Religion based voting : हमारी सिविक सैंस बहुत खराब है, इस का रोना अकसर रोया जाता है पर यह नहीं ढूंढ़ा जाता कि इस का कारण क्या है. हमारे सारे शहर कूढ़े के ढेर हैं. नालों में गंदा पानी उफन कर बाहर आ रहा है, कहीं भी साफसुथरी पक्की सड़कें नहीं हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट खस्ता हालत में है. प्राइवेट तो क्या सारे गवर्नमैंट कंस्ट्रक्शन भी धर्म वाले कलर्स को दिमाग में रख कर बनाए और मैंटेन किए जाते हैं.
इस मामले में हम सब दूसरों को दोष देते रहते हैं पर खुद को दोष नहीं देते कि सालदरसाल हम लोग वोट से ऐसे लोगों को चुन रहे हैं जो अपने सिर से बला को उतार कर हमारे सिर पर सिविक रिस्पौंसिबिलिटी डाल सकें. हम ऐसे लोग चुनते हैं जो हर सड़क पर कब्जा कर के मंदिर बनवा सकें, हर खाली जगह पर आश्रम बनवा डालें, हर पेड़ के नीचे लोगों की घरों के मंदिरों की फालतू की मूर्तियां डलवा सकें, नदियों में पूजा के सूखे फूल डालने की सीख दें.
सिविक सैंस कहीं पीछे से आ कर हमारे कंधे पर सवार न हो जाए हम सब उस के लिए बड़े तैयार रहते हैं. गरीबी इस के लिए जिम्मेदार है पर उस से ज्यादा भक्ति है जहां सिर्फ अव्यवस्था का पाठ पढ़ाया जाता है और सिखाया जाता है कि जिस ने पहले पूजा की उसी ने भगवान का सारा आशीर्वाद बटोर लिया.
शहरों को चमकाने के लिए जो ऐफिशिएंसी व फार साइटेडनैस चाहिए उस की हम में, वोटरों में, नेताओं में, अफसरों में, कर्मचारियों में अगर बेहद कमी है तो इसलिए कि हमें हर रोज यही पाठ पढ़ाया जाता है कि आप कूड़ा फैलाने, अव्यवस्था पैदा करने का कर्म करते रहो, फल जो सड़ कर बदबू देगा, गंदगी करेगा, उस की चिंता न करो. इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में आप साफसुथरे शहर में पैदा होंगे अगर इस जन्म वोटदान सही करते रहे.
शहरी जीवन का सुख हम विश्व की थर्ड या फोर्थ इकोनौमी बन कर भी नहीं उठा पा रहे. हर शहर में मुश्किल से 2-3त्न जगहें होंगी जहां लगेगा कि कोई देखभाल करता है पर वे बेहद महंगी हैं और वहां केवल अमीरों को देखा जा सकता है.
सिविक सैंस असल में वोट डालने में इंटैलिजैंस से आएगी पर यदि वोट मंदिर बनाने, सस्ती बिजली, खाते में कुछ रुपए, सस्ते खाने के नाम पर लिए जा रहे हों तो जो चुन कर आएंगे, जिन पर शहर को मैनेज करने की ड्यूटी होगी, कभी शहरों को साफ न रख सकेंगे.
साफ शहर, शहरों में पक्की सड़कें, सड़कों के किनारे पेड़ और लाइटें, चौराहों पर सही ट्रैफिक लाइटें, बिन गड्डों वाले फुटपाथ, हर 40 कदम पर वेस्टबिन, बिना ऐनक्रोचमैंट वाली गलियां और फुटपाथ, पेंट की हुई बैंचें, हर थोड़ी दूर पर बाग लग्जरी नहीं, राइट हैं. शहर इतना कमा रहे हैं कि ये काम हो सकते हैं. यूरोप के 2000 साल पुराने शहरों की खुदाई में मिले खंडहरों से पता चलता है कि ये सुविधाएं तब थीं जब मौडर्न टैक्नोलौजी नहीं थी क्योंकि तब राज वे लोग करने आए थे जिन्होंने शहर को कमाने के लिए अट्रैक्टिव बनाया था, आज वोट खरीद कर बने नेता शहर से कमाने की सोच कर आते हैं.
इंदौर जैसा साफ कहा जाने वाला शहर भी साफ पानी नहीं दे सकता. कभी प्लेग का शिकार रहा सूरत कुछ सालों के लिए देश का सब से सुंदर शहर रहा पर अब वह भी पीकों और कूड़े से भर गया है. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बैंगलुरु, चैन्नई एक से बढ़ कर एक गंदगी के शिकार हैं. किसी शहर में आंख पर पट्टी खोल कर ले जाओ और फिर पट्टी हटा कर दिखाओ, गंदगी से पता चल जाएगा कि भारत के ही शहर में हैं.
घरों की पढ़ीलिखी औरतें इस मिसमैनेजमैंट की सब से बड़ी विक्टिम हैं पर कारण भी वही हैं. वही वोट डालते समय अपने पति के राजनीतिक या धार्मिक कारणों को सुनसुन कर वोट देती हैं, शहरों की सफाई का मुद्दा कहीं नहीं रहता. व्हाट्सऐप या सोशल मीडिया पर कूड़े के ढेर दिखाने से कूड़ा हटेगा नहीं. किट्टी पार्टी में शोर मचाने से शहर का ऐनक्रोचमैंट कम नहीं होगा.
शहर को ढंग से चलाना है तो हरेक को सही उंगली का इस्तेमाल करना होगा और हर हाथ में ग्लव्स पहन कर घर साफ करने की आदत भी डालनी होगी.
