राइटर-  सीमा प्रताप

Social Story : हम  कभीकभी बहुत ही छोटी रकम के लिए बहस करते हैं. लेकिन सामने वाले व्यक्ति के बोलने के लहजे में इतना अपनापन होता है कि फिर आगे बहस करने की गुंजाइश नहीं बचती.

मैं अपने 2 तकिए धुनिया की दुकान पर ले गई और वहां रखे एक स्टूल पर तकिया पटकते हुए वहां काम कर रहे लड़के से गुस्से से पूछा, ‘‘मनीष जी कहां हैं?’’

उस ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, ‘‘अभी कुछ देर पहले तो यहीं थे, किसी काम से निकले होंगे, आ जाएंगे, आप मु?ो बताइए क्या काम है?’’

?ां?ालाते हुए मैं ने कहा, ‘‘अभी कुछ महीने पहले ही इन तकियों को आप से धुनवाया था, इतनी जल्दी इन में गांठें कैसे पड़ गईं? देखिए, कैसे जगहजगह से रुई इकट्ठा हो गई है.’’

‘‘कोई बात नहीं मैडमजी आप 2 मिनट रुकिए, मैं इन्हें फिर से धुन देता हूं और आप हाथ के हाथ इन्हें ले जाइए,’’ लड़के ने विनम्रता से कहा.

यह घर के पास स्थित एक छोटा सा बाजार था और घर के कार्यों के लिए मु?ो अकसर इस बाजार में जाना पड़ता था. इस के साथ ही मनीषजी की इस दुकान पर भी नियमित रूप से जाना होता रहता था.’’

वापसी में मैं उस की दुकान पर गई. तकिए ठीक हो चुके थे, पास ही स्टूल पर रखे हुए थे पर मनीष अभी भी अपनी दुकान पर नहीं थे. लड़के से कुछ कहे बिना, मैं ने स्टूल पर रखे तकिए उठा लिए और चलने को हुई. तभी उस लड़के ने कहा, ‘‘मैडम, पैसे.’’

मैं ने कहा, ‘‘पैसे क्यों? यह आप की गलती थी और आप को सुधारना थी, मैं क्यों भुगतान करूं?’’

लड़के ने कहा, ‘‘आप के दोनों तकियों दे सौ रुपए हुए.’’

मैं ने कहा, ‘‘आप दोनों तकिए रख लीजिए, जब मनीषजी आएंगे, मैं उन से बात कर लूंगी,’’ तकियों को वापस वहीं स्टूल पर पटक कर जाने को हुई. उस दुकान पर अन्य लोग भी शाम की चाय का आनंद ले रहे थे. उन में से एक ने लड़के का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘ऐसे कैसे ले जा सकती हैं.’’’

आगे बिना कुछ कहे, धम्मधम्म की आवाज करती हुई मैं ने अपने पैरों से जोर से कदम मारे और वहीं खड़ी अपनी गाड़ी में जा कर बैठ गई.

कुछ दिनों बाद मैं फिर से तकिए लेने उस दुकान पर गई. लेकिन इस बार भी मनीषजी वहां मौजूद नहीं थे. जब मैं ने पूछा तो उस लड़के ने बताया कि वे दुकान के पीछे किसी से बातचीत कर रहे हैं. मैं पीछे की ओर गई, लेकिन वे वहां भी नहीं दिखे. फिर उसी बाजार क्षेत्र में अपने अन्य छोटेछोटे काम निबटाने के बाद मैं पुन: उस की दुकान पर लौट आई. पूछने पर उस लड़के ने बताया, ‘‘मनीषजी चाय पीने गए हैं, आप उन्हें उन के मोबाइल पर काल कर सकती हैं.’’

मैं ने सिर हिला कर कहा, ‘‘ठीक है.’’

इस के बाद मैं ने मनीषजी को फोन मिलाया और कहा, ‘‘मनीषजी, मैं आप की दुकान के सामने खड़ी हूं और आप का इंतजार कर रही हूं. कृपया जल्दी आइए.’’

हालांकि मैं मनीषजी की दुकान की नियमित ग्राहक थी, फिर भी आज पहली बार उन का इंतजार करते हुए मैं ने गौर किया कि उन की दुकान आकार में शायद 10 बाई 12 फुट से अधिक नहीं थी, जिसे उन्होंने 2 हिस्सों में विभाजित किया था.

सामने की दीवार पर एक कांच की शैल्फ लगी थी, जिस में सिले हुए तकिए,

रजाई, गद्दे की खोलियां और अन्य सिलाई के कपड़े रखे हुए थे. दुकान की दहलीज पर दोनों तरफ सजेसंवरी रजाइयां, गद्दे और तकिए रखे थे, जिन में से कुछ कोने में मसलन भी रखे गए थे.

दुकान के दाहिने हिस्से में सामान दिखाने के लिए एक छोटी सी गद्दी रखी हुई थी, जिस पर बैठ कर मनीषजी और उन का सहकर्मी सामान दिखाते थे. एक स्टूल पर छोटा सा पंखा रखा था जो गद्दी की ओर ?ाका था.

सालभर में मझे कभी भी तकिया खोलियां, सर्दियों की सारी जरूरतें—रजाई, रजाई कवर, कंबल आदि. मैं हमेशा इन्हीं की दुकान से लिया करती थी. इसीलिए हम दोनों एकदूसरे को चेहरे से बखूबी पहचानते थे.

कभी किसी चीज का कवर बनवाने के लिए जब भी मुझे इन की दुकान पर जाना होता तो हमेशा यही नजारा मिलता.

मनीषजी ने अपने सहायक के रूप में लगभग 20-21 साल का एक लड़का रखा हुआ था जो उन की अनुपस्थिति में दुकान के सारे काम संभालता था. इस के अलावा, 1-2 बुजुर्ग मुलाजिम भी थे जो एक किनारे बैठ कर सिलाई करते थे.

शायद मनीषजी के मधुर स्वभाव और हमेशा मुसकराते चेहरे की वजह से हर बार वहां 2-3 लोग अनायास ही एक कोने में बैठ कर चाय की चुसकियां लेते और आपस में बतियाते रहते थे.

कुछ देर बाद मैं ने देखा कि मनीषजी इत्मीनान से टहलते हुए मेरी ओर आ रहे हैं, वही मुसकान उन के चेहरे पर बसी हुई थी. उन्हें इस तरह आराम से चलते देख मु?ो कुछ गुस्सा आ गया.

नाराजगी जाहिर करते हुए मैं ने कहा, ‘‘आप तो कभी अपनी दुकान पर रहते ही नहीं. मैं कई बार आ चुकी हूं आप की दुकान पर, क्या अपनी दुकान में रुकने का मन नहीं होता?’’

मनीषजी ने मुझे शांतिपूर्वक देखा और मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘अरे, मैडमजी मैं तो बस शाम की चाय पीने गया था. बताइए, क्या काम था?’’

मैं ने तलख स्वर में कहा, ‘‘कुछ महीने पहले ही मैं ने ये तकिए आप के यहां धुनवाए थे. लेकिन अब ये खराब हो गए हैं, जगहजगह गांठें पड़ गई हैं. अब जब इन्हें ठीक करने दिया है तो आप का लड़का सौ रुपए मांग रह समझ नहीं पा रही, मुझे पैसे क्यों देने चाहिए? गलती तो आप की है और अगर मैं पैसे दे भी दूंगी तो इस के बाद कभी आप की दुकान पर नहीं आऊंगी,’’ मैं ने एक ही सांस में पूरी बात कह दी.

वे मुसकराते हुए बोले, ‘‘मैडमजी, आप को तो उसी दिन मुझे बुला लेना चाहिए था, यह तो एक छोटी सी बात है. कृपया गुस्सा मत होइए मैडम. यह तो घर की बात है, आप की दुकान तो हमेशा आप की ही रही है. मैं तो बस आप की इस दुकान की देखभाल करता हूं.’’

उन के बोलने का लहजा इतना सहज और मधुर था कि उन की बातें सुनते ही मेरा गुस्सा पूरी तरह शांत हो गया. उन का सादा और प्यारा अंदाज मु?ो भीतर तक छू गया.

मुसकराते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैडमजी, आप को कुछ भी भुगतान करने की जरूरत नहीं है, कृपया ये तकिए ले जाइए. आप मेरी दुकान की नियमित ग्राहक हैं, मैं आप को कैसे नाराज कर सकता हूं?’’

फिर उन्होंने दोनों तकिए उठा कर मेरे सामने रख दिए और मुसकराते हुए राजू से कहा, ‘‘राजू, ये तकिए उठाओ और मैडमजी की गाड़ी में रख दो.’’

शाम हो रही थी और मैं ने देखा कि दिनभर काम करते हुए वह लड़का गरमी में

पसीने से लथपथ हो चुका था. उस के चारों ओर रुई उड़ रही थी और वह भी मुझे ही देख रहा था. मुझे एकदम असहाय और खेद महसूस हुआ यह सोच कर कि सौ रुपए के लिए मैं ने कितनी जिरह की.

मैं ने बड़ी नरमी से कहा, ‘‘ओह, यह मेरी दुकान है, तो इसे चलते रहना चाहिए, और इस के लिए रुपयों की जरूरत तो पड़ेगी.’’

सौ रुपए उस की तरफ बढ़ाते हुए मेरी नजर उस लड़के पर पड़ी. मैं ने देखा, वह मुसकरा रहा था और तकिए हाथ में ले कर मेरे साथ गाड़ी की ओर बढ़ने लगा. उस पल मु?ो एहसास हुआ कि सच्चे आचरण और समझदारी से भरे लहजे से ही रिश्तों में असल माने बनते हैं. शायद यह छोटी सी बात न होती तो वे ग्राहक के तौर पर मुझे खो देते.

मुझे महसूस हुआ कि शब्दों की शक्ति और विनम्रता किसी भी समस्या का समाधान कर सकती है और जीवन की छोटीछोटी बातें ही इंसानियत और समझ को परिभाषित करती हैं और मैं आज भी मनीषजी की दुकान की नियमित ग्राहक हूं.

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