Marriage advice : नीना एक बड़े सरकारी बैंक में ऊंचे पद पर कार्यरत है. उसे बैंक की तरफ से रहने के लिए घर, गाड़ी, ड्राइवर मिला हुआ है. घर के कामों के लिए हैल्पर भी है पर फिर भी उसे आराम नहीं है क्योंकि औफिस में घर की समस्याएं और घर में औफिस की टैंशन उस के सिर पर सवार रहती है. ऐसे में उस के पास खुद के लिए जरा भी समय नहीं मिल पाता है. चूंकि नीना के पति विक्रांत टूरिंग जौब में हैं तो वे ज्यादातर घर से बाहर ही होते हैं.
ऐसे में अपने 4 साल के बच्चे और सासससुर की सारी जिम्मेदारी नीना पर ही है. यहां तक कि घर के हर छोटेबड़े फैसले भी वही लेती है. जैसे छुट्टियों में कहां घूमने जाना है, प्रौपर्टी में कहां और कितना निवेश करना वगैरह. नीना कहती है कि घर और औफिस दोनों जगह की जिम्मेदारी निभाना आसान काम नहीं है पर निभानी पड़ती है.
31 साल की महिमा एक बड़ी कंपनी में मैनेजर है. उस का एक 2 वर्षीय बेटा है जिसे वह आया के भरोसे छोड़ कर औफिस जाती है, लेकिन उस का सारा ध्यान बेटे पर ही लगा होता है. घर आ कर सब से पहले वह अपने बेटे को गोद में ले कर प्यार करती है, फिर ही कोई दूसरा काम देखती है. महिमा कहती है कि मां बनने के बाद उस के जीवन में थोड़ा बदलाव आया है मतलब कि अब उसे अपने बेटे के हिसाब से सोना और जागना पड़ता है. ऐसे में या तो उस की नींद पूरी नहीं हो पाती या काम अधूरा रह जाता है.

अकेले की जिम्मेदारी
महिमा का कहना है कि आज की कामकाजी मांओं के लिए नौकरी और घरपरिवार में बैलेंस बना कर चलना आसान काम नहीं है. कई बार औफिस के काम की डैड लाइन, घर के काम, बुजुर्ग सास की देखभाल और बेटे की परवरिश में वह इतनी थक जाती है कि फिर कुछ करने का मन ही नहीं होता. सोचती है कि सारी जिम्मेदारी अकेले उसे ही क्यों निभानी है? लेकिन जब वह अपने 2 साल के बेटे का हंसतामुसकराता चेहरा देखती है तो सब दुख तकलीफ भूल कर पूरे जोश से काम करने लगती है.
महिमा कहती है कि बेटे की प्यारी सी मुसकान उसे ताकत देती है.
38 वर्षीय प्रमेधा एक स्कूल में प्रिंसिपल है. बिंदास और हंसमुख किस्म की प्रमेधा से बात करने से लगता ही नहीं है कि उस के जीवन में कोई परेशानी है, जबकि स्कूल के अलावा घरपरिवार की सारी जिम्मेदारी प्रमेधा पर ही है क्योंकि उस के पति किसी दूसरे शहर में क्चस्हृरु में नौकरी करते हैं तो उन की तो परिवार के प्रति कोई जिम्मेदारी है ही नहीं.

हफ्ता, 15 दिन पर 1-2 रोज के लिए आते हैं, छुट्टी मना कर निकल जाते हैं. लेकिन प्रमेधा किसी बात की टेंशन नहीं लेती और न ही पति से कोई शिकायत करती है कि वे कोई जिम्मेदारी क्यों नहीं उठाते या उसे ही क्यों सब करना पड़ता है बल्कि वह अपने काम को एक प्लानिंग के साथ करती है ताकि समय की बचत हो सके और वह समय से स्कूल भी जा सके.
बच्चे और सासससुर
अपनी हैल्थ और आराम को देखते हुए प्रमेधा ने एक फुल टाइम बाई रखी है, जो उस के बुजुर्ग सासससुर और घर का ध्यान रखती है. हां, पैसे कुछ ज्यादा लेती है. तो कोई बात नहीं. कम से कम उसे जौब तो नहीं छोड़नी पड़ रही है. अपनी आजादी तो नहीं खोनी पड़ रही है.
हां, लोग ताने जरूर मारते हैं कि वह अपनी कमाई का 30% तो बाई को दे देती है तो फायदा ही क्या हुआ नौकरी करने का? लेकिन प्रमेधा को अपनी कमाई का 30% बाई को देने का कोई अफसोस नहीं है. कम से कम उसे अपने लिए समय तो मिलता है. नौकरी तो नहीं छोड़नी पड़ रही है. घर, बच्चे और सासससुर को ले कर टैंशन तो नहीं होती अब. घर आ कर थोड़ा आराम तो कर पाती है.
वहीं निकिता प्रमेधा से एकदम अलग है निकिता एक प्राइवेट बैंक में जौब करती है. उस के सिर पर औफिस और घर का काम इतना ज्यादा हावी रहता है कि वह हंसनामुसकराना तक भूल चुकी है. उसे देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि वह 36 साल की है. काम की टैंशन से वह 36 में 50 की दिखने लगी है. कहती है ‘क्या करूं तो? कहां से अपने लिए समय निकालूं?’ उसे औफिस में घर की चिंता सताती है और घर में औफिस का डर जीने नहीं देता.
रात में सोते समय भी निकिता चिंता में ही करवटें बदलती है कि कल फिर उसे सुबह जल्दी उठना पड़ेगा, जल्दीजल्दी सब के लिए नाश्ता बना कर, बेटे के लिए लंच पैक कर उसे स्कूल वैन में छोड़ कर आने के बाद सब के लिए नाश्ताखाना तैयार करना पड़ेगा और 8 बजे तक घर से औफिस के लिए निकल जाना होगा ताकि 9 बजे तक वह अपने औफिस पहुंच सके.
निकिता का कहना है कि घर से औफिस जाने में उसे करीब एक से सवा घंटा लग जाता है. औफिस के पास घर ले सकती थी लेकिन वहां से फिर बेटे का स्कूल दूर पड़ेगा. निकिता के पति और सास पूजापाठ और धर्मकर्म में बहुत विश्वास करते है. मंदिरों में जा कर दान करना और रोज घंटों पूजा और मंत्र जाप करना उन की दिनचर्या में शामिल है. आए दिन घर में हवनकीर्तन होता है जिस की सारी तैयारी न चाहते हुए भी निकिता को करनी पड़ती है.
अब निकिता को ही घर के सारे काम निबटा कर औफिस जाना होता है. लेकिन उस के पति और सास उस की प्रौब्लम सम झते नहीं हैं. ऐसे में वह काफी परेशान रहती है.
खुद के लिए समय नहीं
सास कहती है, कितनी नास्तिक है वह पूजाधर्म कुछ भी नहीं मानती. छुट्टी के दिन भी उसे चैन नहीं है. नातेरिश्तेदारों का आनाजाना उसे थका देता है. इन दोहरीतिहरी जिम्मेदारियों से गुजरते हुए निकिता खुद के लिए समय नहीं निकाल पाती है. कभीकभी तो उसे इन सब से इतनी खीज उत्पन्न होती है कि सोचती है, आखिर वह कर क्या रही है अपनी जिंदगी में? पागलों की तरह खटे जा रही है.
इतना पैसा कमाने का मतलब ही क्या है जब वह खुद पर खर्च ही नहीं कर पाती है तो. खुद के लिए समय ही नहीं निकाल पा रही है तो क्यों सब को खुश करने में लगी है, जबकि उस की तो किसी को परवाह ही नहीं है? लेकिन अपना गुस्सा वह उतारे तो किस पर इसलिए गुस्से को पानी में घोल कर पी जाती है और फिर कमर कस कर अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो जाती है. लेकिन यह गुस्सा और तनाव कहीं न कहीं उसे अंदर तक खा रहा है.
सदियों से महिलाओं को पूजापाठ, रीतिरिवाजों में धकेल दिया गया है. परिवार के नाम पर, परंपरा के नाम पर, प्रेम के नाम पर जिम्मेदारी के नाम पर, व्यवस्थित तरीके से औरतों को मूर्ख बनाया गया है. पति उस का परमेश्वर है और पति के चरणों में ही औरतों की जन्नत है, पति के बिना एक औरत का कोई वजूद नहीं है जैसी बातें औरतों को मर्दों के अधीन रखने की एक साजिश है.
माना कि एक वक्त ऐसा था जब महिलाओं की जिंदगी घर की चारदीवारी में ही सिमटी हुई थी. बाहर की दुनिया से उन्हें कोई लेनादेना नहीं होता था. उन की दुनिया रसोई से शुरू हो कर घर के आंगन पर खत्म हो जाती थी. घर के अहम फैसलों में शामिल होने का उन्हें कोई हक नहीं था. घर के सारे फैसले घर के मर्द ही लेते थे और आज की महिलाएं घरपरिवार के साथसाथ अपने कैरियर और प्रोफैशनल लाइफ को तो अच्छे से मैनेज कर ही रही हैं, साथ ही घर के अहम फैसलों में भी अपना योगदान भी दे रही हैं.

सिक्के का दूसरा पहलू
मगर सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि यही कामकाजी महिलाएं खुद के लिए ही समय नहीं निकाल पाती हैं, उन का अपना कोई मी टाइम होता ही नहीं है. घर चलाने की भावनात्मक जिम्मेदारी के साथ अपने कैरियर पर फोकस करना और हर चीज के बारे में सोचना, योजना बनाना और देखभाल करना उन की मानसिक ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर देता है कि वे खुद के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाती हैं.
माना नीना का अपने घर में एक रुतबा है. पति और सासससुर उसे सिरआंखों पर बैठा कर रखते हैं क्योंकि अपने से पहले वह अपने परिवार के बारे में सोचती है, उन की छोटीछोटी बातों का खयाल रखती है, उन्हें कब क्या चाहिए, किसे क्या पसंद है क्या नहीं, सब का ध्यान रखती है. लेकिन वह खुद के लिए कितना जी पा रही है? कल को अगर वह यह कहे कि अकेले अब उस से घरपरिवार और बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठाई जाएगी क्योंकि वह भी जौब करती है, वह भी थकती है तो क्या उसे उस के घर में वही मानसम्मान मिलेगा? पति और सासससुर की चहेती बनी रहेगी वह?
पीढि़यों से चली आ रही सामाजिक मान्यताएं पुरुषों के मन में गहराई से समाई हुई हैं कि घर और बच्चों की जिम्मेदारी तो केवल औरतों की है. भले ही वे बाहर जा कर नौकरी करें या न करें लेकिन पति को गरम फुलके खिलाने की जिम्मेदारी तो पत्नी की ही है. सासससुर की सेवाटहल करना तो घर की बहुओं का ही काम है और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी भी महिला की ही बनती है. अब महिला ये सब काम कैसे करेगी, वह जाने पर करने तो पड़ेंगे ही.
2 नावों पर सवार कामकाजी महिलाएं
बदलते वक्त ने महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप में सशक्त तो किया है और उन की हैसियत एवं सम्मान में वृद्धि भी हुई है लेकिन इस के बावजूद आज भी महिलाओं को घरेलू कामों की जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं मिल पाया है. खाना बनाना और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी आज भी महिलाओं का ही काम माना जाता है. कह सकते हैं कि वर्किंग महिलाएं दोहरी जिम्मेदारी झेल रही हैं. शादी, चाहे प्रेम विवाह हुआ हो, अरेंज्ड मैरिज हो, घर और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही है, चाहे वे कितनी ही ऊंची पोस्ट पर हों. रिटायर्डमैंट के बाद भी औरतों पर ही पूरे घर की जिम्मेदारी होती है.
घर और औफिस के बीच सामंजस्य बैठाने में हुई दिक्कत के बाद अपनी जौब छोड़ने वाली 42 साल की रंजीता कहती है कि 8 घंटे औफिस में, 3 घंटे ट्रेन औटो में और इस के बाद घर के कामकाज के बीच तालमेल बैठाना मुश्किल होता था, इसलिए उस ने अपने सपनों की बलि दे दी. रंजीता एक सरकारी जौब में थी और यह जौब उस ने बड़ी मेहनत से पाई थी.
रंजीता एक फीकी हंसी के साथ कहती है कल तक मैं औफिस में बौस थी पर आज अपने घर की बौस हूं, उस की हंसी में एक दर्द छिपा है. नौकरी छोड़ने का दर्द सपने टूटने का दर्द. मगर उस का यह दर्द किसी को दिखाई नहीं दे रहा.
रंजीता की तरह कितनी ही ऐसी वर्किंग महिलाएं हैं जिन्होंने घरपरिवार और बच्चों की खातिर अपनी जौब छोड़ दी. लेकिन शायद ही कोई ऐसा पुरुष होगा जिस ने घरपरिवार और बच्चों की जिम्मेदारी के लिए अपनी जौब छोड़ी होगी.
नौकरी छोड़ने की दर: कौरपोरेट क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार, मार्च, 2023 तक महिलाओं के नौकरी छोड़ने की दर 0.35% रही है, हालांकि ब्लूग्रे जौब्स (प्रवेश स्तर) में 50% से अधिक महिलाएं एक साल के भीतर नौकरी छोड़ने की योजना बना रही हैं.
कार्यबल में अनुपस्थिति: एक ताजा रिपोर्ट (स्ह्लड्डह्लद्ग शद्घ ढ्ढठ्ठष्द्यह्वह्यद्बशठ्ठ 2025 ) के अनुसार, भारत में अभी भी 74% महिलाएं कार्यबल से बाहर हैं.
महिलाएं नौकरी क्यों छोड़ रही हैं
लचीलेपन की कमी: लगभग 72% कामकाजी महिलाएं उन नौकरियों को अस्वीकार या छोड़ रही हैं जो उन्हें लचीले ढंग से काम करने की अनुमति नहीं देतीं.
कैरियर में उन्नति का अभाव: 21% महिलाएं कैरियर में ग्रोथ न होने के कारण इस्तीफा दे देती हैं विशेष रूप से उच्च शिक्षित महिलाएं.
वेतन में असमानता: लगभग 54% महिलाएं अपने वेतन से खुश नहीं हैं. आंकड़ों के अनुसार, समान भूमिकाओं के लिए महिलाएं पुरुषों की तुलना में 20% से 35% कम वेतन पाती हैं.
मातृत्व और देखभाल: कई कामकाजी मांओं की नौकरी छोड़ने की दर अधिक है क्योंकि दफ्तरों में बच्चों की देखभाल और मातृत्व के बाद वापसी के लिए सहायक माहौल की कमी है.
असुरक्षित माहौल: लगभग 22त्न महिलाएं कार्यबल में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं और जहां बुनियादी ढांचे (ष्टष्टञ्जङ्क, रोशनी आदि की समस्या है वहां यह आंकड़ा 33त्न बढ़ जाता है.
दूसरों को न्याय दिलाने वाली महिला वकील खुद अपनी फील्ड में असुरक्षित महसूस करती हैं, यह मैं नहीं कह रही बल्कि सर्वे रिपोर्ट कहती है.
सुप्रीम कोर्ट बार ऐसोसिएशन ने देशभर में महिला वकीलों को कानूनी पेशे में आने वाली चुनौतियों के संबंध में एक सर्वे कराया इसे सीजेआई सूर्यकांत ने इस सर्वे की रिपोर्ट को जारी किया. रिपोर्ट के अनुसार, 81.13% महिला क़ानूनी पेशेवरों ने अपने कैरियर को पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन माना है.
34त्न महिला वकीलों ने कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव होने की बात कही है. करीब 10 में से 6 महिलाओं ने सीधे या परोक्ष रूप से संस्थागत लैंगिक भेदभाव का अनुभव स्वीकार किया. यह भेदभाव अदालतों, चैंबर, पुलिस स्टेशन और ला औफिस जैसे पेशेवर स्थानों पर सामने आया. सर्वे में 23 राज्यों की बार काउंसिल ने भी प्रतिनिधित्व किया. इस में 2604 महिला वकीलों के अनुभवों को शामिल किया गया है.
पेशे की चुनौतियां: सर्वे में अन्य समस्याएं भी सामने आईं. 16.1त्न महिलाओं ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का अनुभव बताया, 12.7% ने कुछ कहने से परहेज किया. शिकायत करने या समाधान खोजने वालों में 57% महिलाओं को किसी न किसी रूप में दबाव का सामना करना पड़ा.
सुबह से ले कर रात तक की भागदौड़ में वर्किंग महिलाओं को कई मोरचों पर खुद को साबित करना पड़ता है, औफिस की मीटिंग्स, डैडलाइंस और टारगेट्स के साथसाथ घर की जरूरतें, बच्चों की पढ़ाई, उन का होमवर्क, घर के बुजुर्गों की देखभाल. इन सब के बीच तालमेल बैठाना आसान नहीं होता. कई बार महिलाएं जिम्मेदारी निभातेनिभाते खुद की सेहत को इग्नोर कर देती हैं. इस का असर धीरेधीरे उन के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने लगता है.
ग्लोबल स्लिप सर्वे की एक रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं में पुरुषों से 9% ज्यादा अनिद्रा की रोगी हैं. भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक नींद की कमी का सामना कर रही हैं. भारत समेत 13 देशों में किए गए ग्लोबल स्लिप सर्वे 2026 के अनुसार, पारिवारिक जिम्मेदारियां, औफिस के काम का लोड और मानसिक तनाव का सीधा असर महिलाओं की नींद की गुणवत्ता पर पड़ रहा है.
अंगदान: हर 5 में से 4 महिलाएं
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत समेत दुनियाभर में 5 में से 3-4 महिलाएं डोनर थीं. इस के विपरीत अंग प्राप्त करने वालों में से 5 में से 4 पुरुष थे.
महिलाओं को खास कर वर्किंग महिलाओं को यह सम झना जरूरी है कि नौकरी और परिवार जरूरी है, पर उन का स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है. परफैक्ट या सुपर वूमन बनने की कोशिश में खुद पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालना सही नहीं है. सही प्लानिंग, टाइम मैनेजमैंट और परिवार के सहयोग से घर और औफिस दोनों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है.
अपने काम को मैनेज करना सीखें: घर और औफिस को एकसाथ संभालने के लिए सब से पहले जरूरी है सही टाइम मैनेजमैंट. एक दिन पहले ही काम की सूची बना लें ताकि अगले दिन आप को हड़बड़ी न हो. मोबाइल, कैलेंडर या प्लानर का इस्तेमाल कर के आप अपने दिन को बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर सकती हैं.
जिम्मेदारियां बांटना सीखें: हर काम खुद करने की कोशिश आप को थका सकती है. इसलिए पति, बच्चों से घर के कामों में मदद लें. इस से आप का बो झ तो कम होगा ही, उन्हें भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होगा और परिवार के बीच प्यार भी बढ़ेगा. खाली समय में या छुट्टी वाले दिन, सब्जियों को काट कर फ्रिज में रख सकती हैं, धुले कपड़े स्त्री कर के अलमारी में रख दें. इस से आप का समय बचेगा और टैंशन नहीं होगी.
खुद के लिए समय निकालें: कामकाजी महिलाओं को खुद के लिए समय नहीं मिल पाता है लेकिन आप को खुद के लिए समय निकालना होगा. मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए मी टाइम बेहद जरूरी है. योग और मैडिटेशन आप को शारीरिक और मानसिक रूप से ऊर्जावान बनाए रखेगा और 2 घंटे का काम आप 1 घंटे में कर पाएंगी.
औफिस और घर की सीमाएं तय करें: वर्क फ्रौम होम हो या औफिस जौब, काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करना जरूरी है. औफिस का काम घर पर और घर की टैंशन औफिस तक न ले जाएं. इस से दोनों जगह आप फोकस नहीं कर पाएंगी और आप को तनाव होगा जो स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है.
सुपर वूमन बनने के दबाव से बचें: दुनिया में कोई भी परफैक्ट नहीं होता, यह बात जान लें. इसलिए लोगों को खुश रखने के चक्कर में ज्यादा परफैक्ट बनने की जरूरत नहीं है. जो काम आप नहीं कर सकतीं या आप से नहीं हो पाएगा, वहां न बोलना सीखें. अपनी गलतियों पर खुद को गिल्टी फील न कराएं क्योंकि गलतियां इंसान से ही होती हैं.
लक्ष्मी वेंकटरमण, भारतीय युवा शक्ति ट्रस्ट की संस्थापक और प्रबंधन ट्रस्टी का मानना है कि लैंगिक अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों का बो झ अभी भी महिलाओं के कंधों पर आता है. एक कामकाजी महिला होने के नाते मैं यह अच्छे से सम झती हूं कि अपनी क्षमता को पहचानने का महत्त्व क्या है. महिलाओं में असीम क्षमताएं हैं लेकिन उन्हें अपनी बातों को कहने के लिए खड़ा होना होगा और अपने अधिकार जताने होंगे. परिवार का सहयोग और समर्थन भी जरूरी है क्योंकि महिलाएं एकसाथ कई जिम्मेदारियां निभाती हैं.
घरेलू जिम्मेदारियों को संभालते हुए और कार्यस्थल में बेहतर प्रदर्शन करते हुए महिलाओं के लिए यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि वे अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें. समाज अभी भी महिलाओं से सुपर वूमन होने की अपेक्षा रखता है. इस कारण कामकाजी महिलाएं कई बार अपराधबोध का शिकार हो जाती हैं कि वे घर व बच्चों के ऊपर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता दे रही हैं.
जो दुनिया अर्थव्यवस्था और समाज में महिलाओं की भूमिकाओं को कम महत्त्व देती है, वहां महिलाओं को खुद को मजबूत बनाना चाहिए, मार्गदर्शन लेना चाहिए और अपनी खास जगह बनानी चाहिए. शिक्षा और उद्धमिता के क्षेत्र में मार्गदर्शन मिलने से भी महिलाओं को काफी फायदा हो सकता है.
