Child creativity development : अकसर हम बच्चों की स्कूल में हुई डांस परफौर्मैंस को देख कहते हैं कि बेटा तुम तो हीरो निकले. कभी उन के झूठमूठ के रोनेधोने को देख बोलते हैं कि अरे तुम तो बड़े नौटंकीबाज हो, क्या झूठी ऐक्टिंग की तुम ने. मैं तो सच मान बैठा या कभी उन की गुनगुनाहट को सुन हम कहीं खो जाते हैं.
चलिए बच्चों की कला, क्षमता और हुनर को नई उड़ान दें. जिन कलाकारों को वे दिनभर अपनी स्क्रीन पर देखते रहते हैं और उन की नकल करते हैं, उन की जर्नी की शुरुआत कैसे होती है? उस का रास्ता उन्हें भी दिखाएं. क्या पता बच्चे स्क्रीन को छोड़ स्टेज की ओर बढ़ने लगें.
आज बहुत प्रोफैशनल आर्टिस्ट, ऐक्टिंग स्कूल, थिएटर ग्रुप, डांस क्लास आदि बच्चों के लिए समर वैकेशन की स्पैशल वर्कशौप रखते हैं, साथ ही इन वर्कशौप में हर उम्र के बच्चों के लिए उन की ऐज ग्रुप के हिसाब से प्रोग्राम रहते हैं तो फिर बच्चा 4 साल का हो या 16-17 साल का उसे छुट्टियों में स्क्रीन से दूर करने के लिए आप कला का सहारा लें.

अगर आप यह समझते हैं कि ऐक्टिंग और आर्ट परफौर्मिंग केवल स्टेज परफौर्मैंस या सिनेमा में ही फायदा देती है तो यह गलत है. बच्चों के लिए अभिनय कला या ऐक्टिंग ऐसे बहुत फायदे लिए होती है जो आमतौर पर हम नहीं देख पाते, मगर इन से बच्चों की पर्सनल पर्सनैलिटी के साथ ऐकैडमिक परफार्मैंस में भी बहुत असर पड़ता है.
बच्चों के आर्टफौर्म क्लास से जुड़ने के फायदे
कौन्फिडैंस ऐंड पर्सनैलिटी डैवलपमैंट : ऐक्टिंग हो या डांस या कोई भी आर्टफौर्म जब बच्चे उसे करना शुरू करते हैं तो उन में एक उत्साह आता है और एक छोटी सी मिली प्रशंसा भी उन के भीतर एक गजब का कौन्फिडैंस पैदा करती है. बच्चे का खुद पर, अपनी कला पर विश्वास पैदा होता है, जिस से उस का पर्सनल डैवलपमैंट भी बूस्ट होता हैं.
प्रमोट स्टेज ऐक्टिविटी: अगर बचपन में एक बार स्टेज फियर आ जाए तो बहुत समय तक रहता. हम स्टेज तो क्या चुनिंदा लोगों के बीच में भी अपनी बात रखने से हिचकते हैं. मगर बचपन से की गई ऐक्टिंग, सिंगिंग, डांस या कोई भी आर्ट परफौर्मैंस आप के अंदर से यह डर निकालती है. बच्चें को ड्रामा करना हो या कोई स्पीच देनी हो या फिर स्कूल के किसी प्रोग्राम की होस्टिंग, सिंगिंग करनी हो वह स्टेज पर जाने से डरता बेझिझक अपनी बात सब के सामने रख पाता है.
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कम्युनिकेशन स्किल : सोलो परफौर्म हो या गु्रप परफौर्म यह एक तरह का कम्युनिकेशन ही है, जहां आप अपनी ऐक्टिंग या सिंगिंग अथवा डांस में बौडी मूवमैंट से लोगों को सम?ा, सुना रहे हैं, साथ ही यहां कम्युनिकेशन सिर्फ वेर्बल कम्युनिकेशन ही नहीं होती बल्कि फेशियल ऐंड इमोशनल ऐक्सप्रैशन की भाषा भी बोली और समझ जाती है.
लैंग्वेज ऐंड कल्चरल लर्निंग : कई बार ऐक्टिंगसिंगिंग से जुड़ने पर बच्चों को भाषाओं का भी ज्ञान होता है. जैसे अगर वह कोई रीजनल या ट्राइबल थीम का ड्रामा कर रहे हों तो उन्हें एक नए कल्चरल का पता चलता है. साथ सिंगिंग या ड्रामे को खास बनाने के लिए अगर उस की रीजनल लैंग्वेज के लिरिक्स या डायलौग हों तो बच्चे नई भाषा भी सीखते हैं. डांस में भी आप को दूसरे राज्यों, प्रांतों की डांस फौर्म सीखने को मिलती है.
टीम वर्क : इन सभी आर्ट फौर्म में बहुत गु्रप परफौर्मैंस होती हैं, जहां बच्चे एकदूसरे के साथ परफौर्म करते हैं, एकदूसरे को देख कर उत्साहित होते हैं, एकदूसरे से सीखते हैं, साथ ही किसी एकदूसरे को अच्छा परफौर्म करने का जोश भी देते हैं और किसी की परफौर्मैंस अच्छी न होने पर उसे निराश नहीं होने देते बल्कि उस का मनोबल बढ़ाते हैं या किसी से स्टेज पर गलती हो जाए तो अपने अभिनय से छिपाने की या अपने साथी की मदद करने की कोशिश भी करते हैं. यह बच्चों को टीम वर्क स्किल सिखाता है.
इंप्रूव मैमोरी : ऐक्टिंग में अपने डायलौग, सिंगिंग में लिरिक्स या डांस में स्टैप याद रखने होते हैं, सभी छोटीछोटी बारीकियां याद रखनी होती हैं. ऐसे जब बच्चा इस तरह की ऐक्टिविटी में होता है तो उस की याद रखने की शक्ति यानी कि मैमोरी पावर भी बढ़ती है और यह मैमोरी पावर उसे ऐकैडमिक सब्जैक्ट्स को याद रखने में भी मदद करती है.
सैल्फ ऐक्सप्रैशन : ऐसा बहुत बार देखा गया कि बच्चा छोटा हो या बड़ा वह खुद की फीलिंग खुल कर ऐक्सप्रैस नहीं कर पाता. वह किसी न किसी संकोच या हिचक से घिरा रहता है. वहीं ये सारे आर्ट फौर्म बच्चे के लिए इस संकोच से निकलने का रास्ता बनते हैं. इन के जरीए बच्चे खुल कर खुद को ऐक्सप्रैश कर पाते हैं.
इमोशनल कनैक्शन : ऐक्टिंग और आर्ट फौर्म को करते समय बच्चे अपने कैरेक्टर को सम?ाते हैं, उसे जानते, लिखे शब्दों को सिर्फ पढ़तेबोलते या गाते ही नहीं बल्कि उस के पीछे के इमोशन से भी जुड़ते हैं, अपने साथ के कलाकार की फीलिंग को भी नजदीक से देखतेसम?ाते हैं, जिस से उन में इमोशनल कनैक्शन पैदा होता है. इस तरह के कनैक्शन से वे दूसरों की फीलिंग्स को सम?ाते हैं, रिस्पैक्ट रखते हैं, जिस से किसी को बुली या कम सम?ाने की सोच उन से दूर होती है.
हैल्प टू स्ट्रैस फ्री : ऐकैडमिक हमेशा छोटा या बड़ा स्ट्रैस लिए होता है. जहां यह आर्ट फौर्म उस स्ट्रैस को दूर करने का काम करती है.
वास्तविक दुनिया से संवाद
रंगमंच बच्चों को न केवल खेलखेल में नई दिशा देता है बल्कि उन का सर्वांगीण विकास कर उन्हें जीवन के संघर्षों से लड़ने में भी सक्षम बनाता है. अभिभावकों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है. आज बच्चों का जीवन केवल पढ़ाई, परीक्षा और प्रतियोगिता तक सीमित होता जा रहा है. साथ ही मोबाइल और स्क्रीन की बढ़ती आदत बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर रही है.
ऐसे समय में बाल रंगमंच चिल्ड्रन थिएटर न केवल बच्चों का मनोरंजन करता है बल्कि उन के व्यक्तित्व को भी निखारता है. यह बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानने और आत्मविश्वासी बनाने की एक अनूठी प्रक्रिया है.
बच्चे खेलखेल में सीखते हैं, अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखते हैं और जीवन के अनेक महत्त्वपूर्ण गुणों को सहज रूप से अपनाते हैं. आज अधिकांश अभिभावक इस बात से चिंतित हैं कि बच्चे मोबाइल और वीडियो गेम्स में अधिक समय बिताते हैं. ऐसे में बाल रंगमंच बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखता है. इस से वे स्क्रीन से दूर हो कर वास्तविक दुनिया में संवाद और अनुभव प्राप्त करते हैं.
-संजय टुटेजा निदेशक, रंगकर्मी, वरिष्ठ लेखक व पत्रकार
उड़ान द सैंटर औफ थिएटर आर्ट ऐंड चाइल्ड डैवलपमैंट
