Overspending: अमेरिका हो या भारत पूरा मीडिया इसी बात पर टिका है कि लोग जो भी काम कर के पैसे कमाएं, पूरा खर्च डालें. सभी कंपनियां, क्रैडिट कार्ड कंपनियां, एअरलाइंस, ट्रैवल एजेंसियां, धर्म का व्यापार करने वाले (जो शायद सब से बड़ा धंधा करते हैं) ग्राहकों को हर समय खर्च करते रहने को उकसाते हैं. सोशल मीडिया ने तो हद कर दी है. उस में हर रोज कुछ नया खर्च करने की ही सलाह दी जाती है मानो जिंदगी खर्च करने के लिए बनी है, कमाने के लिए नहीं.

असल में आधुनिक बिजनैस और इकौनोमिक्स इस तरह विकसित किए गए हैं कि एक वर्किंग क्लास है जो बहुत हद तक अनपढ़ है और जिसे सिर्फ जीने लायक पैसे दे कर सामान तैयार करने के लिए प्रिपेयर कर डाला गया है. आमतौर पर हर देश में ऐसा हो रहा है पर कुछ देशों में यह काम बाहरी, अलग धर्म वालों, अलग रंग वालों या समाज के फेल लोगों को दिया जाता है.

इन्हें कंट्रोल करने वालों को बिना निर्माण किए प्रोडक्शन में लगे लोगों को गाइड व कंट्रोल करने का काम दे दिया गया है और इन के पास कुछ पैसा बच जाता है. पहले ये लोग अपनी बचत मकान, गाड़ी, व्हाइट गुड्स खरीदने में लगाते थे और लग्जरी गुड्स कम खरीदते थे. अब अपने खरीदे मकान की जगह किराए के मकान में रहने की जम कर वकालत की जा रही है और सामान किस्तों में लेने व लोन पर लेने की.

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