consanguineous marriage : आजकल एक नया ट्रेंड चल गया है हिन्दू लड़के लड़कियां अपनी ही सगी मां की बेटी, मौसी के लड़के या फिर बुआ की लड़की से प्यार कर बैठते हैं और फिर जब परिवार का विरोध होता है तो भागकर अपने ही भाई बहन से शादी कर लेते हैं.

हालाँकि “प्यार और आकर्षण की आड़ में कानून और सामाजिक ताने-बाने को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है, इसका अंदाजा अक्सर युवाओं को शादी के बाद होता है. हिंदू मैरिज एक्ट के तहत सगे या नजदीकी रिश्तेदारों में की गई शादियां कानूनी रूप से पूरी तरह ‘अमान्य’ (Void) होती हैं. कोर्ट को अंधेरे में रखकर की गई ऐसी शादियां न सिर्फ बच्चों के उत्तराधिकार और इंश्योरेंस क्लेम को अधर में लटका देती हैं, बल्कि भविष्य में कानूनी और सामाजिक स्तर पर इंसान को पूरी तरह अलग-थलग कर देती हैं.”

माना कि वो उम्र ही, ऐसी होती है कि इंफेक्शन होती है तो हो जाती है आप उसका कुछ नहीं कर सकते. अगर ऐसी शादी करनी है, तो की जा सकती है किसी को उन्हें रोकने का अधिकार भी नहीं है. लेकिन जेनेटिकली इसको सही नहीं माना जाता. मुस्लिम समाज में भी ऐसी शादियां होती है और इसका उन्हें कोई बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होता. उनके कोई मुसीबत आफत नहीं आयी है कि मुस्लिम समाज खत्म हो गया. कहा ये भी जाता है कि कई पीढ़ी तक अगर ऐसा हो तो बच्चा होने में दिक्कत है वरना एक दो पीढ़ी में ऐसा हो तो इससे बच्चे पर कोई फर्क नहीं पड़ता. हालाँकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ और ढूंढो, अपने घर में क्यों करते हो शादियां. भाई बहन को छोड़कर नया रिश्ता ढूंढो. करीबी रिश्तों में शादी ना करने की भी कई वजह है जो लॉजिक के हिसाब से भी पूरी तरह सही है जैसे कि –

‘सपिंड’ रिश्ते को कानूनी मान्यता नहीं मिलती

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) की धारा 3(f), 3(g) और धारा 5(iv), 5(v) के तहत सगे भाई-बहन और मौसी/बुआ/मामा के बच्चों के बीच शादी पूरी तरह से प्रतिबंधित है. कानून की नज़र में इन्हें ‘सपिंड’ (Sapinda) और ‘प्रतिबंधित रिश्ते’ (Prohibited Relationships) माना जाता है.

कानून के अनुसार, यदि दो व्यक्तियों का कोई एक ही पूर्वज हो, तो वे आपस में सपिंड माने जाते हैं. माता की तरफ से 3 पीढ़ियों तक सपिंड रिश्ता माना जाता है. आप, आपकी माँ, और आपके नाना/नानी. (मौसी या मामा के बच्चे इसमें शामिल हो जाते हैं)

वहीं पिता की तरफ से 5 पीढ़ियों तक सपिंड रिश्ता माना जाता है. आप, आपके पिता, दादा, परदादा आदि. (बुआ के बच्चे, दादा के भाई-बहनों के पोते-पोती आदि इसमें आते हैं)

कानूनन वैध नहीं है ऐसी शादी

ऐसी शादी कानूनन शुरू से ही अमान्य होती है. भले ही आर्य समाज या किसी मंदिर में शादी कर ली जाए, उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं होती. यानी कि यदि कोई विवाह इन सपिंड नियमों का उल्लंघन करके किया जाता है, तो कानूनन ऐसा विवाह अस्तित्वहीन माना जाता है. इसके लिए तलाक की आवश्यकता नहीं होती; यह शादी शुरू से ही रद्द मानी जाती है.

क्या कहता है विशेष विवाह अधिनियम

कोर्ट मैरिज (Special Marriage Act, 1954) में भी प्रतिबंधित रिश्तों की सूची लागू होती है. वहाँ भी ऐसी शादियों का रजिस्ट्रेशन नहीं हो सकता.

विरासत और संपत्ति पर भी पड़ता है असर

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत किसी पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति उसके विधवा (पत्नी), बच्चे और माँ को मिलती है लेकिन सपिंड या प्रतिबंधित रिश्तों में हुई शादी कानूनन शुरू से रद्द होती है, इसलिए महिला को कानूनन ‘विधवा’ या ‘वैध पत्नी’ का दर्जा नहीं मिलता. यही वजह है कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी का उसकी स्व-अर्जित या पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता है.

चूंकि शादी अमान्य होती है, इसलिए पत्नी को पति की संपत्ति में कानूनी वारिस का दर्जा नहीं मिलता. हालाँकि, बच्चों को कानून पिता की संपत्ति में अधिकार देता है, लेकिन शादी की वैधता पर विवाद होने पर संपत्ति के बंटवारे में लंबे कानूनी पचड़े खड़े होते हैं. साथ ही, ऐसे बच्चे केवल अपने माता-पिता की संपत्ति के हकदार होते हैं. साथ ही वे बच्चे दादा, परदादा या विस्तारित परिवार की खानदानी/संयुक्त हिंदू परिवार (HUF) की संपत्ति में जन्मजात अधिकार का दावा नहीं कर सकते.

इंश्योरेंस का क्लेम रद्द होना

यदि बीमा कंपनी या बैंक में नामांकित Nominee के रूप में ‘पत्नी’ लिखा गया है और बाद में यह साबित हो जाए कि शादी कानूनी रूप से अमान्य थी या तथ्यों को छिपाया गया था, तो कंपनी धोखाधड़ी का हवाला देकर क्लेम देने से मना कर सकती है.

क्योंकि बीमा पॉलिसी लेते समय फॉर्म में बीमित व्यक्ति और नामांकित व्यक्ति के बीच का रिश्ता पूछा जाता है. यदि कोई व्यक्ति सपिंड रिश्ते (जैसे मौसी/बुआ का बेटा/बेटी या सगा भाई/बहन) में शादी करके फॉर्म में ‘पति/पत्नी’ लिखता है, तो कानूनी रूप से इसे गलत जानकारी देना या तथ्य छिपाना माना जाता है.

हालाँकि बीमा कंपनियां पॉलिसी बॉन्ड में साफ लिखती हैं कि यदि जानकारी गलत या भ्रामक दी गई है, तो दावा खारिज कर दिया जाएगा. डेथ क्लेम की जांच के दौरान यदि यह सामने आता है कि शादी कानूनन अमान्य थी, तो कंपनी Misrepresentation का हवाला देकर क्लेम रिजेक्ट कर देती है.

पेंशन और सरकारी सुविधाएँ भी नहीं मिलेगी

अगर आपके पति किसी सरकारी नौकरी में थे तो उनकी डेथ के बाद सपिंड शादी वाली महिला को अपने पति की पेंशन भी नहीं मिलेगी.

बीवी भी गई और बहन भाई भी गए

इस तरह की शादी में शादी टूटते ही वह इंसान आपका जीवनसाथी तो रहता ही नहीं, साथ ही बचपन से बना-बनाया खून का रिश्ता या पारिवारिक रिश्ता (बहन, भाई, मौसेरा/फुफेरा भाई) भी हमेशा के लिए खत्म हो जाता है.

झगड़े में बीच बचाव करवाने के लिए रिश्तेदारी भी नहीं बचती

सामान्य शादियों में जब पति-पत्नी के बीच झगड़े होते हैं, तो दोनों पक्षों के बड़े-बुजुर्ग, मौसी, बुआ, मामा बैठकर बीच-बचाव कराते हैं. लेकिन यहाँ मध्यस्थता कराने वाला कोई बचता ही नहीं, क्योंकि वही रिश्तेदार खुद इस रिश्ते के खिलाफ होकर पहले ही दूर हो चुके होते हैं. यदि कल को इस रिश्ते में कोई अनबन या तलाक की नौबत आती है, तो आप न केवल अपना जीवनसाथी खोते हैं, बल्कि अपना सगा/करीबी रिश्ता भी हमेशा के लिए गंवा बैठते हैं. अगर किसी का तलाक होता है, तो सिर्फ पति या पत्नी से रिश्ता खत्म होता है. आपका अपना परिवार, आपके भाई-बहन और रिश्तेदार आपके साथ खड़े रहते हैं. लेकिन ऐसी शादियों में खानदान तो पहले ही आपके प्यार की भेंट चढ़ चुका होता है.

परिवार से दुःख में सहारा भी नहीं मिलता

यह फैसला आपने खुद सबसे लड़ झगड़कर किया होता है. इसलिए अगर कुछ सालों बाद आप दोनों की नहीं बनती तो अपने मन की बातें शेयर करने के लिए या फिर रोने के लिए एक कंधा भी आपको नहीं मिलेगा क्योंकि अपने माता-पिता और रिश्तेदारों को मुंह दिखाने की जगह नहीं बचती. साथ ही परिवार का तर्क सीधा होता है: “जब हमारी बात नहीं मानी थी, तो अब हमारे पास क्यों आए हो?” इस तरह इंसान सामाजिक और पारिवारिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है. इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए.

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