Indian social activists : भारत  जैसे धर्म सत्तात्मक देश में जहां स्त्रियों का काम महज घरपरिवार संभालना, घर के पुरुष सदस्यों को देवता की तरह मान कर उन का हुक्म मानना और बचे हुए समय में पूजापाठ और दूसरों की देखभाल में लगे रहना माना जाता है, ऐसे देश में अगर कोई स्त्री सत्तासीन पुरुषों से सवाल पूछे और उन की मनमरजी पर लगाम लगाने की कोशिश करे तो आप सम झ सकते हैं यह काम आसान नहीं होगा.

नोएडा में रहने वाली सरल स्वभाव की मलिका 52 वर्षीय अंजलि भारद्वाज को देख कर आप सहज विश्वास नहीं कर पाएंगे कि उन्होंने समाज में व्याप्त करप्शन के खिलाफ न सिर्फ खुद की आवाज बुलंद की बल्कि कितनी ही दूसरी महिलाओं में भी यह हौसला भरा कि वे गलत के खिलाफ आवाज उठाएं, शासन कर रहे अधिकारियों से सवाल पूछें और उन्हें जवाब देने को विवश कर दें.

अंजलि 1999 से यानी 25 साल से ज्यादा समय से आरटीआई आंदोलन से जुड़ी हुई हैं. वे एनसीपीआरआई (इंटरनैशनल कैंपेन फौर पीपल्स राइट्स टू इन्फौर्मेशन) से भी 20 साल से ज्यादा समय से जुड़ी हुई हैं. 2004 से वे इस की वर्किंग कमेटी में हैं और अभी एनसीपीआरआई की कोकन्वीनर हैं. यह पूरे देशभर में सूचना के अधिकार पर काम करते हुए लोगों का अभियान है.

अंजलि भारद्वाज को 2021 में अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा इंटरनैशनल ऐंटीकरप्शन चैंपियन अवार्ड से सम्मानित किया गया. 2011 में लेडी श्रीराम कालेज की ओनर रोल और 2009 में अशोका फैलोशिप फौर सोशल ऐंटरप्रन्योर्स से भी वे सम्मानित हो चुकी हैं.

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सोशल वर्क में इंटरैस्ट

करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने की यह कहानी शुरू होती है दिल्ली में जब वे लेडी श्रीराम कालेज में पढ़ाई कर रही थीं. उन्हें उसी समय से सोशल वर्क्स में इंटरैस्ट था. वे कालेज की स्टूडैंट यूनियन की प्रैसिडैंट भी थीं और लिखने में भी रुचि रखती थीं. उन की मां दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर थीं और पिता सौफ्टवेयर इंजीनियर थे. वे मिडिल क्लास फैमिली से थीं. कालेज के बाद उन्होंने वर्ल्ड बैंक में पावर्टी रिडक्शन और इकौनौमिक मैनेजमैंट में काम शुरू किया. वहां उन्होंने करीब से देखा कि कैसे हजारोंकरोड़ों के प्रोजैक्ट लोगों के लिए जारी होते हैं मगर करप्शन के कारण लोगों तक नहीं पहुंचते. यह सब देख कर उन्हें बहुत तकलीफ होती. वे कुछ ऐसा करना चाहती थीं ताकि इस करप्शन पर लगाम कसी जा सके.

अंजलि औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने चली गईं. ऐन्वायरन्मैंटल चेंजेस ऐंड मैनेजमैंट की पढ़ाई की और वापस आ कर थोड़े दिन वर्ल्ड बैंक में काम किया. फिर वर्ल्ड बैंक छोड़ कर अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया के साथ मिल कर परिवर्तन नाम की संस्था शुरू की और करप्शन के खिलाफ ‘से नो टू ब्राइब’ नाम का कैंपेन चलाया. मगर अंजलि को उन के काम करने के तरीके अलग लगे. तब उन्होंने अपने जैसी सोच वाली महिलाओं के साथ मिल कर  2003 में ‘सतर्क नागरिक संगठन’ की शुरुआत की. यह मुख्य रूप से साउथ दिल्ली और साउथ वैस्ट दिल्ली में 15 से ज्यादा बस्तियों में काम कर रहा है.

इस संगठन का काम है बस्तियों में रह रहे लोगों खासकर महिलाओं की समस्याओं पर काम करना और उन्हें उन के अधिकार दिलाना. बस्तियों में रहने वाले लोग सरकारी सुविधाओं पर सब से ज्यादा डिपैंडैंट हैं. राशन, पैंशन, पानी, सफाई जैसी सुविधाओं के अलावा स्कूलों में पढ़ाई सही से हो, अस्पतालों में सही से दवा मिले जैसे मसले तभी मुमकिन हैं जब भ्रष्टाचार न हो, संस्थाएं सही से काम करें और लोगों को अपना अधिकार मिल सके.

यह संगठन न सिर्फ ब्यूरोक्रेसी के कामकाज पर निगरानी रखता है बल्कि हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों के कामकाज पर भी सूचना के अधिकार कानून के तहत आरटीआई अप्लिकेशन लगा कर निगरानी बनाता है. उन के द्वारा एमपीज और एमएलए के रिपोर्ट कार्ड निकाले जाते थे कि किस तरीके से उन्होंने काम किया, क्या सवाल पूछे.

हम ने मालवीय नगर में स्थित ‘सतर्क नागरिक संगठन’ के उन के औफिस में बैठ कर उन से बातें कीं. पेश हैं, अंजलि से की गई बातचीत के मुख्य अंश:

भ्रष्टाचार पर लगाम

अंजलि कहती हैं कि भ्रष्टाचार तभी होता है जब सरकारी लोग, अफसर, नेता परदे के पीछे काम करें. लोकतंत्र में लोग वोट दे कर सरकार बनाते हैं. लोगों के ही टैक्स के पैसों से सरकार चलती है. हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि ‘डैमोक्रेसी इज औफ द पीपल, बाय द पीपल ऐंड फौर द पीपल.’ डैमोक्रेसी में जरूरी है कि लोगों को यह सूचना रहे कि सरकार उन के नाम पर क्या काम कर रही है. लेकिन जब सरकार यह सब छिपाती है, परदे के पीछे काम करती है तब भ्रष्टाचार पैदा होता है.

सूचना का अधिकार कानून 2005 में पास हुआ और पूरे देश में लागू हुआ. हम ने ‘सतर्क नागरिक संगठन’ में काम शुरू किया और महिलाओं को बताया कि यह एक बहुत ही जरूरी कानून आया है, आप इस का इस्तेमाल करिए और सरकार से सूचना मांगिए. महिलाओं ने बताया कि राशन का दुकानदार कहता है कि आप के नाम का राशन सरकार ने नहीं भेजा सो हम आप को राशन नहीं दे सकते.

तब पहली आरटीआई अप्लिकेशन दिल्ली में राशन के मुद्दे पर लगी. संगठन से जुड़ी 2 महिलाओं ने इसे लगाया था. ये 2 महिलाएं थीं जरीना बेगम और सुनीता देवी. इन्होंने आरटीआई अप्लिकेशन लगा कर मालवीय नगर एरिया में राशन दुकानों के रिकौर्ड्स सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगे. जब सूचना बाहर आई तो स्टौक रजिस्टर में साफ नजर आ रहा था कि हर महीने दुकानों पर राशन पहुंच रहा है.

सेल रजिस्टर में पूरी चोरी नजर आ रही थी. उस में सभी महिलाओं के नाम लिखे थे. लिखा था कि उन को पूरा राशन मिल रहा है और सामने एक ही अंगूठे का निशान बारबार लगाए जा रहे थे. स्टौक रजिस्टर से साफ जाहिर हो गया कि राशन दुकानदार महिलाओं से  झूठ बोल रहे थे. उन का राशन आ रहा था मगर राशन दुकानदार अधिकारियों के साथ मिल कर उस राशन को ब्लैक में बेच रहा था. जब ये सूचना सामने आई तो महिलाओं ने कहा कि उन्हें पहली बार भ्रष्टाचार का प्रूफ मिला है. फिर उन्होंने ‘सतर्क नागरिक संगठन’ के साथ मिल कर बहुत सारी शिकायतें कीं. मगर खाद्य विभाग पर कोई असर नहीं हुआ. फिर एक जन सुनवाई की गई जिस में सभी राशन के अधिकारियों को बुलाया गया, साथ ही मीडिया और राशन दुकानदारों को भी बुलाया गया. वहां महिलाओं ने सूचना के अधिकार कानून के तहत मिली सूचना पढ़ के सुनाई. सेल और स्टौक रजिस्टर के साथ अपने राशन कार्ड दिखाए और यह साबित किया कि कैसे यह सारा घोटाला चल रहा था.

जब यह सब बात सामने आई तो एकदम से एक नतीजा देखने को मिला. इस चोरी में शामिल दुकानदारों और अधिकारियों के खिलाफ ऐक्शन होने लगे, साथ ही सब महिलाओं को पूरा राशन समय से मिलने लगा क्योंकि एक डर बैठ गया कि अगर फिर से चोरी हुई तो महिलाएं सब परदाफाश कर सकती हैं और उन के ऊपर ऐक्शन होगा.

इधर महिलाओं को सम झ में आ गया कि सूचना के अधिकार की क्या ताकत है. भ्रष्टाचार हो रहा हो तो किस तरीके से सूचना ले कर उसे बंद कराया जा सकता है. अब तो सूचना के अधिकार कानून को आए हुए 20 साल हो गए हैं. पूरे देश में हर साल 60 लाख के करीब आरटीआई अप्लिकेशन लगाई जाती हैं. लोग अपने मौलिक अधिकारों को ले कर आरटीआई अप्लिकेशन लगाते हैं, सूचना मांगते हैं और सरकारों को जवाबदेह बनाते हैं. भ्रष्टाचार उजागर होता है.

एक आरटीआई आंदोलन के दौरान अंजलि समर्थक महिलाओं के साथ

विसलब्लोअर प्रोटैक्शन की जरूरत

अंजलि बताती हैं, ‘‘सूचना का अधिकार कानून हमारे देश में हर साल अपने मौलिक अधिकार हासिल करने के लिए लाखों नागरिक इस्तेमाल करते हैं. साथ ही बड़े से बड़े घोटालों को उजागर करने के लिए भी सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया गया है. आप कोई भी बड़ा घोटाला ले लीजिए जो पिछले 20 साल में उजागर हुआ है. चाहे वह आदर्श स्कैम हो जहां पर आर्मी पर्सन के परिवारों और उन की विधवाओं के लिए घर बनाए गए थे लेकिन उन घरों को अलौट कर लिया पौलिटिशियंस और बड़े अधिकारियों ने. यह पूरा स्कैम आरटीआई एक्ट के जरीए सामने आया.

इसी तरह व्यापम स्कैम जिस के अंदर मैडिकल सीट्स को भरने के लिए घोटाला चल रहा था. इस स्कैम को भी उजागर करने के लिए सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया गया. वैसे ही सीडब्ल्यूजी के स्कैम को सामने लाने के लिए भी इस का प्रयोग किया गया.’’

अंजलि के अनुसार, आरटीआई कानून एक ऐसा कानून है जो ताकतवर और सत्ता में बैठे लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित करता है. जाहिर है कि सत्तासीन लोगों को यह कानून बिलकुल पसंद नहीं है और कोशिशें यही रहती हैं कि किसी तरह से सूचना मांगने वालों को खामोश कर दिया जाए. उन पर हमले होते हैं, उन्हें डरायाधमकाया जाता है. 100 से ज्यादा आरटीआई इस्तेमाल करने वाले लोगों की हत्या कर दी गई है.

पिछले 20 सालों में हम ने देखा है कि कैसे उन पर लगातार हमले होते रहे हैं. ऐसे लोग जो कि भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, मानवाधिकार हनन को उजागर करते हैं उन की सुरक्षा के लिए कानून 2014 में पास हो गया था. बहुत लंबी लड़ाई के बाद पास हुआ लेकिन अब हम 2026 में बैठे हैं. 12 साल के बाद आज भी वह कानून सरकार द्वारा लागू नहीं किया गया. उस के रूल्स नहीं बनाए गए हैं. नियम नोटिफाई नहीं हुआ है. इसलिए वह कानून बेकार पड़ा है. कागजों पर कानून है लेकिन किसी को उस की सुरक्षा नहीं मिल रही. सरकार को इस कानून को लागू करना चाहिए.

थ्योरीज और प्रैक्टिकल सीख में अंतर

अंजलि बताती हैं, ‘‘क्लासरूम की थ्योरीज से हम अपनी कुछ सम झ जरूर बना सकते हैं. मु झे लगता है कि मु झे भी एक बहुत जबरदस्त ग्राउंडिंग मिली. मैं अभी तक जिस भी ऐजुकेशन इंस्टिट्यूशन में गई हूं चाहे वह स्कूल हो, कालेज हो, कोई भी यूनिवर्सिटी हो लेकिन जो ऐक्सपीरियंस जमीन पर काम कर के मिलता है और जो सम झ बनती है वह बहुत ही अलग होती है. देश की जो वास्तविकता है वह तभी सम झ आती है जब आप जमीन पर लोगों के साथ काम करते हैं. ‘सतर्क नागरिक संगठन’ का काम पूरी तरह से जमीन से जुड़ा है. हम लोग दिल्ली में स्लम बस्तियों में काम करते हैं. लोगों की किस तरीके की समस्याएं हैं यह सम झ बनती है. सब मिल बैठ कर बात करते हैं तो सम झ आता है कि उन के लिए क्या सही रहेगा, क्या सौल्यूशंस बैस्ट हैं, पौलिसी क्या बैस्ट रहेगी, कानून क्या बैस्ट रहेंगे? जब सम झ जमीन से आती है तब ही वास्तव में कोई पौलिसी, चाहे कानून एक अच्छी शेप ले पाता है.

‘‘मैं सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय अभियान से भी जुड़ी हूं और वहां पर भी हम लोग पूरे देश में अलगअलग जगह से सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय अभियान में जुड़े हुए हैं. मैं उस की कोकन्वीनर हूं. मैं हाल ही में भुवनेश्वर में थी, जहां पर लोगों से बातचीत हो रही थी कि वहां पर किस तरीके की समस्याएं हैं, कैसे सूचना का अधिकार इस्तेमाल किया जा सकता है. अलगअलग जगह पर हम लोग काम करते हैं. सम झ बनती है कि क्या समस्याएं हैं? किस चीज में कमी रह गई है? कहां पर गवर्नैंस में प्रौब्लम आ रही है? किस तरह के कानून लोगों के लिए लाभदायक रहेंगे? जमीन से जुड़े रहना बहुत जरूरी है. केवल एक थ्योरेटिकल नौलेज से आप उसे अच्छे से लिख पाएं मगर सम झने के लिए तो लोगों से मिलना ही होगा.’’

डिजिटल गवर्नैंस में आरटीआई की भूमिका

डेटा कैसे भी रखा हो. वह डेटा चाहे कागजों में हो जैसे हमारे देश में इतने दशकों तक सबकुछ कागजी लिखापढ़ी होती थी या फिर डेटा अब कंप्यूटर में डिजिटलाइज्ड फार्म में हो, लोगों के लिए सूचना का अधिकार उतना ही जरूरी है क्योंकि लोगों के पास जब तक सूचना नहीं होगी, वे सवाल नहीं पूछ सकते. उन के पास जब तक सूचनाएं नहीं आएंगी वे किसी भी सरकार को जवाबदेह नहीं बना सकते.

अंजलि कहती हैं, ‘‘मु झे लगता है कि सूचना के अधिकार और ट्रांसपैरेंसी की शायद जरूरत और भी बढ़ गई है क्योंकि जब तक कागजों में सब सूचना होती थी, तब तक तो लोग जा कर सूचना मांग सकते थे. जैसे लोग किसी भी अस्पताल जा कर कहते थे हमें कागज चाहिए. किसी भी राशन दुकान पर जा कर कह सकते थे हमें अपना रजिस्टर दिखाइए. स्कूल में जा कर अटैंडैंस रजिस्टर मांग सकते थे. मगर अब जब वे ये सब चीजें मांगते हैं तो जवाब मिलता है कि यह सब सूचना तो कंप्यूटर में है आप को कैसे दिखाएंगे.

‘‘यह जो डिजिटलाइजेशन का पूरा दौर चल रहा है, इस में यह सम झने की जरूरत है कि लोगों का सूचना पाने का अधिकार कम नहीं हुआ. हमारा संविधान वही है, हमारा लोकतंत्र वही है. बहुत जरूरी है कि लोगों को सूचनाएं मिलें. ऐसे मिलें जिन्हें वे सम झ पाएं और पढ़ पाएं. मैं आप से एक छोटा सा आंकड़ा शेयर करूंगी. एनएफएचएस का सरकारी डेटा है जो दिखाता है कि हमारे देश में अभी भी केवल 33% ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने आज तक एक बार भी इंटरनैट को ऐक्सैस किया है.

‘‘मतलब 67% से ज्यादा महिलाएं हमारे देश में हैं जिन को कोई आइडिया नहीं है कि इंटरनैट पर कैसे काम होता है. इंटरनैट पर जो अवेलेबल डेटा है वे उसे ऐक्सैस नहीं कर पातीं. उन के पास कंप्यूटर नहीं है. ऐसे में अगर अब सरकार यह कहेगी कि हम तो सारा डेटा कंप्यूटर पर डाल रहे हैं तो मतलब उन सारी 67% महिलाओं के पास कोई सूचना नहीं पहुंचेगी.

‘‘सूचना के अधिकार की जो मुहिम है उस का एक बड़ा उद्देश्य यह रहा है कि सूचना लोगों के पास इस माध्यम से आनी चाहिए जो वे हासिल कर सकें, ऐसी भाषा में आनी चाहिए जिसे वे बोलते हैं. आप ने अगर खूब सारा डेटा डाल भी लिया लेकिन इंगलिश में इंटरनैट पर डाला तो लोग जो इंगलिश नहीं सम झ पा रहे, इंटरनैट नहीं देख पा रहे या उन के पास कंप्यूटर नहीं है तो फिर तो उस सूचना से वे वंचित रह जाएंगे. अगर आप किसी ट्राइबल आदिवासी कम्युनिटी में जा कर कुछ सूचना दे रहे हैं तो हो सकता है आप को ढोल बजा कर लोगों को इकट्ठा कर के उन की भाषा में बोलना पड़े. ऐसे नहीं चल सकता कि अब तो डिजिटल जमाना है सो हम सूचना इंटरनैट पर डाल देंगे आप देख लीजिए.’’

लोकपाल कानून

अंजलि का कहना है, ‘‘कानून लोकपाल बहुत ही अच्छा है. लेकिन सरकारें चाहती नहीं हैं कि उन के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे. इतने लंबे और बहुत ही व्यापक संघर्ष के बाद 2014 में कानून आया और 2019 तक एक भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं की गई. 5 साल तक लोकपाल खाली रखा गया और जब फाइनली लोकपाल की नियुक्ति की गई वह इस तरीके से कि सरकार ने ही ज्यादातर नियुक्तियां कर दीं. ऐसे में लोगों को एक आशंका बन जाती है कि ये सरकार के दबाव में काम कर सकते हैं. इस तरह इस कानून का इंप्लिमैंटेशन ही सही से नहीं हुआ है.’’

आरटीआई और महिला सशक्तिकरण

अंजलि कहती हैं, ‘‘सवाल पूछना हमारे देश में आसान नहीं है और महिलाओं के लिए तो स्पैशली मुश्किल है क्योंकि अगर आप महिला हो

कर जवाबदेही चाहती हैं तो लोगों को लगता है कि यह आप का काम नहीं है. हमारे संगठन में बहुत सी महिलाएं जुड़ी हुई हैं. मैं एक उदाहरण देती हूं. यहां बेगमपुर बस्ती में पानी नहीं आता था. बहुत ही समस्या रहती थी. रात में 12-1 बजे केवल 1 घंटे के लिए पानी आता था. लोग बड़े परेशान थे.

महिलाएं बहुत बार एमएलए के पास गईं और उन्होंने कहा कि आप हमारे यहां पानी लगवा दीजिए, पाइपें बिछवा दीजिए. तो एमएलए ने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं. महिलाओं ने आरटीआई अप्लिकेशन लगा कर पूछा कि इन के पास कोई फंड नहीं है क्या, तो पता चला कि एमएलए लैड्स होता है जिस में हर एमएलए को दिल्ली में हर साल 5 करोड़ मिलते हैं.

‘‘तब एक महिला ने आरटीआई अप्लिकेशन लगाई, जिस में उन्होंने पूछा कि जो हमारे यहां के एमएलए हैं वे अपना लोकल एरिया डैवलपमैंट फंड यानी एमएलए लैड्स कैसे खर्च करते हैं. तो उन्हें सूचना नहीं दी गई और विभाग ने स्पैशली चिट्ठी दे कर बुलाया और कहा कि आप ये सब सवाल क्यों पूछती हैं? आप का काम तो घर में रह कर परिवार में लोगों की सेवा करना होना चाहिए.

आप एमएलए से सवाल क्यों पूछ रही हैं? आप क्या करेंगे यह जान कर कि वह पैसा कैसे खर्च हो रहा है? तो महिला ने कहा कि यह हमारा ही पैसा है अगर आप हमें सूचना नहीं देंगे तो हमारे मतलब के लिए कभी पैसा खर्च होगा ही नहीं.

‘‘महिलाओं ने फिर आरटीआई लगा कर जवाब मांगा कि इन रुपयों का क्या हुआ तो सूचना मिली कि 70% पैसे फुहारे लगाने पर खर्च किए गए थे. पता चला कि उन की कौंट्रैक्टर्स के साथ सांठगांठ थी. वे एक जगह फुहारे लगाते थे फिर तुड़वाते थे और दूसरी जगह लगाते थे. इस तरह खूब पैसे बन रहे थे. जब यह सब महिलाओं को पता चला तो वे सारी सूचना ले कर एमएलए के पास पहुंच गईं और बोला कि आप तो हमें सच नहीं बता रहे थे.

‘‘मगर अब हमारे पास सूचना आ गई है. आप के लिए हम वोट नहीं करेंगे. तब एमएलए ने तुरंत जा कर वहां बस्ती में नारियल फोड़ कर प्रोजैक्ट शुरू करा दिया कि पूरी पाइपलाइन डलवाई जाएगी. अब आप जा कर देखिए बेगमपुर में पाइपें डली हैं, लोगों के घरों तक नलके आए हैं और महिलाओं को सुविधा मिल गई है. इस कानून ने महिलाओं को बहुत सशक्त किया है. उन्हें 30 दिन के अंदर सूचना मिल जाती है जिस का इस्तेमाल कर वे सरकार को जवाबदेह बना सकती हैं.’’

कब होती है हताशा

अंजलि दुखभरे शब्दों में कहती हैं, ‘‘सरकारें कोशिश कर रही हैं कि सूचना के अधिकार कानून को ही कमजोर बना दिया जाए. उस में संशोधन लाए जा रहे हैं. अब तक 2 बार यह कानून संशोधित हो चुका है. हर बार बड़ी निराशा होती है. सरकार द्वारा इस का संशोधन कर के इसे कमजोर बना दिया जाता है जैसेकि सूचना के अधिकार कानून को संशोधित करते हुए उस में जो आयुक्त है, कमिशनर्स है, उन की सैलरी, कार्यकाल, पैंशन सब सरकार ने अपने हाथ में ले लिया. इस से इंडिपैंडैंस कंप्रोमाइज हो गया. यह कानून के लिए बहुत ही बड़ा धक्का है क्योंकि अगर हमें सूचना नहीं मिलती तो हम सूचना आयोग में जाते हैं.

‘‘सूचना आयोग स्वतंत्र होने चाहिए जिस से वे सरकार को मजबूर कर सकें कि हमें सूचना दें. 2019 में संशोधन लाया गया और सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता को खत्म करने का काम हुआ. इस से बड़ी हताशा होती है क्योंकि हम सब लोगों ने मिल कर सूचना के अधिकार कानून की मांग की थी, उस की ड्राफ्टिंग की थी. सूचना आयोगों को बहुत अहम जगह दी गई थी.

‘‘अभी 2023 में सरकार ने डेटा प्रोटैक्शन कानून के जरीए से फिर से सूचना का अधिकार कानून को संशोधित कर दिया है. अब आप किसी की भी निजी सूचना या व्यक्तिगत सूचना नहीं मांग सकते. अगर किसी के घर के सामने की सड़क टूट जाती है तो वह आरटीआई अप्लिकेशन लगा कर पूछते हैं कि किस कौंट्रैक्टर ने यह सड़क बनाई? किस अधिकारी ने सड़क की इंस्पैक्शन कर के पैसे दिए जिस से कि एक बारिश में सड़क टूट गई.

‘‘अब अगर लोगों को यह कहा जाएगा कि आप को नहीं बताएंगे कि कौंट्रैक्टर या अधिकारी कौन था फिर भ्रष्टाचार से लोग कैसे लड़ेंगे? इस तरह यह कानून कमजोर हो रहा है. यही सम झ में आता है कि सरकार सूचना के अधिकार से डरती है क्योंकि इस से लोग सशक्त होते हैं.’’

अंजलि भारद्वाज भारत में आरटीआई आंदोलन का एक बड़ा चेहरा हैं, जिन्होंने कानून बनवाने से ले कर जमीन पर उसे आम आदमी का हथियार बनाने तक काम किया है.

वे एक ऐसी महिला शख्सीयत हैं, जिन्होंने महिलाओं को अपनी आवाज रखने का हौसला दिया है. एक महिला के तौर पर इतने बड़े आंदोलन को लीड करना लाखों महिलाओं के लिए मिसाल है.

महिलाएं कैसे होंगी सशक्त

अंजलि कहती हैं, ‘‘हमारे देश में महिलाओं को हमेशा ही देवी का दर्जा दिया जाता रहा है और कहा जाता है कि महिलाएं पूजनीय हैं. लेकिन हम यह भी जानते हैं कि पितृसत्तात्मक सोच वाले हमारे समाज में महिलाओं को बहुत से चैलेंजेस फेस करने पड़ते हैं. देश में जो सब से डिसऐंपावर्ड तबका है उस के अंदर चाहे कोई भी जाति हो हम महिलाओं को ही पाते हैं.

‘‘इसलिए उन के सशक्तीकरण के लिए बहुत से कदम उठाने की जरूरत है. महिलाओं को सूचना के अधिकार कानून ने बहुत ज्यादा सशक्त किया है. ‘सतर्क नागरिक योजना’ में हम जब काम करते हैं हम यह नहीं कहते कि हम केवल महिलाओं के साथ काम करेंगे लेकिन ज्यादातर हमारी मीटिंग में महिलाएं ही आती हैं क्योंकि महिला सम झती है कि अगर घर में राशन नहीं आया क्योंकि भ्रष्टाचार है तो बच्चे भूखे रह जाएंगे. महिला सम झती हैं कि अगर पब्लिक टौयलेट सही से नहीं चला तो हमारी बच्चियां कहां जाएंगी. महिलाएं बहुत जबरदस्त तरीके से जुड़ती हैं सूचना मांगने के लिए और गवर्नमेंट में भागीदारी के लिए.

‘‘बहुत जरूरी है ऐसे कानून और आएं जो महिलाओं को सशक्त करें. महिलाओं को सूचनाएं कदमकदम पर मिले. उन की शिकायतों और समस्याओं का समाधान सही से हो. भ्रष्टाचार हटेगा तो महिलाओं का सब से ज्यादा विकास होगा. जरूरी है महिलाओं का रिप्रैंजेंटेशन बढ़े. आप देख लीजिए हमारा कोई भी तंत्र हो न्यायपालिका, पार्लियामैंट हो या स्टेट असैंबली? वहां पर महिलाओं की पूरी भागीदारी है ही नहीं. महिलाओं की आधी आबादी है तो पावर वाली पोजीशन में भी महिलाओं की आधी भागीदारी जरूर होनी चाहिए. इतने साल हो गए आजाद हुए मगर अभी भी हम

33% आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं.

महिलाओं ने हर जगह अपनी भागीदारी दी है भले ही स्वतंत्रता संग्राम ही क्यों न हो. हर जगह हर मूवमैंट में महिलाएं आगे रही हैं लेकिन आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना बहुत मुश्किल है. महिलाओं को सशक्त करना है तो बराबरी का दर्जा देना जरूरी है.’’

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