Memory loss : किसी बात को भूल जाना एक आम बात है, जो किसी के साथ भी हो सकती है. कई बार कोई नाम लाख कोशिशों के बाद भी याद नहीं आता, कभी कोई शब्द जुबान पर आकर अटक जाता है, तो कभी किसी कमरे में कदम रखते ही भूल जाते हैं कि वह वहाँ क्यों आए थे. असल में ये सब ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव का एक सामान्य हिस्सा हैं, लेकिन, जब यह भूलक्कड़पन आदत बन जाए या रोज़मर्रा के कामों पर असर डालने लगे, तो समझ लीजिए कि अब इस पर गंभीरता से ध्यान देने का वक्त आ गया है.
जानें भूलने की वजह
इस बारे में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की कॉग्निटिव और बिहेवियरल न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. अणु अग्रवाल कहती हैं कि शुरुआत में यादें मुख्य रूप से मस्तिष्क के ‘हिप्पोकैम्पस’ में बनती हैं. यह दिमाग की गहराई में स्थित एक हिस्सा है. इसका काम नई जानकारियों को सहेजना होता है. साथ ही ज़रूरत पड़ने पर उन्हें फिर से याद दिलाने में मदद करता है. मस्तिष्क के अगले और साइड के हिस्से को फ्रंटल और टेम्पोरल लोब्स कहते हैं.
ये हिस्से ब्रेन सेल्स के नेटवर्क के साथ मिलकर काम करते हैं. इनका काम कुछ नया सीखना, याद रखना, फैसले लेना और ध्यान लगाना है, लेकिन कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ इस पूरे सिस्टम में रुकावट डाल सकती हैं. इनमें अल्ज़ाइमर रोग और वैस्कुलर डिमेंशिया शामिल हैं. इसके अलावा लेवी बॉडी डिमेंशिया, फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया और पार्किंसंस डिमेंशिया भी इसकी वजह हो सकते हैं. कुछ मामलों में स्ट्रोक, सिर की चोट, इन्फेक्शन या विटामिन की कमी से भी ऐसा हो सकता है. राहत की बात यह है कि इनमें से कुछ कारणों का इलाज मुमकिन होता है, कुछ का नहीं. यही वजह है कि सही समय पर शुरुआती जांच कराना बेहद ज़रूरी है.
भूलना गंभीर बात नहीं
डॉक्टर आगे कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ थोड़ा-बहुत भूलना स्वाभाविक है. किसी का नाम भूल जाना या चाबियाँ कहीं रखकर भूल जाना बेहद आम बात है. कभी-कभी किसी अपॉइंटमेंट को याद रखने के लिए दूसरों की मदद भी लेनी पड़ती है. यह सब हर किसी के साथ हो सकता है, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि दिमाग में कोई गंभीर समस्या है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या व्यक्ति अपने रोज़मर्रा के काम खुद कर पा रहा है. अगर वह बिना किसी बड़ी परेशानी के अपने पैसे का हिसाब-किताब, दवाइयाँ और दूसरी ज़िम्मेदारियाँ संभाल लेता है, तो चिंता की कोई बात नहीं होती, लेकिन अगर भूलने की यह समस्या लगातार बनी रहे या हमारे रोज़ के कामों में रुकावट डालने लगे, तो बिना देरी किए डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए.
लाइफस्टाइल है जिम्मेदार
याददाश्त की समस्याओं के पीछे अक्सर बहुत ही साधारण कारण होते हैं, जैसे कि ठीक से नींद न आना. जब नींद पूरी नहीं होती या जेट लैग होता है, तो दिमाग थोड़ा उलझा हुआ महसूस करता है. उस समय हम बहुत फुर्ती से काम नहीं कर पाते हैं. दिमाग के सही तरीके से काम करने के लिए सामान्य और अच्छी नींद बेहद ज़रूरी है. गहरी नींद के दौरान ही हमारा दिमाग दिनभर की ज़रूरी यादों को मज़बूत और सुरक्षित करता है. यही वजह है कि स्कूल के दिनों में जब हम परीक्षा की ठीक पहली रात देर तक जागकर पढ़ाई करते थे, तो वह सब परीक्षा खत्म होते ही दिमाग से साफ हो जाता था. आज की आधुनिक शहरी जिंदगी में रोज़ाना सुबह देर तक सोना या देर से जागना हमारी वर्क-लाइफ का हिस्सा बन चुका है. इसके अलावा ‘ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया’ जैसी बीमारियों के कारण नींद बार-बार टूटती है. यह सब एक साथ अगर मिल जाता है, तो याददाश्त की कमजोरी को पैदा करते हैं, जिससे ऑफिस या काम के प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ सकता है.
याददाश्त कमजोर होने के कुछ दूसरे सामान्य कारण भी हैं, जिन्हें आसानी से ठीक किया जा सकता है. इनमें शरीर में विटामिन की कमी, थायराइड की समस्या और अनियंत्रित डायबिटीज़ जैसी बीमारियाँ शामिल हैं.
भूलना और डिमेंशिया
किसी बात को भूल जाना और डिमेंशिया दो अलग हैं. डिमेंशिया दिमाग या न्यूरोलॉजिकल सिस्टम से जुड़ी एक बीमारी है. यह बीमारी धीरे-धीरे व्यक्ति की याददाश्त, सोचने की क्षमता, भाषा, सही फैसला लेने की ताकत और उसके स्वभाव को खत्म कर देती है. यह असर सामान्य भूलक्कड़पन से कहीं ज्यादा गंभीर होता है. अल्ज़ाइमर रोग इस बीमारी का मुख्य केंद्र होता है. डिमेंशिया के लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामले अल्जाइमर के ही होते हैं. यह बीमारी दिमाग में असामान्य रूप से प्रोटीन जमा होने, ब्रेन सेल्स के नष्ट होने और धीरे-धीरे दिमाग के सिकुड़ने के कारण होती है.
लें एक्सपर्ट की सलाह
कुछ संकेत ऐसे होते हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए, मसलन
• परिचित जगहों पर भी रास्ता भूल जाना या उलझन महसूस होना.
• जब भूलने की आदत रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगे.
• बातचीत के बीच में भूल जाना कि क्या बात हो रही थी.
• एक ही सवाल को बार-बार दोहराना या गलत फैसले लेना आदि.
इसके अलावा अगर व्यक्ति के स्वभाव में कोई शांत-सा बदलाव दिखने लगे, तो ये सभी लक्षण ध्यान देने योग्य हैं, ऐसी स्थिति में न्यूरोलॉजिस्ट से सही जांच कराना बहुत ज़रूरी है.
अक्सर किसी व्यक्ति में आ रहे इन बदलावों को सबसे पहले उनके करीबी लोग ही नोटिस करते हैं और शुरुआती दौर में पहचान लेने से इलाज के बेहतर विकल्प मिलते हैं. साथ ही, व्यक्ति लंबे समय तक आत्मनिर्भर रहकर अपनी ज़िंदगी जी सकता है.
साथ ही कुछ सुझाव ऐसे हैं, जिन्हें अपने लाइफस्टाइल में शामिल करने पर भूलने की आदत से बचा जा सकता है,
• ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखना,
• धूम्रपान न करना, नशे का आदी न होना,
• आसपास के लोगों से जुड़े रहना
• इस अवस्था में माइंड को व्यस्त रखना बहुत जरूरी होता है. लंबे समय तक खुद को क्रिएटिव फील्ड से जोड़ना दिमाग के हक में ही काम करता है, जैसे किताबें पढ़ना, कोई नई भाषा या वाद्य यंत्र सीखना, दिमाग को सक्रिय रखना, पहेलियाँ सुलझाना, शतरंज खेलना और लोगों से आमने-सामने बातचीत करना भी काफी मददगार साबित होता है.
सही माइंड डाइट है जरूरी
डॉक्टर कहती हैं कि खान-पान का भी दिमाग की सेहत से सीधा कनेक्शन होता है. सही ‘माइंड डाइट’ बहुत आवश्यक है. इस डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, रंग-बिरंगी सब्जियाँ, बेरीज़, साबुत अनाज और दालें शामिल होनी चाहिए. साथ ही मेवे, मछली और हेल्दी फैट्स खाने पर ज़ोर दिया जाता है. इस डाइट में प्रोसेस्ड फूड, रेड मीट और अत्यधिक चीनी से दूरी बनाई जानी चाहिए. रिसर्च से पता चला है कि लंबे समय तक ऐसी डाइट को फॉलो करने से सोचने और समझने की क्षमता बेहतर होती है.
इस प्रकार कभी-कभार कुछ चीजें भूल जाना इंसानी स्वभाव का हिस्सा है, लेकिन याददाश्त की बढ़ती हुई कमजोरी को सिर्फ उम्र का असर मानकर अनदेखा न करें. इसमें जल्द से जल्द न्यूरोलॉजिकल जांच से बेहतर इलाज के विकल्प मिलते हैं, जो आपकी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सकता है.
