Double-Decker Food Truck: सोचिए शाम को परिवार के साथ नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान या गोमती नगर के राम मनोहर लोहिया पार्क में जाएं और फ़ूड ट्रक के ऊपर वाली सीट पर बैठकर चाय पकोड़े का मजा लें. यूपी इको-टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड अब लखनऊ के 2 बड़े पर्यटन स्थलों पर “डबल-डेकर फूड ट्रक” उतारने जा रहा है. सरकार निजी संचालक ढूंढ रही है. यानी अब फूड का बिजनेस सिर्फ रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं रहा.
महिलाएं घर में रोज नए नए पकवान बनाती हैं. किसी के हाथ का अचार मशहूर है तो कोई बिरयानी में माहिर. पर बिजनेस शुरू करने के लिए जगह और लाखों का खर्चा रुकावट बन जाता है. अब सरकार खुद कह रही है कि आओ, फूड ट्रक चलाओ. टेंडर की आखिरी तारीख 24/07/2026 है. अगर एजेंसी बना कर, समूह बनाकर, SHG के जरिए या पति के साथ मिलकर अप्लाई किया जाए तो घर की रसोई सीधे सड़क पर उतर सकती है. “घर का खाना” अब ब्रांड बन सकता है.
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बात अच्छी है पर आसान नहीं. फूड ट्रक मतलब लाइसेंस, साफ-सफाई, मेन्यू, स्टाफ और 12 घंटे खड़े रहना. कई बार टेंडर की प्रक्रिया भी महिलाओं को डरा देती है. सवाल ये है कि क्या सरकार इसमें महिलाओं के लिए आरक्षण या आसान लोन की व्यवस्था करेगी? वरना ये मौका फिर बड़े-बड़े ठेकेदार ही ले जाएंगे और महिलाएं बस ग्राहक बनकर रह जाएंगी.
बिजनेस बड़ा होने से नहीं हिम्मत से शुरू होता है. अगर आप खाना बनाने में माहिर हैं तो इस सूचना को हल्के में मत लीजिए. अपने आसपास की 3-4 महिलाओं से मिलकर एक ग्रुप/ एजेंसी बनाइए. बैंक और जिला उद्योग केंद्र से जानकारी लीजिए. क्योंकि आखिरकार चूल्हा चौका संभालने वाली महिला जब सड़क पर अपना फूड ट्रक चलाएगी तभी असली “आत्मनिर्भर भारत” दिखेगा. घर का स्वाद अब सिर्फ घर तक नहीं पूरे लखनऊ तक जाएगा.
