Stories : अंजलि  काफी समय बाद अपने गांव सोनपुर गई थी. अपने दादादादी, नानानानी से खूब लाडदुलार पा कर वह 1 हफ्ते बाद दिल्ली के लिए फिर से लिच्छवी ऐक्सप्रैस से रवाना हुई. 25 वर्षीय अंजलि की दिल्ली में एक अच्छी नौकरी और खुशमिजाज परिवार है, जिस में पापा एक वरिष्ठ प्रोफैसर, मां एक स्कूल टीचर और 17 वर्षीय छोटा भाई मैडिकल स्टूडैंट है.

अंजलि का सफर सुबह 6 बजे शुरू हुआ. जहां उस का 3 एसी कोच का कंपार्टमैंट कुछ अलग ही बनावट का था. उसे एक लास्ट कंपार्टमैंट में लोअर बर्थ मिली थी. अंजलि की बर्थ के आगे कोई सीट नहीं सिर्फ एक प्लेन दीवार थी, साथ ही अंजलि के अलावा उस के कोच में और कोई था भी नहीं. उसे बड़ी हैरानी हुई कि बिहार की कोई ट्रेन खाली कैसे है? फिर उस ने सोचा अभी तो सफर शुरू ही हुआ आगे शायद और पैसेंजर आएं. हर स्टेशन का कुछ सीटों का कोटा होता है.

थोड़ी देर बाद छपरा स्टेशन आया तो वहां से अंजलि को 2 साथी पैसेंजर मिले. दोनों एक प्रेमी जोड़ा दिख रहा था. दोनों की उम्र भी लगभग अंजलि की उम्र के आसपास ही थी. दोनों अपने प्रेम में डूबे साइड बर्थ पर विराजमान हो गए.

कुछ स्टेशन निकलतेनिकलते अंजलि को उन दोनों की प्रेम कहानी और उस प्रेम कहानी के किरदारों के बारे में सब पता चलने लगा. यह भी कि दोनों की कल शाम ही सगाई हुई. आखिर दोनों टेप रिकौर्डर की तरह बज जो रहे थे.

प्रेमी जोड़े की लड़की यानी मनीषा बोली, ‘‘अभिषेक, तुम बहुत मजाकिया हो.’’

अभिषेक बोला, ‘‘नहीं बेबी तुम बहुत

क्यूट हो.’’

मनीषा शरमा कर बोली, ‘‘अभिषेक, जब मैं ने तुम्हें पहली बार देखा था तभी मु  झे पता चल गया था कि तुम ही मेरे लिए बने हो. तुम और तुम्हारी बातें मु  झे बहुत पसंद आती हैं. देखना जब हमारी शादी होगी तो दुनिया यही कहेगी कि खूब जोड़ी बनी है.’’

अभिषेक भी इतरा कर बोला है, ‘‘हां मनु बेबी हमारी जोड़ी सब से बैस्ट है. देखना शादी के बाद मैं तुम्हें पलकों पर बैठा कर रखूंगा.’’

इस प्रेमी जोड़ी की प्रेम भरी बातें अंजलि को परेशान कर रही थीं कि कोई कितनी देर तक इतनी मीठीमीठी बातें, शरमाशरमी और बेबी सोना करता रहेगा. माना प्यार है लेकिन क्या यह दोनों नौर्मल भाषा या बरताव नहीं कर सकते? क्या दोनों में कभी नौर्मल बात भी होती है? अंजलि के मन में उठे इस प्रश्न का जवाब उसे धीरेधीरे मिलने लगा. कुछ स्टेशन निलकते ही दोनों की भाषा और बरताव नौर्मल हो गया.

अभिषेक बोला, ‘‘कैसी बात कर रही हो मनीषा. भला शादी के बाद हम तीर्थ जाएंगे. अरे कपल हनीमून पर गोवा, शिमला जाते हैं. तुम मु  झे तिरुपति ले जाना चाहती हो और वहां मन्नत पर मेरा मुंडन भी करवाना चाहती हो. भला मेरी मरजी के बिना तुम मेरे ही नाम पर ऐसी मन्नत कैसे ले सकती हो? गंजा हो जाऊं? अब यह कैसा हनीमून हुआ?’’

मनीषा भी उखड़ कर बोली, ‘‘देखो अभिषेक तुम्हें पता है मैं कितनी धार्मिक हूं. अगर अपने नए जीवन की शुरुआत करने के लिए कोई मन्नत मांगी तो क्या अब कुदरत का आशीर्वाद लेने के लिए मैं तुम्हारी इजाजत लूं? मैं क्या नौकर हूं तुम्हारी?’’

अभिषेक गुस्से से बोला, ‘‘नहीं लेकिन यह शरीर तो मेरा है,’’  फिर एक लंबी सांस ले अभिषेक ने कहा, ‘‘देखो नई शुरुआत पर कुदरत का आशीर्वाद लेना कोई गलत नहीं. लेकिन हनीमून पर तीर्थ जाना तो गलत है. मेरा यह कहना है कि हनीमून से आ कर तीर्थ चल लेना.’’

मनीषा फिर से उखड़ कर बोली, ‘‘नहीं मैं तिरुपति ही जाऊंगी. तुम्हें साथ चलना हो तो चल लेना, नहीं तो मैं अकेले ही चल जाऊंगी.’’

मनीषा की जिद सुन कर अभिषेक अपना माथा पकड़े था और अंजलि अपनी हंसी दबा रही थी. उसे दोनों की बहस में अभिषेक सही लगा क्योंकि उस ने दोनों का दिल रखने का रास्ता निकाल लिया था. हनीमून पर गोवा जाने का और हनीमून के बाद तिरुपति. लेकिन मनीषा को अभिषेक का निकाला रास्ता न दिखा और न ही सम  झ आया. वह तो सिर्फ अपनी जिद में बैठी थी, साथ ही अभिषेक से बिना पूछे ऐसी कोई मन्नत करना भी अंजलि को गलत लगा.

प्रेमी जोड़े के कुछ देर के मौनव्रत के बाद अभिषेक ने कहा, ‘‘मनीषा मान जाओ न. देखो तुम्हारे लिए मैं तुम्हारे गांव आया, तुम्हारे दादादादी से इतनी सिफारिश भी की और चाची की उखड़ी बातें भी सुनीं. सब को हमारी शादी के लिए मना भी लिया. अपने मांबाप के बिना सगाई भी की.’’

मनीषा फिर से उखड़ कर बोली, ‘‘तो कोई एहसान नहीं किया.’’

मनीषा का यह ताना अभिषेक को चुभा साथ ही एक अनजान यानी अंजलि के सामने मनीषा का यह उखड़ा स्वर उसे बेइज्जती सा महसूस हुआ. उस ने इशारे में मनीषा को शांत होने को कहा और खुद भी चुप कर खिड़की से बाहर देखने लगा.

मगर मनीषा बाज नहीं आई. वह अभिषेक को खरीखोटी सुनाती रही, ‘‘मेरी चाची ने तुम्हें बातें सुनाईं जैसे तुम्हारी बूआ तो बहुत भजन गाती हैं.’’

अभिषेक उसे हैरान हो देखने लगा.

मनीषा बोलती रही, ‘‘क्या फर्क पड़ता है मेरे नौकरी करने या न करने से तुम्हारी बूआ को जो मु  झे सलाह दे रही थीं कि देखो मनीषा शादी के बाद भी जौब करती रहना. लड़कियों को अपने कैरियर को नही छोड़ना चाहिए.’’

अभिषेक अपना माथा पकड़ बोला, ‘‘तो गलत क्या बोला

उन्होंने? अरे तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हें ससुराल वाले ऐसे मिल रहे हैं जो सपोर्ट करते हैं. वरना तो लड़कियों का अपना कैरियर छोड़ कर, सपने छोड़ कर दिनभर घर में रहना पड़ता है.’’

मनीषा मुंह बना कर बोली, ‘‘अरे रहने दो. उन्हें कोई मेरे सपने की नहीं पड़ी. उन्हें तो लगता है कि शादी के बाद उन के भतीजे यानी तुम्हारा खर्चा न बढ़ जाए. इसलिए मु  झे नौकरी करने की सलाह दे रही थीं. अरे खुद तो घर में पड़ी रहती हैं, मजे से दिनभर टीवी देखती हैं और मु  झे नौकरी करते रहने को बोल रही थीं. क्या मु  झे अपने घर में आराम से घरपरिवार का सुख नहीं लेना चाहिए?’’

अभिषेक हैरानी से मनीषा को सुन रहा था.

‘‘और तुम्हारी मां भी कम नहीं. पहली बार जब मु  झ से मिलीं तो पूछ रही थीं कि नौकरी और घर कैसे संभालोगी? अगर मैनेज न हो तो मु  झे बुला लेना. मैं तुम्हारी हैल्प कर दूंगी. हैल्प सीधासीधा नहीं कह रही थीं, तुम बाहर जा कर काम करो और मैं अपने बेटे का घर देखूंगी. अरे इतने साल से तुम अकेले ही रह रहे थे न. अब उन को यहां क्यों आना है घर देखने? मैं सब सम  झती हूं उन्हें इसलिए आना है ताकि उन का बेटा उन के हाथ से न निकल जाए. उन्हें मु  झ पर कंट्रोल चाहिए.’’

मनीषा की बातें सुन अभिषेक का मन जल चुका था लेकिन वह चुप रहा क्योंकि वह एक पब्लिक ट्रांसपोर्ट में अपनी निजी जीवन का और कचरा होते नहीं देखना चाहता था. मनीषा को अब अभिषेक की चुप्पी भी गवारा नहीं हो रही थी. वह फिर उखड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों मां का नाम क्या लिया, सांप सूंघ गया तुम्हें.’’

अभिषेक अब चुप नहीं रहा और मनीषा को डांटते हुए बोला, ‘‘चुप कर जाओ तुम. बहुत हो गया अब. इतनी देर से मेरे परिवार की खिल्ली उड़ा रही हो जबकि असली कंजर तो तुम्हारे घर वाले हैं. वह तुम्हारा फूफा जो गांव में जातपांत का नारा लगाता हुआ, मुखिया पद के लिए खड़ा होना चाहता है. अरे जो लोगों में जाति पर भेदभाव करे, वह कैसे अच्छा नेता बनेगा और तुम्हारी मुंबई वाली चाची और दिल्ली वाली मां जो इस बात से नाराज हैं कि मेरे बैस्ट फ्रैंड के अहीर जात का लड़का है और मैं तुम्हारे घर रुकने के बजाय उस के घर रुक गया. भला यह कोई बात हुई. जब ऐसी पिछड़ी सोच को ले कर चलना है तो पढ़ाईलिखाई करने का क्या फायदा? क्यों तुम लोग मैट्रो शहरों में, दिल्ली, मुंबई में सब तरह के जाति वाले लोगों के साथ उठतेबैठते हो, काम करते हो? यही सब करना तो अपने गांव में ही क्यों नहीं पड़े रहते?’’

मनीषा ने जवाब दिया, ‘‘अरे हम उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. हमें अपनी

मर्यादा बनाई रखनी चाहिए. अरे मैं ने तुम से प्यार किया तो भी अपनी जाति का मान रखा. सोचा हम दोनों का एक राज्य, एक डिस्ट्रिक्ट और एक ही जाति है तो हम दोनों की बहुत अच्छी निभेगी. लेकिन मु  झे क्या पता था कि तुम अंदर से इतने मौडर्न हो चुके हो कि अपने मानसम्मान का ध्यान ही नहीं रखोगे. इस बार तो तुम अपने उस छोटी जात वाले दोस्त के यहां रुक गए लेकिन आगे ऐसा नहीं चलेगा. अपनी दूरी बना कर रखो ताकि मेरी और मेरे परिवार की इज्जत बनी रहे नहीं तो इस तौरतरीके से तो मेरे घर वाले हमेशा तुम से नाराज रहेंगे.’’

अभिषेक मनीषा को गंभीर भाव से देख कर बोला, ‘‘मेरे इन्हीं तौरतरीकों से तुम इंप्रैस हुई थी न तो अब क्या हुआ?’’

मनीषा ने एक लंबी सांस ले कहा, ‘‘हां ठीक है मैं तुम्हारे तौरतरीकों से इंप्रैस हुई लेकिन तुम्हें यह भी सोचना चाहिए कि किस के साथ कौन सा तौरतरीका रखना है. ऊंचनीच का दायरा अपनी कंपनी में मत रखो, लेकिन निजी जीवन में, घरपरिवार में यह दायरा बना कर रखना पड़ेगा और तुम से इंप्रैस होने के और भी कई वजहें थीं जैसे तुम और मैं एक ही कास्ट के हैं. हमारा समाज एक है और तुम ही क्यों तुम्हारे परिवार वालों को भी इन बातों का खयाल रखना चाहिए. शहर में रह कर मौडर्न बनने का मतलब यह नहीं कि अपने समाज के नियम ही भूल जाओ.’’

अभिषेक को अपने घर वालों के लिए मनीषा की उखड़ी बातें सुनते काफी समय हो गया था. दूसरी ओर अंजलि भी चिप्स खाते हुए मनीषा के ड्रामे का मजा ले रही थी. मनीषा की बातें सुन अंजलि मन ही मन यही कह रही थी कि क्या नौटंकी चल रही है. पहले तो ये दोनों तोतामैना बने हुए थे. क्यूट बेबी, स्वीट बेबी चल रहा था, अब सिर्फ ऊंची जात नीची जात. इस लड़की को देख यही लगता है कि यह लड़का बुरा फंसा है. बताओ पढ़ेलिखे का क्या मतलब है इस का. बेचारा यह लड़का.’’

उधर मनीषा बोले ही जा रही थी, ‘‘मेरे लिए तो कई रिश्ते हैं. अभी भी हमारे समाज का एक बड़े कुल का लड़का मेरे रिश्ते की राह में है. मामाजी तो यही चाहते हैं कि मैं उसे पसंद करूं. यहीं बनारस में मामाजी की पहचान में है. लेकिन मैं ने तुम्हें चुना क्योंकि तुम्हारी सोचथोड़ी खुली है. तुम्हारे साथ मु  झे कोई रोकटोक नहीं होगी.’’

मनीषा बहुत सी बातें बोलती रही और अभिषेक चुप कर सुनता रहा. फिर कुछ देर बाद अभिषेक मनीषा को एक व्यंग्य भरी मुसकान दे बोला, ‘‘तो तुम मु  झ से प्यार इसलिए करती हो क्योंकि मैं तुम्हारी ही जात का हूं और मेरे विचारों की वजह से तुम्हें मेरे साथ छूट भी मिलेगी?’’

मनीषा अभिषेक की ओर मुंह बना बोली, ‘‘कहना क्या चाहते हो? अरे कोई प्यार करता है तो शादी के इरादे से करता है तो शादी में देखने वाली बातें अगर मैं ने पहले ही देखपरख लीं तो क्या हुआ?’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘नहीं तुम ने ठीक किया. लेकिन यह कौन सी बात हुई कि मेरी जिस सोच के कारण तुम्हें अपनी आजादी मिल रही है तो वह सही है और जब उसी सोच से मैं दूसरों के साथ एकजैसा व्यवहार करता हूं, दोस्ती निभाता हूं तो वह गलत. मतलब जब तक मेरी सोच से तुम्हें फायदा हो वह तब तक ही सही है.’’

मनीषा कुछ और बोलती कि अभिषेक बोला, ‘‘देखो अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं तुम चाहो तो उस बनारस वाले लड़के से मिल सकती हो.’’

मनीषा अभिषेक की बात सुन कुछ देर तो चुप बैठी लेकिन फिर एकदम बोल पड़ी, ‘‘ठीक है तुम यही चाहते हो तो मैं जा रही उस से मिलने. कुछ देर बाद ही बनारस आएगा.’’

मनीषा का जवाब अभिषेक के दिमाग में खलबली मचा गया. उस ने सोचा बात ज्यादा बिगड़ने से पहले मनीषा को मना लेता हूं, माफी भी मांग लूंगा. प्यार में अगर एक   झुक जाए तो क्या बुरा है. मगर उस के कुछ कहने से पहले ही मनीषा बोली, ‘‘मु  झे तो पता ही था यह रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चलेगा. अरे एक जात होने से क्या हुआ मन भी एक होना चाहिए. लेकिन तुम्हारे मन में मौडर्न कल्चर की आग लगी है. अरे जिसे अपनी जात के सम्मान की लाज नहीं, शादी पर तीर्थ जाना जिसे रास नहीं आता हो, बहू का आराम जिस के घर वालों को बेटे का बड़ा खर्चा नजर आता हो भला उस के साथ और उस के परिवार में मैं कितने दिन निभा पाऊंगी. तुम से अच्छे तो वे बनारस वाले ही हैं जो समाज के बनाए नियमों का मान करते हैं. मेरी तो बुद्धि ही खराब हुई थी कि तुम्हें पसंद किया.’’

मनीषा के ताने चलते जा रहे रहे थे और अभिषेक का दिमाग उसे सोचने पर मजबूर कर रहा था कि नहीं माफी मांग कर कहीं और न फंस जाऊं.’’ इसलिए वह चुप्पी लगाए बैठा. लेकिन जब मनीषा सीट पर फैला अपना सामान समेटने लगी तो अभिषेक व्याकुल हो उठा.

वह मनीषा से बारबार कहता, ‘‘क्या कर रही हो? सामान क्यों पैक कर रही हो? अभी हमें बहुत आगे जाना है. मनीषा इतना नाराज भी नहीं होते. देखो मैं तुम्हारी बात तो चुपचाप सुन रहा हूं. अब इतना भी क्या? मान जाओ न. ऐसे रूठो नहीं.’’

मगर मनीषा अनसुना करती गई और अपना सामान पैक किसी को कौल लगा बोली, ‘‘मामा मैं 10 मिनट में बनारस पहुंचने वाली हूं, मु  झे लेने आ जाना.’’

इतना सुनते ही अभिषेक अपनी सीट के कोने में दुबक गया और बड़ी हैरानी से उसे देखने लगा.

दूसरी ओर मनीषा और अभिषेक का ड्रामा देखते हुए अंजलि के चिप्स खत्म हो

गए थे और उस के पास कोई स्नैक बचा नहीं था ड्रामे का मजा लेते खाने को.

मनीषा ने कहा, ‘‘तुम्हारे साथ मेरा बहुत समय खराब हुआ. मामा की बात पहले ही मान ली होती तो ठीक था. तुम और तुम्हारा परिवार मेरे लायक ही नहीं.’’

अभिषेक देखता रहा और मनीषा अपना सामान ले बनारस स्टेशन उतर गई. मनीषा के जाने के बाद अभिषेक कुछ देर तो शांत बैठा रहा मगर कुछ देर बाद ही रोने लगा. पहले मौन, फिर थोड़ा सुर भरा और फिर एकदम बेसुरा. अभिषेक को यों रोता देख अंजलि के हाथपांव फूलने लगे कि अब वह क्या करे? उसे सम  झ नहीं आ रहा था कि अभिषेक के पास जा उसे धीरज बंधाए या नही. बड़ी हिम्मत कर अंजलि ने अभिषेक के थोड़ा पास जा कर के पानी की बोतल पकड़ाई. अभिषेक ने दूसरे के सामने और लज्जित होने से खुद को रोका और अपने आंसू पोंछ पानी की बोतल ले ली. अभिषेक ने 2 घूंट पानी पी कर के बोतल अंजलि को लौटाई और फिर अपना मुंह धोने चला गया.

कुछ देर बाद एक चाय वाला आया. अंजलि ने एक खुद ली और एक चाय,चाय वाले को इशारा कर अभिषेक को देने को कहा. अभिषेक ने चाय ले ली. दोनों ने खामोश रह चाय पी. अंजलि अपने फोन में व्यस्त हो गई और अभिषेक खिड़की से बाहर देखने लगा. कुछ देर बाद शाम होने लगी. अभिषेक पर दिखाई अंजलि की हमदर्दी अब अंजलि के लिए चिंता बनने लगी. एक तो पहले से कोच में पैसेंजर की कमी. अंजली को खटक रही थी और अब ऊपर से पूरे कोच में सिर्फ वे दोनों और बगल की बर्थ में भी सिर्फ 2 बुजुर्ग. अंजलि का अभिषेक के साथ यों होना उसे अजीबोंगरीब खयालों से घेरने लगा. उस के मन में कभी आता कहीं उस का चायपानी देना, अभिषेक अंजलि की कोई दिलचस्पी न सम  झे या वह यह न सम  झे कि अंजलि अकेली है तो उस पर दांव खेल सकता है या अभिषेक फिर से रोने लगा तो क्या उसे आगे बढ़ कर दिलासा देना चाहिए? अंजलि को कभी तो अभिषेक से हमदर्दी हो रही थी तो कभी उस की नियत पर शक.

अंजलि अपने दिमाग की उधेड़बुन में थी और अभिषेक अपने दुख में. घंटा

गुजर गया लेकिन कोई चूं भी न की. अंजलि ने जब रात में अपने खाने का डब्बा खोला तो एक और डब्बा उस के सामने आ गया. अभिषेक उसे अपने डब्बे से हलवा एक पेपर प्लेट में रख कर औफर कर रहा था. अंजलि ने पहले सोचा ले लूं लेकिन फिर उस के आगे बढ़ते हाथों को एक खयाल ने रोक दिया कि अगर इस में कोई नशे की दवा मिली होगी तो?’’ अत: अंजलि ने भयवश हलवा लेने से इनकार कर दिया और कहा, ‘‘मु  झे मीठा इतना पसंद नहीं.’’

अभिषेक अपना डब्बा ले अपनी सीट पर आ कर बैठ गया और हलवा खाने लगा. उसे खाता देख अंजलि मन ही मन बोली कि यह तो वही हलवा खा रहा है. इस का मतलब कुछ भी नहीं मिलाया इस भले मानुष ने. फालतू में मैं डर गई और हलवा नहीं खाया. उस ने अपनी एक रोटी ही खत्म की थी कि अभिषेक हलवा खातेखाते रोने लगा. अब उस का रोना देख अंजलि आगे रोटी नहीं खा पाई.

अंजलि ने मन को बांधा और अभिषेक की बगल में जा बैठ गई. अंजलि को देख अभिषेक अपने आंसू छिपाने लगा.

अंजलि ने कहा, ‘‘एक बार उसे फोन कर के देख लो. शायद बात संभल जाए.’’

अभिषेक ने उसे अपना फोन दिखाया. वह अब तक 15 कौल कर चुका था, जिस में एक का भी जवाब मनीषा ने नहीं दिया था. अभिषेक बोला, ‘‘वह मु  झे ब्लौक कर चुकी है,’’ और फिर तेज रोने लगा.

उस का रोना सुन बगल के कंपार्टमैंट में एक बर्थ से एक बुजुर्ग जोर से बोले, ‘‘आजकल के लड़कालड़की का ड्रामा हर जगह शुरू हो जाता. अरे अपना मामला ट्रेन से उतर कर निबटा लेना तुम दोनों. मु  झे चैन से सोने दो.’’

बुजुर्ग की बात सुन अभिषेक अपनी आवाज पर करने के लिए सिर्फ सिसकने

लगा और अंजलि इस बात से हैरान हुई कि बुजुर्ग उसे और अभिषेक को जोड़ा सम  झ रहे थे.

अभिषेक ने सिसकते हुए अंजलि से कहा, ‘‘मु  झे माफ करना मेरी वजह से तुम परेशान हो रही हो. लेकिन मैं भी क्या करूं आंसू रुकते ही नहीं और दिमाग भी नहीं सम  झ पा रहा कि मैं सही था या गलत.’’

अंजलि ने बिना देर लगाए कहा, ‘‘तुम सही थे. अगर तुम्हारी सोच सब को एकसमान इज्जत देने की, व्यवहार करने की है तो इस में गलत क्या है? यह तो इंसानियत ही है न. तो इंसान को अच्छी नियत रखने में कैसी शर्म या खेद?’’

अभिषेक को अंजलि के बातें छू गईं. उस ने अपने आंसू पोंछे और कहा, ‘‘ठीक कहा तुम ने. मु  झे खुद पर प्रश्न नहीं उठाने चाहिए. मैं ने तो सिर्फ सच कहा और ऊंचनीच के भेदभाव की निंदा की थी.’’

फिर एक गहरी सांस ले अभिषेक ने कहा, ‘‘चलो खाना खाते हैं. मेरी वजह से तुम ने भी खाना छोड़ दिया था.’’

अंजलि ने थोड़ा सोचा फिर अपना खाना ला खिसक कर अभिषेक के साथ बैठ गई. अंजलि के डब्बे में रोटीसब्जी थी और अभिषेक के पास सिर्फ हलवा.

अंजलि ने पूछा, ‘‘क्या सिर्फ हलवा खाते हो?’’

अभिषेक ने जवाब दिया, ‘‘अरे नहीं. वह खाना मनीषा ले कर आई थी अपने घर से. मु  झे तो मेरे दोस्त की मां ने हलवा बना कर था. वैसे तो साथ होती तो भी नहीं खाती. उस की ऊंची जात उसे रोक देती.’’

अंजलि ने अभिषेक की बात सुनते ही बिना संकोच किए हलवे का एक निवाला खा लिया और कहा, ‘‘मैं तो खा सकती हूं मैं भी अहीर हूं न. वैसे बहुत अच्छा बना है.’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘अरे तुम और ले लो बहुत सारा है.’’

अंजलि ने भी अपनी रोटीसब्जी अभिषेक के साथ शेयर की. कुछ देर में अंजलि हलवे का पूरा डब्बा चट कर गई.

इतना मीठा खाने के बाद अंजलि को सुस्ती छा गई. वह बिना संकोच किए अपने बर्थ पर जा सो गई. अभिषेक उस की टांगों की जगह दे कर बैठा रहा और खिड़की से बाहर का धुंधला दृश्य देखता रहा. कुछ देर बाद उस की आंख खुली तो देखा कि अभिषेक वहां नहीं था. उस ने सोचा वह टौयलेट गया होगा. जब कुछ देर बाद भी वह नहीं आया तो अंजलि को एक भय ने घेर लिया कि कहीं वह ट्रेन से कूद कर मर… अंजली फट से ट्रेन के साइड के बाथरूम में गई कोई नहीं था. दरवाजा बंद था. कोच जांचने लगी. एसी कोच से भागतेभागते जब अंजलि स्लीपर कोच के आखिरी कोच पर पहुंची तो देखा अभिषेक एक कोने में टकटकी लगा कुछ देख रहा है.

अंजलि ने जब ध्यान दिया तो देखा कि कोच के फर्श पर एक छोटे कपड़े के टुकड़े पर एक दरिद्र महिला अपने लगभग 2 साल के बच्चे को ले बैठी है. मां और बेटा दोनों अपने जीवन की सारी मुसीबतों से दूर उस पल सिर्फ अपने खेल में लगे थे. जहां मां आंचल में उसे छिपाती और वह जोर से हंस देता. दोनों का खेल अभिषेक को भी अपने दुख से दूर कर रहा था. इस खेल को देख अंजलि भी थोड़ा भावुक हुई लेकिन अभिषेक के यों गायब होने से वह थोड़ा नाराज भी थी जो अभिषेक ने उस के चेहरे से भांप लिया.

अंजलि बिना कुछ बोले वापस चल दी और अभिषेक भी उस के पीछे चल पड़ा. अंजलि अपनी सीट की ओर बढ़ी ही थी कि अभिषेक ने कहा, ‘‘मु  झे नहीं पता था कि तुम…’’

‘‘क्या तुम?’’ अंजली गुर्राई. ‘‘भला यह क्या हरकत हुई कि बिना बताए ट्रेन के आखिरी डब्बे में चले गए. यहां मेरा गला सूख रहा था कि तुम कहीं ट्रेन से कूद तो नहीं गए.’’

‘‘क्या?’’ अभिषेक एक मौन के बाद बोला, ‘‘माफ करना मु  झे नहीं पता था तुम्हें मेरी चिंता होगी. तुम बैठो पानी पीयो.’’

दोनों सोच ही रहे थे कि और क्या बात करें कि अंजलि ही एकदम बोल पड़ी,

‘‘वैसे तुम दोनों कालेज से साथ थे?’’

अभिषेक अपने प्यार का ब्योरा देने लगा, ‘‘हां. कालेज से थोड़़ी अच्छी दोस्ती रही और कालेज बाद प्यार शुरू हुआ. जब मेरी प्लेसमैंट हुई तब से शुरू हुआ शायद. कालेज में शायद मैं ही उस पर मरता था. कालेज में वही एक लड़की थी जो चूडि़यां डाल कर आती थी और उस के बाल कभी बंधे तो कभी खुले लेकिन हमेशा सुंदर दिखते थे. कल्चरल फैस्ट में जब वह नाचती थी तो मन में तरंग जाग जाती थी. लेकिन जब कालेज से निकला जौब में पड़ा तो रोज उसे देखना मुश्किल हो गया. एक दिन अचानक एक दोस्त के जन्मदिन पर उस से खुल कर बात हुई. दोनों के दिल मिले. वीकैड का तो बेसब्री से इंतजार रहता था. उस के साथ घूमनाफिरना, उस की बातों का हुक्म बजाना. सब कितना अच्छा था.’’

अभिषेक मनीषा की तारीफों के पुल बांधते रहा था की अंजलि ने उसे टोकते हुए पूछा, ‘‘वह काम क्या करती थी? तुम्हें क उस में सब से ज्यादा क्या पसंद था?’’

अभिषेक ने फट से जवाब दिया, ‘‘मनीषा ने ग्रैजुएशन की थी. उसे टीचर बनना था लेकिन पीएचडी में बहुत पढ़ना पड़ता है. इसलिए उस ने सोचा कि कोई आम जौब ही कर ले. तो अब वह एक औफिस में औपरेशन डिपार्टमैंट में काम कर रही है. मगर शादी के बाद सोचा था उस ने कि जौब छोड़ देगी. जौब और घर दोनों साथ नहीं कर पाती न. वैसे भी बहुत थक जाती है औफिस आनेजाने से. तो मैं ने भी कहा हां बेबी तुम आराम करना. मैं हूं न, इतनी अच्छी आईटी जौब है मेरी तो तुम्हें काम करने की क्या जरूरत. औफिस में बहुत काम करना पड़ता है उसे, कभीकभी तो टैंशन से   झुर्रियां भी आ जाती हैं और वर्क प्रैशर से तबीयत भी खराब हो जाती है. बहुत सैंसिटिव है न.’’

‘‘और तुम गधे.’’

अभिषेक को अंजलि के ये शब्द अच्छे नहीं लगे.

वह कोई प्रतिक्रिया देता कि अंजली ने कहा, ‘‘तुम्हें दिखाई नहीं देता, तुम्हें मनीषा से सिर्फ अट्रैक्शन था प्यार नहीं. अरे प्यार इंसान की बातों, उस के हावभाव, चरित्र, उस की सोचसम  झ से होता है लेकिन तुम तो सिर्फ उस की सुंदरता पर ही टिके हो, उस की कोई भी एक खास बात या हुनर या सोच तुम ने बताई नहीं. अरे तुम ने कभी यह सोचा कि मनीषा अपने सपने या कैरियर में सीरियस नही हुई तो तुम्हारे लिए क्यों होगी. पीएचडी नहीं की क्योंकि पढ़ना बहुत पड़ता है. भला यह क्या बात हुई? क्या कोई खिलाड़ी यह कभी कहेगा कि मु  झे क्रिकेटर बनना था लेकिन उस में क्रिकेट खेलना पड़ता है इसलिए क्रिकेटर नहीं बना.’’

अभिषेक को अंजलि की बात में बहुत ठोस तर्क दिखा. वह टकटकी लगा उसे सुनता रहा, ‘‘और अगर वह पीएचडी कर भी लेती तो बहुत खराब टीचर बनती. अरे जो टीचर धर्मजात की बात करे, ऊंचनीच व्यवहार करे भला वह क्या बच्चों को एकता और समानता का पाठ सिखाएगी और किस ने कहा जौब के साथ घर नहीं संभाल सकते? मेरी मां भी काम करती हैं टीचर हैं. उन्होंने पूरा घर संभाला, हम 2 भाईबहन पर भी पूरा ध्यान दिया, मेरे पापा प्रोफैसर हैं उन्होंने ने भी मां का पूरा साथ दिया और तुम्हारी मनीषा थोड़ा सा काम कर के सैंसिटिव बन गई.

‘‘आज की लड़कियां इंडिपैंडैंट बनना चाहती हैं, ऐसा साथी चाहती हैं जो उन से कहे कि तुम सपने पूरे करो, कैरियर में आगे बढ़ो, मैं तुम्हारे साथ दूंगा. लेकिन तुम्हारी मनीषा सिर्फ चूडि़यां खनखनाना चाहती है. उसे तो खुश होना था यह सुन कर कि तुम्हारी बूआ उसे कैरियर में सपोर्ट करना चाहती हैं लेकिन वह उलटा नाराज हो गई और तुम्हें यह भी नहीं दिखता कि वह भी तुम से प्यार नहीं करती थी. तुम एक ही समान जात के लड़के हो, एक अच्छी कंफर्टेबल लाइफ दे सकते हो इसलिए वह तुम्हारे साथ थी. तुम्हारे साथ उस कोई रोकटोक नहीं थी. तुम्हारी मौडर्न थिंकिंग उस की सहूलियत के लिए अच्छी थी, वह अपनी पुरानी सोच के साथ तुम्हारे साथ मौडर्न लाइफ

भी जी सकती थी सिर्फ इसलिए ही तो तुम्हारे साथ थी और इस बात को तो उस ने खुद

स्वीकार किया.’’

अभिषेक को इस बात की भनक तो थी लेकिन वह सब उसे स्वीकारना नहीं चाहता था लेकिन अंजलि की बात सुन कर अब उसे स्वीकारने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि सत्य को प्रमाण ही क्या.

अभिषेक ने एक गहरी सांस ली कहा, ‘‘पता है तुम ने मु  झे नींद से उठा दिया. उस नींद से जिस में मैं मनीषा के व्यवहार, उस के आचरण को नजरअंदाज कर सिर्फ उस की खूबसूरती के सपने देख रहा था. लेकिन अब मैं सचाई देखूंगा सपने नहीं.’’

अंजलि ने भी एक ठहरी नजरों से अभिषेक को देखा. अभिषेक ने कहा, ‘‘अच्छा तुम कुछ तो बताओ अपने बारे में. मेरी तो पूरी गाथा तुम जान ही गईं. अब तुम कुछ सुनाओ.’’

अंजलि ने एक मुसकान ले कहा, ‘‘मेरी गाथा सिंपल है. सिंगल हूं और एक मार्केटिंग कंपनी में ऐग्जिक्यूटिव हूं. मु  झे घूमना पसंद है, अलग शहर खासकर छोटे शहर. उन के कल्चरल, खाने, आर्ट को ऐक्स्प्लोर करना पसंद है. यह देखो…’’ अंजलि ने उसे अपने फोन में कुछ शहरों के फोटो, आर्ट, खानपान के फोटो और कहानियां सुनाईं.

‘‘मेरी जौब में जब दूसरे किसी शहर में जाने को मिलता है तो मैं वहां की लोकल चीजों को जरूर ऐक्स्प्लोर करती हूं, लोकल लोगों से कनैक्ट करती हूं. पता है यों लोगों से जुड़ने पर आप को बहुत बातें पता चलती हैं जो हमारे प्रोफैशन में काम आती हैं. आखिर मार्केटिंग है तो कस्टमर के लिए ही और कस्टमर तो आम इंसान ही है.’’

अभिषेक अंजलि की बातों से बहुत प्रभावित हो रहा था. उसे अंदरअंदर ऐसी आवाज आ रही थी कि कहां मैं एक लड़की की सिर्फ शक्ल पर मिटने को तैयार था जबकि यहां शक्ल, अकल, अच्छा व्यवहार, तर्कवितर्क का भंडार है.

अंजलि उसे बताती जा रही थी और वह उसे बेसुध ताके जा रहा था. कुछ देर बाद अंजलि के प्रश्न ने उसे सचेत किया, ‘‘क्या हुआ तुम्हें? कुछ बोलो भी?’’

अभिषेक बोला, ‘‘मु  झे अपने साथ ले चलो.’’

अंजलि अभिषेक की बात सुन बोली, ‘‘ले चलूं? लेकिन कहां?’’

अभिषेक अब अपनी बात को ठीक करते हुए बोला, ‘‘मेरा मतलब है जब तुम ऐसे किसी सफर पर निकलो तो मु  झे भी ले चलना. मैं भी यह ऐक्सपीरियंस चाहता हूं.’’

अंजलि उसे हैरानी से देख बोली, ‘‘अब तुम अपनी आईटी की जौब छोड़ मेरे साथ मार्केटिंग रिसर्च में घूमोगे?’’

अभिषेक ने जवाब देने के बजाय सवाल किया, ‘‘क्या हम दोस्त बन सकते हैं? देखो तुम ने मु  झे ऐसे समय में संभाल लिया, मेरी गलती भी दिखाई. तुम्हारे जैसा दोस्त साथ हो तो परेशानियों को सम  झने, उन में संभलने में मदद होती है. तुम्हारा साथ मु  झे बहुत अच्छा लगा.’’

अंजलि अभिषेक की बात सुन कर कुछ न बोली.

अभिषेक फिर से बोला, ‘‘मैं अच्छा लड़का हूं. तुम चाहो तो मना कर दो, बस मु  झे आवारा मत सम  झना या मु  झ से घबराना नहीं.’’

अंजलि हम्म्म कर अपनी सीट पर जा सो गई क्योंकि अब रात का समय था और कोच की बत्तियां बंद हो रही थीं. अभिषेक को नींद आ रही थी लेकिन अंजलि उस के बारे में क्या सोच रही होगी यह सवाल उसे सोने नहीं दे रहा था. वहअपनी सीट पर करवट बदलता रहा.

सुबह 6 बजे जब ट्रेन आनंद विहार स्टेशन पर लगी तो अभिषेक की आंखें ही नहीं खुल रही थीं.

अंजलि ने उसे जोर से   झं  झोड़ा, ‘‘अरे अब उठो. रातभर तो सीट पर लोटपोट हो रहे थे और अब आंखें नहीं खोल रहे. जागो स्टेशन आ गया है.’’

अंजलि की डांट ने अभिषेक के कानआंख के परदे खोले. उस ने   झटपट अपना सामान समेटा और अंजलि के साथ स्टेशन पर उतर गया. स्टेशन के बाहर दोनों एकसाथ आए और फिर एकदूसरे को अलविदा कर सोचने लगे.

अंजलि ने अभिषेक से पूछा, ‘‘दिल्ली में कहां?’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘दिल्ली नहीं नौएडा. सैक्टर 40. और तुम?’’

अंजलि ने कहा, ‘‘सिविल लाइंस के पास.’’

अभिषेक ने जट से कहा, ‘‘सुना है वहां एक फेमस नाश्ते वाला भी है.’’

अंजलि ने भी   झट से कहा, ‘‘एक नहीं वहां तो बहुत हैं. अकसर संडे को हम नाश्ता बाहर ही करते हैं, काफी अच्छा बनाते हैं.’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘हां आज भी संडे है. अच्छा है तुम ऐंजोए करना.’’

दोनों को बातचीत जारी रखने के और बहाने नहीं मिल रहे थे तभी अंजलि ने कहा, ‘‘ठीक है तो मैं औटो ले लेती हूं.’’

अभिषेक ने भी हामी भरते हुए हुए कहा, ‘‘हां मैं भी चलता हूं.’’

दोनों एकदूसरे से नजरें चुराते अगलअगल ओर चल दिए. अभिषेक कुछ 20 कदम ही गया होगा कि अंजलि पीछे से औटो से उठ आई और उस से बोली, ‘‘सुनो अगर मेरे पेरैंट्स के साथ नाश्ता करने में कंफर्टेबल हो तो चलो.आज संडे है न तुम्हें वह फेमस नाश्ता मिल जाएगा.’’

अभिषेक मुसकान के साथ   झट से औटो में बैठ बोला, ‘‘हां क्यों नहीं. मैं कोई चोर थोड़ी हूं कि अनकंफर्टेबल होऊंगा, इंजीनियर हूं भई.’’

5 साल बाद: ‘‘सुनो चुप कर के बैठ जाओ वरना हाथ मलते रह जाओगे.’’

‘‘अच्छा भला मैं क्यों हाथ मलूंगा?’’

‘‘क्योंकि अगला स्टेशन बनारस ही है. सोच लो अगर मैं ने 5 साल

पहले की घटना दोहरा दी तो क्या होगा तुम्हारा? इस बार न तुम कुंआरे हो और न ही इस ट्रेन में कोई लड़की जो तुम्हारा दर्द बांटने आएगी.’’

अभिषेक ने चारों ओर देखा कोच सिर्फ बुजुर्गों से भरा पड़ा था.

‘‘देख लिया अब बैठ जाओ,’’ अंजली की धमकी सुन वह मुंह बना कर बैठ गया. फिर मन ही मन एक हंसी लिए बोला, ‘‘हमारी शादी को 4 साल हो गए लेकिन जब भी इस तरह साथ गांव जाते हैं तो लगता कि कल ही तो हम दोनों यों ट्रेन में मिले थे.’’

अंजलि अभिषेक की चुटकी लेते बोली, ‘‘हां कल ही तो मिला था एक दिल टूटा आशिक मु  झे. रोतेबिलखते मनीषामनीषा करता.’’

अभिषेक ने मुंह बना कर कहा, ‘‘अब तुम चुप नहीं हुई तो मैं बनारस उतर जाऊंगा और हां तुम्हारे लिए भी इस ट्रेन में कोई नया दिल टूटा आशिक नहीं.’’

अंजलि अभिषेक की बात पर खिलखिला कर हंस पड़ी.

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