Hindi Satire : साहब, बदलाव में ही दुनिया निहित है, यह सिद्ध कर दिया भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने. पल में मासा, पल में रत्ती होने के काबिल हम सब और हमारा सुप्रीम कोर्ट तक. अपने प्यारे कुत्ताजी गाली न मानो इसलिए हमारे प्यारेप्यारे डौगेसजी पर कोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी आवारा डौगेस को पकड़ कर परमानैंट शैल्टरों में रखा जाए लेकिन बाद में अतिशीघ्र संशोधन उन की नसबंदी व स्वास्थ्य पर जा टिका. जहां आम डौगेस को पकड़ा जाएगा, उन की नसबंदी व टीकारण किया जाएगा, साहब. सार्वजनिक जगहों पर खाना खिलाने पर सख्त आ आदेश आया. खाना खिलाना गैरकानूनी होगा. फीडिंग जोन में ही खाना खिलाया जा सकेगा.
मानवपशु व्यवहार मानवीय तभी होता है जब मानव जानवरों पर रहम करे. इसलिए समाज से डौगेस को निकाला नहीं जा सकता. हां, रैबीज और काटने की घटनाएं कम हों इसलिए उपचार में टीकारण व नसबंदी को प्राथमिकता प्रदान की गई. अब डौगेस भी खुश व उन का प्रेमी वर्ग भी. भारतीय डौगेस को काबू करते. कोर्ट ने भारतीय डौगेस प्रेमी को लगाम लगाने की नेक बात प्रकट की है, साहब. इंसान सम झदार हो या न हो, टीकाकरण व नसबंदी के बाद संभवतया डौग जरूर सम झदार सम झा जाएगा और कोर्ट को अपनी एक टांग उठा कर सलाम करेगा.
साहब, एक जमाना था जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश यदि एक बार हो तो गए. फिर कोई भी उन्हें टस से मस नहीं करवा सकता था. वहीं आजकल देखा जा रहा है सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी पलभर में मासा, पलभर में रत्ती हो रहे हैं. हमारे महल्ले के डौगेस प्रेमी खुश हैं कि अपने प्रिय पालतू डौग को हम ने अपने साथ खाना खिलाया, मसनद वाले सुनहरे गद्दों पर सुलाया, कार में घुमायाफिराया ही नहीं, लिप डीपकिस भी किया.
आज हम से ज्यादा सम्मान सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दे दिया. पालतू डौगेस को सम्मान मिला ही, साथ ही बेचारे कहे जाने वाले स्ट्रे भी ‘रंगा खुश’ दीवाने हुए जा रहे हैं. पथराव से कौन नहीं डरता, सभी को सम्मान चाहिए. अब स्ट्रे डौगेस को डौगेस प्रेमियों ने उन का मनपसंद खाना खिला कर समाज पर बड़ी कृपा कर दी है और अब उन का चहेता डौग भौंके, काटे, छीने, दूसरे डौगेस से लड़े कोई चूं तक नहीं कर सकता.
दरअसल, डौगेस विहीन लोग इन की निगाह में पापी और समाजविरोधी हैं. डौग्स पक्षधर लोगबाग जिस तरह से अपना सीना तान कर चल रहे हैं, उस तरीके से वह दिन दूर नहीं, जब भारतीय डौगेस जाति वर्ग खुद अपने नाम की गाली जैसे वाक्यों ‘साले कुत्ते की मौत मरेगा,’ ‘कुत्ते की तरह दुम हिलाना,’ ‘साले कुत्ते घूर मत मु झे मैं तेरा खून पी जाऊंगा,’ ‘कुत्तेकमीने कहीं के,’ बोलने पर भी सुप्रीम कोर्ट से रोक लगवा ही लेंगे.
एक बार डौग काट ले तो पहले जमाने में तो पेट में मोटी सूई वाले 14 इंजैक्शन लगते थे, आजकल टिटनैस इंजैक्शन के अलावा रैबीज वैक्सीन वाले बांह में 5 इंजैक्शन लगने लगे हैं. अचानक डौग द्वारा काटे जाने वाला इंसान सदमे में रहता है वह अलग क्योंकि अभी तक चिकित्साजगत में किसी भी डौग के काटने पर यदि रैबीज नामक बीमारी हो जाती है तो वह लाइलाज है. रैबीज के शुरुआती लक्षणों में बुखार, सिरदर्द और कमजोरी होती है. इस के बाद काटने वाली जगह पर दर्द, सुन्नपन और खुजली हो सकती है. वहीं कुछ सालों बाद गंभीर अवस्था में अत्यधिक लार आना, झाग निकलना, पानी से डर लगने लगना (हाइड्रोफोबिया), खाना निगलने में कठिनाई, मांसपेशियों में ऐंठन, बेचैनी होना, भ्रमित होना और गुस्सा आना.
देखा जाए तो सम झदारी ही रोकथाम है. मगर न सम झे को भला आज तक कौन सम झा पाया है. जब आजकल का इंसान अपने क्रोध पर काबू नहीं रख पाता तो जानवर तो जानवर हैं, साहब. भला उन पर आंख मूंद कैसे विश्वास किया जा सकता है.
पिछले दिनों की बात है कि हमारी पत्नी साहिबा गई तो थीं अपनी सहेली के घर उन से मिलने मगर उन के घर के प्रिय पालतू वैक्सीनेटेड डौगेसजी ने कर दिया उन पर आक्रमण. नतीजा, जब तक समयसमय पर उन को 5 रैबिवैक्स-एस वैक्सीन इंजैक्शन नहीं लग गए तब तब न उन्हें चैन न हमें चैन मिला.
खैर साहब, सब की अपनीअपनी फितरत है. किसी को टांग उठा कर शूशू करने की तो किसी को टांग में टांग फंसा कर बिना वजह पटकने की, टांगों में लिपटने की, झपटने की. हमारे फ्लैट के प्रवेशद्वार पर एक डौगेसजी हमेशा जमे रहते हैं. डौगेसजी कोई इंसान नहीं, जानवर हैं. जानवरों में भी वे डौग हैं. वे हमारा लिहाज करते हैं और हम उन का. वे शांत स्वभाव से सच्चे हैं, दिल के पक्के हैं, इसलिए वे हमें घर से बाहर जाते समय अपने पास से मात्र निकल जाने भर का रास्ता देते हैं. वे सम झदार इतने कि कभी किसी पर भी भौंकते तक नहीं. डौगेसजी का हमारे प्रवेशद्वार पर लेटे, बैठे रहना हमें खटकता तो है मगर उन की अनजाने नव स्वामी से भी, स्वामीभक्ति देख हम गदगद हो उठते हैं.
सच कहूं तो डौगेस भी हम से नहीं डरते, इंसान तो हमारे सामने आ कर बिना वजह आंखभौं टेढ़ी कर के हमें ही डराते रहते हैं. इंसानों के अप्रत्याशित आक्रमण से हम भी सहमेसहमे और डरतेडरते से रहने लगे हैं. मैं आम आदमी को देख गुर्राता नहीं हूं, इसलिए लोग मु झे डरपोक सम झते हैं. सोचता हूं कि किसी तरह से 12 महीने कटें और साल पूरा हो और हम रिटायर हों. तब हम अपने इस देश में स्वमार्ग पर तन कर और सीना ठोक कर चलें.
सामने वाले की आंखों में आंखें डाल उस से हाथ मिला सकें. अभी तो कार्यालय हो या घर सामने वाले की हलकी लाललाल आंखें तक सहनी ही पड़ती हैं. घर में पुलाव की जगह खिचड़ी मिले तो चुप्पी और कार्यालय में बड़े साहब की घमंड भरी बेकार अनुचित बातों के आगे डौगेस समान दुम, अरे… अरे… दुम तो मेरे हैं ही नहीं, इसलिए इस प्रकार सम झें कि उन की ‘हां में हां’ मिलानी पड़ती है.
हमारे दरवाजे पर अधिकांश या बैठने वाले डौगेसजी पक्के स्वामीभक्त हैं इसलिए कभी काटते नहीं. विश्वास बनाया है उन्होंने हम पर. डौगेस यदि विद्यालय जाते तो आदमी से ज्यादा काबिल होते क्योंकि आदमी को तो आत्मविश्वास पर सम झाते हुए सदियां बीतीं, मगर आदमी रहा ढाक के तीन पात.
अपनी जलीकंटीली बातों की मार से वह टस से मस नहीं हो सकता क्योंकि विश्वविद्यालयी ज्ञान उस में कूटकूट कर जो भरा है. और अब तो एआई का जमाना है, यह आम आदमी को आदमी नहीं, महापुरुष बना कर ही दम लेगा और डौग को डौग भी नहीं रहने देगा. अभी तक आदमी यह नहीं जान पाया कि सब शक्तियां हमारे अंदर ही हैं. सबकुछ कर सकने वाला आदमी ही डौगी बन गया है. इसलिए एआई को आना पड़ा. आजकल का आदमी, बड़ा स्वामी नहीं बन सकता क्योंकि वह डौगी की तरह धारणा और अंदर की शक्तियों को नहीं पहचानता और न जगाता है. रात को जाग कर, अपने स्वामी को मस्ती की नींद सुलाने वाला डौगी यदि वफादार प्राणी कहलाया तो उस ने आदमी के आगे बिना विश्वविद्यालय जाए यह सिद्ध किया है कि उस के अंदर शत्रु को रोकने यानी अपनी शक्तियों को पहचानने की भरपूर क्षमता है.
हमारे महल्ले के समस्त डौगेसजन एकत्रित हुए और सभा की. उन के सभापति ने आदमियों की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘जब तक आदमी इस दुनिया में हैं, तब तक हम भी उन के साथ ही रहेंगे. भले ही हमारी नसबंदी हो या वैक्सीन लगे. अब इस संसार का नवइतिहास गवाह है कि डौग की मौत अब डौग नहीं मरते. हर चौराहे पर आदमी ही डौग की मौत मरते हैं, जिन में आत्मरक्षा का आत्मविश्वास होता है वे आगे निकल जाते हैं. डौग हो या आदमी हर सिरफिरे के दिन भी फिरते हैं. इसलिए हे आदमियो, चिंता मत करो, न डरो हम से. समाज में अनेक विद्रूपताएं और विसंगतियां हैं, उन पर ध्यान दो. कुछ लेखक, लेखक नहीं रहे, प्रबुद्ध संपादक बन रहे हैं, उन पर ध्यान दो. आदमी, आदमी को काट नहीं रहा तो हत्याएं कर रहा है. आदमी प्रकृति और जंगलों को स्वयं नष्ट कर रहा है.
हमें पता है तुम आदमी हो इसलिए कुछ भी कर सकते हो. हम जानवरों का अस्तित्व मिटाने में भी तुम्हें देर नहीं लगती.
डौगेसजी ने साबित कर दिया है कि जैसे धर्म वाले रातदिन भौंकते रहते हैं, किसी काम के नहीं हैं, वैसे ही वे हैं, वे थे, वे रहेंगे. धर्म की तरह हर जगह डौगेस व्याप्त हैं. कहीं गोदी में चढ़े हैं, कहीं बिस्तर पर साथ सो रहे हैं, कहीं काट रहे हैं तो ऐसा कि दूसरे की जान चली जाए. न धर्म को सुप्रीम कोर्ट कंट्रोल कर सकता है, न डौगेसजी की. डौगेसजी को पूजाअर्चना उसी तरह होती है जैसी धर्म में होती है.
गनीमत यही है कि हम पुराने इजिप्शियनों की तरह डौगेसजी को पूजते नहीं हैं.
