राहुल गांधी ने अपने गुजरात के चुनावी दौरों में चीन व भारत के व्यापार पर काफी तंज कसे हैं. उन्हें इस बात के लिए गलत नहीं कहा जा सकता. चीन की मेजबानी में शियामेन में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों के 9वें सम्मेलन में भारत और चीन के संबंधों के बीच नए तेवर देखने को मिल चुके हैं. भारत और चीन दोनों देश आर्थिक विकास पर ध्यान देने की पुरजोर वकालत करते नजर आए. इस के पीछे जहां एक तरफ भारत की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था जिम्मेदार है तो वहीं दूसरी तरफ चीन अपने पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा है.

ये दोनों देश बखूबी जानते हैं कि शांति के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है. इसी कारण पाकिस्तान के आतंकी रुख को ले कर भी चीन में परिवर्तन आया है. भारत की कूटनीति काम आई कि एक तरफ डोकलाम विवाद पर घिरे बादल छंटने लगे, वहीं दूसरी तरफ चीन, भारत के साथ आतंकवाद को मिटाने के लिए मंच साझा करता नजर आया.

ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणापत्र में न केवल आतंकवाद की निंदा की गई है, बल्कि हिंसा और असुरक्षा के लिए जिम्मेदार आतंकी समूहों की एक बड़ी सूची में पाकिस्तान के हक्कानी नैटवर्क, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे 4 आतंकी समूहों का नाम लिया गया.

भले ही ब्रिक्स सम्मेलन में सरकार ने चीन पर राजनीतिक जीत मान ली हो पर आर्थिक क्षेत्र में चीन अपनी अर्थव्यवस्था के साम्राज्य को बढ़ाने में ही लगा है, और राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि आतंकवाद विरोध पर साझा बयान दे कर चीन भारत में अपनी आर्थिक दखलंदाजी बढ़ाने की मंशा रखता है.

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