Husband Wife relationship : मैरिज, डिवोर्स, डोमैस्टिक वायलैंस के कानून तो पिछले 75 सालों में बना दिए गए हैं पर समाज अभी भी उन के लायक नहीं हुआ और नतीजा यह है कि पुरुष आज भी पौराणिककाल में जीना समझ कर औरतों पर राज करना चाह रहे हैं और औरतें इन नए गुलामी से छुटकारा दिलाने वाले कानूनों का सहारा लेते समय भूल जाती हैं कि उन की टक्कर पति से नहीं समाज से होनी चाहिए पर वे कठघरे में खड़ा पति को कर देती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने डाउरी केस में फंसे 70 के आसपास के जोड़े को बहू के आरोपों से राहत दी कि वे बिना सुबूतों के धुंधले थे. असल में यह हर मामले में हो रहा है जो फैमिली कोर्ट, वूमन सैल या कोर्ट में यंग मैरिड औरतें ले जा रही हैं. इन औरतों की तकलीफ का कारण सोशल है. वे जानती हैं कि पति से न निभनेके बाद अगर वे अपने पेरैंट्स के घर चुपचाप लौट आईं तो उन के भाईभाभी और उन का समाज उन्हें जीने न देगा. वे इसलिए मनगढ़ंत कहानियां बनाती हैं, कानूनों का सहारा लेती हैं जो उन की सुरक्षा के लिए बनाए गए पर अब समाज में उन्हें बचाव का बहाना देते हैं.
जब पेरैंट्स को कहा जाए कि पति के घर उस पर अत्याचार हो रहे हैं, उसे मारापीटा जा रहा है, दहेज कम लाने के ताने दिए जा रहे हैं तो पेरैंट्स की हिम्मत नहीं होती कि मैरिड बेटी को घर से निकाल दें. ये कानून असल में वे चाबियां हैं जिन से पेरैंट्स के घरों के दरवाजे पति से लड़ कर आई लड़की के लिए खुल जाते हैं.
आज भी हिंदू धर्म और समाज यह मानने को तैयार नहीं है कि विवाह के 7 दिन बाद या 7 साल बाद या 17 साल बाद पत्नीपति एकदूसरे से इस कदर ऊब चुके हों कि वे अलग रहना चाहते हों, समाज ऐसे में पति का घर छोड़ कर आई लड़की को हिकारत की नजरों से देखता है. बचने के लिए पत्नियां डोमैस्टिक वायलैंस, डाउरी, क्रूएलिटी का बहाना बनाती हैं.
मिडिल क्लास में यह प्रौब्लम ज्यादा है जहां डिवोर्स के बाद क्या का मतलब नहीं सू?ाता. पति को छोड़ कर आई बच्चों वाली या बिना बच्चों वाली औरत को कमाऊ होते हुए भी आसानी से कहीं ठिकाना नहीं मिलता. समाज इन 1955 में बने कानूनों को अभी तक 76 साल बाद भी डाइजैस्ट नहीं कर पाया है कि ये रेयर इंसीडैंट्स के लिए हैं, हर मैरीटल प्रौब्लम का सौल्यूशन नहीं हैं.
शिकायत करने वाली औरत को मालूम होता है कि इन कानूनों में केस चलने के बाद उस के समझौते के सारे चांसेज खत्म हो जाएंगे पर वह यह भी जानती है कि अगर उस ने ये आरोप नहीं लगाए तो उस के पेरैंट्स और सिबलिंग उसे घर में पनाह नहीं देंगे. उसे तुरंत हल रोनाधोना ही लगता है.
अगर समाज उदार होता जो इन कानूनों का असली उद्देश्य था तो मैरीटली डिसप्यूट को और्डनरी समझौता और पतिपत्नी दोनों को गुनहगार नहीं मानता. समाज तो पत्नी को ही दोषी मानता है. नए कानून पत्नी के लिए कुछ समय परदे का काम करते हैं.
