Street food : स्ट्रीट फूड खाना एक कंसेशन है या हक? लड़कियां और औरतें ही नहीं अच्छेभले खातेपीते घरों के लोग भी स्ट्रीट फूड के दीवाने हैं क्योंकि स्ट्रीट फूड की एक खासीयत यह है कि इस का बहुत सा हिस्सा खरीदार के सामने ही पकाया जाता है और सामने ही परोसा जाता है. यह सस्ता तो है ही क्योंकि कुक खुद ही वर्कर भी है कैशियर भी, यह कुक के हाथों का हुनर भी बताता है.
यह ठीक है कि आज के पौल्यूशन, गाडि़यों के धुएं, सड़कों की धूल के कारण स्ट्रीट फूड अब इतना सुरक्षित नहीं है पर क्या गारंटी है कि रेस्तराओं में अंदर किचन में सारी सफाई रखी जा रही है? तीनचौथाई फूड जौइंट्स में पीछे की दुनिया सड़कों से भी ज्यादा गंदगी वाली होती है क्योंकि वहां कोनों में महीनों सफाई नहीं होती.
स्ट्रीट फूड पर म्यूनिसिपल कौरपोरेशनों का सब से पहले घाल होता है और जहां किसी तरह का लाइसैंस, तहबाजारी का भी हिसाब है, ऊपरी कमाई का जरीया ये मालिक-कम-कुक-कम-सर्वर होते हैं जो सब से ज्यादा कमजोर होते हैं. इन का ठेला 1 घंटा भी बंद हो जाए तो बहुत सा सामान खराब हो जाता है. जिस दिनकौरपोरेशनें उगाहीका रेट बढ़ाने के लिए अपने ट्रक ले कर आ जाती हैं, स्किल वाले कुक्स की एक रोज की आय नहीं, पूरी कैपिटल भी स्वाहा हो जाती है.
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मानव ने हमेशा से जंगल में से उठा कर खाया है और वह जीता रहा है तभी तो हम आज 8 अरब हैं. हैल्थ के नाम पर या सड़कों के कंजैशन के नाम पर स्ट्रीट फूड को बदनाम करना गलत है, कस्टमर्स के साथ अन्याय है. जो अमीर कस्टमर स्वाद के लिए आते हैं वे तो 1-2 रोज रुक सकते हैं पर हजारों तो ऐसे होते हैं जिन को खाना ही स्ट्रीट से लेना है क्योंकि उन के पास अपनी छत नहीं होती. कुछ को तो खाना बनाना ही नहीं आता.
दिल्ली में हाल में संकरी कालोनियों में आग के बाद कई इलाकों में भीड़ कम करने के लिए सड़कों पर ये स्ट्रीट फूड स्टौल हटा दिए गए हैं. यह अपनेआप में चाहे अच्छा हो पर उन हजारों लड़कियों को सस्ते में स्वाद वाली चाट से वंचित कर दिया है जिस की एक तरह से हकदार हैं. दिल्ली जैसे शहर में जहां सिर्फ अमीर ही नहीं गरीब भी बेतहाशा हर रोज आ कर खाते हैं, सस्ता खाना मिले, यह देखना सरकार का काम है. स्ट्रीट फूड पर सरकार अपनी जेब ढीली नहीं कर रही.
रही बात दूसरे शहरियों के आनेजाने की सुविधा की तो कुछ गलियां इसी काम के लिए तय की जा सकती हैं जहां स्ट्रीट फूड ही मिले. सरकारी भवनों की दीवारों को थोड़ा पीछे कर के फूड स्टौल निकाले जा सकते हैं, पटरियां चौड़ी कर के उन की 3-4 फुट जगह स्टौलों को दी जा सकती है.
दिक्कत प्लानिंग की है. कौरपोरेशन और पुलिस का जब हर अफसर इस बात में लगा हो कि कैसे उगाही की जाए तो जनता पिसेगी ही. रिश्वत का पैसापैसा स्टौल चलाने वाला ग्राहक से दामों में वसूलता है, यह न भूलें.
