Breast Ironing: अकसर सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं पर आधारित होते हैं. इन में से कुछ रिवाज तो महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रख कर भी बनाए जाते हैं जो आखिर में उन के अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन ही करते हैं. भले ही आज हम देखते हैं कि महिलाओं की जिंदगी बदल रही है, वहीं दूसरी ओर हमें किसी ऐसे रिवाज के बारे में पता चल जाता है जहां महिलाओं के साथ रीतिरिवाजों के नाम पर बेरहमी होती है जो आप को सोचने पर मजबूर कर दे कि क्या वाकई दुनिया आगे बढ़ रही है? क्या वाकई नियमकानून महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं? इन्हीं में से एक प्रथा है ‘ब्रैस्ट आयरनिंग.’
‘ब्रैस्ट आयरनिंग’ की इस प्रथा को लड़की की मां या कोई अन्य औरत (बहन, मामी, चाची, दादी आदि) अंजाम देती है. मान्यता यह है कि गरम चीजों से ब्रैस्ट दागने से लड़कियों की छाती चपटी हो जाती है और उन पर पुरुषों का ध्यान नहीं जाता. लड़कियां जब प्यूबर्टी के करीब आती हैं तो खुद उन की मां, पत्थर या लोहे को गरम कर उन की छाती पर दाग देती हैं और उन को इलास्टिक बैंडेज से बांध देती हैं.
ऐसा हफ्ते में 2 या 3 बार किया जाता है. यह प्रैक्टिस काफी दर्दनाक होती है क्योंकि प्यूबर्टी में ब्रैस्ट की ग्रोथ होना शुरू हो जाती है और इस प्रोसैस में लड़कियों के ब्रैस्ट में पहले ही कुछ दर्द होता है. ऐसे में गरम पत्थर से दागे जाने पर यह और भी भयानक हो जाता है.
यह प्रैक्टिस सब से ज्यादा अफ्रीकी देश कैमरून में प्रचलित है. कैमरून की महिलाओं का मानना है कि अगर लड़कियों में जवानी के लक्षण जल्दी दिखाई देने लगें तो पुरुषों का ध्यान उन पर जाता है और ऐसे में लड़कियों के शादी से पहले ही गर्भवती होने का डर बना रहता है. इस के अलावा बेनिन, आइवरी कोस्ट, चाड, गिनीबिसाऊ, केन्या, टोगो, जिंबाब्वे और गिनीकोनाक्री में भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं.
मानसिक दर्द
ब्रैस्ट आयरनिंग की वजह से लड़कियों को न सिर्फ दर्द झेलना पड़ता है बल्कि इस से टिशू भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इतना ही नहीं, इस से ब्रैस्ट कैंसर होने की आशंका भी बढ़ जाती है और ब्रैस्ट फीडिंग कराने में भी दिक्कत आती है.
यूनाइटेड नेशंस ने ब्रैस्ट आयरनिंग को लिंग आधारित हिंसाओं की कैटेगरी में रखा है और इस बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए काफी कोशिशें की जा रहीं हैं. यूनाइटेड नेशंस और अफ्रीकी हैल्थ और्गेनाइजेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 3.8 करोड़ लड़कियों को इस परेशानी से गुजरना पड़ता है. रिपोर्ट मानती है कि 58% बार यह मां के द्वारा ही की जाती है.
ब्रैस्ट आयरनिंग के अलावा ऐसी कई मान्यताएं और परंपराएं हैं जो महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बनाई गई हैं लेकिन ये प्रैक्टिसेज केवल महिलाओं को प्रताडि़त करती हैं और कई बार तो उन्हें जीवनभर के लिए अपंग बना देती हैं. इन में महिलाओं का खतना, वर्जिनिटी टैस्ट, बाल विवाह आदि शामिल हैं. जी हां, ये सभी रीतिरिवाज इसलिए बनाए गए हैं ताकि शादी से पहले लड़की का सैक्सुअल ऐनकाउंटर या प्रैगनैंसी न होने पाए. हालांकि इन्हें दुनियाभर में बहुत पहले ही बैन किया जा चुका है इस के बावजूद आज भी ऐसे कई मामले सुनने में आ जाते हैं.
महिलाओं का खतना हो या ब्रैस्ट आयरनिंग ये सभी पूरी तरह से लड़कियों की पर्सनैलिटी को किल कर देते हैं. किसी भी व्यक्ति को खुद को ऐक्सप्रैस करने का सब से अच्छा तरीका है अपनी पर्सनैलिटी को शो करना चाहे वह लड़का हो या लड़की.
चौकाने वाला सर्वे
आज की दुनिया में कई लड़कियां अपने शरीर को फ्लौंट करना कौन्फिडैंस का प्रतीक मानती हैं. वे अपने लुक्स और स्टाइल को ले कर काफी सहज होती हैं और अपने शरीर को किसी भी तरह के संकोच या शर्मिंदगी के बिना अपनाती हैं और उन्हें फ्लौंट करने से बिलकुल नहीं संकुचाती हैं. अकसर लड़कियां या महिलाएं अपनी ब्रैस्ट साइज को अट्रैक्शन के साथ जोड़ कर देखती हैं. वहीं एक सर्वे में पाया गया है कि अधिकांश महिलाएं अपनी ब्रैस्ट के साइज से खुश नहीं रहतीं.
जिन के साइज छोटे होते हैं वे खुद को अंडरकौन्फिडैंट महसूस करती हैं और जिन के बड़े होते हैं उन्हें कई बीमारियों और फिजिकल मूवमैंट से जूझना पड़ता है. बड़ी ब्रैस्ट फिजिक को इन्हांस कर सकती है लेकिन कई बार यह परेशानी का कारण भी बन जाती है. ज्यादा बड़ी ब्रैस्ट से कई हैल्थ प्रौब्लम्स का सामना करना पड़ता है, इसलिए आज इस का समाधन ब्रैस्ट रिडक्शन सर्जरी के तौर पर निकला है. इसे रिडक्शन मैमप्लास्टी भी कहा जाता है. अगर इस की तुलना ब्रैस्ट आयरनिंग से की जाए तो यह सर्जरी पेनलैस और काफी हद तक सेफ मानी जाती है.
व्यक्तिगत पसंद का विषय
लड़कियों द्वारा अपने शरीर को फ्लौंट करना व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसे किसी भी तरह की जजमैंट के बिना देखने की जरूरत है. हर व्यक्ति को अपने शरीर को अपनाने का अधिकार है. किसी भी व्यक्ति के आत्मविश्वास, बौडी पौजिटिविटी और स्वतंत्रता का सम्मान करना ही एक डैवलपड सोसायटी की पहचान है.
मगर समाज में आज भी कई लोग इसे गलत नजरिए से देखते हैं. हैरानी की बात यह है कि ऐसा केवल पिछड़े गांवों या शहरों में ही नहीं बल्कि सभ्य समाज में भी खासा देखा जा सकता है. महिलाओं को उन के कपड़ों और बौडी शो करने के आधार पर आंका जाता है. लेकिन यह जरूरी है कि लोग व्यक्तिगत पसंद और अभिव्यक्ति के अधिकार को समझें और महिलाओं को उन की मरजी के अनुसार जीने का अवसर दें.
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