Relationship Tips : ‘‘रिश्ते तब ही जीवित रहते हैं जब उन में महसूस करने की जगह होती है, सिर्फ निभाने की नहीं.’’

आज का समय विरोधाभासों का समय है. लोग चैट विंडो में घंटों जुड़े रहते हैं पर भावनाओं में कुछ ही मिनट टिक पाते हैं. सोशल मीडिया पर औनलाइन दिखना आसान है पर किसी के जीवन में सचमुच मौजूद रहना कठिन. युवा पीढ़ी प्यार चाहती है, अपनापन चाहती है लेकिन जैसे ही रिश्ते में गहराई आने लगती है एक अनजाना भय उन्हें पीछे खींच लेता है. वह जुड़ना चाहती हैं पर बंधना नहीं.

स्वतंत्रता या आत्म एकांत

अवनि एक समझदार, आत्मनिर्भर और आधुनिक विचारों वाली युवती थी. दोस्तों के बीच उस की छवि बेहद संतुलित और परिपक्व लड़की की थी. उसे लोगों से मिलना, घूमना, अनुभव साझा करना अच्छा लगता था. वह हर नई मुलाकात में खुल कर हंसती, बातें करती, योजनाएं बनाती. मगर जैसे ही कोई व्यक्ति उस के जीवन में थोड़ी स्थिरता की चाह दिखाता, अवनि के भीतर एक अलार्म बज उठता. वह अचानक व्यस्त हो जाती, काल्स कम कर देती, संदेशों के जवाब देर से देने लगती.

एक बार आदित्य ने उस से कहा, ‘‘अवनि, मैं तुम्हें अपने जीवन में गंभीरता से देखता हूं. क्या तुम भी मुझे उसी तरह देखती हो?’’

अवनि मुसकराई लेकिन भीतर से घबरा गई. उसे लगा जैसे यह सवाल उस की स्वतंत्रता पर दस्तक है. उस ने हलके स्वर में कहा, ‘‘मैं अभी किसी बंधन में नहीं पड़ना चाहती. मुझे चीजें हलकी रखना पसंद है.’’

आदित्य चुप हो गया. कुछ महीनों बाद वह रिश्ता भी भीड़ में खो गया. अवनि ने खुद को सम?ाया कि मैं ने सही किया. मैं अभी अपने लिए जीना चाहती हूं.

मगर हर बार जब कोई अच्छा रिश्ता यों ही फिसल जाता उस के भीतर एक अधूरी धुन गूंजती रहती. धीरेधीरे उसे एहसास हुआ कि जिन भावनाओं के पीछे वह भाग रही थी वही उस की सब से बड़ी जरूरत थीं.

लगाव मनुष्य की बुनियादी जरूरत

मनोवैज्ञानिक जोहन बौल्वी ने अटैचमैंट थ्योरी देते हुए कहा था कि सुरक्षित लगाव व्यक्ति को दुनिया के प्रति भरोसेमंद दृष्टिकोण देता है. जब यह जुड़ाव नहीं मिलता तो मन में असुरक्षा और अलगाव की भावना जन्म लेती है.

रिश्ता केवल साथ घूमनेफिरने का नाम नहीं. यह भावनात्मक ऊर्जा का आदानप्रदान भी है. जब हम किसी के साथ सुरक्षित महसूस करते हैं तब ही हम अपने असली स्वरूप में जी पाते हैं.

एक और किस्सा रवि और काव्या का देखें

रवि और काव्या की मुलाकात एक सोशल प्लेटफौर्म पर हुई. बातचीत गहरी होती गई. देर रात तक चैट, साझा सपने, भविष्य की योजनाएं, सबकुछ एक सच्चे जुड़ाव का संकेत दे रहा था. लेकिन हर बार जब काव्या रिश्ते को नाम देने की बात करती रवि पीछे हट जाता.

‘‘मुझे तुम्हारा साथ अच्छा लगता है,’’ वह कहता, ‘‘पर मैं किसी से भावनात्मक रूप से बंधना नहीं चाहता. मैं फ्री रहना पसंद करता हूं.’’

काव्या ने उस की सीमाओं का सम्मान किया. उस ने सोचा, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. लेकिन समय के साथ रवि की दूरी और बढ़ती गई. कभी अचानक गायब हो जाना, कभी अनदेखा करना यह सब काव्या को भीतर से तोड़ने लगा.

एक रात काव्या ने डायरी में लिखा, ‘‘शायद मु?ा में ही कुछ कमी है कि वह मु?ा से जुड़ नहीं पा रहा.’’

यहीं से भावनात्मक अस्वीकृति की भावना जन्म लेती है. व्यक्ति अपने मूल्य पर संदेह करने लगता है. हर नया रिश्ता उसे डराने लगता है. यह वही स्थिति है जिसे मनोविज्ञान में ‘अटैचमैंट ऐंग्जौइटी’ कहा जाता है.

पिछले रिश्तों की चोटें डर की असली जड़

अकसर लोग कहते हैं कि मैं किसी से बंधना नहीं चाहता पर असल में वे कहना चाहते हैं कि मैं दोबारा टूटना नहीं चाहता.

रिया का विवाह 5 साल पहले टूटा था. उस ने पूरे मन से रिश्ता निभाया था लेकिन विश्वासघात ने उस की दुनिया हिला दी. अब जब भी कोई नया व्यक्ति उस के करीब आता वह अनजाने में दीवार खड़ी कर देती.

एक दिन उस के दोस्त ने पूछा, ‘‘रिया, तुम हर अच्छे इंसान को क्यों दूर कर देती हो?’’

रिया ने धीरे से कहा, ‘‘क्योंकि मैं दोबारा टूटने की हिम्मत नहीं रखती.’’

पिछले रिश्तों की चोटें नई संभावनाओं पर परछाईं बन जाती हैं. विश्वास टूटना नए जुड़ाव में बाधा डालता है. व्यक्ति सोचता है कि दूरी ही सुरक्षा है.

इमोशनल थेरैपी विशेषज्ञा कहती हैं कि अटैचमैंट से भागना आत्मसुरक्षा की प्रक्रिया है लेकिन यह धीरेधीरे आत्म एकांत में बदल जाता है.

आधी दूरी वाला रिश्ता सब से खतरनाक स्थिति

सब से जटिल स्थिति तब होती है जब एक व्यक्ति गहराई से जुड़ चुका हो और दूसरा केवल हलके रिश्ते में रहना चाहता हो.

स्नेहा और अर्जुन 2 साल से साथ थे. अर्जुन हर जगह स्नेहा के साथ दिखता, उस की तसवीरें पोस्ट करता लेकिन जब भी स्नेहा भविष्य की बात करती वह हंस कर टाल देता.

‘‘देखते हैं, अभी इतना आगे मत सोचो.’’

स्नेहा उल?ान में थी. वह रिश्ते में थी भी और नहीं भी. यह अस्पष्टता उसे भीतर से थका रही थी. धीरेधीरे उस का आत्मसम्मान कमजोर होने लगा.

अस्पष्ट रिश्ते व्यक्ति को भावनात्मक बर्नआउट तक ले जा सकते हैं. वह या तो जरूरत से ज्यादा चिपकने लगता है या पूरी तरह उदासीन हो जाता है. दोनों ही स्थितियां रिश्ते की नींव हिला देती हैं.

आधुनिक जीवनशैली का असर

आज अगर किसी रिश्ते में थोड़ी असुविधा होती है, लोग उसे सुधारने के बजाय बदल देना आसान सम?ाते हैं. ‘औप्शन’ का यह भ्रम गहरे जुड़ाव की प्रक्रिया को कमजोर कर रहा है.

अटैचमैंट से डरने वाले लोग कैसे होते हैं

वे बाहर से आत्मनिर्भर, तर्कशील और मजबूत दिखते हैं. वे कहते हैं कि मु?ो किसी की जरूरत नहीं. लेकिन भीतर कहीं न कहीं वे भी चाहते हैं कि कोई उन्हें बिना शर्त स्वीकार करे. फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपनी इस चाह को स्वीकार नहीं करते.

डा. कैरोलीन लीफ मानना है कि अटैचमैंट का डर व्यक्ति को खुद की भावनाओं से अलग कर देता है. जब तक व्यक्ति खुद से जुड़ना नहीं सीखता, वह किसी और से भी नहीं जुड़ पाता.

जुड़ाव कमजोरी नहीं

अटैचमैंट का मतलब आजादी का छिनना नहीं है. यह भरोसे और सुरक्षा के साथ आजादी साझा करना है.

हम तब पूरे होते हैं जब हम किसी के सामने अपनी असुरक्षाएं भी रख सकें. जब हम यह स्वीकार कर सकें कि हमें किसी की जरूरत है और यह जरूरत हमारी कमजोरी नहीं हमारी मानवता है.

पेरैंट्स का प्रोटैक्शन

एक बड़ी समस्या यह है कि आजकल लड़कियों को पेरैंट्स बनाबनाया घर दे देते हैं. वे जब 25-30 की होने लगती हैं तो पेरैंट्स उन्हें एहसास दिला देते हैं कि घर मैनेज करना भी एक टास्क है और वर्किंग गर्ल्स इस से बचने के बहाने ढूंढ़ने लगती हैं. पेरैंट्स चूंकि अनुभवी होते हैं, वे बहुत से काम सहजता से कर लेते हैं जो वैसे मुश्किल लगते हैं.

सहेलियों के वैवाहिक विवाद

मैरिड फ्रैंड्स भी कई बार डिसकरेज कर देती हैं क्योंकि पूरी तरह से तो संतोष किसी को नहीं होता. शादी के टाइम का शोरशराबा तो अच्छा लगता है पर बाद के बंधन भारी लगने लगते हैं. यह भी शादी से न करने का एक बड़ा कारण बन जाता है.

आधुनिक रिश्तों का सब से बड़ा विरोधाभास यही है कि हम जुड़ना चाहते हैं लेकिन बंधने से डरते हैं. अब समय आ गया है कि हम इस डर को पहचानें और इस से भागने के बजाय इस का हाथ थाम लें क्योंकि अंतत: जीवन की सब से सुंदर अनुभूति वही है जब कोई कहे, ‘‘मैं यहां हूं और तुम्हारे साथ हूं.’’

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