Mobile phone vs books : आज  के युवाओं के रिलेशन मोबाइल फोन से शुरू हो कर वहीं समाप्त हो रहे हैं क्योंकि जब किसी वस्तु का आवश्यकता से अधिक उपयोग करा जाए तो वह हावी होने लगता है. मोबाइल फोन का उपयोग भी चाहे जितना कम करें हमारी रिलेशनशिप को प्रभावित कर रहा है.

यंग जैनरेशन पर मोबाइल का विशेष प्रभाव पड़ा है. मोबाइल ने बेशक हमारी जिंदगी आसान कर दी है परंतु इस के साथ जुड़ी परेशानियों को भी नकारा नहीं जा सकता है. मोबाइल से होने वाली रैडिएशन और मोबाइल फोन का गलत कामों के लिए इस्तेमाल होना, मोबाइल की लत की वजह से सब को आने वाले समय में बहुत बड़ीबड़ी परेशानियों से दोचार होना पड़ेगा.

अगर आज मोबाइल लोगों के भरोसे का साथी है तो उन के भरोसे को तोड़ने में भी यही सब से अधिक सहायक रहा है. मोबाइल फोन पर लोगों का भ्रम भी है तो उन्हें भरोसा भी है. भ्रम इस बात के लिए है कि मोबाइल के जरीए एकदूसरे पर नजर रखी जा सकती है, पेरैंट्स को भरोसा है कि जब जहां चाहें वहां संपर्क हो जाएगा.

मगर मोबाइल ने किडनैपरों को तो जैसे जादू की छड़ी दे दी है. नंबर घुमाया माल हाजिर. प्रेम के पुजारियों ने अपने प्रेम को जगजाहिर करने के लिए न जानें कितनी अश्लील वीडियो क्लिप्स बना कर जगजाहिर कीं और अपना गुस्सा निकाला. वहीं इस मोबाइल की वजह से आज लोगों में कई तरह की बीमारियां भी सामने आ रही हैं.

आज मोबाइल की वजह से प्रेमप्रसंग बढ़ रहे हैं. इसीलिए मोबाइल उन लोगों के लिए ज्यादा समस्या बना हुआ है, जिन के घर में जवान बच्चे हैं. अश्लील मैसेज आदि मोबाइल की ही देन हैं. आजकल लड़केलड़कियों के घर से भागने में मोबाइल अहम भूमिका निभा रहा है.

आजकल की स्थिति बयान करने के लिए यह रिपोर्ट काफी है कि लोग अपने दिन के औसतन 5 घंटे मोबाइल फोन पर बिताते हैं. वहीं डाक्टरों का कहना है कि यह स्मार्ट डिवाइस हमें आलसी और रोगी तक बना सकता है.

आलसी और रोगी बना सकता है

वायरल हुआ एक मैसेज मोबाइल फोन से पैदा हुई परेशानियों को खूब बयान कर रहा है. मैसेज कुछ यों था ‘‘मैं गीता चौबे, मुझे यह अनुभव हुआ है कि मेरे घरपरिवार वाले मुझ से ज्यादा मोबाइल के करीब हो गए हैं. मेरे बच्चे लाइक्स के लिए पागल हुए रहते हैं इसलिए मैं यह नियम बना रही हूं कि अब सब लोग सुबह उठते ही फोन नहीं सब को गुडमौर्निंग मुंह से बोलेंगे. सब को एकसाथ बैठ कर डानिंग टेबल पर खाना खाना होगा और फोन टेबल से से 20 कदम दूर रहेगा. बाथरूम जाते समय सब अपने फोन बाहर रख कर जाएंगे. यदि कोई नियम तोड़ेगा तो 1 महीने तक बाहर से खाना और्डर नहीं कर पाएगा.’’

हम सब स्वीकार करें या न करें अब हम हर प्रश्नों के उत्तरों के लिए स्मार्टफोन पर निर्भर होते जा रहे हैं. यही निर्भरता मानसिक आलस्यपन को बढ़ा रही है. जरनल मैमोरीज में प्रकाशित एक शोध में यह पुष्टि भी हुई है. एक सर्वे में कठिन प्रश्नों के उत्तरों के लिए गूगल की मदद लेने के लिए कहा गया तो यह देखा गया कि सरल प्रश्नों के उत्तरों के लिए भी गूगल की सहायता ली गई.

न्यूरोसाइकिएट्रिस्ट की क्लीनिकल डाइरैक्टर सुसैन लेहमैन कहती हैं कि स्मार्टफोन हमारी याद करने की दिमागी कैपैसिटी पर बाधा डालते हैं. जब आप  इन उपकरणों का प्रयोग करते हैं तब आप का दिमाग बातचीत करते समय तेजी से स्विच कर रहा होता है. आप की एकाग्रता पर होने वाले बदलाव किसी तथ्य या विचार को यादों में पर्याप्त रूप से दर्ज करने से रोकते हैं.

वर्चुअल वर्ल्ड

इस मोबाइल फोन के रचे हुए वर्चुअल वर्ल्ड ने एक तरह से लोगों को उन के दोस्तों, परिवारों और प्रियजनों से भी दूर कर दिया है. 80 फीसदी लोगों ने यह स्वीकार किया है कि वे स्मार्ट फोन पर उस समय भी समय बिताते हैं जब वे अपने पेरैंट्स के साथ होते हैं और पेरैंट्स ने माना कि वे बच्चों के सामने मोबाइल पर चिपके रहते हैं.

एक सर्वे में शामिल 69 फीसदी लोगों ने माना है कि जब वे अपने स्मार्टफोन में डूबे होते हैं तो अपने पेरैंट्स, फ्रैंड्स और आस पास के लोगों का ध्यान खो बैठते हैं.

स्वास्थ्य पर प्रभाव

इस का अधिक उपयोग रेडियो फ्रीक्वैंसी विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों से संपर्क में ला सकता है, जिस से स्वास्थ्य समस्या का खतरा हो जाता है.

स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी नींद के पैटर्न में बाधा डाल सकती है, जिस से नींद में खलल पड़ता है.

लंबे समय तक स्मार्टफोन का उपयोग करने से टैक्स्ट नैक, आंखों में तनाव, कलाई में दर्द की समस्या पैदा कर सकता है. अत्यधिक समय और सोशल मीडिया का उपयोग चिंता, अवसाद और नकारात्मक मूड की ओर धकेलता है.

शारीरिक गतिविधि की कमी से मोटापा, हृदयरोग, मधुमेह, पीठ दर्द और कंधे में तनाव जैसी परेशानियों को जन्म देता है.

फोन से ज्यादा चिपकना सेहत को नुकसान पहंचा रहा है. ब्रिटिश न्यूरोलौजिस्ट डा. अल्वारो विलबावो कहते हैं कि 6 साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल दे कर हम उन से उन की क्रिएटिविटिव बचपन की स्मृतियों को संजो कर रखने की क्षमता को भी उन से छीन रहे हैं. इस से उन में डिप्रैशन, अटैंशनडैफिसिट, डिसऔर्डर जैसी समस्याएं दिखाई पड़ रही हैं.

ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि 2050 तक लोग स्मार्ट फोन्स का उपयोग बंद कर देंगे. इस के स्थान पर इंटरफेस की जरीए इंसानी दिमाग को इंटरनैट से कनैक्ट किया जाएगा अर्थात काल करना हो, खाना और्डर करना हो, बस आप सोचिए और काम हो जाएगा.

फिलहाल स्मार्ट फोन के शिकंजे से अपने दिमाग को निकालने की जरूरत है वरना हम सब टैलीपैथी टैक्नीक से पहले ही रोबोट में बदल जाएंगे.

ये आंकड़े हमें डराते हैं

ड्राइविंग के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल के कारण 1-6 मिलियन दुर्घटनाए होती हैं. सोशल मीडिया, मैसेजिंग और मनोरंजन ऐप्स के कारण लोगों का फोन पर बिताया हुआ समय 51% से ज्यादा हो गया है.

80 फीसदी लोग आंख खोलते ही अपने फोन पर पहले नजर डालते हैं. 56 फीसदी अमेरिकियों ने वेतनवृद्धि की पेशकश के बावजूद 1 महीने के लिए फोन को नहीं छोड़ा.

न्यूरौलाजी के प्रोफैसर ओलिवर हार्ट्ज कहते हैं कि जब आप एक बार अपनी मैमोरीज का प्रयोग करना बंद कर देते हैं तो उम्र होने पर डिमेंशिया का खतरा भविष्य में बढ़ जाता है. आज के यंग हो सकता है 40-50 साल की एज में ही मैमोरी लैस के शिकार होने लगें.

एक अन्य शोध के अनुसार हमारा मस्तिष्क तेजी से याद रखने की क्षमता खो रहा है, जिसे डिजिटल ऐमेंशिया कहा जा रहा है क्योंकि हम लोग डेटा को याद करने के लिए तकनीक पर निर्भर होते जा रहे हैं.

शोध कहते हैं कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी लोगों की बौडी क्लौक को खराब कर देती है, जिस की वजह से आप को अपने सामान्य समय पर भी सोना मुश्किल हो जाता है. यह प्रकाश नींद के लिए जिम्मेदार हारमोन मेलाटोनिन को दबा देता है, जिस से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

सप्ताह में कम से कम 1 दिन बिना फोन के रहने का अभ्यास डालने की जरूरत है और फिर देखिए फोन के कारण आप अपने आसपास का कितने कुछ को ध्यान से नहीं देख पा रहे हैं. यहां तक कि अपने मनोरंजन के अन्य तरीकों के बारे में सोच पाएंगे.

सोशल मीडिया की एक यूजर हिना ने बताया कि उन्होंने एक नया दिन फोन के बिना शुरू करने का फैसला किया तो पहले दिन बिना गूगल मैप के घर से निकलने में असहजता महसूस हुई परंतु उन्हें आश्चर्य तब हुआ, जब वे सीधा औफिस पहुंच गईं और उस दिन हर दिन से ज्यादा काम किया.

द्य यदि आप बहुत सारी सोशल साइट्स पर व्यस्त रहते हैं तो हर एक दिन के बाद एक दिन के लिए सोशल साइट्स से दूरी बना कर रहें और धीरेधीरे आदत डाल लें और इस तरह से बेवजह अपना समय खराब करने से बचें.

अपने स्मार्टफोन में से सभी गैरजरूरी ऐप्स हटा दें. इस से आप का ध्यान नहीं भटकेगा, समय भी बचेगा.

कुशल समय प्रबंधन विषय में पढ़ कर, उस पर ध्यान दे कर तमाम व्यस्तताओं के साथ भी अपने परिवार के लिए समय निकालें.

खाना खाते समय इंटरनैट और टीवी बंद ही रखें और उस समय का इस्तेमाल परिवारजनों के साथ बातचीत कर के करें.

रात को सोने से पहले ही मोबाइल से दूरी बना लें और शांत मन से दिनभर किए गए कार्यों पर विचार करें.

यह न भूलिए कि तकनीक से परे जो वास्तविक जीवन और खुशियां हैं वे आप का इंतजार कर रही हैं जिन का पूरा आनंद उठाना चाहिए.

न्यूरोसाइकिएट्रिस्ट की क्लीनिकल डाइरैक्टर सुसैन लेहमैन कहती हैं कि स्मार्टफोन हमारी याद करने की दिमागी कैपैसिटी पर बाधा डालते हैं. जब आप  इन उपकरणों का प्रयोग करते हैं तब आप का दिमाग बातचीत करते समय तेजी से स्विच कर रहा होता है. आप की एकाग्रता पर होने वाले बदलाव किसी तथ्य या विचार को यादों में पर्याप्त रूप से दर्ज करने से रोकते हैं.

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