ‘‘प्रिय सौरभ पहरेदार साहब, अब अपनी पहरेदारी शौक से फरमाइए. हम ने तो उस पहरे को ही तोड़ दिया जिसे आप अपनी तानाशाही की सलतनत सम  झते थे.’’

सौरभ को यह पढ़ कर 440 वोल्ट का करंट लगा. पहरे के कारण घरवाली तो गई ही, इज्जत भी मटियामेट हो गई. उस ने एक औरत के मन को न सम  झने की भारी भूल की थी. उस की सजा तो उसे मिलनी ही थी.

सौरभ की जिंदगी उस के बाद कसमसाती चली क्योंकि जो सुख उसे एक गुलाम सी पत्नी से मिल रहे थे, मिलने बंद हो गए. वह संस्कृति की गुदड़ी में सिमट कर रह गया और नीरू आजाद पक्षी की तरह उड़ रही थी.

सौरभ की इतनी हिम्मत भी नहीं हुई कि वह तलाक का मुकदमा कर सके क्योंकि फिर जगहंसाई हो जाती. तलाक की ऐपिलकेशन तो नीरू ने डाली और जब कई हाजरियों में सौरभ अदालत में पेश नहीं हुआ तो उसे एकतरफ निर्णय फैमिली कोर्ट ने पकड़ा दिया. जज उदार डेक्टिकल महिला थी जिस ने विवाह के संस्कार जन्मों के साथ होने की बात ज्यादा नहीं थी.

रिंकू के साथ नीरू ज्यादा खुश थी हालांकि उस का घर उतना बड़ा नहीं था जितना सौरभ का था. पर जेल चाहे बड़ी कैदी की कोठरी छोटी ही होती है. रिंकू के घर में दीवारें नहीं थीं, खिड़कियां थीं, दरवाजे थे जिन से आजादी की हवा आती थी.

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