Short story : रीमा ने पूछा, ‘‘तुम्हें क्या लगता है प्यार के बिना जिंदगी अधूरी होती है?’’
विहान को रीमा से ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी. वह बोला, ‘‘जिंदगी में प्यार जरूरी है लेकिन उस का मतलब शादी या बंधन नहीं होता. साथ जरूरी है पर बंधन नहीं.’’
रीमा को भी यही चाहिए था आजादी के साथ अपनापन.
विहान बोली, ‘‘लगता है तुम शादी के पक्ष में नहीं हो.’’
‘‘ऐसी बात नहीं है. जिन्हें शादी का सुख चाहिए वे उस में आराम से बंधे रह कर जी सकते हैं लेकिन मु झे यह ढकोसला लगता है. जब हम किसी को पसंद करते हैं तो उसे बांधना जरूरी तो नहीं है. बंधनों के बगैर भी जिंदगी सुकून और आराम से चलाई जा सकती है.’’
‘‘मु झे भी यही लगता है. मैं ने बचपन से जवानी तक परिवार के साथ रह कर बहुत कुछ देखा और झेला है. मु झे भी बंधन पसंद नहीं हैं. मैं जिंदगी जीना चाहती हूं लेकिन अपने शर्तों पर बिना किसी रोकटोक और बिना किसी अपेक्षा के.’’
रीमा के लिए आजादी कोई साधारण शब्द नहीं था. वह बचपन से ही अपने आसपास के बंधनों को देखती आई थी. मम्मी की चुपचाप की गई कुरबानियां, पिता की कठोर डांट, महल्ले की औरतों की फुसफुसाहटें और भाई की पाबंदियां. हर किसी की अपनी दुनिया थी, अपनी मान्यताएं और अपने नियम. लेकिन रीमा ने कभी खुद को उन बंधनों में नहीं बांधा. उस ने बचपन से ही तय कर लिया था कि वह अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीएगी, अपने विचारों और अपनी शर्तों पर.
ग्रैजुएशन करने के बाद परिजनों की मरजी के खिलाफ सीमा ने घर छोड़ दिया और जौब की तलाश में दिल्ली आ गई.
दिल्ली की भीड़भाड़ वाली जिंदगी में, जहां हर किसी के पास खुद की
कहानी होती है, रीमा ने अपनी अलग पहचान बनाई. विज्ञापन ऐजैंसी में काम करते हुए उस ने खुद को साबित किया. तेज, आत्मविश्वासी और बिलकुल आजादी. उस की सोच भी वैसी ही थी, खुले विचारों वाली. आत्मविश्वासी रीमा हर चुनौती को खुले दिल से स्वीकार करती, अपने विचारों को बेबाकी से सब के सामने रखती. उस के कपड़े हों या उस के सोचने का तरीका, वह हमेशा खुद की एक अनोखी छाप छोड़ने में कामयाब रहती.
विहान एक पेशेवर फोटोग्राफर की नजरें कैमरे के पीछे से दुनिया को नए तरीके से देखती थीं. वह अपनी आजादी को महत्त्व देता. अपनी तसवीरों के जरीए वह न केवल बाहरी दुनिया को बल्कि अपनी भावनाओं और विचारों को भी व्यक्त करता. वह भी स्वतंत्र विचारों वाला था जो किसी भी बंधन में बंधना पसंद नहीं करता. उस की रीमा से पहली मुलाकात एक औफिशियल मीटिंग में हुई. एक नजर में उसे रीमा बहुत अच्छी लगी. दुबली, पतली, लंबी तीखे नैननक्श वाली रीमा देखने में भी बहुत आकर्षक थी. शुरुआत में वे केवल काम के विषय पर बात करते रहे पर धीरेधीरे उन की बातचीत गहरी होती गई. वे अकसर शाम को एकदूसरे से मिलने लगे. एक शाम वे कौफी शौप में बैठे थे.
विहान की परवरिश एक अनाथ आश्रम में हुई थी. उसे पता नहीं था उस के मांबाप कौन हैं? आश्रम के संचालक ही उस के सबकुछ थे. उन्होंने ही उसे पढ़ालिखा कर इस काबिल बना दिया था कि आज वह एक पेशेवर फोटोग्राफर बन गया था. उस की सामाजिक रिश्तों में कोई आस्था नहीं थी. उस ने कभी ऐसे रिश्ते देखे ही नहीं थे. मां बाप की गलतियों की सजा उस ने बखूबी भुगती थी. जब रीमा ने प्यार के बारे में पूछा तो बोला वह:
‘‘जिंदगी का असली मजा इसी में है रीमा. अगर तुम मु झ से सहमत हो तो हम दोनों एक ही छत के नीचे रहते हुए जिंदगी अपने तरीके से जी कर उस का भरपूर आनंद ले सकते हैं.’’
रीमा को लगा जैसे विहान ने उस के मुंह की बात छीन ली. उसे निर्णय लेने में जरा भी समय नहीं लगा. उसे भी विहान पसंद था और उस से ज्यादा उस के विचार उसे बहुत प्रभावित करते थे. दोनों ने मिल कर जल्द ही अपने लिए एक नया फ्लैट देख लिया और वे एकसाथ रहने लगे. छोटे से इस फ्लैट में, जहां कोई सामाजिक दस्तावेज नहीं थे बस उन की अपनी दुनिया और अपनी शर्तें थीं. किताबें, काफी मग, विहान का कैमरा. वे खुश थे पर धीरेधीरे रिश्तों की जटिलताएं उन के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं.
विहान अंतर्मुखी था. वह आसानी से अपने मन की बातों और भावनाओं को किसी से सा झा नहीं करता था. कई बार वह अकेले छत पर घंटों बैठा रहता. साथ रह कर रीमा ने महसूस किया कि विहान की जिंदगी में ऐसे कोने हैं जहां वह नहीं जा पाती. फिर भी वे साथ थे लेकिन उन की जिंदगी में दूरियां भी थीं. रीमा को लगता बचपन से अनाथ आश्रम में पलेबढ़े होने के कारण विहान की मानसिक स्थिति उस से थोड़ी अलग थी. उस के पास अपना कहने के लिए कोई नहीं था जिस से वह अपनी बातें और दुखसुख बांट सकता.
कुछ साल पहले दिल्ली आ कर रीमा ने अपने घर से संपर्क बहुत कम कर लिया
था. वह कभीकभार मम्मी से बात कर लेती. पापा की सख्तियों की वजह से वह उन्हें पहले भी पसंद नहीं करती थी और आज भी दूरी बनाए हुई थी. उस का घर जाना भी कम होता था. विहान के साथ रहने की बात उस ने मम्मी को बता दी थी. बेटी के स्वभाव को जानते हुए उन्होंने कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं जताई थी. शीला को हालात से सम झौते करने की आदत पड़ गई थी.
औफिस से लौटते हुए रीमा ने मम्मी को फोन कर टटोलना चाहा. उन की आवाज में थकान थी लेकिन उस में प्यार की गरमाहट भी थी.
‘‘कैसे हो मम्मी?’’
‘‘अच्छी हूं. तुम कैसी हो?’’
‘‘क्या आप को कभी लगा कि आप ने जीवन में जरूरत से ज्यादा सहन किया मम्मी?’’ रीमा ने पूछा.
‘‘कई बार महसूस हुआ लेकिन रिश्ते सिर्फ अधिकारों से नहीं चलते, प्यार के कारण भी बहुत कुछ सहन किया जाता है.’’
यह सुन कर रीमा की आंखें नम हो गईं. मम्मी की बातें उस के दिल को छू गईं. उस रात वह देर तक छत पर बैठी रही, अपने और मम्मी के जीवन की सोच में डूबी. कुछ दिनों बाद रीमा की सहेली तन्वी उस से मिलने आई. जब वह दिल्ली आई थी तब शुरुआत में तन्वी ने उस की बड़ी मदद की थी. कैफे में बैठी दोनों बातों में खो गईं…
‘‘तो मिस आजादी, जिंदगी कैसी चल रही है?’’ तन्वी ने मुसकराते हुए पूछा.
‘‘कभीकभी लगता है कि सब होते हुए भी कुछ नहीं है. विहान अच्छा है पर जैसे हम दोनों अलगअलग दुनिया में रहते हैं. मैं ने सोचा था कि लिवइन में सब आसान होगा लेकिन यहां भी रिश्तों की पेचीदगियां कम नहीं होतीं.’’
‘‘रीमा हर रिश्ता अपनी कीमत किसी न किसी रूप में मांगता है, चाहे नाम कुछ भी हो.’’
‘‘मैं विहान को करीब से जानना चाहती हूं लेकिन वह इस का मौका ही नहीं देता.’’
‘‘मु झे लगता है तुम उस से ज्यादा अपेक्षा रखने लगी हो. साथ रहने का मतलब यह नहीं कि एकदूसरे के निजी जिंदगी में दखलंदाजी की जाए. ऐसे रिश्ते भरोसे पर टिके होते हैं. जिस दिन तुम इसे जीत लोगी उस दिन वह खुद ही तुम्हें सबकुछ बता देगा.’’
तन्वी से बात कर रीमा का मन कुछ हलका हो गया था. अकसर जब उस के मन
में कुछ हलचल उठती वह उसे तन्वी से जरूर शेयर करती. तन्वी एक सम झदार और सुल झी हुई महिला थी. उस के पति मानव उस की भावनाओं की पूरी कद्र करते. उन दोनों की एक प्यारी सी बिटिया भी थी. वे अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश थे. दोनों साथ मिल कर परिवार की जिम्मेदारी बहुत अच्छे ढंग से निभा रहे थे.
एक बार रीमा को कंपनी के काम से
1 महीने के लिए मुंबई जाना था. विहान से दूर जाना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन मजबूरी थी.
विहान बोला, ‘‘जाना जरूरी है क्या?’’
‘‘आगे बढ़ने के लिए कंफर्ट जोन से बाहर तो निकालना ही पड़ेगा.’’
‘‘मु झे तुम्हारे बिना बहुत खाली खाली लगेगा.’’
‘‘पहले भी तो रहते थे. वैसे ही अब भी
रह लेना.’’
‘‘पहले की बात और थी. तब मैं तुम से नहीं मिला था. अब मु झे तुम्हारी आदत हो गई है.’’
‘‘शायद तुम भूल रहे हो मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूं.’’
‘‘तुम्हारी जगह एक पत्नी भी नहीं ले सकती.’’
यह सुन कर रीमा को बहुत अच्छा लगा.
‘‘तुम भी चलो मेरे साथ. कुछ दिन वहीं आराम से जिंदगी बिताएंगे.’’
‘‘यह संभव नहीं है. मेरे भी कुछ काम हैं. उन्हें समय से पूरा करना जरूरी है.’’
‘‘मु झे तुम्हारी बहुत याद आएगी विहान आई मिस यू,’’ कह कर रीमाने उस के गले में बांहें डाल दीं.
विहान उसे छोड़ने एअरपोर्ट गया था. विहान का मन रीमा के बगैर नहीं लग रहा था. वह उस के बिना अपने को अधूरा महसूस कर रहा था. दोनों की अकसर फोन पर बातें होती रहतीं. फ्लैट उसे अकेला देख कर मुंह चिढ़ा रहा था. उसे सम झ नहीं आ रहा था इतना समय वह रीमा के बगैर कैसे गुजारेगा.
इस दौरान उस की एक इवेंट में सूजी मौडल से मुलाकात हो गई. देखने में सुंदर व स्मार्ट सूजी को भी विहान बहुत अच्छा लगा. दोनों के बीच अकसर बातचीत भी होने लगी. वक्त गुजारने के लिए वे दोनों साथसाथ घूमते नजर आते. कभीकभी सूजी उस के साथ फ्लैट पर भी आ जाती. रीमा को काम से फुरसत ही नहीं मिलती थी. अकसर देर रात तक वह अपने काम में ही व्यस्त रहती. किसी तरह उस ने अपने काम को वक्त से पहले समेट लिया. रीमा का काम महीना पूरा होने से 2 दिन पहले खत्म हो गया. विहान को सरप्राइज देने के लिए वह तुरंत दिल्ली लौट आई.
मुंबई से लौट कर जब रीमा फ्लैट में पहुंची तो उस का सामना सूजी से हुआ. वह
रीमा के लिए अजनबी थी.
विहान को सूजी के साथ देख कर रीमा के तनबदन में आग लग गई. वह सोच भी नहीं सकती थी कि उस की अनुपस्थिति में विहान किसी और लड़की को फ्लैट में ले आएगा और उस की जगह उसे दे देगा. रीमा के तेवर देख कर सूजी तुरंत वहां से चली गई. विहान भी उसे रोक नहीं सका. सूजी बुरा लगा कि विहान ने उस से यह बात छिपाई थी कि वह पहले से ही रीमा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा है.
विहान ने सोचा कि आजादी के नाम पर उस ने उस इनसान को खो दिया जिसे वह सच में चाहता था. उस रात रीमा और विहान के बीच तीखी बहस हुई.
‘‘मैं ने तुम पर भरोसा किया था, ‘‘रीमा की आवाज में दर्द था.
‘‘मैं ने तुम्हें धोखा नहीं दिया रीमा, मैं बस… मैं अकेला था.’’
‘‘तुम अकेलेपन की भरपाई किसी अजनबी से करते रहे? मैं क्या थी तुम्हारे लिए?’’
‘‘मैं खुद को नहीं सम झ पाया. तुम दूर हो गई तो मैं टूट गया.’’
‘‘अगर हर बार मैं दूर रहूं और तुम ऐसे बहाने बनाते रहोगे तब हमारे रिश्ते का क्या होगा?’’
‘‘मु झे माफ कर दो रीमा. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता.’’
मगर रीमा की आंखों में वह चमक नहीं थी जो पहले होती थी. किसी तरह उस ने एक ही फ्लैट में विहान के साथ अजनबी की तरह पहली बार रात काटी. वह क्या सोच कर आई थी और उसे क्या देखने को मिला. सोचसोच कर उस की आंखें भर आतीं.
अगली सुबह रीमा ने अपना सामान उठाया और शिमला चली गई. पहाड़ों की
ठंडी हवा और मम्मी के अपनेपन ने उसे थोड़ी राहत दी. इन दिनों उस के पापा बड़े भाई के पास दार्जिलिंग गए थे और मम्मी घर में अकेली थीं. पापा की गैरमौजूदगी उसे बड़ा सुकून दे रही थी वरना उसे यहां आ कर भी 4 बातें सुननी पड़तीं.
शीला बेटी की पसंद का खाना बना रही थीं. रीमा चुपचाप बैठी थी. शीला को सम झते देर न लगी कि रीमा के साथ जरूर कुछ हुआ है. वे बोलीं.
‘‘कई बार रिश्ते में लौटने का मतलब हार नहीं बल्कि सम झदारी होती है.’’
‘‘मैं खुद को सम झने निकली थी मम्मी पर लगता है खुद से दूर हो गई.’’
‘‘खुद से भाग कर कभी सुकून नहीं मिलता रीमा. हमें खुद को माफ करना पड़ता है तभी दूसरों को ठीक से सम झ पाते हैं.’’
शीला ने अपनी भावनाएं रीमा तक पहुंचा दी थीं. उसे कुरेद कर वे उस के
विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती थीं. एक वही तो थीं जो हर मुसीबत में बेटी को सहारा दे सकती थीं.
घर आ कर रीमा का तनाव कुछ कम हो गया था. रहरह कर उसे विहान की याद आती लेकिन वह उसे भूलने की कोशिश कर रही थी. इस बारे में उस ने तन्वी से फोन पर लंबी बातें कीं.
‘‘विहान ने मु झे धोखा दिया तन्वी. मैं उस से ऐसी उम्मीद नहीं करती थी. वह अपनी बात मु झ से शेयर नहीं करता था लेकिन मेरी अनुपस्थिति में किसी और को घर ले आएगा यह मैं सोच भी नहीं सकती थी.’’
‘‘तुम भूल रही हो रीमा तुम दोनों ने अपनी व्यक्तिगत आजादी को चुन कर साथ रहना मंजूर किया था. तुम्हें उस से इतनी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए. ऐसा सबकुछ तो शादीशुदा जोड़े करते हैं. लिव इन में रहने वाले 2 युवा नहीं.’’
‘‘तुम्हारी बात अपनी जगह ठीक है
लेकिन जब 2 इंसान एक ही छत के नीचे रहने लगते हैं तो उन्हें एकदूसरे की भावनाओं की भी कद्र करनी पड़ती है. मैं अभी उस की जिंदगी
से दूर नहीं गई थी. 1 महीने में ही वह इतना
बदल गया?’’
‘‘बदलने वाले तो कुछ ही समय में बदल जाते हैं. लगता है तुम विहान का भरोसा नहीं जीत पाई. हो सकता है वह भी तुम्हारे बारे में ऐसा ही सोच रहा होगा कि मुंबई में तुम किसी और के साथ…’’
‘‘वह मेरे बारे में ऐसे कैसे सोच सकता है?’’
‘‘सोच पर किसी का बस नहीं चलता रीमा. ठंडे दिमाग से सोचो. विहान ने गलती जरूर की है लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि उस के लिए तुम अपना कैरियर दांव पर लगा दो. कब तक छुट्टी ले कर शिमला रहोगी? ऐसे ही रहना था तो फिर तुम ने अपने मम्मीपापा का घर ही क्यों था?’’ तन्वी बोली.
तन्वी की बात बिलकुल सही थी. रीमा अपनेआप को बहुत मौडर्न और आजादखयालात सम झ रही थी लेकिन जरा सा झटका लगते ही वह फिर उसी जगह लौट आई थी जहां से उस ने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करनी चाही थी. उस ने सोच लिया विहान के कारण वह अपने आप को टूटने नहीं देगी और जल्द ही वापस जा कर काम में मन लगाएगी और उसे भूल जाएगी.
विहान भी अपनेआप से लड़ रहा था. उस ने अपने स्टूडियो पर ताला लगा दिया. वह कैमरा ले कर निकल
जाता पर तसवीरों में कोई रंग नहीं था. एक दिन उस ने तन्वी से कहा, ‘‘मु झे रीमा की बहुत याद आती है.’’
‘‘तुम उस से मिलने शिमला जा सकते हो विहान?’’
‘‘डर लगता है कि वह मु झ से नफरत न करने लगी हो.’’
‘‘नफरत तो उन्हीं से होती है जिन्हें हम बहुत चाहते हैं. जाओ अब और देर मत करो.’’
‘‘वह मु झे गलत सम झ रही होगी. ऐसा कुछ भी नहीं था. बस समय काटने के लिए मैं कभीकभी सूजी को घर ले आता था. वह मेरी अच्छी दोस्त है. इस घटना के बाद से उस ने
भी मु झ से बात करना बंद कर दिया है. उसे बुरा लगा कि मैं ने उसे रीमा के बारे में कुछ नहीं बताया और उस दिन रीमा के बरताव के लिए उसे रोका भी नहीं. मैं रीमा को सफाई भी नहीं दे सका.’’
‘‘यह सब तुम मु झे नहीं रीमा को सम झाओ. मु झे उम्मीद है वह तुम्हारी बात और भावनाएं सम झ जाएगी.’’
अगले दिन ही विहान शिमला पहुंच गया. रीमा का घर ढूंढ़ने में उसे परेशानी नहीं हुई. उस समय रीमा मम्मी के साथ आंगन में बैठी थी. तभी बाहर से किसी ने आवाज दी. ‘‘रीमा…’’
रीमा चौंक कर खड़ी हो गई. गेट पर विहान था. उस का चेहरा थका हुआ था और
आंखें पश्चात्ताप से भरी थीं. शीला ने गेट खोला. विहान ने आगे बढ़ कर उन के पैर छुए. उन्हें सम झते देर नहीं लगी कि यह वही लड़का है
जिस के लिए रीमा दिल्ली छोड़ कर शिमला आई है. सीधा तुरंत बरामदे से उठ कर अंदर आ गई.
विहान बोला, ‘‘जानता हूं, मैं ने गलती की. मैं ने तुम्हारा भरोसा तोड़ा पर मैं सच में बदलना चाहता हूं. मैं तितलियों के पीछे भागता रहा पर अब सम झ गया हूं कि एक शाख पर टिके रहना क्या होता है.’’
रीमा चुप रही. तभी शीला पानी ले कर आईं और बोलीं, ‘‘कभीकभी रिश्ते दोबारा पनप जाते हैं अगर उन में विश्वास की जड़ें अब भी जिंदा हों.’’
रीमा ने उन की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उठ कर कमरे में आ गई. शीला विहान के साथ बैठ कर बातें करने लगीं. शीला बोलीं, ‘‘रिश्ते फूलों की तरह होते हैं, उन्हें पानी और
धूप दोनों चाहिए. बिना देखभाल के वे मुर झा
जाते हैं.’’
‘‘आप ठीक कहती हैं आंटी. मैं रीमा को खुश रखने की भरसक कोशिश करूंगा.’’
कुछ देर बाद रीमा बाहर आईं. विहान अभी भी वहीं था.
‘‘अगर हम दोबारा शुरू करें… इस बार ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ?’’ उस ने पूछा.
‘‘जो कुछ कहना है अभी कह दो रीमा. ऐसे मौके बारबार नहीं मिलते,’’ शीला प्यार से रीमा के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं.
‘‘इस बार केवल आजादी नहीं होगी साथ में भरोसा भी होगा और भरोसे के लिए शब्द नहीं, समय लगेगा,’’ रीमा बोली.
रीमा को विहान से बातें करते देख शीला किचन में आ गई. विहान ने उस की बात से सहमत हो कर सिर हिलाया.
ऐसा लग रहा था जैसे आज शिमला की हवा में नमी कम और उम्मीद ज्यादा थी.
शीला रसोई की खिड़की से मुसकरा रही थीं. अंदर गैस पर चाय चढ़ी थी और बाहर दो दिल नए सिरे से जुड़ने को तैयार थे. विहान के मनाने पर रीमा उस के साथ दिल्ली चली आई. उसे खुश देख कर शीला को अच्छा लगा.
धीरेधीरे रीमा और विहान ने एकदूसरे को सम झना शुरू किया. उन्होंने अपने पुराने घावों को भरने की कोशिश की. विहान अपने व्यवहार से जतला रहा था कि वह अब सिर्फ स्वतंत्र नहीं बल्कि जिम्मेदार भी बनना चाहता है. रीमा को भी एहसास हो रहा था कि आजादी का मतलब अपनी दुनिया में अकेले नहीं बल्कि साथसाथ आगे बढ़ना होता है.
जल्द ही रीमा और विहान ने अपने रिश्ते
को फिर से आकार दे दिया. वे अपने काम में व्यस्त रहते पर हर दिन एकदूसरे के लिए थोड़ा वक्त निकालते. वे छोटीछोटी खुशियों को भी महत्त्व देते. कभी बालकनी में चाय की प्याली के साथ बैठना तो कभी साथ में फिल्म देखना.
उन के रिश्ते की गहराई और सम झ में अब बहुत फर्क आ गया था. अब वे केवल
साथ नहीं रह रहे थे बल्कि एकदूसरे के साथी भी बन गए थे. रीमा सम झ गई कि आजादी का मतलब अपने फैसले खुद लेने के साथसाथ कभीकभी समर्पण भी करना होता है. विहान ने भी जाना कि साथ रहना केवल स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं बल्कि एक नई आजादी की शुरुआत भी हो सकती है.
अब उन की कहानी केवल 2 युवाओं की नहीं थी बल्कि उन सभी की थी जो अपने जीवन के बंधनों से लड़ते हुए एक नए रूप की आजादी की तलाश में रहते हैं. रीमा ने यह बात तन्वी से साझा की.
तन्वी उस के लिए खुश थी, ‘‘तुम चाहो तो अपने इस रिश्ते को अब शादी का नाम भी दे सकती हो. इतना तो तुम ने महसूस कर लिया कि तुम दोनों एकदूसरे के बिना अधूरे हो.’’
तन्वी की बात का सीमा ने कोई उत्तर नहीं दिया. उसे भी महसूस हो रहा था कि साथ रहते हुए उन्हें रिश्ते को एक नाम दे कर परिवार में और खुशियों को भी जोड़ना चाहिए.
राइटर – डा. के. रानी
