cancer and breastfeeding : कैंसर आजकल कुछ हद तक लाइफस्टाइल डिजीज में शामिल हो चुका है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार लगभग 30 से 50% कैंसर के मामलों को स्वस्थ जीवनशैली अपना कर रोका जा सकता है. कभी ऐसा समय था जब इस बीमारी का नाम सुनते ही मरीज और उस के परिवार के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते थे, पर ऐसा अब नहीं है। कई कैंसर के इलाज आज हैं और समय पर इस का इलाज करवाने पर रोगी रोगमुक्त भी हो सकते हैं.

गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के पहले वर्ष के भीतर होने वाले ब्रैस्ट कैंसर को ‘प्रैगनैंसी-एसोसिएटेड ब्रैस्ट कैंसर’ कहा जाता है. वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, यह हर 3,000 गर्भवती या नई मांओं में से लगभग 1 महिला 0.03% को प्रभावित करता है.

युवा महिलाओं खासकर 45 वर्ष से कम आयु में होने वाले कुल ब्रैस्ट कैंसर के मामलों में, नई मांओं और गर्भवती महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 7% से 15.6% होती है. 30 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में यह आंकड़ा बढ़ कर 20% तक पहुंच जाता है क्योंकि स्तनपान कराने वाली मांओं में गांठ को अकसर दूध की गांठ मान लिया जाता है, जिस से बीमारी का पता स्टेज 2 या 3 में जा कर चलता है। इतना ही नहीं वर्तमान में महिलाएं अधिक उम्र में गर्भधारण भी कर रही हैं.

कई बार कैंसर कम उम्र की महिला को भी अटैक कर देती है, ऐसे में अगर कैंसर से जूझ रही महिला एक नवजात बच्चे की मां है, तो उस की सब से बड़ी चिंता अकसर बच्चे को ले कर होती है। ऐसी परिस्थिति में वह करे तो करे क्या, क्या वह अपने बच्चे को स्तनपान करा सकती है? क्या मां के दूध के जरीए कैंसर बच्चे तक पहुंच सकता है? आइए जानते हैं ऐक्सपर्ट की राय क्या है :

ऐक्सपर्ट राय

ओनकोलाइफ कैंसर सैंटर, तलेगांव, पुणे के सर्जिकल औंकोलोजिस्ट डाक्टर उत्कर्ष अजगावकर कहते हैं कि सिर्फ मां को कैंसर होने की वजह से उस के स्तन के दूध से बच्चे को कैंसर होने का खतरा नहीं माना जाता. मां का कैंसर सामान्य रूप से स्तनपान के जरीए बच्चे में नहीं फैलता. मातृ कैंसर से बच्चे तक कैंसर कोशिकाओं के दूध के माध्यम से पहुंचने का कोई प्रमाण आजतक नहीं मिला है. हालांकि, स्तनपान की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि मां को किस प्रकार का कैंसर है और उस का इलाज किस तरीके से चल रहा है. कैंसर का इलाज शुरू होने के बाद स्थिति अलग हो सकती है.

दवाइयां होती हैं नुकसानदायक

कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं मां के खून से हो कर स्तन के दूध में पहुंच सकती हैं. खासकर कीमोथेरैपी की कई दवाएं दूध में आ सकती हैं और बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं. इसलिए कीमोथेरैपी के दौरान आमतौर पर स्तनपान कराने की सलाह नहीं दी जाती.

इसी तरह कुछ हारमोन थेरैपी और टार्गेटेड थेरैपी की दवाएं भी स्तन के दूध में पहुंच सकती हैं. इन दवाओं का नवजात शिशु पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह दवा के प्रकार पर निर्भर करता है, इसलिए इलाज के दौरान बिना डाक्टर की सलाह के बच्चे को स्तनपान कराना या दवा बंद करना उचित नहीं है.

अगर महिला को स्तन कैंसर का पता चला है और अभी कैंसर का इलाज शुरू नहीं हुआ है, तो कुछ परिस्थितियों में उपचार शुरू होने तक स्तनपान संभव हो सकता है, लेकिन यह निर्णय डाक्टर मरीज की बीमारी, जांच और उपचार योजना को देख कर लेते हैं.

इस के आगे डाक्टर कहते हैं कि अगर महिला की सर्जरी या रेडिएशन थेरैपी होने वाली है, तो स्तनपान से जुड़े फैसले अलग हो सकते हैं. रेडिएशन थेरैपी के दौरान प्रभावित स्तन से स्तनपान कराने की सलाह नहीं दी जाती, जबकि कुछ परिस्थितियों में अप्रभावित स्तन से स्तनपान जारी रखना संभव हो सकता है.

इलाज के बाद स्तनपान कराना है संभव

इस के अलावा कई महिलाओं के लिए इलाज पूरा होने के बाद दोबारा स्तनपान करना संभव हो सकता है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह की सर्जरी, रेडिएशन या अन्य उपचार हुआ है. स्तन कैंसर की सर्जरी या रेडिएशन के बाद प्रभावित स्तन में दूध बनने की क्षमता कम हो सकती है, लेकिन कई महिलाएं दूसरे स्तन से बच्चे को दूध पिला सकती हैं. इलाज पूरा होने के बाद स्तनपान कराने से कैंसर के दोबारा होने का खतरा बढ़ता है, ऐसा माना नहीं जाता.

शिशु को कैंसर होने का डर नहीं

अगर किसी महिला को बाद में कैंसर का पता चलता है और उस ने उस से पहले अपने बच्चे को स्तनपान कराया है, तो केवल इस वजह से बच्चे को कैंसर होने की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मां का कैंसर स्तनपान के माध्यम से बच्चे में फैलने का प्रमाण नहीं है. इसलिए कैंसर से जूझ रही मां के लिए सब से जरूरी बात यह है कि वह डर या गलत जानकारी के आधार पर फैसला न ले.

कैंसर अपनेआप मां के दूध से बच्चे तक नहीं पहुंचता, लेकिन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं बच्चे के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं. इसलिए स्तनपान जारी रखना है, रोकना है या बाद में दोबारा शुरू करना है, इस का निर्णय विशेषज्ञ की सलाह से ही लेना चाहिए.

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