Parenting Tips : आज बच्चों को परफैक्ट बनाने की धुन मांबाप पर यों सवार है कि उन्होंने बच्चों के पढ़नेलिखने के साथसाथ उन के हंसनेगाने, खानेपीने तक का टाइमटेबल बना दिया है और इस टाइमटेबल का इतनी कठोरता से पालन किया और कराया जाता है कि मांबाप और बच्चों के संबंध का आधार उन की ममता, करुणा व प्रेम खत्म होता जा रहा है.

बिना भावना की तो सिर्फ मशीन होती है. तो इस तरह का आचरण अपना मांबाप स्वयं रोबोट बन रहे हैं और बच्चे को चाबी वाला टौय बनाते जा रहे हैं. जिस तरह एक चाबी वाला टौय उतना ही नाचता है जितनी उस में चाबी भरी जाती है. ठीक ऐसे ही मांबाप बच्चे को उतना ही हंसतागाता देखना चाहते हैं जितना उन के कड़े पेरैंटिंग के नियमों के अनुसार मान्य हो. थोड़ी भी अधिक भावुकता या छूट अनुशासन भंग के समान है.

सुबह घड़ी का अलार्म बजते ही पेरैंट्स एक मशीन की तरह बिना रुके, बिना थके अपने बच्चे के आगेपीछे घूमने लगते है. उसे बिस्तर से उठा सीधा बाथरूम में भेज तैयार कर, समय पर नाश्ता करा स्कूल भेज दिया जाता है. फिर स्कूल से ला बच्चे को ऐक्स्ट्रा क्लासेज और फिर घर वापसी पर खाने और सोने की बिना रुकी एक समयबंधित प्रक्रिया. इस बीच न कोई खेल है न कोई मनोरंजन. न बच्चे के साथ बैठ उसे मन की बात सुनना या उस के साथ कोई हंसीठिठोली कर अपना रिश्ता मजबूत करना.

रोबोटिक्स स्टाइल

रोबो पेरैंट्स बच्चों की दैनिक दिनचर्या इतनी कठोर बना देते हैं कि उस का पालन करतेकरते बच्चे उत्साहहीन हो जाते हैं. उन की चपलता, शरारतें एक अति अनुशासित प्रणाली में कैद हो जाती हैं. क्या यह जरूरी है कि बच्चा सदैव एक ही नियमित समय पर पढ़े, खाए, सोए या कोई भी कार्य करे? क्या वह खाना तब नहीं खा सकता जब उस का जी हो या उसे भूख लगे?

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इस दिनचर्या में रोज नित होने वाली सारी क्रियाएं हैं परंतु पेरैंटिंग ब्लिस अर्थात लालनपालन का सुख नहीं. यहां बच्चों की परवरिश तो हो रही है लेकिन रोबोटिक्स स्टाइल में. इस स्टाइल में जितनी तेजी और अनुशासन है, उस से कहीं ज्यादा नियंत्रण और कटुता. जहां पहले यह कहा जाता था कि ज्यादा प्यारदुलार ठीक नहीं. अब कहते हैं कि प्यारदुलार मिलता ही नहीं. मांबाप बच्चों को हर चीज में परफैक्ट बनाने में यों लग चुके हैं कि खुद इंपैक्ट मांबाप बन चुके हैं.

पहले तो परफैक्ट बनना या बनाना एक इंसानी व्यवहार या क्रिया है ही नहीं क्योंकि परफैक्शन का मानदंड किसी निर्जीव के लिए अर्थात किसी वस्तु या सामान के लिए इस्तेमाल होता है न कि इंसानों के लिए. मगर आजकल के पेरैंट्स बच्चों को परफैक्ट, हर चीज में आल राउंडर बनाने में खुद को यों ?ांकते जा रहे हैं कि बच्चों को तो कष्ट दे ही रहे हैं, साथ ही स्वयं को भी बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं.

फिलिंग्स का फ्रिक नहीं

इमोशनल बौंड खत्म होता जा रहा है, जिस का एक बहुत बड़ा कारण है कि मांबाप बच्चों को उन की भावना व्यक्त करने ही नहीं देते और न ही स्वयं बच्चों से इमोशनली अटैच्ड होना चाहते हैं. बच्चों को इमोशन दिखाते या भावुक होते देख मांबाप उन्हें डांटफटकार देते हैं. उन्हें लगता है बच्चों का यों भावुक होना उन्हें कमजोर बना देगा. इसलिए वे बच्चों के आवभाव को नजरअंदाज करते हैं जोकि बहुत बड़ी गलती है. मांबाप यह नहीं सम?ाते कि इस तरह का व्यवहार न केवल बच्चे की मानसिकता को कष्ट देगा बल्कि मांबाप के भीतर भी कठोरता भर देगा.

इस से मांबाप और बच्चों के बीच एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी हो जाएगी, जिस से मांबाप बच्चों का दर्द, उन की पीढ़ा न देखा पाएंगे और न ही सम?ा पाएंगे, साथ ही बच्चे मांबाप से अपने मन की बात कभी शेयर करने की हिम्मत या इच्छा नहीं करेंगे क्योंकि पहले से मांबाप का उन की भावना को अनदेखना करना उन्हें यह विश्वास दिला चुका होगा कि मांबाप को बच्चों की फीलिंग्स का कोई फिक्र नहीं है.

मांबाप को बच्चों की स्कूल में रैंक से पहले उन की हंसी उन की खुशी पर ध्यान देना चाहिए. मांबाप को दुनिया के सारे कोर्सेज, स्ट्रीम तो पता होंगे लेकिन बच्चे के मन में क्या चल रहा है यह पता नहीं होगा. यहां मांबाप अच्छे कालेजस्कूल से तो संपर्क बढ़ाते जा रहे हैं लेकिन अपने बच्चों की मनोस्थिति से किसी भी प्रकार के संपर्क में नहीं.

नियंत्रण अधिक है मधुरता कम. माना कि पेरैंटिंग में स्ट्रिक्ट होना जरूरी है लेकिन उस की भी एक सीमा होनी चाहिए. बहुत से मांबाप अपने नियमों और कानूनों को ले कर इतने अधिक कठोर हैं कि वे मांबाप से एक संचालक बन गए हैं. नियंत्रण संतुलित होना चाहिए. उस में जितना अनुशासन हो उतना ही लचीलापन भी हो वरना बच्चे और मांबाप का रिश्ता जेल और कैदी का बन जाएगा. जो समय उन्हें बच्चों के साथ मौजमस्ती में गुजारना चाहिए उस समय को वे कठोर अनुशासन और नियंत्रित परवरिश में खपा अपना और बच्चों का संबंध खराब कर रहे हैं.

मांबाप और बच्चों का संबंध ही ममता और भावना पर जन्मता और पनपता है लेकिन आज इसी भावना का होना लोगों को व्यर्थ दिखता है. मांबाप आजकल बच्चों को अपने इमोशन ऐक्सप्रैस नहीं करने देते जैसे बच्चों को उन्हें यह कह कर कि इतना इमोशनल होना उन्हें कमजोर करेगा, वे बच्चों को चुप करा देते हैं. यह स्वभाव बच्चों के लिए तो गलत है ही, साथ ही मांबाप के लिए भी दोषपूर्ण है.

इस तरह का पालनपोषण दोतरफा शोषण है. एक शोषण तो मांबाप बच्चों का कर रहे हैं और दूसरा शोषण स्वयं का.

परफैक्ट बनाने का स्ट्रैस

पेरैंट्स ने अपनी लाइफ भी स्ट्रैसफुल बना ली है. बच्चों को परफैक्ट बनाने का स्ट्रैस, खुद बैस्ट मांबाप बनने का स्ट्रैस. इन सब में घिर कर वे अपना जीवन नीरस करते जा रहे हैं, साथ ही यह उन के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं.

पेरैंट्स को सम?ाना चाहिए कि जिस बच्चे को परफैक्ट बनाने के लिए वे हर भावना और संवेदना का त्याग कर रहे हैं उस बच्चे को जन्म एक इंसान ने ही दिया है और इंसानी रूप में ही दिया है न कि रोबोट या मशीन ने. इसलिए बच्चे और उस के पेरैंट्स के बीच इमोशन बौंड होना ही उन दोनों के जीवन और दोनों के विकास के लिए आवश्यक है न कि कोई मशीनरी तकनीक या कोई कठिन दिनचर्या.

उन्हें ये याद रखना चाहिए की मांबाप के अतिरिक्त भी उन की एक पहचान, एक व्यक्तित्व है, जिसे वो मशीनी लिबास में कैद कर अपने निजी विकास और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को रोक रहे हैं, उस का नाश कर रहे हैं. एक इंसान के अपने विकास के लिए उस का भावनात्मक विकास होना बहुत जरूरी है. यह आप की मनोस्थिति को, पर्सनैलिटी को विकसित और ढृढ़ करता है.

मशीनी लाइफ

यह रोबोटिक पेरैंटिंग मांबाप के आपसी संबंध को भी फीका और निर्जीव कर रही है. जब पेरैंट्स का पूरा ध्यान सिर्फ अपने बच्चे को परफैक्ट बनाने में लग जाता है तो वे एकदूसरे पर ध्यान नहीं दे पाते. उन्हें एकदूसरे के साथ सिर्फ पतिपत्नी बन बैठ चार बातें करना मुश्किल पड़ता है. उन की बातों में सिर्फ बच्चों के भविष्य की योजना ही चलती रहती है. अपने संबंध और जीवन की मधुरता और उस की प्राथमिकता को किनारे कर सिर्फ पेरैंटिंग मशीन बन कर रह गए हैं जो उन के अपने रिश्ते के लिए ठीक नहीं.

रोबो पेरैंट्स के बच्चे इमोशन खो बैठते हैं. वे सिर्फ अपना काम करना जानते हैं या काम निकालना जानते हैं. ये बच्चे खुद रोबोट बन रहे हैं और दोस्तियां, रिश्ते, टीचरस्टूडैंट रिलेशनशिप की इंपौर्टैंस को भूल रहे हैं. इन के रोज ब्रेकअप होते हैं और फिर नशा करने लगते हैं. इन्हें रोज अपनी रैंकिंग की फिक्र होती है, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर फेस टू फेस रिलेशनशिप पर नहीं.

पढ़ेंगे नहीं तो पूछेंगे कैसे

अब आप सोचेंगे कि भला यह क्या बात हुई लेकिन यह सच है कि आज 70त्न से ज्यादा लोगों के पास पूछने के लिए कोई सवाल ही नहीं है. सवाल का जवाब देने के लिए आजकल कई मौडर्न टूल्स जैसे गूगल, गूगल एआई, जैमिनी और चैटजीपीटी इत्यादि हैं लेकिन सवाल कहां हैं. सवाल इसलिए नहीं हैं क्योंकि आप ने पढ़ना छोड़ दिया है. पढ़ने से दिमाग को टौनिक ही नहीं मिलता बल्कि कई नई बातें और शब्द पता चलते हैं. जब नई चीजें पता चलती हैं तब मन में जिज्ञासा पैदा होती है कि यह क्या है, क्यों है इत्यादि और तब जा कर आता है दिमाग में सवाल कि इस क्या और क्यों का जवाब ढूंढ़ा जाए. जनाब, 6 इंच की स्क्रीन देखदेख कर आंखों और दिमाग को बीमार मत बनाइए बल्कि किसी मैगजीन, किताब को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाइए. बच्चों को भी सिखाइए कि पढ़ना सिर्फ स्टडी तक सीमित नहीं बल्कि यह जीवन को नई दिशा दिखाने का ऐसा रास्ता है जिस पर चलते रहेंगे तो हर मोड़ पर कुछ नया सीखने को मिलेगा.

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