अभी बहुत साल नहीं बीते हैं जब स्क्रीनों पर मैरिज को सैक्रोसैंट, संस्कारी, संस्कृति महान बनाने वाली कहानियां फिल्मों और टीवी
सीरियलों में सैकड़ों की तादाद में दिख रही थीें. इन सीरियलों ने 1970-80 में पैदा हुई जैनरेशन को एडल्ट होने तक धर्मकर्म, रीतिरिवाजों, पूजापाठ, चमत्कारों, दान की महिमा का इतना ब्रेनवाश कर दिया था कि उस का फायदा देश की दानदक्षिणा पार्टी को भरपूर मिला और मंदिरों की सत्ता के साथ राजनीतिक सत्ता भी मिली और घरों में भी दोबारा एडमिशन मिल गया.
हर घर में मंदिर बनने लगे. मिलेनियम जैनरेशन की औरतें कभी सलवार, कमीज, कभी टीशर्ट और कभी पारपंरिक साडि़यों में नजर आने लगी पर पूरी तरह धर्म की चासनी में लपेटी हुई थी और पुरुषों को बड़ा लाभ हुआ. उन की मेलडौमिनेटर लाइफ लगभग पहले जैसी चलने लगी और ऐजुकेटेड जैनरेशन ने उसी तरह बच्चे पाले जैसे उन की मांओं ने पाले थे जो अनऐजुकेटेड थीं पर हर समय चूल्हेचौकों में बिजी रहती थीं.
मिलेनियम जैनरेशन की खूब फिल्में और टीवी सीरियल बने जिन में लड़कियां काम भी कर रही हैं, घर का खाना भी बना रही हैं, चुनरी से सिर ढक कर आनेजाने वाले पंडितों के पैरों में भी पड़ रही हैं.
अब एक नई जैनरेशन आ गई है और स्क्रीन का रंग बदलने लगा है.
8 ऐपिसोड का टीवी सीरियल ‘मुसाफिर कैफे’ भोपाल और मसूरी के बीच घूमता है जिस के तीनों मुख्य पात्र व एक चौथा जो स्क्रीन पर नहीं आया, लिवइन में रह रहे हैं और उन के पेरैंट उन्हें फिजिकली प्रेजैंट हो कर या मोबाइल स्क्रीन पर शादी करने को कहते रहते हैं पर जबरदस्ती नहीं करते.
इस में पहले शिखा और चंदर मिलते, कुछ रोज साथ रहते हैं और फिर चंदर प्रीति है जो एक बिस्तर पर सोते हुए अनमैरिड हैं और एक कैफे चला रहे हैं. सभी छोटे शहरों के हैं, कोई रतलाम का, कोई भोपाल का. सभी के पेरैंट्स पढ़ेलिखे पर लिवइन में रहने वाले व्यस्क से भी ज्यादा बड़े हो चुके बच्चों को सलाह देते हैं कि शादी कर लो, जबरदस्ती नहीं करते.
यह भारी बदलाव की निशानी है. स्क्रीन आज प्रिंट और बुक्स से आगे है. स्क्रीन पर ‘मुसाफिर कैफे’ जैसे सीरियल अब दिखने लगे हैं. चाहे वे कहानी की कमजोरी की वजह से पौपुलर न हों. पर यह पक्का है कि वे उस जैनरेशन को रिप्रजैंट करते हैं जिस ने जंतरमंतर पर जमा हो कर नरेंद्र मोदी की बेहद दकियानूसी, कट्टर और ऐरोगैंट सरकार को पीसफुल प्रोटैस्ट से मनवा लिया.
शादी करना जरूरी है या नहीं, यह लोगों का अपना फैसला है. आप इंश्योरैंस ले कर मैडिकल इमरजैंसी का इंतजाम भी कर सकते हैं और बचत कर के जमा पैसे से भी अपना इलाज कर सकते हैं. शादी और इंश्योरैंस क्लेम दोनों में अनसर्टेनिटी है. लिवइन में शयोरिटी है कि जो भी करनाधरना आज करना है. आज ही सारा लेनादेना कर लो और बच्चे कर के भविष्य की लायबिलिटी या ऐसैट की चिंता न करो.
शादी एक इंश्योरैंस थी कि जीवनसाथी लंबे समय चाहो या न चाहो, मरने तक साथ रहेगा पर इंश्योरैंस कंपनियों की तरह उस की शर्तें भी बदलती रहती हैं. इंश्योरैंस क्लेम बहुत से सक्सैसफुल होते हैं पर जो सक्सैसफुल नहीं होते हैं वहां बड़ा दर्द छोड़ते हैं. शादी भी ऐसी ही है. पहले पंडेपुजारी इन्हें बढ़ावा दिया करते थे क्योंकि उन्हें मोटा पैसा मिलता है, अब वे सिर्फ शादी से नहीं, दूसरे हजार तरीकों से पैसा कमा रहे हैं और इसलिए उन्हें ‘सास भी कभी बहू नहीं थी’ की जरूरत नहीं और ‘मुसाफिर कैफे’ को चलने दे रहे हैं.
