Respect daughters : हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उस कड़वी सच्चाई पर से पर्दा हटाया है जिसे हम सब जानते तो हैं पर मानना नहीं चाहते. कोर्ट ने कहा कि बेटा पैदा करने की गहरी जड़ें जमाए सोच आज भी जिंदा है. ऊपर से भले ही हम ‘बेटी बचाओ’ के नारे लगाते हों पर अस्पतालों के बंद कमरों में, सोनोग्राफी मशीनों के सामने अब भी चोरीछुपे लिंग जांच चल रही है. इसलिए लिंग जांच विरोधी कानून का पालन सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बल्कि सख्ती से होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी हर उस मांबाप के लिए आईना है जो आज भी बेटे की चाह में बेटियों को बोझ समझते हैं.

कहानी एक डाक्टर की, सोच पूरे समाज की ये मामला महाराष्ट्र के डा. रमेश के सोनोग्राफी सेंटर का है. नियम कहता है कि हर सोनोग्राफी का ‘फार्म स्न’ भरना जरूरी है – मरीज का नाम, पता, सोनोग्राफी की वजह, सब दर्ज करना होता है ताकि पता चले कि कहीं भ्रण का लिंग तो नहीं बताया जा रहा. जांच में डां. रमेश के सेंटर पर इसी फार्म में कमियां मिलीं. मजिस्ट्रेट ने कार्रवाई की. डाक्टर साहब घबराए. रिविजनल कोर्ट गए, फिर बाम्बे हाईकोर्ट गए. हर जगह से झटका लगा. आखिर में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. लेकिन

जस्टिस संजय करोल और प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने अपील खारिज कर दी और कहा कि कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ाई में एक इंच की भी ढिलाई नहीं चलेगी.

कोर्ट ने बहुत अहम बात कही. ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘जननी सुरक्षा योजना’ जैसी स्कीमें सरकार यूं ही नहीं चलाती. ये इस बात का सबूत हैं कि हमारे समाज में लड़कियों के साथ आज भी सिस्टेमेटिक भेदभाव है. यानी ये भेदभाव एक-दो घर की बात नहीं बल्कि पूरे सिस्टम में घुसा हुआ है. बेटी पैदा होते ही मांबाप के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं. दहेज की टेंशन होने लगती है.

‘‘बेटा होता तो वंश चलाता’’ वाले ताने सुनने को मिलते हैं. यही सोच लिंग जांच को बढ़ावा देती है.

क्या हम गुनहगार नहीं हिंदु धर्म की बहुत सी परंपराओं में बेटियां को बेचना माना जा रहा है. पहले तो धर्म हर घर को गिरफ्त में कर लेता है और फिर सीधा हमला लड़कियों पर करता है. लड़कियां को पराया धन कहने में धर्म का ही हिस्सा ज्यादा है.

शादी में दहेज : जब तक हम खुद बेटी की शादी में लाखों का दहेज देंगे तब तक हर मां बाप बेटी को बोझ ही समझेंगे.

संपत्ति में हक : बेटे के नाम जमीनजायदाद कर दी और बेटी को ‘‘पराया धन’’ कहकर टरका दिया. यही भेदभाव बेटी के साथ पक्षपात की शुरुआत करते हैं.

त्योहारों पर फर्क : भाई दूज पर भाई को टीका, रक्षाबंधन पर भाई से रक्षा की उम्मीद और करवा चौथ पर पत्नी से व्रत की उम्मीद ताकि पति की उम्र बढ़े. ये छोटे छोटे फर्क बड़ी सोच बनाते हैं.

जब तक घर घर में बेटी को बेटे जैसा दर्जा नहीं मिलेगा तब तक कानून कितना भी सख्त हो पर्दे के पीछे ये पाप चलता रहेगा. याद रखिए कल की कल्पना चावला, पी.वी. सिंधु, हिमा दास किसी की बेटी ही थी. बेटी बचाओगे तभी तो देश बढ़ाओगे. क्या आपने अपनी बेटी को आज ‘आई लव यू’ बोला? अगर नहीं तो अभी बोलिए. बदलाव वहीं से शुरू होता है.. कानून अपना काम करेगा पर
बदलाव की पहली ईंट हमें अपने घर से ही रखनी होगी.

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