Digital India: हाल ही में राज्यसभा में इंफोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्ति ने सोशल मीडिया पर बच्चों के इस्तेमाल को ले कर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि मातापिता सोशल मीडिया पर फौलोअर्स बढ़ाने के लिए बच्चों का बचपन छीन रहे हैं. मूर्ति ने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने और उन की प्रतिभा को विकसित करने का अवसर देने की अपील की है. उन का मानना है कि बच्चों को खेलने, पढ़ने और सीखने का समय मिलना चाहिए.
आप खुद डिजिटल वर्ड के जनक हो
मगर यह समय उन्हें कैसे मिलेगा? अब उन का सारा समय तो सोशल मीडिया, मोबाइल ने खा लिया है. आप ही तो चाहते थे कि भारत जिसे सोने की चिङिया कहा जाता था उसे डिजिटल इंडिया बना दिया जाए. तो लीजिए बन गया डिजिटल इंडिया फिर अब इस टेक्नोलौजी से परहेज क्यों? अब आप खुद भी इसे ऐंजौय करिए और जनता को भी करने दीजिए.
दरअसल, आज हर किसी के हाथ में मोबाइल है. छोटेछोटे मासूम बच्चे रील्स बनाने में लगे हैं. ये डिजिटल रैव्यूलेशन का नतीजा है. पहले तो आप ने खुद ही महिलाओं और बच्चों के हाथों में मोबाइल पकड़ाए और अब जब हरकोई अपना कामधंधा सब छोड़ कर मोबाइल और रील्स बनाने में लगा है, तो आप को बच्चों की चिंता हो रही है. आप ही कहते थे कि डिजिटल रैव्यूलेशन आप को गड्ढे में धकेलने के लिए नहीं बना है. लेकिन अब अगर वह गड्ढे में धकेल रही है तो आप पेरैंट्स को दोष क्यों दें रहे हो? यह गड्ढा किस ने खोदा? आप ही तो सरकार के सारे प्रोग्राम बना रहे हो.
इंफोसिस सब से ज्यादा सरकारी पोर्टलों के ठेके लेता है. यह सुधा मूर्ति जैसे लोगों का फैलाया हुआ रायता है जिसे हम सब समेटने में लगे हैं और अब आप सहानभूति समेटने में लगी हैं.
इस से केवल आप को और सरकार को फायदा हो रहा है. फिर राज्यसभा में इस नौटंकी का क्या मतलब जबकि आप खुद ही चाहते हैं कि हर किसी के हाथ में मोबाइल हो. हर कोई टेक्नोलौजी से जुड़ा हो. लेकिन सवाल यह है इस टेक्नोलौजी का फायदा आखिर हो किसे रहा है? आम जनता सिर्फ इस से परेशान ही हो रही है.
डिजिटल इंडिया की तसवीर का एक पहलू यह भी है
‘डिजिटलीकरण’ साइबर अपराधियों के लिए स्वर्ग है : डिजिटलाइजेशन दिन पर दिन आम आदमी के लिए घातक सिद्ध हो रहा है विशेषकर वहां जहां धन का लेनदेन है. लोग रोजाना ठगी का शिकार होते जा रहे है. यह संख्या बढने पर तो है, लेकिन कम होने का कहीं नाम नहीं ले रही है.
‘डिजिटल अरेस्ट’, सिम स्वैपिंग और यूपीआई फ्रौड जैसे अपराधों में 2024-25 में भारी बढ़ोत्तरी देखी गई है. बैंक खाते से जीवनभर की कमाई एक क्लिक में गायब हो जाती है और अपराधी अकसर कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं.
इस का मुख्य कारण है, शिक्षा तो ग्रहण कर ली, लेकिन रोजगार के अभाव में घर बैठ कर करें तो कौन सा काम करें? इसलिए वे इस अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं. शायद ही कोई बैंक हो जो इस अपराध का शिकार न हुई हो?
डिजिटल डिवाइड (गरीब और अमीर के बीच की खाई)
अमीर घरों के बच्चों के पास हाईस्पीड ब्रौडबैंड, लैपटौप और लेटैस्ट स्मार्टफोन हैं. दूसरी ओर एक गरीब परिवार के पास अकसर पूरे परिवार के लिए सिर्फ एक पुराना स्मार्टफोन होता है, जिस में डेटा पैक खत्म होने का डर हमेशा बना रहता है.
लौकडाउन के दौरान हम ने देखा कि कैसे लाखों गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए क्योंकि उन के पास औनलाइन क्लास लेने के साधन नहीं थे.
इस के आलावा जिन लोगों के पास स्मार्टफोन या डेटा नहीं हैं, वे सरकारी योजनाओं (जैसे राशन, स्वास्थ्य सेवाएं) का लाभ लेने में पिछड़ जाते हैं क्योंकि सब कुछ ‘औनलाइन’ हो गया है.
जब सरकार राशन कार्ड, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह औनलाइन कर देती है, तो इस का सब से बुरा असर उस गरीब पर पड़ता है जिसे फौर्म भरना नहीं आता.
एक मजदूर को अपना हक पाने के लिए भी अब किसी ‘साइबर कैफे’ वाले को पैसे देने पड़ते हैं या दलालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इस से भ्रष्टाचार का एक नया डिजिटल स्वरूप पैदा हो गया है.
निजता का खत्म होना
‘डिजिटल इंडिया’और ‘संचार साथी’ जैसे पोर्टल्स पर डेटा एकत्र होता है. अगर डेटा लीक होता है, तो विज्ञापन कंपनियों से ले कर अपराधियों तक, सब के पास आप की निजी जानकारी (नाम, पता, आधार) पहुंच जाती है.
सोशल मीडिया और ऐप्स आप की सहमति के बिना भी आप की लोकेशन, लाइक्स और औनलाइन ऐक्टिविटी को ट्रैक करते हैं, जिसे फेसबुक जैसी कंपनियां विभिन्न ऐप्स (इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप) के जरीए करती हैं. आप की निजी जानकारी गलत हाथों में पड़ने से पहचान की चोरी और फिशिंग हमलों का खतरा बढ़ जाता है.
सीनियर सिटीजन के लिए दिक्कतें
बुजुर्गों को ऐप चलाने, पासवर्ड याद रखने या बायोमीट्रिक (अंगूठे के निशान) देने में दिक्कत होती है. कई बार फिंगरप्रिंट न मिलने के कारण गरीबों को राशन तक नहीं मिल पाता. वे खुद को समाज में कटा हुआ और लाचार महसूस करने लगते हैं.
बैंकिंग से ले कर बिल भरने तक, हर जगह मशीनें आ गई हैं. जब वे बैंक जाते हैं, तो उन्हें ‘मशीन से पैसे निकालने’ या ‘ऐप डाउनलोड’ करने को कहा जाता है, जिस से वे लाचार महसूस करते हैं. उन्हें कौल कर के डराया जाता है कि उन की ‘पेंशन रुक गई है’ या उन के ‘नाम पर वारंट’ है. वे डर के मारे ओटीपी या पिन साझा कर देते हैं और जीवनभर की कमाई खो देते हैं.
डिजिटल अरेस्ट की घटनाएं बढ़ी हैं
एसआईआर या संचार साथी का हवाला दे कर पीड़ित को डराते हैं कि उन पर एफआईआर दर्ज होने वाली है. पीड़ित को घंटों तक वीडियो कौल पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहते हैं. इस के चलते लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई कुछ ही घंटों में ही लुटा देते हैं. पढ़ेलिखे लोगों के साथ भी इस तरह की घटनाएं हो रही हैं.
डिजिटल इंडिया नहीं डिजिटल निर्वासन
यद्यपि हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी इंटरनैट की 80% से अधिक महत्त्वपूर्ण सामग्री और सेवाएं अंगरेजी में उपलब्ध हैं. यह उन करोड़ों भारतीयों के लिए डिजिटल निर्वासन जैसा है जो अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में बात करते और समझते हैं.
अधिकांश डिजिटल सामग्री अंगरेजी या प्रमुख भाषाओं में है, जिस से क्षेत्रीय भाषाओं के बोलने वाले लोग वंचित रह जाते हैं. क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों से पढ़ने वाले प्रतिभाशाली बच्चे केवल भाषा की कमी के कारण वैश्विक डिजिटल ज्ञान की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं. यह उन की बौद्धिक प्रगति को सीमित कर देता है. सिफर यहीं नहीं बल्कि कहने को तो हिंदी हमारी राजभाषा है लेकिन जब सारा सरकारी कामकाज और डिजिटल सबकुछ अंगरेजी भाषा में हो रहा है, तो कैसे आप दूरदराज की आम हिंदी भाषी जनता को खुद से जोड़ पाएंगे? क्या इस डिजिटल इंडिया से उन की परेशानियां बढ़ नहीं रहीं?
संचार साथी ऐप डिजिटल पुलिस मैन है. मतलब यह आप की जेब में जबरन घुसा निगरानी कैमरा है.
‘अगर आप इस ऐप को इंस्टौल कर के सिर्फ रजिस्टर करते हैं, तो आप के फोन और एसएमएस ऐप्स का ऐक्सेस लेता है. अगर आप फोटोज अपलोड करते हैं, तो ये गैलरी का ऐक्सेस एक्सेस मांगता है. वहीं आईएमइआई कोड स्कैन करने के लिए ये कैमरे की परमिशन मांगते हैं. कुल मिलाकर ये आप के फोन, कौल लौग्स, एसएमएस, स्टोरेज, कैमरा जैसी परमिशन मांगता है. कंज्यूमर्स एक्टिवेट या डिलीट कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यह आप की जेब में जबरन घुसा निगरानी कैमरा है.
हालांकि कुछ बुद्धिजीवियों का इस पर कहना है कि व्हाट्सऐप, गूगल प्ले और बाकी ऐप भी डेटा लेते हैं, फिर बहस क्यों?
लेकिन हम आप को बता दें कि संचार साथी की बहस इसलिए है क्योंकि पहली बार ऐसा ऐप सीधे सरकार की निगरानी में होगा और उस से बचने का विकल्प नहीं मिलेगा. डेटा भी आप का, मोबाइल भी आप का, लेकिन नियंत्रण किसी और का क्यों?
सरकार समर्थकों का तर्क है कि कई निजी ऐप पहले ही लोकेशन, कौन्टैक्ट और व्यवहारिक डेटा का उपयोग करते हैं. पेमेंट ऐप तो बिना लोकेशन के भुगतान भी नहीं होने देते हैं. मगर संचार साथी की बहस इसलिए बड़ी है क्योंकि, पहली बार ऐसा ऐप सीधे सरकार की निगरानी में होगा और उस से बचने का विकल्प नहीं मिलेगा. इस के जरीए आप की सारी प्राइवेसी और सारा डाटा सरकार के पास जा रहा है.
सच तो यह है कि जब डेटा भी आप का, मोबाइल भी आप का, लेकिन नियंत्रण किसी और का क्यों?
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी इसे ‘पेगासस प्लस प्लस’ बताया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “बड़े भाई हमारे मोबाइल फोन्स को और हमारी प्राइवेट लाइफ को टेकओवर करेंगे. इस के जरीए आप की सारी प्राइवेसी और सारा डाटा सरकार के पास जा रहा है. एक तरह से सरकार हम पर प्यूरी तरह शिकंजा कस रही है. वह भी हमारे ही हाथों से. सरकार का यह रवैया क्या किसी तानाशाह सरकार जैसा नहीं है?”
एसआईआर डिजिटलीकृत अव्यवस्था की मिसाल
देशभर में एसआईआर के नाम पर खुलेआम धांधली हो रही है. एसआईआर सिर्फ वोटरों का एड्रैस जानने के लिए की जा रही है, ताकि चुनाव के दौरान भाजपा उन तक पहुंच सके और उन्हें ट्रेन का मुफ्त टिकट व पैसे दे कर अपने पक्ष में वोट देने के लिए घर ला सके.
मतदाताओं के सामने तो एसआईआर को ले कर समस्याएं ही बनी हुई हैं. किसी का सवाल है कि अपना घर बनवा लिया और अब नए पते पर वोटर कार्ड बनवाना है तो किसी बीएलओ ने 2003 की सूची में नाम नहीं होने पर फौर्म नहीं देने की शिकायत की.
एसआईआर को लेकर जो तसवीर सामने आई है, वह किसी डिजिटलीकृत अव्यवस्था की मिसाल बन गई है. सर्वर डाउन हैं, ऐप हैंग हो रहे हैं, फौर्म नहीं छपे और फील्ड में बीएलओ हाथ मल रहे हैं. इस से 55 जिलों में वह काम, जो पिछले 4 दिसंबर तक खत्म होना था, अब दिनोंदिन और जटिल होता जा रहा है. सर्वर ठप्प होने से बीएलओ के पास न 2003 की लिस्ट, न अपडेट कौपी.
जिस डिजिटल टूल पर पूरा एसआईआर टिका है, वही सब से बड़ी कमजोरी बन गया है. आयोग ने फील्ड डेटा कलैक्शन के लिए जो बीएलओ ऐप तैयार किया, उस की तकनीकी खामियां संकट में बदल चुकी हैं. एप का सब से बड़ा झोल है ब्लड रिलेशन लिंकिंग फीचर. यह सिर्फ पिताऔर दादा के रिश्ते को मान्य करता है. किसी मतदाता को चाचा, ताऊ या भाई से जोडऩा हो तो सिस्टम उसे अमान्य बता देता है.
आम जनता को इस डिजिटल युग की दुनिया में समझ ही नहीं आ रहा कि हमें क्या करना है? कहां जाना है? किस से बात करनी है? कोई कुछ बताने वाला नहीं है. हरकोई पैसे बनाने में लगा है और सरकार बस किसी तानाशाह की तरह अपनी नईनई स्किम और फैसले जनता पर थोप रही है और सुधा मूर्ति जैसे लोग इस पर बेवजह की टिप्पणियां कर सहानभूति बटोरने का काम कर रहे हैं जबकि वे खुद इस सिस्टम का हिस्सा हैं.
तो फिर ये रोनापीटना किस के लिए किया जा रहा है? उन मासूम बच्चों के लिए जिन के हाथों में ये मोबाइल पकड़ाने वाले भी आप ही हैं या फिर खुद लाइमलाइट में आने के लिए ताकि आप की सत्ता की दुकानें यों ही चलती रहें?
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