Special kids activities : यों तो हर बच्चा स्पैशल है पर कुछ बच्चे औरों से ज्यादा स्पेशल होते है इसलिए नहीं कि उन की शारीरिक क्षमता थोड़ी सी अगल होती है बल्कि इसलिए उन की भावनाओं से जुड़ने की क्षमता, सीखने की काबिलियत, संकेतों (शारीरिक भाषा, चेहरे के भाव) को पढ़नेसमझने की सामर्थ्य बहुत अलग होती है और साथ ही असाधारण दृश्य स्मृति यानी विजन मैमोरी भी रहती है और इसीलिए ये बच्चे खास होते हैं.
आज हम उन खास बच्चों की बात कर रहे हैं जो हियरिंग लौस, स्पीच ऐंड लैंग्वेज डिसऔर्डर का बहादुरी से सामना कर रहे हैं. इन खास बच्चों के लिए खास क्लास भी होती है, जहां वे खास तरीकों से चीजों को सीखतेसमझते हैं. मगर कई बार बच्चों को क्लास भेजना संभव नहीं होता है खासकर छुट्टियों के समय जब सभी तरह की क्लासें बंद हों. बच्चों के साथ 1 या 2 दिन की छुट्टी तो एडजस्ट हो जाती है लेकिन 1-2 महीनों की छुट्टियां नहीं जैसेकि समर वैकेशन.
अब इस समय में पेरैंट्स को कुछ मुश्किल होती है क्योंकि उन्हें भी अपने दैनिक कार्य और औफिस टाइमिंग के साथ एडजस्ट हो कर बच्चे का लर्निंग प्रोसैस जारी रखना होता है.
आप बच्चों को कुछ फिजिकल और सैंसरी ऐक्टिविटी या खेल से भी अभ्यास करा सकते हैं जो एक खेल के माध्यम से बच्चों की सुनने और बोलने में काफी मदद करता है.
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घरेलू लर्निंग वर्कशौप ऐक्टिविटीज
जोर और साफ भाषा से पढ़ना: हावभाव के साथ साफसाफ भाषा में जोर से पढ़ने से बच्चों में भाषा की समझ, नए शब्द और सुनने की क्षमता बढ़ती है.
क्ले से डिजाइन बनाना: रंगबिरंगे क्ले से बच्चों के साथ डिजाइन या आकृतियां बनाएं. इस तरह बच्चों को आकार, रंग और बनावट के बारे में समझ आता है, बात करने का मौका मिलता है.
लिप रीड या औब्जर्वेशन: बच्चे के सामने और उस केआई लैवल या अच्छे आई कौंटैक्ट पर रह कर बात करें ताकि वह आप के होंठों की हलचल को आसानी से देख सके. इस से बच्चे में लिप रीड की क्षमता आती है.
सैंसरी बिन्स (खोजबीन का डब्बा): एक ट्रे में चावल, रेत या पानी भरें और उस में बारीबारी से नए खिलौने या अल्फाबेट छिपाएं और बच्चे के साथ उसे ढूंढ़ते समय बातचीत में बारबार उस का नाम लें ताकि बच्चा उस शब्द को सुनता रहे और ढूंढ़ते रहने के प्रयास से उसे वह याद होने लग जाए. इस तरह ही गेम से उसे नए शब्द सीखने में मदद मिलती है.
शब्दों का दोहराव: नए शब्दों या गानों को बारबार दोहराएं ताकि वे बच्चे की याददाश्त और सम?ा में पक्के हो सकें.
हौपस्कौच शब्दों का खेल: हौपस्कौच (स्टापू) गेम के डब्बों में कोई शब्द लिखें ताकि बच्चा खेलते हुए भी शब्दों को देखेसीखे. इस तरह शारीरिक खेलखेल में उस का अभ्यास भी हो जाएगा.
गैस गेम (चीजों को पहचानना): आप किसी चीज की बनावट या उस के काम का दिखावा बच्चे के सामने करें और उसे उस चीज का गैस करने को कहें. इस से बच्चे की सोचने की क्षमता तो बढ़ेगी ही, साथ में बारबार गैस कर जवाब देने से उस के बोलने का अभ्यास भी होगा.
आवाज मैच या मिलाने के खेल: बच्चों को आवाज पहचानने, मिलाने और उस की दिशा जानने में मदद करने के लिए इंस्ट्रूमैंट्स या टूल का उपयोग करें.
म्यूजिकल स्टैचू या डांस: बच्चों को म्यूजिक बहुत पसंद होता है. अत: म्यूजिक की मदद भी लें. म्यूजिक और म्यूजिकल इंस्ट्रूमैंट्स के साथ खेल के सहारे उन्हें रिदम की सम?ा दीजिए. इस से उन की भाषा का विकास और आवाज में नियंत्रण की मदद मिलती है.
आवाज पहचानने का अभ्यास: आवाज सम?ाने की क्षमता को बेहतर बनाने के लिए घर की रोजमर्रा की आवाजों जैसे डोरबैल, टाइमर को पहचानने का अभ्यास करें.
तसवीरों से कहानियां: रोज के काम के दौरान तसवीरें लें. उन्हें प्रिंट करें और बच्चे से उस कहानी को बताने के लिए कहें. इस से उस की अपनी एक किताब बन जाएगी, साथ ही बात को अच्छी तरह सम?ाने के लिए शब्दों के साथसाथ फ्लैशकार्ड, तसवीरों वाली किताबों या इशारों का उपयोग करें.
रोल प्ले (नाटक करना): बातचीत और कहानी सुनाने के कौशल को बढ़ावा देने के लिए स्वयं अभिनय कर या कठपुतलियों अथवा खिलौनों का उपयोग कर के छोटी कहानियां नाटक के रूप में दिखाएं.
इन ऐक्टिविटीज के अलावा आप बच्चे की पसंद के अनुसार भी अपनी खुद की कोई गेम बना सकते हैं ताकि बच्चा उस में और रुचि दिखाए, साथ ही इस ऐक्टिविटी के समय ध्यान रखें कि आसपास शोर कम हो जैसे टीवी आदि बंद हो ताकि बच्चा आप की आवाज पर ध्यान दे सके और उस एक्टिविटी या आप दोनों की बातचीत में रुचि ले.
स्पीच और लैग्वेज की समस्या
हाल के वर्षों में बच्चों में स्पीच लैंग्वेज की समस्याओं में भारी वृद्धि देखी गई है. कुछ बच्चों में यह समस्याएं जन्मजात होती हैं और कुछ बच्चों में बचपन के बाद के दिनों में विकसित होती है. स्पीच और लैंग्वेज की इस समस्या में कई कारण हैं जैसेकि जेनेटिक्स, दवाएं, बीमारियां, पारिवारिक इतिहास और कुछ पर्यावरणीय कारण.
लेकिन आज की दुनिया में हमारे पास सभी तरह की समस्याओं को दूर करने के लिए बहुत सी ट्रीटमैंट औप्शन उपलब्ध है. शुरुआती पहल और उपचार के साथसाथ जागरूकता कार्यक्रमों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है.
इस से सफलता की दर में सुधार होता है और हर विशेष बच्चे को अपने कम्युनिकेशन, आत्मविश्वास, व्यक्तित्व और बेहतर ऐकैडमिक प्रदर्शन में मदद मिलती है. इस में स्क्रीन नहीं बल्कि प्रैक्टिकल प्रैक्टिस मदद करती है. इन में खास स्कूल, क्लासेज, ऐक्टिविटीज शामिल हैं और इन क्लास और ऐक्टिविटीज को आप घर पर भी कर सकते हैं.
इस से बच्चों को निरंतर प्रयास करने का मौका मिलता है, साथ ही बच्चे पास और करीब से जुड़ते हैं. सिर्फ ट्रेनर या टीचर का ही नहीं बल्कि पेरैंट्स का भी बहुत बड़ा रोल है इन की काबिलीयत, हुनर को बढ़ाने में ताकि उन के भविष्य की राह में किसी भी तरह की कमी न बने.
-राजेश कुमार, स्पीच, लैंग्वेज ऐंड हियरिंग स्पैशलिस्ट ओटिकौन.
