Gen Z Protest: आज आप फेसबुक खोल लो या इंस्टाग्राम कई जगह  GEN Z  को जमकर कोसा जा रहा है. खासतौर पर लड़कियों को बहुत भला बुरा कहा जा रहा है क्योंकि जंतर मंतर  पर नीट के  पेपर लीक मामले को लेकर जो प्रोटेस्ट चल रहा था उसमें  GEN Z के द्वारा सरकार के कामकाज, बातचीत के  तरीकों और उन पर कई उंगलियां उठायी, साथ ही अपनी मांगे भी इनके द्वारा सरकार से मनवा ली गयी है. जहां एक तरफ इस काम के लिए लोग इनकी तारीफ़ कर रहें है वही दूसरी तरफ इतने बड़े काम को अंजाम देने के बाद इन्हें शाबाशी देने के बजाएं खूब ट्रोल किया जा रहा है. जो सरकार भक्त वे इन  GEN Z  पर अपनी भाषा में ज्ञान पेल रहे हैं और वहां प्रोटेस्ट के दौरान आवेग या गुस्से में आकर इनके द्वारा स्पेशली लड़कियों के द्वारा दी गयी गालियों का विरोध हो रहा है.

सीरियसली, मिलेनियम  ये आप लोग ही हैं ना जो इन्हें कोस रहें है और बाकी सारे मुद्दों को भूल कर बस  GEN Z  को भला बुरा कह रहें है. लेकिन ऐसा करते वक्त आप शायद यह  भूल गए है कि अनौपचारिक या आम बोलचाल की भाषा में गाली-गलौज का इतिहास पुराना रहा है. गालियां हमारी वोकैबलरी का हिस्सा हमेशा से रही है, तो गालियां अगर युवाओं ने दे भी दी, तो इस पर इतना हंगामा करने के क्या जरूरत है.

विरासत का असर 

नई पीढ़ी वही भाषा सीखती है और इस्तेमाल करती है जो उसने अपने आसपास के समाज, मीडिया और बड़ों से सुनी होती है. इसलिए केवल नई पीढ़ी को दोष देना और उस भाषा को जन्म देने वाली सामाजिक संरचना पर सवाल न उठाना दोहरे रवैये को दर्शाता है.

दरअसल, ये हमारी ही लैंग्वेज का हिस्सा है.. आपने ये भाषा कब नहीं सुनी थी ये बताओं. ये तो हमेशा से है. जब हम छोटे थे 5  साल के थे तब बड़ों को ये गाली देते हुआ सुना था. तब भी गलियां दी जाती थी. हमारे यहां मां बहन की गालियां हमेशा से दी जाती है. अब उसे आजकल की योंग जनरेशन अंग्रेजी में कह रही है, तो काफी लोगों को दिककत हो रही है. मां बहन की गालियां इस तरह के शब्द हमारे यहां कब नहीं थे. हमारे पुरूष शौचालय तो छोड़ें, लड़कियों के शौचालयों में तथाकथित सनातनी रात को घुस कर भद्दे शब्द लिख आते थे जो हफ्तों तक मिटाए नहीं जाते थे.

अब  वही बड़े नैतिक सात्विक बनकर आप बाकी के सारे मुद्दे भूलकर इस जनरेशन को क्यों कोस रहे हो? ये तो उनके बाप दादादों ने उन्हें विरासत में थाली में परोस कर दी है तो उसका उपयोग तो उन्हें करना ही है न.

“अब जब बच्चों तक बात पहुंची…”—समाज का दोहरा रवैया

जब तक यह भाषा केवल घरों की चारदीवारी में या अनौपचारिक रूप से इस्तेमाल हो रही थी, तब तक समाज इसे अनदेखा करता रहा. लेकिन जब यही भाषा सार्वजनिक जीवन, सोशल मीडिया और नई पीढ़ी की जुबान और स्क्रीन पर खुलकर आयी तो समाज में बेचैनी देखने लगी.

पीढ़ियों से चली आ रही इस भाषा को समाज ने “सामान्य” या “अनौपचारिक बोलचाल” मानकर स्वीकार कर लिया, जिसके कारण यह भाषा बिना किसी रोक-टोक के आगे बढ़ती रही. आखिर आपके बच्चों ने आपकी बेटियों ने हमेशा से ही ये गलियां अपने बाप के द्वारा अपनी मां को देते सुना है तो फिर आज की नई जनरेशन को तो इसे अपनानाना ही था. अब इतना हो हल्ला क्यों?

महिलाओं को ‘संपत्ति’ या ‘ऑब्जेक्ट’ मानना

समाज में दी जाने वाली अधिकांश गालियां मां, बहन या बेटियों से जुड़ी होती हैं. इसका मुख्य कारण यह सोच रही है कि महिला की ‘इज़्ज़त’ या ‘पवित्रता’ किसी पुरुष या परिवार का मुख्य आधार है. किसी पुरुष को नीचा दिखाने के लिए उसकी महिला रिश्तेदारों पर हमला करना पितृसत्तात्मक सोच का ही हिस्सा है.

गालियों के जरिये महिलाओं को कंट्रोल किया गया 

गालियों की यह संरचना महिलाओं को एक स्वतंत्र नागरिक मानने के बजाय पुरुषों के अधीन या उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से बंधी हुई वस्तु के रूप में देखने की ऐतिहासिक मानसिकता को दर्शाती है. इसलिए जब भी महिलाओं को बेज्जत करना होता तो घर के पुरुष उन्हें गन्दी गलियां देते.

मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका है गलियों पर बवाल करना 

कई लोगों का मानना है कि गालियों पर इतना बड़ा बवाल खड़ा करके असल मुद्दों (जैसे रोजगार, पेपर लीक, भविष्य की चिंताएं) को दबा दिया गया. मीडिया और सत्ता का ध्यान गालियों पर सिमट गया और युवाओं की जायज मांगें पीछे छूट गईं. अब सरकार का पूरा फोकस गालियों पर है और ढूंढ ढूंढ कर ऐसे लोगों का पता लगाया जा रहा जिन्होंने गालियां दी. हालंकि यह बात किसी भी लिहाज से सही नहीं है. क्यूंकि शुरू से ये माना  गया है कि गालियां हमारी संस्कृति का हिस्सा है. जबकि होना तो यह चाहिए कि गालियों को “संस्कृति का हिस्सा” मानकर स्वीकार कर लेने के बजाय यह पहचानना जरूरी है कि वे किस तरह महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं—चाहे वे किसी भी मंच पर बोली जाएं.

अगर गाली देने वाले युवा हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, तो सख्त कानूनी सजा देने के बजाय उन्हें चेतावनी (Warning) देकर या माफीनामा लेकर छोड़ देना चाहिए, ताकि उनका भविष्य और करियर बर्बाद न हो.

विरोध के मूल कारण (जैसे बेरोजगारी या नीतियां) को समझकर उस पर ध्यान देना किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की निशानी होती है.

समाज के स्तर पर इसे “गुस्से में निकली बात” मानकर अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर यह सुरक्षा, मर्यादा और कानून व्यवस्था का मामला बन जाता है. हालांकि, युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कठोर दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सख्त हिदायत देकर मामला निपटाना एक संतुलित रास्ता हो सकता है.

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