Handling kids fights : “यह देखो इस ने मुझे मारा”, “यह देखो, इस ने मेरा खिलौना तोड़ दिया…” जैसी छोटीछोटी बात कभीकभी मारामारी तक भी पहुंच जाती है और भाईबहन की लड़ाई में बच्चे चोटिल भी हो जाते हैं. लेकिन बच्चों का झगड़ा पेरैंट्स के लिए मुसीबत बन जाता है. अगर पेरैंट्स एक बच्चे के व्यवहार को सही कह दें और दूसरे को गलत, तो उस में भी उन के लिए मुश्किल है क्योंकि इस से एक बच्चे का दिल टूट सकता है.

घरपरिवार में बच्चों के बीच झगड़ा न हो और वे शांति से रहें, इस के लिए पेरैंट्स को कुछ खास बातों का खयाल रखना चाहिए :

पेरैंट्स भी तो कहीं अपने भाईबहनों से नहीं झगड़ रहे

9-10 साल के मासूम बच्चे को मालूम है कि मेरी मां अपने भाई से लड़ रही है. मेरी बुआ मेरे पिताजी से लड़ रही है. पहले मैं बुआ के घर खूब जाता था, खूब खेलता था अब पिताजी ने मना कर दिया. वह अपने पेरैंट्स से कहता है कि बुआ, मामा अब घर क्यों नहीं आते? शुरूशुरू में मामा, बुआ बहुत प्यार करते हैं फिर अचानक से गायब हो गए वगैरह बातें बच्चों को समझ आती है. उन्हें पता है कि मेरे मातापिता अपने भाईबहन से लड़ते हैं और फिर बात नहीं करते. धीरेधीरे यह सब बातें बच्चों के व्यवहार में भी आने लगती है. वे भी अपने सिबलिंग से लड़ने लगते हैं और इस के जिम्मेदार मातापिता ही होते हैं.

पेरैंट्स को आपसी लड़ाइयों और आदतों में बदलाव करना चाहिए

अगर पेरैंट्स चाहते हैं कि बच्चे आपस में न लड़ें, तो इस के लिए यह जरूरी है कि आप भी अपने भाईबहनों की बहुत सी बातों को इगनोर करें. अपने बच्चों के सामने उन से न झगडें और अपने झगड़ों में बच्चों को न घसीटें. कुछ रूल बनाएं जैसे कि अपने झगड़े से बच्चों को दूर रखें. उन्हें मामा और बुआ से मिलने से न रोकें.

बच्चों में इस तरह के झगडे पेरैंट्स की प्योर गलती से होते हैं

“तू मेरा लाडला है…” यह सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन दूसरे बच्चे के लिए यह एक रिजैक्शन है. यह शब्द भाईबहन के पवित्र रिश्ते को दुश्मनी में बदल देते हैं. जब एक बच्चे को लाडला और दूसरे को कम महसूस कराया जाता है, तो उन के बीच का झगड़ा सिर्फ उस पल का नहीं होता. वे अपनी वैल्यू की लड़ाई लड़ने लगते हैं. उन्हें लगता है कि दूसरे को नीचा दिखा कर ही वे मातापिता का ध्यान पा सकते हैं.

“तू मेरा लाडला है और यह मेरी लाडली नहीं है…” जैसे शब्द पेरैंट्स की वोकेब्लरी में ही नहीं होने चाहिए. यही शब्द है जो 2 सिबलिंग में एक लकीर खींच देते हैं.

जब हम पूछते हैं कि मम्मी ज्यादा प्यारी है या पापा? तो हम बच्चे को प्यार को तौलना सिखा रहे हैं. प्यार कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बांटा जाए या जिस की तुलना की जाए.

आई लव यू जैसे शब्द यूज करें या नहीं

यूरोपियन कल्चर की तरह हर किसी से आई लव यू कहना भी गलत है. आप का एक बच्चा बाहर जा रहा है, तो आप ने उस से कहा कि आई लव यू. तो ऐसे में दूसरा बच्चा बोलेगा कि क्यों, क्या आप मुझ से प्यार नहीं करते फिर उसे ही क्यों बोला? मम्मी, यू डौंट लव मी जैसी बात कहने की नहीं करने की होती है. आई लव यू, आई केयर यू…कहना नहीं है बस जस्ट केयर. उसे आप की केयर करने से ही पता चल जाएगा कि पेरैंट्स प्यार करते हैं या नहीं.

केयर ही असली भाषा है

एक मां का अपने बच्चे के सिर पर हाथ फेरना, पिता का चुपचाप उस की जरूरतों को पूरा कर देना या झगड़े के समय निष्पक्ष रह कर सही बात समझाना, यही वे तरीके हैं जिन से बच्चा सुरक्षित महसूस करता है. उसे यह पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ती कि आप मुझ से प्यार करते हो या नहीं क्योंकि उसे आप की उपस्थिति और परवाह में उस का जवाब मिल जाता है.

एक की साइड न लें

अकसर झगड़े जब बहुत गंभीर न हों, तो ऐसे में किसी एक की साइड ले कर दूसरे बच्चे को अकेला महसूस न कराएं. इस से बच्चा अपने भाईबहन के साथ आप के लिए भी नकारात्मक रवैया अपनाएगा. किसी एक को यह बोलने की जगह कि आप की गलती है, यह बोलें कि चलो साथ में मिल कर इस समस्या का समाधान निकालते हैं.

तुलना न करें

पेरैंट्स अकसर एक बच्चे की तुलना दूसरे से करने लगते हैं, जिस से बच्चों में ईर्ष्या और मनमुटाव पैदा होने लगता है. ऐसे में बच्चों को आपस में कंपेयर करने से बचें, जिस से बच्चों की बौंडिंग स्ट्रौंग रहेगी और उन के बीच में लड़ाईयां होने की संभावना कम हो जाएंगी. अनजाने में भी जब हम कहते हैं कि देखो तुम्हारा भाई/बहन कितना होशियार है, तो यह जलन की आग में घी का काम करता है.

हर बच्चे की अपनी खूबियों को अलगअलग सराहें. उन्हें महसूस कराएं कि उन की अपनी एक अलग पहचान है और उन का मुकाबला एकदूसरे से नहीं है.

डिसिप्लिन है जरूरी

गलत व्यवहार को सपोर्ट कतई न करें. डिसिप्लिन करने के अलगअलग तरीके अपनाएं जिस से आप की खुद की ऐनर्जी भी बची रहे और बच्चे भी सही दिशा में चलें. जैसे जब वे लड़ रहे हों तो उन्हें 2 अलग कमरों में जाने का निर्देश दें और दिमाग को शांत करने का अवसर दें. दोनों से अकेले में उन की गलतियां और उन के व्यवहार की बातें करें और सहीगलत समझाएं. अगली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर वे उसे कैसे डील करेंगे, इस बात का उदाहरण सहित ज्ञान दें.

समझौते करना सिखाएं

लड़ाइयों को खुद कैसे हैंडल करना है, यह सिखाएं. उन्हें समझाएं कि एक के बाद दूसरे की टर्न आएगी, अधिक गुस्सा लगने पर लंबी सांसें भरना सिखाएं, 10 से 1 तक उलटी गिनती गिनने को कहें, अपनी भावनाओं को मारपीट की जगह शब्दों में व्यक्त करना सिखाएं.

बच्चे को सीनियरिटी समझा नहीं पाते पेरैंट्स

दोनों बच्चों में एक सीनियर है एक जूनियर है. छोटे बच्चे को यह समझ कर रहना चाहिए कि मैं जूनियर हूं तो हूं. यह उस के दिमाग में होना चाहिए कि मुझे अपने बड़े सिबलिंग को रिस्पेक्ट देनी है. घर में एक प्रोटोकाल होना चाहिए. अगर बड़ा बच्चा कुछ सही सलाह दे रहा है, तो पेरैंट्स को उसे सपोर्ट करना चाहिए ताकि छोटे को समझ आए कि सीनियरिटी की एक वैल्यू है. जब पेरैंट्स खुद बड़े बच्चे को सब के सामने डांटते या नीचा दिखाते हैं, तो छोटा बच्चा भी वही सीखता है.

सीनियरिटी केवल उम्र से नहीं, जिम्मेदारी से भी आती है. पेरैंट्स की गलती यह होती है कि वे बड़े बच्चे को जिम्मेदारी तो सारी दे देते हैं (जैसे छोटे का खयाल रखना), लेकिन उसे वह अथोरिटी या सम्मान नहीं देते जो उस जिम्मेदारी के साथ आना चाहिए.

अकसर छोटा बच्चा गलती करता है और पेरैंट्स बड़े को कहते हैं कि तू तो बड़ा है, तू समझदारी दिखा, उसे छोड़ दे.

यह कह कर आप छोटे बच्चे को इम्युनिटी दे देते हैं कि वह कुछ भी गलत कर के बच सकता है. जब छोटे बच्चे को यह नहीं सिखाया जाता कि बड़ा भाई या बहन उस से पहले इस दुनिया में आए हैं और उन से कुछ सीखना है, तो वह बदतमीजी को अपना हक समझने लगता है.

बड़े के पास ज्यादा ऐक्सपीरियंस है

छोटे बच्चे के लिए बड़ा भाई या बहन अकसर एक कंपीटीटर की तरह दिखता है जिसे पेरैंट्स की ज्यादा अटैंशन या ज्यादा आजादी मिलती है. इस नजरिए को बदलने के लिए हमें घर में सीखने की संस्कृति (कल्चर औफ लर्निंग) विकसित करनी होगी.

जब छोटा बच्चा यह देखता है कि बड़े के पास जो अनुभव है, वह उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि उस की राह आसान करने के लिए है, तो जलन की जगह सम्मान पैदा होता है.

बड़ा प्रोटेक्टिव है चाहे वह बड़ा लड़का हो या लड़की हो. उस की ड्यूटी है कि वह अपने छोटे भाईबहन को प्रोटेक्ट करें.

धर्म ही हमें सिबलिंग राइवलरी सीखा रहा है

इतिहास और पौराणिक कथाओं को देखें, तो हम पाते हैं कि सिबलिंग राइवलरी यानी भाईबहनों का आपसी मुकाबला लगभग हर महान गाथा का हिस्सा रहा है.

चाहे वह रामायण में बाली और सुग्रीव का संघर्ष हो, महाभारत में कौरवों और पांडवों का भीषण युद्ध या फिर बाइबल में केन और एबेल की कहानियां, इन सब में भाईबहनों के बीच का टकराव ही मुख्य केंद्र रहा है.

राम और भरत का सारा किस्सा सिबलिंग का ही है. राम के मंदिर बन गए तो भरत के मंदिर क्यों नहीं बने? हमें धर्म ने यह सिखा और बता दिया न कि भरत बेकार है? वैसे तो कहते हैं कि राम और भरत की जोड़ी. लेकिन हमारी सरकार ने राम के तो सारे मंदिर बना दिए लेकिन भरत का एक भी मंदिर नहीं बनाया. लक्ष्मण और शत्रुघ्न के मंदिर भी नहीं हैं.

दुर्योधन और युधिष्ठर का झगड़ा क्यों हो रहा था? वह भी सिबलिंग राइवल थी.

जिन घरों में धर्म की बातचीत कम होती है उन घरों में सिबलिंग काफी समय तक साथ चल सकते हैं. हर धर्म में सिबलिंग का झगड़ा है इसलिए जहां जिन घरों में धर्म की बात ज्यादा होती है वहां बच्चों में भी यह सब चीज ज्यादा देखने को मिलती है. इसलाम और क्रिश्चियन में भी है. हिंदू धर्म में भी है. यह हमारे दिमाग के कोने में रहता है.

अगर दशरथ ने कहा कि राम राजा बन रहा है तो बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी, वह खड़ाऊं क्यों रख रहा है. अगर ऐसी बेतुकी कहानियां कहोगे तो किसी न किसी दिन यह अपने घर में भी दोहराई जाएंगी. आप का बच्चा भी एक दिन कहेगा कि लड़ाई तो भरत की भी हुई थी न. इसलिए धर्म की बात करेंगे तो बच्चे तो झगड़ेंगी ही.

आज की तारीख में तर्क और फैक्ट पर जियो

बच्चे को बचपन से ये समझाओ कि अगर मैं कमजोर हूं तो मुझे दूसरे का प्रोटैक्शन लेना चाहिए. बराबरी की चाहत नहीं रखनी चाहिए. आज के समय में भावुकता से ज्यादा तथ्यों पर ध्यान देना ही बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है.

बराबरी के बजाय सुरक्षा और सहयोग को प्राथमिकता देना एक बहुत ही गहरी सोच है. अकसर पेरैंट्स बच्चों को सब बराबर हैं का जो पाठ पढ़ाते हैं, वह असल दुनिया के मुकाबले उन्हें कमजोर बना देता है. इस के बजाय, अगर बच्चों को अपनी शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना सिखाया जाए, तो वे एकदूसरे के पूरक बन सकते हैं.

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