Pros and Cons of Busy Lifestyle : आशी पर हर समय काम करने की धुन सवार थी. उस दिन दफ्तर के सहकर्मी उस से कहते रहे कि आशीर्वाद आप को मीटिंग भी लेनी है इसलिए आयोजन की खरीदारी हम कर लेते हैं. मगर आशीर्वाद नहीं मानी. सुबह बेटी को स्कूल छोड़ कर सारा दफ्तर संभाला. फिर खरीदारी करने गई. रात तक इतनी थक गई कि खाना भी मुश्किल से खाया गया. आशी के पति ने इतना सम झाया था कि तुम कुछ दिनों से ढंग से नहीं सो रही हो. चिड़चिड़ी हो रही हो. जरा आराम किया करो. रिलैक्स रहो. मगर आशी को सुनना ही नहीं था. फिर वही हुआ जिस का डर था.
अपने दफ्तर के कार्यक्रम में सब से सुस्त आशी ही लग रही थी. आखिरकार उसी को नुकसान हुआ. अगर वह औरों को काम बांट देती तो कितना अच्छा होता.
आजकल मल्टीटास्किंग एक लोकप्रिय सी बात हो गई है. एकसाथ खूब काम करना. मगर उस के बाद शरीर का थक कर इतना पस्त हो जाना कि झुंझलाहट होने, रक्तचाप बढ़ने, बचैनी आदि से जू झना पड़ जाए तो ऐसी अति का भला क्या फायदा.
माना कि जिस जगह हम अपना कर्तव्य निभा रहे हैं वह दफ्तर हो या कोई और जगह काम के कुछ नियम खुद भी तय करने चाहिए. 8 से 10 घंटे तो फिर भी ठीक हैं लेकिन 12 से 16 घंटे तक किसी काम में बहुत उल झ जाना कभीकभार तो ठीक होता है पर यह हमेशा ठीक नहीं.
